नई दिल्ली। हरियाणा-पंजाब के खनौरी बॉर्डर पर पिछले 38 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल ने बहुत ही गंभीर सवाल उठाया है कि क्या राज्य सरकारें अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों से भाग सकती हैं जब अन्नदाताओं की जान दांव पर लगी हो? इस घटनाक्रम ने न सिर्फ पंजाब और हरियाणा के किसान आंदोलन की जटिलताओं को उजागर किया है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट में भी बहस का विषय बन गया है जहां इस मामले पर सुनवाई चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए त्वरित कार्रवाई करने का निर्देश दिया है ताकि किसान नेता की जान को बचाया जा सके।
किसान आंदोलन और डल्लेवाल का अनशन
जगजीत सिंह डल्लेवाल जो पंजाब के प्रमुख किसान नेताओं में से एक हैं, खनौरी बॉर्डर पर पिछले एक महीने से अधिक वक्त से आमरण अनशन पर बैठे हैं। उनका अनशन तब से जारी है जब उन्होंने पंजाब सरकार की नीतियों और कार्यों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू किया था। डल्लेवाल का मुख्य मकसद सरकार द्वारा किसानों की समस्याओं को नजरअंदाज किए जाने और कृषि कानूनों के प्रभाव को लेकर चिंता जताना है। उनका कहना है कि पंजाब और हरियाणा के किसान आर्थिक संकट में फंसे हुए हैं और इसके खिलाफ जब वह उठ खड़े हुए हैं तो उनकी आवाज़ को दबाया जा रहा है।
किसानों की आगामी रणनीति क्या है?
इस बीच खबर है कि आगामी 4 जनवरी को खनौरी मोर्चे पर होने वाली किसान महापंचायत की तैयारी शुरू हो गई है। किसान नेताओं ने कहा कि 2 लाख से अधिक किसान मोर्चे पर पहुंचेंगे। डल्लेवाल अपना जरूरी संदेश खनौरी मोर्चे से देंगे। उधर, किसान नेता सरवण सिंह पंधेर के नेतृत्व में बुधवार को शंभू बॉर्डर पर किसानों की बैठक हुई जिसमें तय हुआ है कि 6 जनवरी को श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का प्रकाश पर्व शंभू बॉर्डर पर मनाया जाएगा। ऐसे में पटियाला के नजदीक के गांवों से अपील की जा रही है कि अधिक से अधिक लोग मोर्चे में पहुंचे।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को इस मामले में तेजी से कदम उठाने का निर्देश दिया है। कोर्ट का यह रुख राज्य सरकार की लापरवाही पर भी सवाल खड़ा करता है, क्योंकि डल्लेवाल का अनशन उनके स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। कोर्ट ने राज्य सरकार को यह याद दिलाया कि यह उनका कर्तव्य है कि वे किसी भी स्थिति में किसान के जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करें। कोर्ट ने इस मामले में पंजाब सरकार से जवाब तलब किया और यह भी स्पष्ट किया कि यदि शीघ्र कोई समाधान नहीं निकाला गया, तो राज्य सरकार को इसका नतीजा भुगतना पड़ सकता है।
पंजाब सरकार की प्रतिक्रिया
पंजाब सरकार इस मामले में बेहद लापरवाह नजर आई है। राज्य सरकार का तर्क यह था कि वह इस मुद्दे को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने की कोशिश कर रही है, लेकिन किसान नेता की हालत बिगड़ती जा रही है और स्थिति गंभीर होती जा रही है। सरकार की तरफ से अब तक कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं और इस कारण सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्य की स्थिति पर सवाल उठाए हैं।
किसान आंदोलन की गहराई
किसान आंदोलन की इस घटना की गहराई को कम करके आंका जा रहा है। लेकिन यह भूलना गलत होगा कि यह व्यापक किसान आंदोलन का हिस्सा है, जो पिछले कई वर्षों से देशभर में चल रहा है। पंजाब और हरियाणा के किसान विशेष रूप से कृषि सुधार कानूनों, मंडी शुल्क, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और बिजली बिल के मुद्दों पर सख्त विरोध जता रहे हैं। डल्लेवाल जैसे नेता इन मुद्दों पर सख्त रुख अख्तियार किए हुए हैं और वे यह चाहते हैं कि सरकार इन मुद्दों को हल करे, ताकि अन्नदाताओं के जीवन में सुधार आ सके।
सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव
इस पूरे घटनाक्रम का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव बहुत गहरा हो सकता है। किसान आंदोलन ने न सिर्फ पंजाब और हरियाणा, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। यदि पंजाब सरकार इस मामले को गंभीरता से नहीं लेती और किसान नेताओं की मांगों पर ध्यान नहीं देती है तो यह आंदोलन और भी तेज हो सकता है। इससे राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के बीच मतभेदों को और हवा मिल सकती है जो किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए एक चुनौती बन सकती है।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट की तीव्र प्रतिक्रिया और किसान नेता के अनशन ने यह साबित कर दिया है कि किसानों की समस्याएं अब केवल एक राज्य की समस्या नहीं रह गई हैं। यह एक राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है जिसे जल्दी से जल्दी सुलझाने की आवश्यकता है। पंजाब सरकार को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और इसको लेकर तत्काल कदम उठाने होंगे, ताकि किसान नेता की जान को बचाया जा सके और किसानों की समस्याओं का समाधान किया जा सके। यदि यह स्थिति इसी तरह बनी रही तो यह न सिर्फ राज्य सरकार के लिए बल्कि देश के कृषि क्षेत्र के लिए भी एक गंभीर संकट बन सकती है।




