नीदरलैंड ऑफस्लोडाइक डैम मॉडल से भारत की जल रणनीति को नई दिशा

प्रधानमंत्री Narendra Modi की नीदरलैंड यात्रा केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि जल प्रबंधन, जलवायु अनुकूलन और भविष्य की अवसंरचना को लेकर भारत की दीर्घकालिक रणनीति का संकेत भी थी। इस यात्रा के दौरान दुनिया की सबसे चर्चित इंजीनियरिंग परियोजनाओं में से एक — ऑफस्लोडाइक — चर्चा के केंद्र में रही।

1932 में बने इस विशाल डैम को आधुनिक जल प्रबंधन का वैश्विक मॉडल माना जाता है। करीब 32 किलोमीटर लंबे और लगभग 90 मीटर चौड़े इस बांध ने उत्तर सागर की खाड़ी जुइडरज़ी को बंद कर खारे और मीठे पानी को अलग किया। इसका सबसे बड़ा उद्देश्य नीदरलैंड को विनाशकारी बाढ़ से बचाना था, लेकिन समय के साथ यह जल संरक्षण, भूमि पुनर्ग्रहण और परिवहन का भी महत्वपूर्ण आधार बन गया।

भारत और नीदरलैंड के बीच हुई बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण पहलू गुजरात की प्रस्तावित Kalpasar Project परियोजना को लेकर सहयोग रहा। खंभात की खाड़ी पर प्रस्तावित यह महत्वाकांक्षी योजना एक विशाल मीठे पानी के जलाशय के निर्माण पर आधारित है। इसके साथ ज्वारीय ऊर्जा उत्पादन, सिंचाई और परिवहन नेटवर्क को भी जोड़ा जाना है।

यहीं पर अफस्लाउटडाइक मॉडल भारत के लिए प्रेरणा बनता है। जिस तरह डच इंजीनियरिंग ने समुद्री जल को नियंत्रित कर जल सुरक्षा सुनिश्चित की, उसी तरह कल्पसर परियोजना गुजरात और पश्चिम भारत में जल संकट, सिंचाई और ऊर्जा की चुनौतियों का समाधान बन सकती है।

दोनों देशों ने इस दिशा में तकनीकी सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। भारत के जल शक्ति मंत्रालय और नीदरलैंड के बुनियादी ढांचा एवं जल प्रबंधन मंत्रालय के बीच आशय पत्र (MoU) पर हस्ताक्षर भी हुए हैं। इसका उद्देश्य डच हाइड्रॉलिक इंजीनियरिंग विशेषज्ञता को भारतीय परियोजनाओं के साथ जोड़ना है।

नीदरलैंड दशकों से समुद्र और बाढ़ प्रबंधन में विश्व अग्रणी रहा है, जबकि भारत बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को लागू करने की क्षमता रखता है। ऐसे में यह साझेदारी केवल तकनीकी सहयोग नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के दौर में भविष्य की रणनीतिक तैयारी भी मानी जा रही है।

प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा संकेत देती है कि आने वाले वर्षों में भारत जल प्रबंधन को केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक विकास के केंद्र में रखकर आगे बढ़ना चाहता है। अफस्लाउटडाइक जैसे मॉडल भारत के लिए यह संदेश देते हैं कि सही तकनीक, दीर्घकालिक दृष्टि और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जल संकट जैसी बड़ी चुनौतियों को अवसर में बदला जा सकता है।

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सत्ता विमर्श डेस्क
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