पूरी दुनिया एक बार फिर से ऊर्जा संकट की गिरफ्त में है, लेकिन इस बार की कहानी सिर्फ तेल की नहीं, बल्कि जियो पॉलिटिक्स, युद्ध और ग्लोबल सप्लाई चेन के टूटते-बिखरते संतुलन की है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की धुरी माना जाता है, पिछले एक महीने से लगभग ठप पड़ा है। यह वही रास्ता है जिससे दुनिया के लगभग 20% तेल की सप्लाई होती है। अमेरिका, इसराइल और ईरान के बीच भीषण सैन्य टकराव ने इस संकट को ग्लोबल क्राइसिस बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसियां इसे “इतिहास का सबसे बड़ा ऊर्जा सुरक्षा खतरा” बता रही हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह कि क्या हम 1973 के तेल संकट से भी बड़े तेल संकट के दौर में प्रवेश कर चुके हैं?
एक नीतिगत हथियार था 1970 का तेल संकट
साल 1973 का तेल संकट मूल रूप से एक राजनीतिक और रणनीतिक निर्णय का नतीजा था। अरब देशों ने योम किप्पुर युद्ध के दौरान अमेरिका और उसके सहयोगियों पर दबाव बनाने के लिए तेल उत्पादन कम कर दिया और निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसका असर तत्काल और व्यापक था- तेल की कीमतें चार गुना तक बढ़ गईं, और पश्चिमी देशों में ईंधन की भारी कमी हो गई। इस संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया। महंगाई तेजी से बढ़ी, उद्योगों की उत्पादन क्षमता घट गई और बेरोज़गारी में भारी उछाल आ गया था। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में मंदी छा गई थी। सामाजिक स्तर पर भी इसका असर गहरा था मसलन, हड़तालें, राजनीतिक अस्थिरता और गरीबी में वृद्धि जैसे हालात पैदा हुए। यह संकट सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के लिए भी एक चुनौती बन गया था।
मौजूदा संकट में सप्लाई चेन का टकराव
तेल संकट का मौजूदा स्वरूप थोड़ा अलग है। यह किसी नीतिगत निर्णय का परिणाम नहीं, बल्कि सीधे सैन्य संघर्ष का प्रभाव है। अमेरिका और इसराइल द्वारा ईरान के खिलाफ कार्रवाई के बाद से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही लगभग बंद हो गई है। इसका खतरनाक नतीजा यह हुआ कि खाड़ी देशों से तेल और गैस की आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है। यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ऊर्जा बाजार आज 1970 के दशक की तुलना में कहीं अधिक विविध और जटिल हो चुका है। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत, रणनीतिक भंडार और बेहतर आपातकालीन व्यवस्थाएं मौजूद हैं। बावजूद इसके आपूर्ति में इतनी बड़ी बाधा आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
संकट की असली गंभीरता: समय का अंतराल
मौजूदा संकट की एक खासियत यह है कि इसका पूरा प्रभाव अभी सामने नहीं आया है। जो तेल एक महीने पहले खाड़ी से निकला था, वही अभी रिफाइनरियों तक पहुंच रहा है। जैसे-जैसे यह सप्लाई खत्म होगी, असली कमी और कीमतों में उछाल तब देखने को मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा लागत में वृद्धि सिर्फ इस संकट के दौरान ही नहीं, बल्कि इसके खत्म होने के बाद भी 6 से 12 महीनों तक बनी रह सकती है। यह “डिले इफेक्ट” 1970 के तेल संकट से अलग है, जहां असर अपेक्षाकृत तुरंत दिखा था। आज की ग्लोबल सप्लाई चेन लंबी और बेहद जटिल है, जिससे संकट का प्रभाव धीरे-धीरे लेकिन अधिक व्यापक रूप में सामने आएगा।
विकसित बनाम विकासशील दुनिया
साल 1973 का संकट मुख्य रूप से विकसित देशों को प्रभावित कर रहा था, जिनके पास संसाधन और संस्थागत क्षमता थी। वे इस संकट को संभालने में सक्षम थे, भले ही उन्हें थोड़ी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। लेकिन आज का संकट विकासशील देशों के लिए अधिक खतरनाक है। भारत, पाकिस्तान, अफ्रीकी देश और कई एशियाई देशों की अर्थव्यवस्थाएं तेल के आयात पर निर्भर हैं। इनके पास न तो पर्याप्त रणनीतिक भंडार हैं और न ही आर्थिक झटकों को सहने की क्षमता। ऊर्जा कीमतों में वृद्धि सीधे महंगाई, खाद्य संकट और सामाजिक अस्थिरता को जन्म दे सकती है।
तो यह संकट 1970 से बड़ा है?
इस सवाल का जवाब देना आसान नहीं है। अगर हम सिर्फ तेल बाजार की संरचना देखें तो आज की स्थिति अपेक्षाकृत ज्यादा मजबूत है। दुनिया अब सिर्फ तेल पर निर्भर नहीं है। ऊर्जा के स्रोतों में काफी विविधता आई है, लेकिन अगर हम भू-राजनीतिक जोखिम, सप्लाई चेन की जटिलता और विकासशील देशों की कमजोर स्थिति को ध्यान में रखें, तो यह संकट कहीं अधिक खतरनाक साबित हो सकता है। खासकर तब, जब यह लंबे समय तक खिंचता है। एक और बड़ा अंतर यह है कि आज का संकट सिर्फ सप्लाई तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को भी नुकसान पहुंचाने का खतरा है। तेल रिफाइनरी, पाइपलाइन और शिपिंग रूट सीधे युद्ध के दायरे में आ चुके हैं। 1970 के दशक में ऐसा नहीं था। अगर ऊर्जा ढांचे को व्यापक नुकसान होता है, तो इसकी भरपाई में सालों-साल लग सकते हैं, जिससे संकट और गहरा हो सकता है।
तो आगे का रास्ता क्या है?
इस पूरे संकट में सबसे बड़ा खतरा अनिश्चिय की स्थिति है। अगर यह टकराव लंबा खिंचता है, तो निवेश, उत्पादन और वैश्विक व्यापार पर इसका गहरा असर पड़ेगा। आर्थिक विकास धीमा हो सकता है और वैश्विक मंदी की आशंका बढ़ सकती है। समाधान की बात करें तो राजनयिक प्रयासों के जरिए इस संघर्ष को जल्द समाप्त करने के अलावा और कोई विकल्प फिलहाल है नहीं। लेकिन मौजूदा वैश्विक राजनीतिक माहौल में यह आसान नहीं दिखता।
बहरहाल, मौजूदा तेल संकट और 1970 के दशक का तेल संकट, दोनों अपने-अपने समय की उपज हैं। जहां 1970 के दशक का संकट एक राजनीतिक हथियार था, वहीं आज का संकट एक भू-राजनीतिक विस्फोट है। यह तय करना अभी जल्दबाज़ी होगी कि कौन सा संकट बड़ा है, लेकिन इतना तय है कि आज की दुनिया जिस तरह से आपस में कहीं अधिक गहराई और नाजुकता से जुड़ी है, अगर यह संकट लंबा चलता है तो इसका असर सिर्फ तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज के हर पहलू को प्रभावित करेगा। ऐसे में यह सिर्फ एक ऊर्जा संकट नहीं, बल्कि एक व्यापक वैश्विक चुनौती बन चुका है।




