तिरुवनंतपुरम। केरल में सत्ता की जंग आज अपने निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुकी है। इस दक्षिणी प्रदेश की 140 विधानसभा सीटों पर आज (गुरुवार) मतदान संपन्न हो गया है, जिसमें 883 उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला ईवीएम में बंद हो गया है। खबर है कि पिछले 49 वर्षों में दूसरी बार सबसे ज्यादा वोटिंग हुई है। चुनाव आयोग की मानें तो रात के 8.00 बजे तक मिली जानकारी में यहां 78 प्रतिशत वोट डाले गए हैं। इस हाई-प्रोफाइल चुनाव में मुकाबला तीन प्रमुख गठबंधनों CPI-M के नेतृत्व वाले एलडीएफ, कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ और बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के बीच है।
चुनाव आयोग ने राज्यभर के 30,495 पोलिंग बूथों पर शांतिपूर्ण और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित कराने के लिए व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए थे, जिसमें 76 हजार पुलिसकर्मियों और केंद्रीय बलों की तैनाती की गई थी। दिलचस्प बात यह है कि कई पोलिंग स्टेशनों का संचालन महिलाएं और दिव्यांग कर्मी कर रहे थे, जो चुनावी प्रक्रिया को और समावेशी बनाता है। इस चुनाव में मतदाताओं की संरचना भी काफी अहम है- 1.32 करोड़ पुरुष, 1.39 करोड़ महिलाएं और 273 ट्रांसजेंडर मतदाता लोकतंत्र के इस महापर्व में हिस्सा लिया।
ADR Report : 38% उम्मीदवारों पर आपराधिक केस
केरल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ADR की रिपोर्ट ने उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड पर गंभीर खुलासे किए हैं। कुल 883 में से 324 (38%) उम्मीदवारों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जिनमें 201 पर गंभीर आरोप हैं। प्रमुख दलों में कांग्रेस के 85 उम्मीदवारों में से 72, भाजपा के 93 उम्मीदवारों में से 59 और सीपीएम के 77 उम्मीदवारों में से 51 ने अपने हलफनामों में आपराधिक मामलों की जानकारी दी है। प्रदेश की 140 विधानसभा सीटों में से 59 (42%) ऐसी हैं, जहां तीन या उससे अधिक उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। रिपोर्ट में यह भी तथ्य सामने आया कि यह स्थिति नई नहीं है। पिछले चुनावों की तुलना में उम्मीदवारों के चयन में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के पारदर्शिता संबंधी निर्देशों के बावजूद राजनीतिक दल आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को टिकट दे रहे हैं।
करीब एक महीने तक चले जोरदार चुनाव प्रचार के दौरान राष्ट्रीय स्तर के दिग्गज नेताओं ने भी मैदान संभाला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने एनडीए के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की, जबकि कांग्रेस के राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने यूडीएफ के लिए जोर लगाया। वहीं, मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने सत्तारूढ़ एलडीएफ के अभियान की अगुवाई करते हुए अपने कामकाज के आधार पर वोट मांगे।
राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो केरलम में परंपरागत रूप से एलडीएफ और यूडीएफ के बीच ही सीधा मुकाबला रहा है, लेकिन इस बार बीजेपी भी तीसरे विकल्प के तौर पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में है। एलडीएफ जहां अपने मजबूत कैडर और ग्रामीण क्षेत्रों में पकड़ के दम पर आत्मविश्वास से भरा है, वहीं उसे एंटी-इन्कम्बेंसी का सामना करना पड़ सकता है।
दूसरी ओर, यूडीएफ को मुस्लिम और ईसाई समुदायों का पारंपरिक समर्थन हासिल है, लेकिन आंतरिक गुटबाजी उसकी राह को थोड़ा मुश्किल बना सकती है। बीजेपी ने सबरीमाला जैसे मुद्दों और विकास के वादों के जरिए अपने जनाधार को बढ़ाने की कोशिश की है और खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश किया है।
चुनाव प्रचार के दौरान आरोप-प्रत्यारोप भी खूब लगे। वाम दलों ने कांग्रेस पर वायनाड भूस्खलन राहत को लेकर सवाल उठाए, जबकि कांग्रेस ने एलडीएफ सरकार पर तानाशाही और अंदरूनी कलह के आरोप लगाए। बीजेपी ने दोनों गठबंधनों को घेरते हुए राज्य में विकास की कमी का मुद्दा उठाया और बड़े वादे किए। अब नजरें मतदान के बाद वोटिंग प्रतिशत और 4 मई को आने वाले नतीजों पर होंगी जो यह तय करेंगे कि केरल में सत्ता की बागडोर किसके हाथ में जाती है।




