Xi Jinping : पीली मिट्टी का बेटा शी जिनपिंग

21वीं सदी में ऐसे बहुत कम नेता हैं जो गुफा में रहे हों, जिन्होंने खेतों में मेहनत की हो और फिर वो सत्ता के शिखर पर पहुंचे हों। पांच दशक पहले जब चीन में सांस्कृतिक क्रांति का तूफ़ान आया था, उस वक्त 15 साल के लड़के शी जिनपिंग ने देहात में मुश्किल भरी ज़िंदगी की शुरुआत की थी।

चीन के अंदरूनी इलाके में जहां चारों तरफ पीली खाइयां थीं, ऊंचे पहाड़ थे वहां से जिनपिंग की ज़िंदगी की जंग शुरू हुई थी। जिस इलाके में जिनपिंग ने खेती-किसानी की शुरुआत की थी, वो गृह युद्ध के दौरान चीन के कम्युनिस्टों का गढ़ था। येनान के लोग अपने इलाके को चीन की लाल क्रांति की पवित्र भूमि कहते थे।

शी जिनपिंग की कहानी काफी अजब-गजब किस्म की है। दिलचस्प बात ये है कि जहां चीन के तमाम अंदरूनी इलाकों का तेजी से शहरीकरण हो रहा है, वहीं राष्ट्रपति शी के गांव को जस का तस रखा गया है। कम्युनिस्ट पार्टी के भक्तों के लिए वो एक तीर्थस्थल है।

1968 में चेयरमैन माओ ने फरमान जारी किया था कि लाखों युवा लोग शहर छोड़कर गांवों में जाएं। वहां वो जिंदगी की मुश्किलात का सामना करके, आगे बढ़ने के सबक किसानों और मजदूरों से सीखें। शी जिनपिंग कहते हैं कि उस तजुर्बे से उन्होंने भी बहुत कुछ सीखा। शी का कहना है कि आज वो जो कुछ भी हैं, वो उसी दौर की वजह से हैं। उनका किरदार उसी गुफा वाले दौर ने गढ़ा।

जिनपिंग अक्सर कहा करते हैं, ‘मैं पीली मिट्टी का बेटा हूं। मैंने अपना दिल लियांगजिआहे में छोड़ दिया था। उसी जगह ने मुझे बनाया।’ जिनपिंग कहते हैं ‘जब मैं लियांगजिआहे पहुंचा तो 15 बरस का लड़का था। मैं फिक्रमंद था। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। लेकिन 22 साल का होते-होते मेरी सारी शंकाएं दूर हो गई थीं। मैं आत्मविश्वास से लबरेज था। मेरी ज़िंदगी का मकसद पूरी तरह साफ हो चुका था।’

उस दौर में हर शख़्स चेयरमैन माओ की मशहूर छोटी लाल किताब पढ़ा करता था। आज चेयरमैन शी के खयालात बड़ी-बड़ी लाल होर्डिंग पर लिखे दिखाई देते हैं। उनके सम्मान में एक म्यूज़ियम भी बनाया गया है। इस म्यूज़ियम में इस बात का जिक्र मिलता है कि उन्होंने अपने साथी किसानों-मज़दूरों के लिए क्या-क्या अच्छे काम किए। लेकिन इन किस्सों को इस तरह काट-छांटकर पेश किया गया है कि उसमें शी जिनपिंग की जिंदगी की असली कहानी का पता लगाना बेहद मुश्किल है।

राष्ट्रपति के तौर पर अपने पहले पांच साल के कार्यकाल में शी जिनपिंग ने अपना एक महान इंसान का किरदार गढ़ा है। वो खद को एक ऐसे शख़्स के तौर पर पेश करते हैं, जो जनता का नेता है।

वो अक्सर गली-कूचों की सैर पर जाते हैं, वो गरीबों के घर जाया करते हैं, वो जनता की ज़ुबान में बात करते हैं, वो अक्सर छात्रों को बताते हैं कि ज़िंदगी एक बटन वाली कमीज़ है, जिसके शुरू के बटन सही तरीके से लगाने चाहिए, वरना सारे बटन गलत बंद होते हैं।

वो कई बार लंच के लिए कतार में खड़े हुए हैं। वो अपने खाने का बिल खुद भरते हैं। लेकिन एक मिथक के तौर पर शी जिनपिंग की कहानी का केंद्र है उनका गुफा में बिताया हुआ शुरुआती जीवन, जहां वो सियासत से अलग कर दिए गए थे। जिनपिंग कहते हैं, ‘जिनको सत्ता का तजुर्बा कम है, वो इसे नया और राजदाराना तजुर्बा समझते हैं।

लेकिन मैं इन पर्दों के पार, बड़ी गहराई से सियासत को देखता हूं। मैं फूलों के हार और तालियों की गड़गड़ाहट से परे हटकर देखता हूं। मैं नजरबंदी वाले घर देखता हूं, मैं इंसानी रिश्तों की कमजोरी देखता हूं, मैं राजनीति को गहराई से समझता हूं।’

बचपन से जवानी के बीच शी जिनपिंग दोनों तरह की ज़िंदगी का तजुर्बा कर चुके थे। उनके पिता भी कम्युनिस्ट क्रांति के हीरो थे। ऐसे में शी ने एक राजकुमार वाली जिंदगी का तजुर्बा भी किया था।

2009 के एक खुफिया अमरीकी केबल के मुताबिक़, शी के एक करीबी दोस्त ने बताया था कि उनके शुरुआती दस सालों ने उनके किरदार की बुनियाद रखी थी। इसके बाद कम्युनिस्ट क्रांति के दौरान जब वो किसानों के बीच रहे, तो उस तजुर्बे ने भी उनकी आगे की जिंदगी पर गहरा असर डाला था। लेकिन साठ के दशक में चेयरमैन माओ ने अपनी ही पार्टी के नेताओं पर जो ज़ुल्म ढाए, उसका सितम शी जिनपिंग को भी उठाना पड़ा था।

पहले तो शी के पिता को पार्टी से बाहर कर दिया गया, फिर उन्हें जेल भेज दिया गया। शी के परिवार को बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी। उनकी एक बहन की मौत हो गई। शायद उसने ख़ुदकुशी कर ली थी। 13 साल की उम्र में ही शी जिनपिंग की पढ़ाई बंद हो गई थी क्योंकि बीजिंग के सारे स्कूल बंद कर दिए गए थे।

ऐसा इसलिए ताकि छात्र अपने अध्यापकों की निंदा कर सकें, उन्हें पीट सकें या फिर उन्हें जान से मार सकें। परिवार और दोस्तों के बग़ैर, शी जिनपिंग काफ़ी दिनों तक माओ के बदनाम रेड गार्ड्स से बचते-छुपते रहे। एक बार तो उन्होंने एक रिपोर्टर से एक एनकाउंटर का भी ज़िक्र किया था।

शी जिनपिंग ने बताया था कि, ‘मैं केवल 14 साल का था। रेड गार्ड्स ने मुझसे पूछा कि तुम अपने जुर्म को कितना गंभीर मानते हो? मैंने कहा कि तुम खुद अंदाजा लगा लो, क्या ये मुझे मारने के लिए काफी है?

रेड गार्ड्स ने कहा कि हम तुम्हें सैकड़ों बार मार सकते हैं। मेरे हिसाब से एक बार मरने या बार-बार मारे जाने में कोई फ़र्क नहीं।’ शी की पीढ़ी के बहुत से चीनी लोग ये मानते हैं कि उस दौर में जब स्कूल बंद हो गए थे, जब वो जान बचाकर छुपते फिर रहे थे तब की मुश्किलों ने उनके जहन पर गहरा असर डाला था। उन्हें मज़बूत बनाया था।

खुद शी जिनपिंग कहते हैं कि मुझे अपनी गलतियां बताए जाने में लुत्फ़ आने लगा था। हालांकि वो ये भी कहते हैं कि हर किसी की बात को वो गंभीरता से नहीं लेते थे। साठ के दशक में चीन के गांवों की ज़िंदगी बहुत कठिन थी। बिजली नहीं हुआ करती थी। गांवों तक जाने का रास्ता भी पक्का नहीं होता था। खेती के लिए मशीनें भी नहीं थीं। उस दौर में शी ने खाद ढोने, बांध बनाने और सड़कों की मरम्मत का काम सीखा था।

वो जिस गुफा में रहते थे, वहां कीड़े-मकोड़ों का डेरा होता था। उसमें वो ईंटों वाले बिस्तर पर तीन और लोगों के साथ सोया करते थे। उस वक्त खाने के लिए उन्हें दलिया, बन और कुछ सब्ज़ियां मिला करते थे। उनके एक किसान साथी लू होउशेंग की मानें तो भूख लगने पर ये कोई नहीं देखता था कि खाने में मिल क्या रहा है। रात में शी जिनपिंग अपनी गुफा में ढिबरी की रोशनी में पढ़ा करते थे। उन्हें पढ़ने का शौक था। शी सिगरेट भी बहुत पीते थे।

शी अक्सर माओ के भाषण और अखबार पढ़ा करते थे क्योंकि पढ़ने के लिए इसके सिवा कुछ और था भी नहीं। शी के दोस्त लू के मुताबिक, शी बहुत संजीदा रहा करते थे। हंसी-मज़ाक उन्हें पसंद नहीं था। वो न तो दोस्तों के साथ खेला करते थे और न ही उनकी दिलचस्पी गर्लफ्रैंड बनाने में थी।

18 की उम्र में वो अपना सियासी सफर शुरू करने के लिए तैयार थे। वो कम्यूनिस्ट यूथ लीग में शामिल हो गए। 21 साल की उम्र में वो बार-बार ठुकराए जाने के बावजूद कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए। शुरुआत से ही वो जमीनी हकीक़त से वाबस्ता थे। उनकी निगाह हमेशा लक्ष्य पर होती थी। जब उनके दोस्त खेलने-कूदने में मसरूफ़ होते थे, तब वो काम में लगे रहते थे। वह बेहद महत्वाकांक्षी थे।

कम्युनिस्ट क्रांति के बाद वो कट्टर कम्युनिस्ट बन गए थे। जब शी 25 साल के थे, तो उनके पिता की पार्टी में दोबारा वापसी हो गई थी। उन्हें गुआंगडॉन्ग सूबे में काम करने के लिए भेजा गया था। चीन का ये बड़ा सूबा हांगकांग के बेहद क़रीब था। ये चीन की आर्थिक तरक़्क़ी का पावरहाउस बन गया। पिता की मदद से शी जिनपिंग ने अपना करियर तेज़ी से आगे बढ़ाया।

सत्तर के दशक में वो चीन की सेना में शामिल हो गए थे। शी का व्यक्तित्व बेहद अंतर्मुखी था। शायद यही वजह थी कि एक राजनयिक की बेटी से उनकी पहली शादी नाकाम रही थी। हां इसका फायदा उन्हें सियासी करियर आगे बढ़ाने में जरूर मिला था।

शी जिनपिंग ने तरक्की की सीढ़ियां बेहद खामोशी से दबे पांव चढ़ीं। शी ने उस वक़्त सुर्ख़ियां जरूर बटोरी थीं, जब उन्होंने अपनी मौजूदा पत्नी पेंग लियुआन से शादी की। पेंग एक मशहूर गायिका थीं। बरसों तक शी की पहचान लियुआन के पति के तौर पर रही थी।

शी ने देखा था कि उनके पिता को माओ ने किस तरह सताया था इसीलिए वो बेहद खामोश रहा करते थे। 40-50 की उम्र में एक सीनियर नेता बनने के बावजूद वो सिर्फ़ काम से काम रखा करते थे। एक करीबी शख़्स ने कहा कि शी जिनपिंग एक ऐसी सुई हैं, जो रेशम के कवर में बंद हैं।

अमरीका में शी जिनपिंग 1985 में कुछ दिन एलेनोर ड्वोरचाक के घर में रहे थे। वो उनके बेटे के साथ उसके कमरे में सोते थे, जहां दीवार पर ‘स्टारट्रेक’ फिल्म के पोस्टर चिपके हुए थे। एलेनोर का घर अमरीका के आयोवा सूबे के मस्कैटिन शहर में है। जब 2012 में जिनपिंग आयोवा के दौरे पर आए थे, तो एलेनोर ने बताया था कि किसी को ये अंदा़जा भी नहीं हो सकता कि उनके घर आया शख़्स एक दिन किसी देश का राष्ट्रपति बन जाएगा।

2012 में शी जिनपिंग चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता बने। वो कम्युनिस्ट पार्टी के तमाम खेमों के आम सहमति से चुने गए नेता थे लेकिन किसी को भी ये अंदाज़ा नहीं था कि अगले पांच साल में वो कैसे नेता बनकर उभरने वाले हैं।

सरकार की शाहखर्ची रोकने के लिए शी जिनपिंग ने बड़े-बड़े भोज आयोजित करने पर रोक लगा दी। वो कारों के काफिले में चलने के बजाय कई बार वैन से चलते थे। जब शी जिनपिंग सत्ता में आए तो उन्होंने जनता से एक साफ-सुथरी सरकार का वादा किया।

शी ने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया था। वो हर छोटे-बड़े भ्रष्ट नेता को सबक सिखाना चाहते थे। उन्होंने इस वादे पर सख़्ती से अमल किया था।

शी जिनपिंग ने साफ कर दिया कि जो पैसा कमाना चाहता है, वो कम्युनिस्ट पार्टी में न आए। लेकिन पार्टी के करीब 9 करोड़ कार्यकर्ताओं में से ज़्यादातर का मकसद तो पैसा बनाना ही है। कम्युनिस्ट पार्टी, बरसों से घूसखोरी, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से ही चलती रही है। इस सिस्टम को साफ करने के लिए कुछ बड़ी मछलियों पर कार्रवाई भर से काम नहीं चलने वाला था।

शी जिनपिंग ने कई फरमान जारी किए। पार्टी के हर नेता के दफ्तर के साइज से लेकर नेताओं के लंच या डिनर में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों की संख्या को लेकर भी शी ने नियम बना दिए। वो अक्सर गांव के लोगों से मिलने जाते रहे हैं। वो खुद को कम्युनिस्ट पार्टी के रईस और भ्रष्ट नेताओं से अलग रखकर पेश करते हैं पर तमाम कोशिशों के बावजूद शी, ख़ुद को पार्टी के रईस नेताओं की जमात से अलग नहीं कर सकते।

शी के राष्ट्रपति बनने से पहले ही उनके कई रिश्तेदार करोड़पति हो चुके थे। हालांकि इसमें शी का कोई योगदान रहा हो, इसके सबूत नहीं मिलते हैं। लेकिन पिछले पांच साल में जिनपिंग ने एक संदेश जरूर दिया कि शी जिनपिंग से उलझोगे तो मरोगे। भ्रष्टाचार के आरोप में शी जिनपिंग ने बहुत से नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया।

शी जिनपिंग ने सोवियत संघ के विघटन से भी जिंदगी का सबक सीखा है। वो मानते हैं कि सोवियत संघ का पतन इसलिए हुआ क्योंकि वो अपना मकसद ही भूल गया था। वो अपने लक्ष्य से भटक गया था।

उन्होंने एक भाषण में कहा भी था कि सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से ज़्यादा सदस्य थे फिर भी किसी ने विघटन को रोकने की कोशिश नहीं की। शी खुलेपन के सख्त खिलाफ हैं।

जिनपिंग अक्सर 11वीं सदी के चीनी विचारक सू शी का जिक्र करते हैं जो अंदरूनी खतरे से आगाह किया करते थे और कहा करते थे कि हालात पर सख्त निगरानी की जरूरत है वरना भीतरी खतरा तबाह कर देगा। शी जिनपिंग अक्सर अपने नागरिकों को सीख देते हैं कि वो चीन के अपने जीवन मूल्य को अपनाएं। पश्चिमी सोच से प्रभावित न हों। क्योंकि अगर हम दूसरों की नकल करेंगे, तो अपनी पहचान खो बैठेंगे।

शी जिनपिंग के राज में मुसलमान, ईसाई, मज़दूर कार्यकर्ता, ब्लॉगर, पत्रकार, महिलावादी और वक़ील, सबको जेल भेजा गया है। शी आंदोलन करने वालों को बिलकुल भी पसंद नहीं करते। शी जिनपिंग अक्सर अपने देश के लोगों को सलाह देते हैं कि वो देश से प्यार करें। अपनी मातृभूमि से मोहब्बत करें। चीन के कम्युनिस्ट इंकलाब का सम्मान करें। चीन की संस्कृति और जीवन मूल्यों को जानें-समझें।

2012 में सत्ता में आने के साथ ही शी ने चीन को सबसे बड़ा खिलाड़ी बनाने की ठान ली थी। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सौवीं सालगिरह यानी 2021 तक चीन आर्थिक तरक्की के मामले में औसत देश हो जाएगा।

वहीं चीन में कम्युनिस्टों के सत्ता में आने के सौ साल पूरे होने पर यानी 2049 तक चीन पूरी तरह से विकसित, अमीर और ताकतवर देश बन जाएगा। जल्द ही चीन की अर्थव्यवस्था अमरीका से 40 फ़ीसदी ज़्यादा बड़ी हो जाएगी। 2049 तक खरीदने की ताकत के मामले में चीन की अर्थव्यवस्था, अमरीका से तीन गुना बड़ी होगी।

चीन और शी जिनपिंग के लिए पिछले चार दशक एकदम अनूठे रहे हैं जब 1972 में अमरीका के राष्ट्रपति चेयरमैन माओ से मिले थे, तो उस वक्त शी जिनपिंग एक गुफा में रहा करते थे और ढिबरी की रोशनी में पढ़ाई किया करते थे। उस वक़्त रिचर्ड निक्सन ने कहा था, ‘भविष्य को देखते हुए हम चीन को बाकी देशों से अलग करके नहीं रख सकते वरना वो अलग-थलग होकर अपने ख्वाब अपने आप में बुनता रहेगा, दूसरों से नफरत को दिल में बैठाता रहेगा, अपने पड़ोसियों को धमकाता रहेगा।’

जब पश्चिम ने अपने दरवाजे चीन के लिए खोले तो शी की पीढ़ी के कई लोगों ने अपना देश छोड़ने का फ़ैसला किया था लेकिन शी को इस बात का अहसास था कि अपना देश छोड़कर जाने पर वो कुछ ख़ास नहीं कर पाएंगे। वो विदेशियों से बड़े आत्मविश्वास से मिलते हैं और वो कहते हैं, ‘चीन क्रांति का निर्यात नहीं करता, भुखमरी और गरीबी का निर्यात नहीं करता, चीन आपको कोई सिरदर्दी नहीं देता तो फिर आपको और क्या चाहिए।’

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प्रवीण कुमार
मैं कौन हूं, क्या हूं, क्यों हूं, यह सब खुद मुझे भी नहीं पता क्यों कि खुद के बारे में बताना, जताना या उकेरना सबसे मुश्किल काम होता है। हां! बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और गीता के दर्शन से मैंने अपने जीवन को संवारने की कोशिश जरूर की है। बिहार के बेगूसराय जिले का रहने वाला हूं। जाने-अनजाने में पत्रकारिता के आंगन में ढाई दशक से अधिक वक्त से कूद-फांद कर रहा हूं। शुरूआती दौर में जी भरकर देश के तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में वैचारिक लेखन किया। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर लिखने में अपनी रूचि रहती है। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर लेखन कर रहा हूं। डिजिटल और सोशल मीडिया कंसल्टेंट के तौर भी हाथ साफ करता रहता हूं। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान फेक न्यूज़ की बयार को गहराई से जांचा परखा था। उससे पहले नोएडा स्थित ज़ी न्यूज़ में हिन्दी वेबसाइट की शुरूआत कर काफी लंबा वक्त गुजारा। इससे भी पीछे का पूछेंगे तो करीब डेढ़ दशक तक दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, अमर उजाला, दैनिक भास्कर समेत कई राष्ट्रीय व क्षेत्रीय अखबारों के संपादकीय विभाग में अलग-अलग भूमिकाओं को निभाते हुए एक पत्रकार के तौर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की, एक बेहतर इंसान भी बनने की कोशिश की, पर कितना बन पाया ये सब ''ऊपर वाले पर'' छोड़ता हूं...

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