यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम एक खतरनाक संकेत

प्रवीण कुमार

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 28 जनवरी 2019 को छत्तीसगढ़ में आयोजित किसान रैली में लोगों से ये वादा किया कि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद अगर उनकी सरकार बनी तो वो सभी ग़रीबों के लिए एक न्यूनतम आमदनी सुनिश्चित करेंगे।

अपने भाषण में उन्होंने कहा, कांग्रेस पार्टी ने निर्णय ले लिया है कि हिंदुस्तान के हर ग़रीब व्यक्ति को कांग्रेस पार्टी वाली सरकार गारंटी से न्यूनतम आमदनी देगी। इसका मतलब देश में न कोई भूखा रहेगा, न कोई ग़रीब रहेगा।

इस चुनावी घोषणा के अंत में राहुल गांधी ने ये भी दावा किया कि ये काम आज तक दुनिया की किसी सरकार ने नहीं किया है। ये काम दुनिया में सबसे पहले हिंदुस्तान की 2019 के बाद बनने वाली कांग्रेस सरकार करने जा रही है।

हालांकि राहुल ने अपने भाषण में ये नहीं बताया कि वो इस स्कीम को कैसे लागू करेंगे और किन शर्तों पर लोगों को इसका लाभ मिलेगा। राहुल का ये दावा भी सत्य पर आधारित नहीं है कि दुनिया की किसी भी सरकार ने ऐसी स्कीम लागू नहीं किया है।

वर्तनाम में कई देशों में चल रहीं कल्याणकारी योजना राहुल की अवधारणा वाली इस योजना से मिलती-जुलती है। लेकिन कांग्रेस या भाजपा जो भी यूबीआई की बात कर रहा है उसके पीछे के संकेत समझना देश के लिए बहुत जरूरी है।

साफ शब्दों में कहा जाए तो आने वाले वक्त में देश में बेरोजगारी का संकट बढ़ने वाला है। नौकरियां और कम होने जा रही है। इस हालात से निपटने के लिए अभी से राजनीतिक दलों के नेता बेरोजगार युवाओं की बढ़ती फौज को संभालने का एक लॉलीपॉप थमा रही है।

भारत से लेकर यूरोप तक, पूरी दुनिया में यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम लोगों को लुभाती है। वामपंथी और उदारवादी लोगों को लगता है कि इससे गरीबी और असमानता खत्म होगी। दक्षिणपंथी इसे और ज्यादा प्रभावी व नौकरशाही से मुक्त कल्याण योजना मानते हैं।

अगर आपको याद हो तो नरेंद्र मोदी जब देश की सत्ता में आए तो उन्होंने वादा किया था कि वे मनरेगा जैसी योजनाओं को खत्म कर देंगे। उन्होंने इसे मनमोहन सरकार की ऐतिहासिक नाकामी करार दिया था। लेकिन जब बजट पेश किया गया तो उन्होंने मनरेगा के मद में 10 फीसदी धन बढ़ा दिया।

आज हकीकत यह है कि पूरी दुनिया में नौकरियां कम हो रही हैं और आने वाले दिनों में नौकरियां और कम होंगी खासतौर से जैसी नौकरियां लोग चाहते हैं। बहुत से विशेषज्ञ भविष्यवाणी कर रहे हैं कि दुनिया की सबसे विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश भी अगले एक-डेढ़ दशक में भीषण बेरोज़गारी का सामना करेंगी।

इसका अर्थ साफ है कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम्स पर ज़्यादा से ज़्यादा ध्यान दिया जाए। भारत में तो पश्चिम के मुकाबले ज्यादा कठिन समस्याएं हैं। हमारे यहां प्रति व्यक्ति आय पश्चिमी देशों के मुकाबले काफी कम है। इसलिए हमें दूसरे देशों से पहले अपने यहां लोगों को पैसे से मदद करनी पड़ेगी।

2019 के आम चुनाव बहुत दूर नहीं हैं और इसके मद्देनज़र देश के दो बड़े राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा लोक-लुभावन वादों की पोटली खोलकर बैठे हैं। इन्हीं में से एक है न्यूनतम मासिक आय (Universal Basic Income-UBI) जिसका अर्थ है सरकार की तरफ से देश के हर नागरिक को एक निश्चित मासिक आय देना।

भारत में इसे सभी गरीब परिवारों पर लागू करने की बात चल रही है। बेशक सरकार ने अंतरिम बजट में इसका कोई उल्लेख नहीं किया, फिर भी यह मुद्दा लगातार चर्चा में बना हुआ है।

सिक्किम सरकार ने राज्य में UBI स्कीम्स को लागू करने का प्रस्ताव रखा है। यदि सिक्किम सरकार ऐसा करने में सफल हो जाती है तो ऐसा करने वाला वह देश का पहला राज्य होगा।

1938 में भी देश में न्यूनतम आय की गारंटी देने की योजना पर विचार किया गया था। 1964 में भी सरकार ने इसे ठंडे बस्ते से निकालना चाहा था, लेकिन बात नहीं बनी। 2011-12 में बेहद छोटे स्तर पर इसे मध्य प्रदेश के एक गांव में लागू किया गया। इसके बाद 2017-18 के आर्थिक सर्वेक्षण में इसका ज़िक्र किया गया था।

क्या है यूबीआई स्कीम?
लंदन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर Guy Standing ने गरीबी हटाने के लिए अमीर-गरीब, सबको एक निश्चित अंतराल पर तयशुदा रकम देने का विचार पेश किया था। उनके विचार के तहत इस योजना का लाभ लेने के लिये किसी भी व्यक्ति को अपनी कमज़ोर सामाजिक-आर्थिक स्थिति अथवा बेरोज़गारी का सबूत देने की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिये। ऐसे में कह सकते हैं कि यूबीआई देश के प्रत्येक नागरिक को एक निश्चित समयांतराल पर दिया जाने वाला बिना शर्त नकद हस्तांतरण है।

क्या है प्रो. स्टैंडिंग की थ्योरी?
प्रो. स्टैंडिंग के मुताबिक, भारत में यूबीआई को लागू करने पर जीडीपी का 3 से 4 प्रतिशत खर्च आएगा, जबकि अभी कुल जीडीपी का 4 से 5 प्रतिशत सरकार सब्सिडी में खर्च कर रही है।

आर्थिक सर्वे 2016-17 में भी योजना को लागू करने के लिये जो तीन सुझाव दिये गए थे, उनमें पहला सुझाव सबसे गरीब 75 प्रतिशत आबादी को लाभ दिये जाने का था। इसमें कहा गया था कि इस पर जीडीपी का 4.9 प्रतिशत हिस्सा खर्च होगा।

प्रो. स्टैंडिंग के मुताबिक, यूबीआई और सब्सिडी दोनों साथ नहीं चल सकते। सरकार का वित्तीय अनुशासन प्रभावित नहीं हो, इसके लिये सरकार सब्सिडी को चरणबद्ध तरीके से हटा सकती है और सब्सिडी पूरी तरह खत्म हो सकती है।

इसकी जगह निश्चित रकम सीधे लोगों के खाते में जाती रहेगी। यह अपनी प्रकृति में यूनिवर्सल है, टारगेटेड नहीं। यह बिना शर्त होने वाला नकदी हस्तांतरण है, जिसके लिये किसी भी प्रकार की पहचान साबित करने की जरूरत नहीं है।

यूबीआई एक न्यूनतम आधारभूत आय की गारंटी है जो प्रत्येक नागरिक को बिना किंतु-परंतु किये हर माह सरकार द्वारा दी जाएगी। इसके लिये व्यक्ति को केवल उस देश का नागरिक होना ज़रूरी होता है, जहां इसे लागू किया जाना है।

2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में यूबीआई का जिक्र किया गया था। इस सर्वे में कहा गया था कि भारत में केंद्र सरकार की तरफ से प्रायोजित कुल 950 योजनाएं हैं और जीडीपी बजट आवंटन में इनकी हिस्सेदारी लगभग 5 प्रतिशत है।

ऐसी ज़्यादातर योजनाएं आवंटन के मामले में छोटी हैं और टॉप 11 स्कीमों की कुल बजट आवंटन में हिस्सेदारी 50 प्रतिशत है। इसे ध्यान में रखते हुए सर्वे में यूबीआई को मौजूदा स्कीमों के लाभार्थियों के लिये विकल्प के तौर पर पेश करने का प्रस्ताव दिया गया है।

सर्वे के अनुसार, ‘इस तरह से तैयार किये जाने पर यूबीआई न सिर्फ जीवन स्तर को बेहतर कर सकता है, बल्कि मौजूदा योजनाओं का प्रशासनिक स्तर भी बेहतर कर सकता है। इस आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक देश के सबसे गरीब 25 प्रतिशत परिवारों को 7,620 रुपए वार्षिक दिये जाने का प्रस्ताव रखा गया था।

लेकिन इसकी लागत और कई तरह की सब्सिडी वापस लिये जाने में आने वाली दिक्कतों के मद्देनज़र इसे लागू नहीं किया गया। तब इससे राजकोष पर लगभग 7 लाख करोड़ रुपए का भार पड़ने का अनुमान लगाया गया था।

देश में गरीबी का आंकलन
देश में गरीबी रेखा के दायरे में कौन-कौन आता है, इसका आंकलन ठीक से नहीं हो पाया है। तेंदुलकर फॉर्मूले में 22 प्रतिशत आबादी को गरीब बताया गया था, जबकि रंगराजन फॉर्मूले ने 29.5 प्रतिशत आबादी को गरीबी रेखा से नीचे माना था। इसके बावजूद सरकार आर्थिक और सामाजिक रूप से कमज़ोर वर्ग को एक निश्चित धनराशि की मदद ले सकती है। एक अनुमान के अनुसार यूबीआई स्कीम के तहत पहले देशभर के करीब 20 करोड़ ज़रूरतमंदों को फायदा मिलेगा।

मध्य प्रदेश में सफल प्रयोग
यूनिवर्सल बेसिक इनकम मध्य प्रदेश की एक पंचायत में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया गया था, जिसके काफी अच्छे परिणाम देखने को मिले थे। इंदौर के 8 गांवों के 6000 लोगों को 2010 से 2016 के बीच इस योजना में लाया गया था। इसमें पुरुष और महिलाओं को 500 रुपए और बच्चों को हर महीने 150 रुपए दिये गए। 5 सालों में स्कीम का लाभ मिलने के बाद इनमें से अधिकांश लोगों ने अपनी आय बढ़ने की बात स्वीकारी।

राह में चुनौतियां भी कम नहीं
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत जैसे विकासशील और जनसंख्या में विश्व में दूसरा स्थान रखने वाले देश की अर्थव्यवस्था यह बोझ उठाने में सक्षम है और इसको लागू करने की राह में क्या चुनौतियां हैं?

इसको लेकर सबसे बड़ा विवाद इस बात पर है कि असमानताओं और विविधताओं से भरे देश में इसका लाभ किस-किस को मिलना चाहिये? वैसे इस योजना से जुड़े अधिकांश लोग यह मानते हैं कि यूबीआई योजना तभी सफल हो सकती है जब इसका लाभ सभी को मिले।

प्रो. स्टैंडिंग भी यह मानते हैं कि यह योजना तभी सफल होगी, जब हर नागरिक को एक न्यूनतम आय हर महीने मिले और इसमें अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं होना चाहिये। यदि ऐसा किया जाता है तो यह योजना अपने मूल रूप में यूनिवर्सल नहीं रहेगी।

इससे भ्रष्टाचार बढ़ेगा और अन्य विवादों के उभरने की संभावना भी बनी रहेगी। लेकिन आर्थिक सर्वे 2016-17 में स्पष्ट कहा गया है कि यूबीआई के दायरे में देश की पूरी आबादी को नहीं लाया जा सकता, इसलिये इसके वास्तविक लाभार्थियों की पहचान करना सबसे बड़ी चुनौती है।

सर्वे में जो तीन सुझाव दिये गए थे, उनमें एक को भी आधार मानकर यूबीआई की शुरुआत की जाती है तो वास्तविक हकदार के योजना से बाहर छूटने की आशंका बनी रहेगी, जैसा कि हर कल्याणकारी योजना के साथ होता है।

देश में अब लगभग सभी के पास अपनी विशिष्ट आधार संख्या है, उस नंबर से जुड़े बैंक खाते में हर महीने एक तय धनराशि पहुंचाई जा सकती है, जैसे- एलपीजी सब्सिडी के मामले में अभी किया जा रहा है।

यहां जो बात गौर करने वाली है वह यह है कि बेशक आधार हर व्यक्ति की पहचान को स्थापित करता है, लेकिन यह लोगों का वर्गीकरण नहीं करता। ऐसे में लाभार्थी की बेहतर तरीके से पहचान किये बिना यूबीआई पर आगे बढ़ना ठीक नहीं होगा।

सबसे जटिल प्रश्न यह है कि यूबीआई का मानक क्या होगा? यदि यह गरीबी रेखा हो तो ग्रामीण क्षेत्र में 32 रुपए एवं शहरी क्षेत्र में औसतन 40 रुपए के अनुसार लगभग 1200 रुपए प्रतिमाह व 19,400 रुपए प्रतिवर्ष होते हैं। क्या इससे व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को पूरा कर सकता?

विदेशों में भी हो चुके हैं प्रयोग
ऐसा नहीं है कि यूबीआई की चर्चा सिर्फ भारत में ही हो रही है, बल्कि विदेशों में भी इसको लागू करने के लिये प्रयोग चल रहे हैं। अमेरिका में कैलिफोर्निया राज्य के स्टॉकटन में इसे आंशिक रूप से लागू करने पर विचार हो रहा है। यहां के 100 लोगों को प्रतिमाह 500 डॉलर डेढ़ साल तक दिये जाएंगे।

फिनलैंड ने जनवरी 2017 में 25 से 58 वर्ष के 2000 लोगों को यूबीआई की सुविधा दी थी, लेकिन दो वर्ष बाद ही इसे बंद कर दिया। इन सभी लोगों को 560 यूरो प्रतिमाह दिये जाते थे।

यूबीआई का अब तक का सबसे बड़ा प्रयोग अफ्रीकी देश केन्या में शुरू हुआ है। अमेरिकी चैरिटी संस्था GiveDirectly ने आधिकारिक तौर पर ग्रामीण केन्या में यूबीआई का परीक्षण शुरू किया है। केन्या के लगभग 120 गांवों के सभी निवासियों पर यह प्रयोग किया जा रहा है। इनमें कुल मिलाकर 16 हज़ार से अधिक लोग शामिल हैं, जिन्हें प्रयोग के बिना शर्त दौरान कुछ-न-कुछ नकद हस्तांतरण दिया जा रहा है। इनमें से कुछ गांवों को 12 वर्षों के लिये यूबीआई की सुविधा दी जानी है।

ब्राज़ील के कुछ इलाकों में भी प्रायोगिक तौर पर यूबीआई की सुविधा दी जा रही है। 2004 में वहां बोल्सा फेमिलिआ प्रोग्राम शुरू किया गया था, जिसके तहत परिवारों को बच्चों सहित एक निश्चित धनराशि देनी शुरू की गई।

2013 तक प्रत्येक परिवार को लगभग 30 डॉलर प्रतिमाह की सहायता दी गई, जो तत्कालीन न्यूनतम मज़दूरी का 4.4 प्रतिशत था। जब इसके नतीजों पर नज़र डाली गई तो पता चला कि इससे ब्राज़ील को कुपोषण का स्तर कम करने में सहायता मिली।

ईरान ने भी 2011 में यूबीआई जैसी योजना चलाई, जिसका उद्देश्य गैस और पेट्रोलियम पर मिलने वाली सब्सिडी को समाप्त करना था। पहले-पहल तो इस योजना से ईंधन के दामों में बढ़ोतरी देखी गई, लेकिन कुछ समय बाद स्थिति सामान्य हो गई। इसके तहत प्रत्येक परिवार को लगभग 40 डॉलर प्रतिमाह दिये गए।

2005 से 2009 के बीच मेक्सिको सरकार ने प्रोग्राम द अपोयो नाम की नीति पेश की, जिसके तहत प्रत्येक परिवार को न्यूनतम मजदूरी दर की 10 प्रतिशत राशि या उसके बराबर खाद्यान्न दिया जाना था। लेकिन इसके कार्यान्वयन में बरती गई लापरवाहियों के कारण इसे रद्द कर दिया गया।

एक पायलट परियोजना के तहत अल्पविकसित अफ्रीकी देश नामीबिया के दो गांवों में भी 2008-09 के बीच एक साल की अवधि के लिये यूबीआई की सुविधा दी गई थी। जर्मन प्रोटोस्टेंट चर्च द्वारा वित्त पोषित इस योजना से इस समयावधि में उन गांवों की खाद्यान्न समस्या कम हो गई थी।

स्विट्ज़रलैंड ने भी पिछले साल इस पर जनमत संग्रह किया परंतु यूबीआई के वित्तीय प्रभाव और इसकी वज़ह से लोगों में काम करने की प्रेरणा के खत्म होने की आशंका से वहां की जनता ने इसे खारिज कर दिया।

यूबीआई पर नीति आयोग का रुख
2017 में नीति आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने कहा था, देश के पास यूबीआई योजना के लिये जरूरी वित्तीय संसाधन नहीं हैं। आय के मौज़ूदा स्तर पर और स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढांचा तथा रक्षा क्षेत्र में निवेश के सापेक्ष देश के पास 130 करोड़ भारतीयों के लिये उचित यूबीआई के लिहाज़ से पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।

2011-12 को आधार वर्ष मानते हुए तेंदुलकर समिति ने गरीबी रेखा पर जो रिपोर्ट सौंपी थी, उसके मद्देनजर इस स्कीम को अमल में लाने के लिये भारी धनराशि की ज़रूरत होगी।

आधार वर्ष 2011-12 पर तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट के हिसाब से शहरी गरीबी रेखा 1000 रुपए प्रति व्यक्ति मासिक की है। 2011-12 के दौरान मुद्रास्फीति और मौजूदा कीमतों को देखते हुए यह आंकड़ा काफी बड़ा होगा।

बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं है कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम का विचार भारत की जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य नागरिक सुविधाओं में सुधार के साथ उनके जीवन-स्तर को ऊपर उठाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास होगा लेकिन सबके लिये एक बेसिक इनकम तब तक संभव नहीं है जब तक कि वर्तमान में सभी योजनाओं के माध्यम से दी जा रही सब्सिडी को खत्म न कर दिया जाए।

इस लिहाज से सभी भारतीयों के लिये एक बेसिक इनकम की व्यवस्था करने की बजाए सामाजिक-आर्थिक जनगणना की मदद से समाज के सर्वाधिक वंचित तबके के लिये एक निश्चित आय की व्यवस्था करना कहीं ज़्यादा प्रभावी और व्यावहारिक होगा।

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सत्ता विमर्श डेस्क
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