पश्चिम बंगाल सरकार विधानसभा के आगामी सत्र में दो नए विधेयक लाने की तैयारी कर रही है। इनका उद्देश्य सार्वजनिक अव्यवस्था, हिंसा, सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने और पुलिस तथा सरकारी कर्मचारियों पर हमलों को रोकना है। पहली नजर में तो सरकार का यह कदम कानून-व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक स्वाभाविक पहल दिखाई देता है। आखिर किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस थानों, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक संपत्तियों पर हमले को कैसे स्वीकार किया जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या नए कानून वास्तव में समस्या का समाधान करेंगे या फिर वे राज्य की शक्तियों का और विस्तार करके नागरिक अधिकारों के लिए नई चुनौतियां पैदा करेंगे?
पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा, भीड़ द्वारा सरकारी संस्थानों पर हमले और कानून अपने हाथ में लेने की घटनाएं चर्चा का विषय रही हैं। हाल ही में फलता क्षेत्र में एक पुलिस थाने पर भीड़ द्वारा धावा बोलने की कोशिश ने सरकार को सख्त कानूनों की जरूरत का तर्क देने का मौका दिया है। सरकार का कहना है कि यदि कठोर कानूनी प्रावधान होंगे तो लोग कानून हाथ में लेने से पहले कई बार सोचेंगे।
हालांकि यह तर्क अपने आप में गलत नहीं है। किसी भी राज्य का पहला दायित्व नागरिकों की सुरक्षा और कानून के शासन को सुनिश्चित करना होता है। यदि पुलिस या सरकारी कर्मचारी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय असुरक्षित महसूस करें, तो शासन व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है। इसलिए हिंसा और तोड़फोड़ के खिलाफ प्रभावी कानूनी तंत्र की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि क्या पश्चिम बंगाल में कानूनों की कमी है या समस्या मौजूदा कानूनों के निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन की है?
भारतीय दंड संहिता, आपराधिक कानूनों और विभिन्न विशेष अधिनियमों में पहले से ही दंगा, आगजनी, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, पुलिस पर हमला करने और सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने के खिलाफ पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं। ऐसे में नए कानूनों की आवश्यकता को केवल कानून-व्यवस्था की दृष्टि से नहीं, बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक संदर्भ में भी परखना होगा।
सरकार जिन राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के कानूनों का उदाहरण दे रही है, वे भी विवादों से मुक्त नहीं रहे हैं। इन राज्यों में संगठित अपराध और असामाजिक गतिविधियों के खिलाफ बने कठोर कानूनों की आलोचना इस आधार पर होती रही है कि कई बार उनका इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं या असहमति व्यक्त करने वाले समूहों के खिलाफ भी किया गया है। इसलिए पश्चिम बंगाल में प्रस्तावित कानूनों को लेकर यह आशंका स्वाभाविक है कि कहीं उनकी व्यापक और अस्पष्ट परिभाषाएं प्रशासन को अत्यधिक विवेकाधिकार तो नहीं दे देंगी।
विशेष रूप से “असामाजिक गतिविधि” जैसी शब्दावली हमेशा बहस का विषय रही है। यदि इसकी स्पष्ट और सीमित परिभाषा नहीं होगी तो शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन और आपराधिक गतिविधि के बीच की रेखा धुंधली हो सकती है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कानून-व्यवस्था बनाए रखने का दायित्व।
प्रस्तावित कानून का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू हिंसा या तोड़फोड़ में दोषी पाए गए लोगों की संपत्ति बेचकर क्षतिपूर्ति वसूलने का प्रावधान है। पहली दृष्टि में यह व्यवस्था न्यायसंगत प्रतीत होती है। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों को आर्थिक जिम्मेदारी उठानी चाहिए। लेकिन इसके साथ निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया की गारंटी भी उतनी ही जरूरी है। यदि संपत्ति जब्ती या बिक्री की कार्रवाई दोषसिद्धि से पहले शुरू हो जाए या प्रशासनिक निर्णयों पर आधारित हो तो यह नागरिक अधिकारों के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।
दरअसल, इस पूरे मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष राजनीतिक विश्वास का संकट है। पश्चिम बंगाल लंबे वक्त से राजनीतिक ध्रुवीकरण और हिंसा की समस्या से जूझ रहा है। ऐसे माहौल में किसी भी कठोर कानून को केवल कानूनी दस्तावेज के रूप में नहीं देखा जाएगा, बल्कि उसके राजनीतिक इस्तेमाल की संभावनाओं के संदर्भ में भी परखा जाएगा। इसलिए सरकार के लिए यह आवश्यक होगा कि वह विधेयकों का मसौदा सार्वजनिक करे, व्यापक चर्चा कराए और विपक्ष तथा नागरिक समाज की चिंताओं को भी सुने।
यह भी ध्यान रखना होगा कि कानून का भय केवल तब प्रभावी होता है जब कानून का अनुपालन निष्पक्ष और समान रूप से होता है। यदि जनता को यह महसूस हो कि कठोर कानून केवल चुनिंदा लोगों या समूहों पर लागू होते हैं तो उनका नैतिक और कानूनी प्रभाव कमजोर पड़ जाता है।
पश्चिम बंगाल की सरकार का मकसद यदि वास्तव में सार्वजनिक सुरक्षा को मजबूत करना है, तो उसे केवल दंडात्मक उपायों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। पुलिस सुधार, खुफिया तंत्र की मजबूती, त्वरित न्याय और राजनीतिक हिंसा पर शून्य सहिष्णुता जैसी नीतियां कहीं अधिक प्रभावी साबित हो सकती हैं।
कानून-व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा होती है। पश्चिम बंगाल के प्रस्तावित विधेयक भी इसी कसौटी पर परखे जाएंगे। यदि ये कानून हिंसा और अराजकता को रोकते हुए नागरिक अधिकारों की रक्षा कर पाए, तो उनका स्वागत होगा। लेकिन यदि वे राज्य की शक्तियों को असंतुलित रूप से बढ़ाने का माध्यम बनते हैं, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। इसलिए असली सवाल नए कानूनों की संख्या नहीं, बल्कि उनके स्वरूप, पारदर्शिता और निष्पक्ष क्रियान्वयन का है।





जो सरकार जनता की आंख में धूल झोंककर और लोकतंत्र को दरकिनार कर बनाई गई हो उसकी नीयत साफ हो यह जरूरी नहीं है। जिस तरह से ईवीएम मशीनों में आग लगी और लोकसभा सदस्य और अन्य जनप्रतिनिध्यिों के साथ हो रहा व्यवहार बताता है कि सरकार की मंशा साफ नहीं है। वह इस कानून के जरिये लोगों की संपत्ति को लूटने का काम शुरू करेगी। साथ ही अनावश्यक लोगों को अपने पक्ष में करने के लिए इस कानून को हथियार के रूप में काम करेगी।
आपके विचारों से असहमत हूं। हमारा देश 1947 में आजाद हुआ था लेकिन पश्चिम बंगाल को आजाद होने में 79 साल लग गए। कांग्रेस, वामियों और टीएमसी ने मुस्लिम तुष्टिकरण की राह पर चलते हुए पश्चिम बंगाल को करीब करीब इस्लामिक स्टेट बना दिया है। 4 मई को पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की जीत हुई है। अभी ऐसे और कानून आएंगे जो लोकतंत्र की स्थापना को सुदृढ़ करेंगे।