नई दिल्ली। अमेरिकी राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की विदेश नीति, उनकी सैन्य शक्तियों और अमेरिका की लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी सीनेट में एक ऐसा प्रस्ताव पास हुआ है, जिसका मकसद राष्ट्रपति की उस शक्ति को सीमित करना है जिसके तहत वे कांग्रेस की अनुमति के बिना किसी बड़े सैन्य अभियान की शुरुआत कर सकते हैं। यह प्रस्ताव खास तौर पर ईरान के खिलाफ संभावित युद्ध या सैन्य कार्रवाई को ध्यान में रखकर लाया गया है। सबसे बड़ी बात यह रही कि वोटिंग के दौरान ट्रम्प की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसदों ने भी उनके खिलाफ जाकर डेमोक्रेट्स का साथ दिया। प्रस्ताव 50-47 के अंतर से पास हुआ और इसे अमेरिकी राजनीति में विपक्ष की बड़ी जीत माना जा रहा है।
सीनेट में यह प्रस्ताव वर्जीनिया से डेमोक्रेट सीनेटर टिम केन लेकर आए हैं। उन्होंने सीनेट में बहस के दौरान कहा कि अमेरिका में युद्ध शुरू करने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति के पास नहीं है, बल्कि यह अधिकार संसद यानी कांग्रेस को दिया गया है। केन का कहना था कि जब पूरी दुनिया मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और संभावित युद्ध को लेकर चिंतित है, तब राष्ट्रपति को अपनी रणनीति कांग्रेस के सामने स्पष्ट करनी चाहिए। प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि अमेरिका ईरान के खिलाफ किसी लंबे सैन्य अभियान में शामिल होता है तो उसके लिए कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी जरूरी हो।
दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव पिछले कुछ समय से लगातार बढ़ता रहा है। मध्य-पूर्व में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों में तेजी, ईरान समर्थित गुटों और अमेरिकी हितों के बीच टकराव, तथा इजराइल-ईरान संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है। ऐसे माहौल में अमेरिकी विपक्ष को यह डर सताने लगा कि ट्रम्प प्रशासन बिना संसदीय अनुमति के किसी बड़े सैन्य अभियान की शुरुआत कर सकता है। यही वजह है कि यह प्रस्ताव सिर्फ एक राजनीतिक कदम नहीं बल्कि राष्ट्रपति की युद्ध संबंधी शक्तियों पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
अमेरिका में 1973 का War Powers Resolution पहले से लागू है। इस कानून के तहत कोई भी राष्ट्रपति बिना कांग्रेस की अनुमति के अधिकतम 60 दिनों तक सैन्य कार्रवाई जारी रख सकता है। इसके बाद या तो युद्ध समाप्त करना होता है, या फिर कांग्रेस से अनुमति लेनी होती है। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपतियों पर अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि वे इस कानून की सीमाओं को नजरअंदाज करते रहे हैं। ट्रम्प प्रशासन पर भी यही सवाल उठ रहे हैं कि क्या वे ईरान के खिलाफ किसी बड़े कदम की तैयारी कर रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू रिपब्लिकन पार्टी के भीतर दिखाई देने वाली दरार है। आमतौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के मुद्दों पर रिपब्लिकन सांसद राष्ट्रपति के साथ खड़े दिखाई देते हैं, लेकिन इस बार चार रिपब्लिकन सांसदों ने ट्रम्प के खिलाफ वोट देकर संकेत दिया कि पार्टी के भीतर भी युद्ध को लेकर पूरी सहमति नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इराक और अफगानिस्तान जैसे लंबे युद्धों के बाद अमेरिका में अब विदेशी सैन्य हस्तक्षेप को लेकर पहले जैसी राजनीतिक इच्छा नहीं बची है। ट्रम्प की “America First” राजनीति भी लंबे विदेशी युद्धों से दूरी बनाने की बात करती रही है, ऐसे में यह विरोध उनके लिए राजनीतिक रूप से असहज स्थिति पैदा कर सकता है।
हालांकि यह प्रस्ताव फिलहाल कानून नहीं बना है। इसे अभी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स से भी पारित होना होगा, जहां रिपब्लिकन बहुमत ट्रम्प के पक्ष में खड़ा हो सकता है। इसके बाद भी राष्ट्रपति ट्रम्प के पास वीटो का अधिकार रहेगा। अगर वे इसे वीटो करते हैं तो कांग्रेस को उस वीटो को पलटने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जुटाना होगा जो मौजूदा परिस्थितियों में बेहद मुश्किल माना जा रहा है। इसके बावजूद इस प्रस्ताव का राजनीतिक और रणनीतिक महत्व कम नहीं होता। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब अमेरिकी संसद ने राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों पर सवाल उठाए हों, लेकिन मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात में इसका संदेश बेहद बड़ा माना जा रहा है।
फिलहाल, इस वोटिंग का असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। पूरी दुनिया, खासकर मध्य-पूर्व, इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। अगर अमेरिकी राष्ट्रपति की सैन्य स्वतंत्रता सीमित होती है तो इजराइल को तत्काल अमेरिकी सैन्य समर्थन मिलने में राजनीतिक अड़चनें आ सकती हैं। दूसरी तरफ ईरान इसे इस संकेत के रूप में देख सकता है कि अमेरिका के भीतर युद्ध को लेकर एकमत नहीं है। इसका असर तेल बाजारों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। अगर युद्ध की आशंका कम होती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव घट सकता है, जिसका फायदा भारत जैसे तेल आयातक देशों को मिल सकता है।
भारत के लिए भी यह घटनाक्रम काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मध्य-पूर्व में लाखों भारतीय काम करते हैं और वहां किसी बड़े संघर्ष का असर सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा पर पड़ सकता है। भारत लंबे समय से अमेरिका, इजराइल और खाड़ी देशों के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखते हुए ईरान से भी संपर्क बनाए हुए है। ऐसे में नई दिल्ली की कोशिश यही रहेगी कि क्षेत्र में तनाव नियंत्रित रहे और किसी बड़े युद्ध की स्थिति न बने।
कुल मिलाकर यह प्रस्ताव सिर्फ ईरान के खिलाफ युद्ध रोकने की कोशिश नहीं है, बल्कि अमेरिकी लोकतंत्र में सत्ता संतुलन की एक बड़ी परीक्षा बन गया है। यह घटनाक्रम दिखाता है कि अमेरिका के भीतर राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियों, विदेश नीति और युद्ध संबंधी फैसलों को लेकर गंभीर बहस जारी है। साथ ही यह भी साफ हो रहा है कि ट्रम्प को अपनी ही पार्टी के भीतर हर मुद्दे पर बिना शर्त समर्थन मिलना अब उतना आसान नहीं रह गया है।




