झारखंड में बीजेपी का ऑपरेशन लोटस चौथी बार फेल

नई दिल्ली/रांची : चम्पाई सोरेन कब कोलकाता गए, कोलकाता के किस होटल में बीजेपी नेताओं के साथ मीटिंग हुई, किस फ्लाइट से कितने बजे दिल्ली पहुंचे। चम्पाई की इन सारी गतिविधियों पर सीएम हेमंत सोरेन और उनके मुख्यमंत्री कार्यालय की नजर थी। हेमंत सोरेन पूरा मामला जानते हुए शांत रहे। बस डैमेज कंट्रोल के लिए उन्होंने कोल्हान के विधायकों को खुद फोन किया और रांची बुला लिया। सभी विधायकों की समस्या सुनी और समाधान का भरोसा देकर वापस भेज दिया। बस हेमंत सोरेन की इतनी ही मशक्कत ने झारखंड में बीजेपी के ऑपरेशन लोटस को एक बार फिर यानी चौथी बार फेल कर दिया।

खबरी लाल के मुताबिक, 16 अगस्त 2024 को झारखंड के पूर्व सीएम चम्पाई सोरेन के साथ झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक समीर मोहंती, दशरथ गगराई, नीरल पूर्ती, चमरा लिंडा, रामदास सोरेन, संजीव सरदार और मंगल कालिंदी के बीजेपी में शामिल होने की चर्चाएं जोर-शोर से हो रही थी। हालांकि जब उनसे इस बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने इसे अफवाह बताकर खारिज कर दिया।

फिर 18 अगस्त 2024 को चम्पाई सोरेन की अचानक कोलकाता के दमदम एयरपोर्ट से दिल्ली जाने की सूचना सामने आती है। खबरी लाल की मानें तो वे दोपहर करीब एक बजे दिल्ली एयरपोर्ट पर लैंड भी कर गए। यहां उनकी बीजेपी के कुछ आला नेताओं से मुलाकात भी हुई और बात भी हुई। जब उनसे इस बारे में पूछा गया कि क्या आप बीजेपी में शामिल होने आए हैं, तब चम्पाई ने पूरे घटनाक्रम पर पर्दा डालते हुए कहा कि ‘मैं जहां हूं, वहीं रहूंगा’। बस उनके इतना कहने भर से यह तो साफ हो ही गया कि जेएमएम के जिन विधायकों के बीजेपी में जाने की बात की जा रही थी वह ऑपरेशन फेल हो गया। हालांकि चंपाई की ये बात झूठ निकली कि ‘मैं जहां हूं, वहीं रहूंगा’ क्योंकि ये कहने के दरम्यान ही उन्होंने एक्स की प्रोफाइल से वो सबकुछ छिपा दिया जो यह बता रहा था कि वह जेएमएम के एक वरिष्ठ नेता हैं। थोड़ी देर बार चम्पाई सोरेन ने सोशल मीडिया पर जोहार साथियों के नाम एक लंबा पोस्ट लिखा…

जोहार साथियों,
आज समाचार देखने के बाद, आप सभी के मन में कई सवाल उमड़ रहे होंगे। आखिर ऐसा क्या हुआ, जिसने कोल्हान के एक छोटे से गांव में रहने वाले एक गरीब किसान के बेटे को इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया।

अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत में औद्योगिक घरानों के खिलाफ मजदूरों की आवाज उठाने से लेकर झारखंड आंदोलन तक, मैंने हमेशा जन-सरोकार की राजनीति की है। राज्य के आदिवासियों, मूलवासियों, गरीबों, मजदूरों, छात्रों एवं पिछड़े तबके के लोगों को उनका अधिकार दिलवाने का प्रयास करता रहा हूं। किसी भी पद पर रहा अथवा नहीं, लेकिन हर पल जनता के लिए उपलब्ध रहा, उन लोगों के मुद्दे उठाता रहा, जिन्होंने झारखंड राज्य के साथ, अपने बेहतर भविष्य के सपने देखे थे।

इसी बीच, 31 जनवरी को, एक अभूतपूर्व घटनाक्रम के बाद, इंडिया गठबंधन ने मुझे झारखंड के 12वें मुख्यमंत्री के तौर पर राज्य की सेवा करने के लिए चुना। अपने कार्यकाल के पहले दिन से लेकर आखिरी दिन (3 जुलाई) तक, मैंने पूरी निष्ठा एवं समर्पण के साथ राज्य के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया। इस दौरान हमने जनहित में कई फैसले लिए और हमेशा की तरह, हर किसी के लिए सदैव उपलब्ध रहा। बड़े-बुजुर्गों, महिलाओं, युवाओं, छात्रों एवं समाज के हर तबके तथा राज्य के हर व्यक्ति को ध्यान में रखते हुए हमने जो निर्णय लिए, उसका मूल्यांकन राज्य की जनता करेगी।

जब सत्ता मिली, तब बाबा तिलका मांझी, भगवान बिरसा मुंडा और सिदो-कान्हू जैसे वीरों को नमन कर राज्य की सेवा करने का संकल्प लिया था। झारखंड का बच्चा-बच्चा जनता है कि अपने कार्यकाल के दौरान, मैंने कभी भी, किसी के साथ ना गलत किया, ना होने दिया।

इसी बीच, हूल दिवस के अगले दिन, मुझे पता चला कि अगले दो दिनों के मेरे सभी कार्यक्रमों को पार्टी नेतृत्व द्वारा स्थगित करवा दिया गया है। इसमें एक सार्वजनिक कार्यक्रम दुमका में था, जबकि दूसरा कार्यक्रम पीजीटी शिक्षकों को नियुक्ति पत्र वितरण करने का था। पूछने पर पता चला कि गठबंधन द्वारा 3 जुलाई को विधायक दल की एक बैठक बुलाई गई है, तब तक आप सीएम के तौर पर किसी कार्यक्रम में नहीं जा सकते।

क्या लोकतंत्र में इससे अपमानजनक कुछ हो सकता है कि एक मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों को कोई अन्य व्यक्ति रद्द करवा दे? अपमान का यह कड़वा घूंट पीने के बावजूद मैंने कहा कि नियुक्ति पत्र वितरण सुबह है, जबकि दोपहर में विधायक दल की बैठक होगी, तो वहां से होते हुए मैं उसमें शामिल हो जाऊंगा। लेकिन, उधर से साफ इंकार कर दिया गया।

पिछले चार दशकों के अपने बेदाग राजनैतिक सफर में, मैं पहली बार, भीतर से टूट गया। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं। दो दिन तक, चुपचाप बैठ कर आत्म-मंथन करता रहा, पूरे घटनाक्रम में अपनी गलती तलाशता रहा। सत्ता का लोभ रत्ती भर भी नहीं था, लेकिन आत्म-सम्मान पर लगी इस चोट को मैं किसे दिखाता? अपनों द्वारा दिए गए दर्द को कहां जाहिर करता?

जब वर्षों से पार्टी के केन्द्रीय कार्यकारिणी की बैठक नहीं हो रही है, और एकतरफा आदेश पारित किए जाते हैं, तो फिर किसके पास जाकर अपनी तकलीफ बताता? इस पार्टी में मेरी गिनती वरिष्ठ सदस्यों में होती है, बाकी लोग जूनियर हैं, और मुझसे सीनियर सुप्रीमो जो हैं, वे अब स्वास्थ्य की वजह से राजनीति में सक्रिय नहीं हैं, फिर मेरे पास क्या विकल्प था? अगर वे सक्रिय होते, तो शायद अलग हालात होते।

कहने को तो विधायक दल की बैठक बुलाने का अधिकार मुख्यमंत्री का होता है, लेकिन मुझे बैठक का एजेंडा तक नहीं बताया गया था। बैठक के दौरान मुझसे इस्तीफा मांगा गया। मैं आश्चर्यचकित था, लेकिन मुझे सत्ता का मोह नहीं था, इसलिए मैंने तुरंत इस्तीफा दे दिया, लेकिन आत्म-सम्मान पर लगी चोट से दिल भावुक था।

पिछले तीन दिनों से हो रहे अपमानजनक व्यवहार से भावुक होकर मैं आंसुओं को संभालने में लगा था, लेकिन उन्हें सिर्फ कुर्सी से मतलब था। मुझे ऐसा लगा, मानो उस पार्टी में मेरा कोई वजूद ही नहीं है, कोई अस्तित्व ही नहीं है, जिस पार्टी के लिए हम ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। इस बीच कई ऐसी अपमानजनक घटनाएं हुईं, जिसका जिक्र फिलहाल नहीं करना चाहता। इतने अपमान एवं तिरस्कार के बाद मैं वैकल्पिक राह तलाशने हेतु मजबूर हो गया।

मैंने भारी मन से विधायक दल की उसी बैठक में कहा, “आज से मेरे जीवन का नया अध्याय शुरू होने जा रहा है।” इसमें मेरे पास तीन विकल्प थे। पहला, राजनीति से सन्यास लेना, दूसरा, अपना अलग संगठन खड़ा करना और तीसरा, इस राह में अगर कोई साथी मिले, तो उसके साथ आगे का सफर तय करना। उस दिन से लेकर आज तक, तथा आगामी झारखंड विधानसभा चुनावों तक, इस सफर में मेरे लिए सभी विकल्प खुले हुए हैं।

20 अगस्त 2024 को एक सीन फिर क्रिएट किया गया। सीएम हाउस, रांची में अचानक हलचल बढ़ती है। जिन विधायकों को चंपाई सोरेन के साथ बताया जा रहा था, वे अचानक एक-एक कर सीएम हाउस पहुंचे। यहां लगभग 3 घंटे तक इनकी सीएम हेमंत सोरेन से मुलाकात हुई। इसके बाद विधायकों ने कहा कि ‘हम सीएम हेमंत सोरेन के साथ थे, हैं और मजबूती से रहेंगे। झामुमो छोड़कर कहीं नहीं जा रहे हैं।’

उधर, चम्पाई सोरेन भी दिल्ली से कोलकाता के रास्ते सरायकेला पहुंच चुके थे। बीजेपी में जाने के सवाल पर कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि ‘उनका पार्टी को नुकसान पहुंचाने का कोई मकसद नहीं है।’

झारखंड पहुंचने पर चम्पाई सोरेने ने कहा ‘मैं उसी बात पर कायम हूं कि मेरे पास तीन विकल्प हैं- संन्यास लेना, नया संगठन बनाना या कोई अच्छा दोस्त मिल जाए तो उसके साथ काम करना। मेरा नया अध्याय शुरू होगा। मैं संन्यास के बारे में सोच रहा था, लेकिन लोगों से बहुत प्यार मिल रहा है। मेरी जेएमएम के किसी भी व्यक्ति से कोई बात नहीं हुई है।’

पूरी कहानी का मतलब यह कि झारखंड में जिस ऑपरेशन लोटस और हेमंत सोरेन की सरकार को अस्थिर करने की बात पिछले कई दिनों से कही जा रही थी, वह एक बार फिर से सीएम हेमंत सोरेन की सक्रियता से टल गया है। खबरी लाल की मानें तो चम्पाई सोरेन की बीजेपी से एक डील हुई थी। इसके तहत चम्पाई को जेएमएम के कुछ विधायकों के साथ बीजेपी में शामिल होना था। इनके साथ आने वाले विधायकों को 2024 के विधानसभा चुनाव में टिकट मिलना था। इसके साथ ही चम्पाई सोरेन और उनके बेटे को भी सेट करने की बात हुई थी। कहा तो यह भी जा रहा है कि बीजेपी से होने वाली इस डील में चम्पाई सोरेन के बेटे की बड़ी भूमिका थी। लेकिन झारखंड में विधायकों को मनाने का काम खुद चम्पाई सोरेन कर रहे थे।

हालांकि इस डील को दोनों ओर से पूरी तरह सीक्रेट रखा गया था। किसी को भनक न लगे इसके लिए चम्पाई सोरेन बीजेपी के बड़े नेताओं से कोलकाता में डील कर रहे थे। झारखंड में मीटिंग के बाद इन्हें दिल्ली जाना था। लेकिन, दिल्ली जाने से पहले ही पूरा सीक्रेट प्लान वायरल हो गया और वक्त रहते मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बीजेपी के ऑपरेशन लोटस को फेल कर दिया। ये अलग बात है कि चम्पाई सोरेन ने झारखंड मुक्ति मोर्चा से अलग रहा अपना ली है और बीजेपी के भरोसे पर एक नई पार्टी के गठन को लेकर मशविरा शुरू कर दिया है।

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सत्ता विमर्श डेस्क
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