कोलकाता/नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर मचा असंतोष अब पार्टी नेतृत्व के लिए गंभीर चुनौती बनता दिखाई दे रहा है। 80 में से 58 विधायकों की कथित नाराजगी के बाद अब लोकसभा में टीएमसी के 28 में से 20 सांसदों ने भी भाजपा नीत एनडीए को समर्थन देने की इच्छा जताई है। टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भेजकर अपनी राजनीतिक स्थिति से अवगत करा दिया है।
यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक दल के भीतर की बगावत नहीं है, बल्कि यह पश्चिम बंगाल की राजनीति और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन की शक्ति-संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है। टीएमसी के इन 20 सांसदों का यह कदम काफी अहम है। मालूम हो कि लोकसभा में टीएमसी के कुल 28 सांसद हैं। यदि इनमें से 20 सांसद वास्तव में अलग रुख अपनाते हैं, तो यह पार्टी की संसदीय ताकत के लिए बड़ा झटका होगा। यह संख्या दो-तिहाई के करीब पहुंचती है जिसके कारण दल-बदल कानून और संसदीय मान्यता से जुड़े सवाल भी टीएमसी के साथ खड़े नहीं हों सकते। बागी खेमे ने दावा किया है कि वे तत्काल पार्टी छोड़ने के बजाय अलग संसदीय समूह के रूप में एनडीए का समर्थन करेंगे।
कहने का मतलब यह कि ममता बनर्जी के नेतृत्व के लिए यह सबसे बड़ी परीक्षा की घड़ी है। टीएमसी लंबे समय से ममता बनर्जी के करिश्माई नेतृत्व के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है। पार्टी की संगठनात्मक मजबूती भी काफी हद तक उनके व्यक्तित्व पर आधारित रही है। ऐसे में विधायकों और सांसदों दोनों स्तरों पर असंतोष का खुलकर सामने आना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि चुनावी झटकों के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष गहरा गए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता में रहने वाली क्षेत्रीय पार्टियों में चुनावी हार के बाद अक्सर आंतरिक असंतोष तेजी से सतह पर आता है। टीएमसी भी फिलहाल इसी दौर से गुजरती दिख रही है।
ऐसे में बड़ा सवाल ययह कि एनडीए को किस रूप में इसका फायदा मिलेगा? यदि बागी सांसदों का समर्थन औपचारिक रूप लेता है, तो भाजपा नीत एनडीए को संसद में अतिरिक्त संख्यात्मक मजबूती मिल सकती है। हालांकि केंद्र सरकार पहले से सत्ता में है, लेकिन सहयोगी सांसदों की संख्या बढ़ने से महत्वपूर्ण विधेयकों और राजनीतिक संदेश दोनों स्तरों पर उसे लाभ मिल सकता है। साथ ही, पश्चिम बंगाल में भाजपा को यह कहने का अवसर मिलेगा कि टीएमसी के भीतर ही उसके नेतृत्व को लेकर भरोसा कम हो रहा है।
इससे इतर इंडिया गठबंधन (INDIA BLOCK) पर भी इसका असर पड़ सकता है। टीएमसी विपक्षी गठबंधन इंडिया की प्रमुख पार्टियों में से एक रही है। संसद में उसकी मजबूत उपस्थिति गठबंधन की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती रही है। यदि सांसदों का बड़ा वर्ग टूटकर मोदी-शाह नीत एनडीए को समर्थन देता है, तो विपक्षी एकजुटता की राजनीति के लिए यह बड़ा झटका होगा। विशेष रूप से ऐसे समय में जब विपक्ष केंद्र सरकार के खिलाफ साझा रणनीति बनाने की कोशिश कर रहा है, टीएमसी के भीतर का संकट विपक्षी खेमे के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
तो अब आगे का रास्ता क्या होगा? फिलहाल बागी सांसदों के दावे और उनके राजनीतिक कदमों पर सबकी नजर है। टीएमसी नेतृत्व की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है। यह भी देखना होगा कि क्या यह असंतोष केवल दबाव की राजनीति है या फिर पार्टी में वास्तविक विभाजन की दिशा में बढ़ता कदम।
बहरहाल 58 विधायकों की नाराजगी और अब 20 सांसदों के एनडीए समर्थक रुख के दावों ने टीएमसी को उसके सबसे कठिन दौर में ला खड़ा किया है। यह संकट केवल ममता बनर्जी के नेतृत्व की परीक्षा नहीं है, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति, संसद के शक्ति-संतुलन और विपक्षी राजनीति के भविष्य को भी प्रभावित कर सकता है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि यह बगावत अस्थायी है या टीएमसी की राजनीति में किसी बड़े पुनर्गठन की शुरुआत।



