ईरान जंग पर ट्रम्प-नेतन्याहू में बढ़ा टकराव, पश्चिम एशिया में बढ़ी रणनीतिक दरार

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान को लेकर अमेरिका और इजराइल के बीच मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच हालिया फोन वार्ता ने यह साफ कर दिया है कि दोनों देशों की रणनीतिक प्राथमिकताओं में अब एक जैसी सोच नहीं रह गई है।

CNN की रिपोर्ट के अनुसार, नेतन्याहू चाहते हैं कि ईरान के खिलाफ सैन्य दबाव लगातार बनाए रखा जाए, जबकि ट्रम्प फिलहाल प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हुए बातचीत और क्षेत्रीय संतुलन को प्राथमिकता दे रहे हैं। यही वजह है कि अमेरिका द्वारा तैयार किए गए प्रस्तावित सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन स्लेजहैमर’ को अंतिम समय में रोक दिया गया।

इस मतभेद की कितनी अहमियत?

अमेरिका और इजराइल लंबे समय से पश्चिम एशिया में रणनीतिक साझेदार रहे हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर दोनों देशों की चिंता भी एक समान रही है। लेकिन इस बार ट्रम्प प्रशासन का रुख पहले की तुलना में ज्यादा सतर्क दिखाई दे रहा है।

दरअसल, कतर, सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देशों ने अमेरिका से अपील की थी कि ईरान के खिलाफ बड़े सैन्य हमले से पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल सकती है। खाड़ी देशों को डर है कि अगर युद्ध बढ़ा तो तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा गंभीर संकट में पड़ सकती है। ट्रम्प ने इन्हीं चिंताओं को ध्यान में रखते हुए हमले टालने का फैसला किया।

नेतन्याहू की मजबूरी क्या है?

इजराइल लंबे समय से ईरान को अपने लिए सबसे बड़ा सुरक्षा खतरा मानता रहा है। गाजा युद्ध, हिजबुल्लाह की गतिविधियां और सीरिया-लेबनान में ईरान समर्थित नेटवर्क ने इजराइल की चिंता और बढ़ा दी है। नेतन्याहू मानते हैं कि यदि अभी दबाव नहीं बनाया गया तो ईरान और मजबूत होकर उभरेगा। घरेलू राजनीति भी इस रणनीति के पीछे एक बड़ा कारण है। नेतन्याहू की सरकार लगातार सुरक्षा मुद्दों पर अपनी सख्त छवि बनाए रखना चाहती है। ऐसे में ईरान पर नरमी उनके लिए राजनीतिक जोखिम बन सकती है।

ट्रम्प क्यों बदल रहे हैं रणनीति?

ट्रम्प की प्राथमिकता फिलहाल व्यापक युद्ध से बचना और अमेरिका की प्रत्यक्ष सैन्य भागीदारी को सीमित रखना है। अमेरिका पहले ही यूक्रेन संकट और इंडो-पैसिफिक तनाव जैसे कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है। ऐसे में पश्चिम एशिया में नया युद्ध अमेरिका की आर्थिक और रणनीतिक चुनौतियों को और बढ़ा सकता है। इसके अलावा, तेल बाजार में अस्थिरता और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संभावित असर भी ट्रम्प प्रशासन की चिंता का बड़ा कारण है। अमेरिकी चुनावी राजनीति में भी लंबे युद्धों से बचने की नीति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इस टकराव का असर क्या होगा?

अगर अमेरिका और इजराइल के बीच यह रणनीतिक मतभेद और गहराता है तो पश्चिम एशिया की पॉवर पॉलिटिक्स में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। खाड़ी देश अब सिर्फ अमेरिकी सैन्य रणनीति पर निर्भर रहने के बजाय क्षेत्रीय कूटनीति और संतुलन की नीति को प्राथमिकता दे रहे हैं। दूसरी ओर, ईरान इस स्थिति को अपने पक्ष में कूटनीतिक अवसर के रूप में देख सकता है। अमेरिका की हिचकिचाहट और इजराइल की आक्रामकता के बीच ईरान क्षेत्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश करेगा। फिलहाल इतना साफ है कि ईरान संकट अब सिर्फ सैन्य संघर्ष का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह अमेरिका, इजराइल और खाड़ी देशों के बीच बदलते रणनीतिक समीकरणों की परीक्षा बन चुका है।

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सत्ता विमर्श डेस्क
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