नई दिल्ली। देश के तीन सबसे संवेदनशील मंदिर-मस्जिद विवादों वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह और संभल की शाही जामा मस्जिद में सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता की पहल को दोनों पक्षों ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। हिंदू और मुस्लिम पक्षों का स्पष्ट कहना है कि इन मामलों का समाधान बातचीत या समझौते के बजाय अदालत के अंतिम निर्णय से ही होना चाहिए।
जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने ‘समाधान समारोह 2026′ पहल के तहत दोनों पक्षों को पत्र भेजकर मध्यस्थता के जरिए विवाद सुलझाने की संभावना पर सहमति मांगी थी। हालांकि, किसी भी पक्ष ने इस प्रस्ताव पर सहमति नहीं दी। यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि यह पत्र कब भेजा गया था।
सुप्रीम कोर्ट परिसर में 21 से 23 अगस्त के बीच आयोजित होने वाले ‘समाधान समारोह‘ के तहत विशेष लोक अदालत का उद्देश्य ऐसे मामलों में लंबी कानूनी प्रक्रिया के बजाय आपसी सहमति से समाधान तलाशना है। लेकिन इन तीनों विवादों में संबंधित पक्षों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे न्यायिक प्रक्रिया को ही आगे बढ़ाना चाहते हैं।
क्यों महत्वपूर्ण हैं ये तीनों मामले?
देश की राजनीति और सामाजिक विमर्श में लंबे समय से केंद्र में रहे इन तीनों मामलों का संबंध धार्मिक स्थलों के स्वामित्व और ऐतिहासिक दावों से है। इन पर न केवल विभिन्न अदालतों में सुनवाई चल रही है, बल्कि पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 की व्याख्या और संवैधानिक वैधता से जुड़े व्यापक प्रश्न भी न्यायपालिका के समक्ष हैं।
ज्ञानवापी मस्जिद, वाराणसी
हिंदू पक्ष का दावा है कि ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण प्राचीन काशी विश्वनाथ मंदिर को आंशिक रूप से ध्वस्त कर कराया गया था। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह एक वैध मस्जिद है और पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के तहत इसकी वर्तमान स्थिति को चुनौती नहीं दी जा सकती। फिलहाल इस मामले में पूजा के अधिकार, एएसआई सर्वे, वजूखाना क्षेत्र और धार्मिक स्थल अधिनियम से जुड़े विभिन्न मामलों पर जिला अदालत, इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह, मथुरा
मथुरा विवाद में हिंदू पक्ष का दावा है कि शाही ईदगाह मस्जिद भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। वहीं मुस्लिम पक्ष 1968 के समझौते और पूजा स्थल अधिनियम का हवाला देते हुए मौजूदा स्थिति बनाए रखने की मांग कर रहा है। इस मामले में भूमि स्वामित्व, सर्वे और 1968 के समझौते की वैधता से जुड़े कई मुकदमे इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।
शाही जामा मस्जिद, संभल
संभल की शाही जामा मस्जिद को लेकर हिंदू पक्ष का दावा है कि यह प्राचीन हरिहर मंदिर के स्थान पर बनाई गई थी। उनकी मांग है कि पुरातात्विक सर्वे कराया जाए और यदि मंदिर के अवशेष मिलते हैं तो मंदिर को पुनर्स्थापित किया जाए। मुस्लिम पक्ष इस मस्जिद को ऐतिहासिक और वैध धार्मिक स्थल बताते हुए सर्वे और नए मुकदमों पर रोक की मांग कर रहा है। इस मामले की सुनवाई चंदौसी सिविल कोर्ट, इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चल रही है।
राजनीतिक और कानूनी महत्व
इन तीनों विवादों को केवल संपत्ति या धार्मिक स्थल के मुकदमे के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि ये धार्मिक आस्था, इतिहास की व्याख्या और संवैधानिक कानून के जटिल प्रश्नों से जुड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता पहल का उद्देश्य तनाव कम करते हुए सहमति का रास्ता तलाशना था, लेकिन दोनों पक्षों के इनकार के बाद अब इन मामलों का भविष्य पूरी तरह न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर रहेगा।




