देश की राजनीति में दलबदल (Defection Politics) और संसदीय गणित एक बार फिर केंद्र में हैं। विपक्षी दलों से लगातार हो रहे दलबदल के बीच बीजेपी नीत मोदी सरकार के भीतर यह भरोसा बढ़ता दिख रहा है कि आगामी मानसून सत्र तक लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत (Two-Thirds Majority in Lok Sabha) हासिल किया जा सकता है।
मोदी सरकार की रणनीति के केंद्र में दो बड़े संवैधानिक एजेंडा हैं- पहला, महिला आरक्षण को परिसीमन (Delimitation) से जोड़ने वाला संवैधानिक संशोधन विधेयक और दूसरा, देश में एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव (One Nation One Election) कराने का प्रस्ताव। इन दोनों प्रस्तावों को पारित करने के लिए संसद में विशेष बहुमत की जरूरत होगी जो मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में सरकार के लिए महत्वपूर्ण चुनौती और अवसर दोनों माना जा रहा है।
दलबदल से बढ़ती एनडीए सांसदों की संख्या
वर्तमान राजनीतिक स्थिति में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) लोकसभा में लगभग 293 सांसदों के समर्थन पर है। 540 प्रभावी सीटों वाले सदन में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा करीब 360 सांसदों का है। हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों और विपक्षी दलों में टूट के बाद यह संख्या 319 तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। इसमें तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (UBT) के कुछ सांसदों के संभावित दलबदल को प्रमुख कारण माना जा रहा है।
एक केंद्रीय मंत्री का तो साफ तौर पर कहना है कि मानसून सत्र तक मोदी सत्ता संवैधानिक संशोधन के लिए जरूरी संख्या के काफी करीब होगा। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अभी भी सरकार को दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए अतिरिक्त समर्थन की जरूरत होगी।
राज्यसभा में भी NDA को बढ़त, बहुमत के करीब
245 सदस्यीय राज्यसभा (Rajya Sabha) में भी सत्ता पक्ष की स्थिति मजबूत होती दिखाई दे रही है। वर्तमान में एनडीए के पास लगभग 152 सांसद हैं, जबकि दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 164 सांसदों का है। हाल के महीनों में हुए राजनीतिक बदलावों ने इस स्थिति को प्रभावित किया है, जिनमें शामिल हैं- आम आदमी पार्टी (AAP) के कई सदस्यों का दलबदल,विभिन्न विपक्षी दलों में इस्तीफे और राजनीतिक दलबदल और उपचुनावों के परिणामों का सत्ता के पक्ष में जाना। राजनीतिक गलियारों में चर्चा आम है कि आने वाले महीनों में राज्यसभा में सत्ता पक्ष और अधिक मजबूत स्थिति में आ सकता है।
परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण विधेयक बना केंद्र बिंदु
सरकार का कहना है कि देश में संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं अभी भी 1971 की जनगणना (1971 Census) पर आधारित हैं, जबकि देश की जनसंख्या संरचना में भारी बदलाव आ चुका है। इसी आधार पर नए परिसीमन की जरूरत (Need for Delimitation) को सरकार आवश्यक सुधार के रूप में पेश कर रही है।
सरकार के पक्ष में तर्क दिया जा रहा है कि यह प्रक्रिया प्रतिनिधित्व को और अधिक न्यायसंगत बनाएगी, जनसंख्या अनुपात के अनुसार सीटों का पुनर्वितरण करेगी और लोकतांत्रिक ढांचे को अधिक संतुलित बनाएगी। लेकिन विपक्षी दलों ने इसको लेकर चिंता जताई है कि परिसीमन से राजनीतिक संतुलन प्रभावित हो सकता है और कुछ राज्यों या क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कम या अधिक हो सकता है।
परिसीमन राजनीतिक लाभ के लिए : विपक्ष
विपक्षी नेताओं का आरोप है कि प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया का राजनीतिक उपयोग किया जा सकता है। उनका कहना है कि इससे कुछ क्षेत्रों में राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं और यह सत्ता संतुलन को प्रभावित कर सकता है। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने संसद में कहा है कि परिसीमन का उपयोग यदि राजनीतिक लाभ के लिए किया गया तो यह लोकतांत्रिक असंतुलन पैदा कर सकता है। हालांकि सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व सुधारने की संवैधानिक प्रक्रिया है।
One Nation One Election प्रस्ताव भी एजेंडे में
सरकार का दूसरा बड़ा प्रस्ताव देश में एक साथ चुनाव (One Nation One Election) कराने का है। इस योजना के तहत लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभा के चुनाव एक ही समय पर कराए जाने की बात की जा रही है। सरकार का तर्क है कि इससे चुनावी खर्च में कमी आएगी, प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और नीतिगत निरंतरता (Policy Continuity) सुनिश्चित होगी। लेकिन आलोचकों का कहना है कि इससे राज्यों की राजनीतिक स्वायत्तता कमजोर हो सकती है और राष्ट्रीय मुद्दे क्षेत्रीय चुनावों पर हावी हो सकते हैं।
विपक्षी दलों में टूट और राजनीतिक अस्थिरता
हाल के महीनों में विपक्षी दलों में दलबदल और आंतरिक असंतोष की घटनाएँ बढ़ी हैं। तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना (UBT) और अन्य क्षेत्रीय दलों में राजनीतिक अस्थिरता के संकेत देखे गए हैं। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, आने वाले समय में कुछ और विपक्षी दलों में भी टूट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
क्या दो-तिहाई बहुमत की ओर बढ़ रही है सरकार?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि दलबदल की वर्तमान प्रवृत्ति जारी रहती है, तो सरकार दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंच सकती है। हालांकि यह लक्ष्य अभी भी पूरी तरह सुनिश्चित नहीं है। संवैधानिक संशोधनों के लिए आवश्यक बहुमत हासिल करना केवल संख्या का खेल नहीं है, बल्कि राजनीतिक स्थिरता और व्यापक सहमति पर भी निर्भर करता है।
बहरहाल, भारत की राजनीति इस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। एक ओर सरकार बड़े संवैधानिक और चुनावी सुधारों की दिशा में आगे बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष दलबदल और परिसीमन को लेकर गंभीर सवाल उठा रहा है।दलबदल की राजनीति (Defection Politics), परिसीमन (Delimitation) और One Nation One Election जैसे मुद्दे आने वाले समय में भारतीय लोकतंत्र की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक साबित हो सकते हैं।





शानदार स्टोरी।
सर आप बहुत बेहतरीन स्टोरी लिखते हैं । आपका विश्लेषण बहुत शानदार रहता।