अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प की जीत पर लगी मुहर

नई दिल्ली/वॉशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प की जीत पर अमेरिकी कांग्रेस ने मुहर लगा दी है। इलेक्टोरल कॉलेजों के वोटों की गिनती के बाद उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने डोनाल्ड ट्रम्प को विजेता घोषित किया है। हालांकि ट्रम्प की जीत 6 नवंबर 2024 को ही तय हो गई थी, लेकिन इसकी आधिकारिक घोषणा होना बाकी था।

अमेरिकी संसद कैपिटल हिल के जॉइंट सेशन में 6 जनवरी 2025 को इलेक्टोरल कॉलेज के वोट गिने गए। यह प्रक्रिया उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की अध्यक्षता में हुई क्योंकि वही सीनेट की अध्यक्ष हैं। पिछले साल 5 नवंबर को हुए राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प को 312 इलेक्टोरल वोट्स मिले जबकि उनके विरोधी कमला हैरिस को सिर्फ 226 इलेक्टोरल वोट्स मिले। चुनाव में जीत के लिए किसी प्रत्याशी को 270 इलेक्टोरल वोट्स चाहिए होते हैं।

डोनाल्ड ट्रम्प अब 20 जनवरी 2025 को राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे। इस महीने के अंत में होने वाले ज्वाइंट सेशन और ट्रम्प के शपथ ग्रहण समारोह के लिए कैपिटल हिल के चारों तरफ भारी सुरक्षा व्यवस्था तैनात की गई है।

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनने का तरीका भारत के प्रधानमंत्री जैसा ही है

जिस तरह से भारत में जनता सीधे सांसद चुनती है और जिस पार्टी या गठबंधन के पास सांसदों का बहुमत होता है उसी दल का नेता प्रधानमंत्री बनता है उसी तरह अमेरिका में भी राष्ट्रपति को सीधे जनता का वोट नहीं मिलता है। जनता इलेक्टर्स चुनती है और इससे इलेक्टोरल कॉलेज बनता है। इलेक्टोरल कॉलेज के सदस्य राष्ट्पति का चुनाव करते हैं।

दरअसल, इलेक्टोरल कॉलेज एक चुनावी संस्था है जो अमेरिका के राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति को चुनने के लिए गठित की गई है। चुनाव के दौरान जब जब जनता इलेक्टर्स को चुन लेती है तो फिर दिसंबर के महीने में इलेक्टोरल कॉलेज की बैठक होती है। इसमें हर राज्य के चुने हुए इलेक्ट्रर्स अपनी-अपनी काउंटी या राज्य में मिलते हैं और राष्ट्रपति के लिए औपचारिक तौर पर वोटिंग करते हैं।

अमेरिका के 50 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों से कुल 538 इलेक्टर्स चुनकर आते हैं। सभी राज्यों से चुने गए इलेक्टर्स की संख्या अलग-अलग होती है। लेकिन यहां रोचक बात यह है कि अमेरिकी चुनाव में ‘विनर टेक ऑल’ सिस्टम काम करता है। इसका मतलब है कि अगर किसी कैंडिडेट को एक राज्य में 50% से ज्यादा पॉपुलर वोट मिल जाते हैं, तो उस राज्य के तमाम इलेक्टोरल वोट उसी कैंडिडेट को मिले हुए माने जाते हैं। जैसे ट्रम्प को पेन्सिलवेनिया में सबसे ज्यादा लोगों ने वोट किया तो वहां के सारे 19 इलेक्टर्स ट्रम्प को मिल गए।

इलेक्टोरल वोटों को राज्य के चुनाव अधिकारी प्रमाणित करते हैं और फिर इन वोटों को कांग्रेस को भेजा जाता है। अगली 6 जनवरी को कैपिटल हिल यानी अमेरिकी संसद में दोनों सदन (सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) इकट्ठा होते हैं। अमेरिकी सीनेट के अध्यक्ष उपराष्ट्रपति होते हैं जिन्हें हर राज्य के चुनाव रिजल्ट्स को पढ़ने के लिए दस्तावेज मिलता है।

उपराष्ट्रपति जब इलेक्टोरल कॉलेज के वोटों को पढ़ते हैं, तो उसे रिकॉर्ड भी किया जाता है। अगर यदि कोई आपत्ति आती है, तो उसे दोनों सदनों में विचार किया जाता है। जब सभी वोटों की गिनती पूरी हो जाती है, तो यह घोषणा की जाती है कि कौन राष्ट्रपति और कौन उपराष्ट्रपति चुने गए हैं। राष्ट्रपति बनने के लिए 270 इलेक्टोरल वोट हासिल करना जरूरी होता है।

अगर भारत से तुलना करें तो जैसे सांसदों के वोट से प्रधानमंत्री का चुनाव होता है, ठीक उसी तरह इलेक्टर्स के वोट से अमेरिका में राष्ट्रपति चुना जाता है। हालांकि भारत के सांसदों के उलट अमेरिका के इलेक्टर्स का राष्ट्रपति चुनने के अलावा और कोई काम नहीं है। जबकि भारत में सांसद देश का प्रधानमंत्री चुनने के साथ संसद में अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भी करते हैं और संसद में कानून भी बनाते हैं।

Previous articleकिसान आन्दोलन 2.0 : भगवान भरोसे अन्नदाताओं का भविष्य
Next articleआदिवासी शिक्षा की उदासीनता का लोक पर्व
सत्ता विमर्श डेस्क
सत्ता विमर्श (Satta Vimarsh) नाम ही हमारी पहचान है। हमारा मानना है कि सब कुछ सत्ता के इर्द-गिर्द तय होता है, सरकार भी और सरोकार भी। लेकिन, इस सत्ता में हमारी-आपकी भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सत्ता में बैठे लोगों की। इसीलिए सत्ता और सरोकार से जुड़े मुद्दों पर विमर्श जरूरी है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here