नेपाल की भोटेकोशी नदी में 26 अगस्त की सुबह आई विनाशकारी बाढ़ अब सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा की कहानी नहीं रह गई है। यह चीन और नेपाल के बीच सीमा-पार आपदा सूचना साझा करने की व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है। 30 अगस्त तक नेपाल सरकार के मुताबिक, 734 शव बरामद हो चुके हैं और करीब 2,498 लोग अब भी लापता हैं। तबाही की भयावहता के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस आपदा की चेतावनी कुछ मिनट या कुछ समय पहले मिल सकती थी? और अगर मिल सकती थी तो वह चेतावनी नेपाल के लोगों तक समय रहते क्यों नहीं पहुंची?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भोटेकोशी में आया पानी नेपाल के भीतर अचानक पैदा नहीं हुआ था। प्रारंभिक तकनीकी अनुमानों के मुताबिक, बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिस्सा ल्हेंदे खोला क्षेत्र में गिरा, जिससे नदी में मलबा जमा हुआ और अस्थायी झील जैसी स्थिति बनी। बाद में उसके टूटने से पानी और मलबे का विनाशकारी सैलाब भोटेकोशी में उतरा। नेपाली अधिकारियों को चीनी अधिकारियों से मिली उपग्रह तस्वीरों ने भी इस प्रक्रिया को समझने में मदद की।
यानी तबाही का स्रोत सीमा के बेहद करीब था और उसका असर सीमा पार नेपाल की तरफ हुआ। ऐसे में सवाल स्वाभाविक है कि सीमा के दोनों तरफ आपदा निगरानी और रियल-टाइम सूचना साझा करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी थी?
सुबह 7:30 बजे से 9:15 बजे तक का सवाल : घटना के बाद सामने आए अलग-अलग समय इस पूरी कहानी को और गंभीर बनाते हैं। नेपाल के Flood Forecasting Division की तकनीकी रिपोर्ट के मुताबिक, सुबह करीब 9:00 बजे अधिकारियों को सूचना मिली कि तिब्बत की तरफ से भोटेकोशी में बड़ा फ्लड सर्ज दाखिल हो चुका है। करीब 9:05 बजे इस सूचना की पुष्टि हुई और इसके बाद 9:15-9:16 बजे नदी किनारे रहने वाले लोगों को बड़े पैमाने पर SMS अलर्ट भेजे गए। लगभग 6.8 लाख संदेश भेजे जाने की रिपोर्ट है। लेकिन इससे पहले के घटनाक्रम को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय लोगों के हवाले से सामने आई जानकारी में सुबह 7:30 बजे के आसपास चीन सीमा के निकट से बाढ़ के खतरे की सूचना मिलने की बात कही गई है। यदि यह सूचना वास्तव में किसी स्थानीय व्यक्ति तक इतनी जल्दी पहुंच गई थी, तो यह जांच का विषय बनता है कि सरकारी आपदा चेतावनी प्रणाली को उसी समय इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली? यहीं से नेपाली कांग्रेस के उपनेता अभिषेक प्रताप शाह की आपत्ति अहम हो जाती है। उनका तर्क है कि चीन के पास ग्लेशियर और हिमालयी क्षेत्र की निगरानी के लिए उपग्रह प्रणालियां हैं। ऐसे में अगर किसी बड़े ग्लेशियर या बर्फ-चट्टान के खिसकने की गतिविधि का संकेत मिला था, तो नेपाल को तत्काल इसकी सूचना मिलनी चाहिए थी।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है कि किसी व्यक्ति को सीमा के पास से खतरे की सूचना मिल जाना इस बात का प्रमाण नहीं है कि चीन की सरकार या उसके वैज्ञानिक तंत्र को उसी समय पूरी आपदा की जानकारी थी। इसलिए 7:30 बजे की सूचना को चीन की आधिकारिक जानकारी मान लेना अभी जल्दबाजी होगी। फिर भी सवाल खत्म नहीं होता। बल्कि और बड़ा हो जाता है कि चीन की निगरानी प्रणालियों ने आखिर क्या देखा, कब देखा और नेपाल के साथ कब साझा किया?
8:37 का झटका और 8:50 बजे निगरानी स्टेशन स्टेशन ठप : इस आपदा की टाइमलाइन में एक और महत्वपूर्ण कड़ी है। नेपाली तकनीकी रिपोर्ट के अनुसार, सुबह 8:37 बजे नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास 4.4 तीव्रता का भूकंपीय झटका दर्ज हुआ और लगभग 13 मिनट बाद, 8:50 बजे, भोटेकोशी नदी के जलस्तर की निगरानी करने वाला एक डेटा रिसीविंग सिस्टम काम करना बंद कर दिया। स्टेशन की आखिरी रीडिंग सामान्य चेतावनी स्तर से काफी नीचे थी।
बाद के वैज्ञानिक आंकलनों में इस घटना की प्रकृति को लेकर भी तस्वीर बदली है। शुरुआती रिपोर्टों में इसे भूकंप से जोड़कर देखा गया, लेकिन बाद में उपलब्ध विश्लेषणों ने संकेत दिया कि दर्ज की गई भूकंपीय गतिविधि स्वयं बड़े भूस्खलन या ग्लेशियर-चट्टान के गिरने से जुड़ी हो सकती है। इसका मतलब यह हुआ कि पारंपरिक नदी जलस्तर सेंसरों से पहले ही खतरे का संकेत पकड़ने वाली प्रणालियों की जरूरत कितनी बड़ी है, यह आपदा साफ तौर पर दिखाती है।
क्योंकि जब तक नेपाल के जलस्तर मापक यंत्रों ने खतरे को पकड़ना शुरू किया, तब तक उनमें से कुछ या तो क्षतिग्रस्त हो चुके थे या डेटा भेजना बंद कर चुके थे।
चीन के पास सैटेलाइट हैं, लेकिन क्या सैटेलाइट हर खतरा पहले बता सकते हैं? यही वह बिंदु है जहां चीन को कठघरे में खड़ा करने वाली बहस सबसे ज्यादा सावधानी मांगती है। यह कहना आसान है कि चीन के पास अत्याधुनिक उपग्रह हैं, इसलिए उसे हर ग्लेशियर टूटने की घटना पहले से पता होनी चाहिए थी। लेकिन वैज्ञानिक रूप से यह दावा बहुत मजबूत नहीं है। दूरस्थ हिमालयी क्षेत्र में अचानक होने वाले Ice-Rock Avalanche या Debris Flow को केवल सैटेलाइट से हमेशा पहले से पहचान लेना संभव नहीं होता।
नेपाल के विशेषज्ञों ने भी कहा है कि यह घटना अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में हुई है और वहां पूर्व चेतावनी की क्षमता सीमित थी। एक विशेषज्ञ के अनुसार, नेपाल में चेतावनी तब पहुंची जब पानी सीमा तक आ चुका था और लोगों के पास भागने के लिए महज कुछ मिनट थे। लेकिन इसका दूसरा पहलू चीन की जिम्मेदारी को खत्म नहीं करता। क्योंकि आपदा के बाद सामने आया तथ्य यह है कि चीनी अधिकारियों से प्राप्त सैटेलाइट तस्वीरों ने नेपाली अधिकारियों को घटना के स्रोत और नदी अवरोध के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी।
तो मूल सवाल यह होना चाहिए कि ऐसी जानकारी चीन के पास पहली बार कब आई? अगर चीन के पास घटना के शुरुआती चरण में कोई विश्वसनीय संकेत था, तो नेपाल को सूचना देने की प्रक्रिया कितनी तेज थी? और अगर चीन के पास कोई उपयोगी पूर्व-संकेत नहीं था, तो दोनों देशों के बीच सीमा-पार हिमालयी आपदाओं के लिए ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं है जो कुछ मिनटों की अतिरिक्त चेतावनी उपलब्ध करा सके?
हालांकि चीन ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। चीनी पक्ष ने उन दावों को खारिज किया है कि चीन की तरफ किसी “जियोलॉजिकल डिजास्टर डैम” के टूटने से नेपाल में तबाही आई और चीन ने नेपाल को चेतावनी नहीं दी। चीनी दूतावास ने कहा कि घटना नेपाल की तरफ हुई ग्लेशियर/भूवैज्ञानिक घटना से जुड़ी थी और सीमा के दोनों ओर भारी नुकसान हुआ। यानी बीजिंग का आधिकारिक रुख साफ है कि तबाही का कारण चीन की तरफ किसी बांध या मानव-निर्मित संरचना का टूटना नहीं था और चीन ने जानबूझकर नेपाल को कोई चेतावनी नहीं रोकी।
लेकिन यही जवाब कुछ नए सवाल भी पैदा करता है। अगर चीन भी इस क्षेत्र में आपदा से प्रभावित हुआ था, तो क्या उसके पास घटना के शुरुआती क्षणों की रियल-टाइम जानकारी थी? अगर थी, तो वह जानकारी नेपाल को कितनी जल्दी दी गई? और अगर नहीं थी, तो सीमा के दोनों ओर एक साझा रियल-टाइम निगरानी तंत्र क्यों नहीं बनाया गया?
असली समस्या सिर्फ चीन नहीं, नेपाल की चेतावनी व्यवस्था भी है। इस पूरे विवाद में नेपाल की अपनी व्यवस्था की जवाबदेही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। Flood Forecasting Division के मुताबिक, जानकारी मिलने के बाद नेपाल ने अपेक्षाकृत तेजी से SMS अलर्ट भेजे। लेकिन सवाल यह है कि क्या चेतावनी तंत्र को सीमा-पार स्रोतों से सीधे जोड़ने की व्यवस्था पर्याप्त थी? अगर ऊपरी नदी घाटी चीन के नियंत्रण वाले क्षेत्र में है और नदी नेपाल में प्रवेश करती है, तो केवल नेपाल के नदी-स्तर सेंसरों पर निर्भर रहना खतरनाक है।
नेपाल के लिए यह केवल एक मौसम संबंधी चुनौती नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय सुरक्षा का सवाल भी है। भोटेकोशी और त्रिशूली जैसी नदियों पर दर्जनों बस्तियां, सड़कें और जलविद्युत परियोजनाएं निर्भर हैं। इस बार बाढ़ ने घरों के साथ-साथ महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और जलविद्युत परियोजनाओं को भी भारी नुकसान पहुंचाया।
एक चेतावनी कुछ मिनट पहले मिलती तो क्या होता? इस सवाल का जवाब निश्चित रूप से कोई नहीं दे सकता। इतने तीव्र फ्लैश फ्लड में कुछ मिनट की चेतावनी भी हर व्यक्ति को बचा लेती, ऐसा दावा करना वैज्ञानिक रूप से गलत होगा। लेकिन कुछ लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचने का मौका जरूर मिल सकता था। यही कारण है कि आपदा प्रबंधन में “कितनी जानें बच सकती थीं” से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल होता है- क्या उपलब्ध सूचना को समय पर चेतावनी में बदला गया था? इस मामले में यही जांच का केंद्रीय प्रश्न होना चाहिए।
चीन से अब सिर्फ सफाई नहीं, डेटा चाहिए : नेपाल और चीन दोनों हिमालयी आपदाओं के बढ़ते खतरे का सामना कर रहे हैं। चीन ने खुद घटना के बाद निगरानी और पूर्व चेतावनी तंत्र को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया है। नेपाल के विदेश मंत्रालय और चीन के बीच बातचीत में भी रियल-टाइम हाइड्रो-मौसम संबंधी डेटा साझा करने और प्रभावी पूर्व चेतावनी तंत्र मजबूत करने की जरूरत सामने आई है।
यही भविष्य का रास्ता है। अब सवाल आरोप लगाने या बचाव करने से आगे जाना चाहिए। नेपाल को चीन से स्पष्ट रूप से पूछना चाहिए कि 26 अगस्त की सुबह चीन की निगरानी प्रणालियों ने क्या दर्ज किया? किस समय दर्ज किया? किस एजेंसी ने देखा? नेपाल को कब सूचना दी गई? और सूचना देने में कितना समय लगा? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक किए जाने चाहिए। क्योंकि हिमालय किसी एक देश की संपत्ति नहीं है। उसकी नदियां सीमाओं को नहीं पहचानतीं और ग्लेशियरों का टूटना पासपोर्ट देखकर नहीं होता।
अगर चीन के पास ऐसी तकनीक है जो सीमा-पार आपदाओं के शुरुआती संकेत पकड़ सकती है, तो उसका इस्तेमाल केवल चीनी नागरिकों की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि नीचे की ओर बसे नेपाली लोगों की सुरक्षा के लिए भी होना चाहिए। और अगर ऐसी तकनीक किसी घटना को पहले से नहीं पकड़ सकती, तो चीन और नेपाल दोनों को मिलकर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जो नदी में मौत का सैलाब उतरने से पहले चेतावनी दे सके।
नेपाल की इस त्रासदी में चीन के खिलाफ सबसे बड़ा आरोप अभी साबित नहीं हुआ है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल जरूर खड़ा हो चुका है कि खतरे की सूचना किसके पास थी, कब थी और उसे साझा करने में कितनी देर हुई? यही सवाल आने वाले दिनों में इस जल तबाही की सबसे महत्वपूर्ण जांच का आधार बनना चाहिए।




