राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत इन दिनों अमेरिका और कनाडा के दौरे पर हैं और वहां उनके दो संबोधन भारतीय राजनीति के लिए कई असहज सवाल खड़े कर गए हैं। न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन से लेकर कनाडा के टोरंटो तक संघ प्रमुख ने जिस भारत और जिस हिंदू दर्शन की तस्वीर पेश की, उसमें नफरत के लिए कोई जगह नहीं है, धार्मिक पहचान के आधार पर किसी नागरिक की गरिमा कम नहीं होती, विविधता कोई खतरा नहीं बल्कि प्रकृति का स्वभाव है और दुनिया की हर चीज को अपना मानना चाहिए, लेकिन मालिक की तरह नहीं, भाई की तरह।
उन्होंने यहां तक कहा कि अगर कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए तो वह हिंदू नहीं हो सकता। सुनने में यह वही संदेश है जिसकी आज के भारत को जरूरत है। लेकिन इस संदेश के साथ एक बुनियादी सवाल भी जुड़ा हुआ है कि क्या मोहन भागवत यही बात भारत में भी उसी ताकत और स्पष्टता से कह पाते हैं? यही सवाल विदेश में दिए इन संबोधनों को महज आध्यात्मिक या सांस्कृतिक भाषण नहीं रहने देता, बल्कि उन्हें भारत की मौजूदा राजनीति के संदर्भ में एक गंभीर राजनीतिक दस्तावेज बना देता है। क्योंकि विचारों की असली परीक्षा तब नहीं होती जब उन्हें ऐसे मंच पर कहा जाए जहां सामने बैठे लोग पहले से ही उन्हें सुनने को तैयार हों। विचार की असली परीक्षा तब होती है जब वही बात अपने देश में कही जाए, खासकर तब जब वह बात सत्ता के राजनीतिक हितों से टकराती हो।
मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में कहा कि किसी हिंदू का यह सोचना कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, हिंदू होने की भावना के खिलाफ है। यह बात काफी महत्वपूर्ण है। लेकिन भारत में जब मुसलमानों को लेकर नफरत की भाषा सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनती है, जब धार्मिक पहचान चुनावी राजनीति का हथियार बनती है, जब अल्पसंख्यकों के प्रति संदेह और भय पैदा करने वाली बयानबाजी होती है, तब संघ प्रमुख की आवाज उसी स्पष्टता से क्यों नहीं सुनाई देती? अगर यह विचार वास्तव में संघ की मूल वैचारिक समझ का हिस्सा है तो इसे अमेरिका की जमीन पर ही क्यों याद किया जाना चाहिए? इसकी जरूरत तो भारत में कहीं ज्यादा है।
भारत में आज धार्मिक पहचान राजनीति का एक महत्वपूर्ण औजार बन चुकी है। मंदिर-मस्जिद से लेकर खान-पान, पहनावे और नागरिकता तक अनेक मुद्दे धार्मिक पहचान के चश्मे से देखे जाते हैं। बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की भाषा सार्वजनिक जीवन में पहले से ज्यादा मुखर हुई है। ऐसे माहौल में संघ प्रमुख का यह कहना कि हर इंसान की गरिमा समान है, निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है। लेकिन लोकतंत्र में केवल स्वागतयोग्य बयान काफी नहीं होते। सवाल यह होता है कि क्या उन बयानों के पीछे खड़े होने का साहस भी उतना ही है?
मोहन भागवत ने टोरंटो में कहा कि भारत में विविधता कभी एकता के लिए समस्या नहीं रही। उन्होंने ‘विविधता में एकता’ से भी आगे जाकर कहा कि विविधता ही एकता का हिस्सा है। उन्होंने यह भी कहा कि हम यह नहीं कहते कि सभी एक जैसे हैं, हम कहते हैं कि सब एक हैं। यह भारतीय लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना के बेहद करीब खड़ा विचार है। भारत की खूबसूरती यही है कि यहां एक होने के लिए एक जैसा होना जरूरी नहीं है। हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और दूसरे समुदाय अपनी अलग-अलग आस्थाओं के साथ भारत के नागरिक हैं। उनकी भाषाएं अलग हो सकती हैं, पूजा-पद्धतियां अलग हो सकती हैं, खान-पान और जीवन-शैली अलग हो सकती है, लेकिन नागरिक गरिमा एक होनी चाहिए।
लेकिन अगर विविधता को ही एकता का आधार मानना है तो फिर धार्मिक विविधता के साथ असहजता क्यों? अगर हर व्यक्ति की गरिमा बराबर है तो धर्म के नाम पर किसी समुदाय को राजनीतिक रूप से निशाना बनाने वाली भाषा का विरोध भी बराबर होना चाहिए। अगर ‘हम और हमारा’ ही समाधान है तो ‘वे और उनका’ वाली राजनीति को भी चुनौती देनी होगी। यहीं मोहन भागवत के विदेशी भाषण और भारत के राजनीतिक व्यवहार के बीच दूरी दिखाई देती है।
संघ प्रमुख ने अमेरिका में राजनीति को ‘स्वार्थ का खेल’ बताया। उन्होंने कहा कि जहां ‘मैं और मेरा’ की भावना होगी वहां समाधान नहीं निकलेगा। समाधान निकलेगा ‘हम और हमारा’ के रास्ता से। बात बिल्कुल सही है। लेकिन इस विचार को यदि गंभीरता से लिया जाए तो फिर इसका पहला सवाल राजनीति की तरफ ही जाता है। राजनीति में धर्म का इस्तेमाल किसलिए होता है? नागरिकों को धार्मिक पहचान में बांटकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश किसलिए होती है? चुनावों के दौरान बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक की भाषा क्यों मजबूत होती है? सत्ता हासिल करने और बनाए रखने के लिए समाज की भावनाओं को धार्मिक आधार पर संगठित करना क्या ‘मैं और मेरा’ की राजनीति नहीं है?
इन सवालों का जवाब केवल यह कहकर नहीं दिया जा सकता कि समाज को बदलना होगा। समाज और राजनीति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। राजनीति समाज से निकलती है और फिर वही राजनीति समाज को प्रभावित भी करती है। कानून, संस्थाएं, प्रशासन और सार्वजनिक विमर्श- सब पर राजनीति का असर पड़ता है। इसलिए अगर समाज में विभाजन बढ़ रहा है तो राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। और जिस संगठन को देश की सत्तारूढ़ विचारधारा का वैचारिक स्रोत माना जाता है, उसकी जिम्मेदारी का सवाल तो और भी गंभीर हो जाता है।
यहां सवाल भारतीय जनता पार्टी या नरेंद्र मोदी तक सीमित नहीं है। सवाल उससे बड़ा है। सवाल उस वैचारिक निरंतरता का है जिसकी बात स्वयं आरएसएस चीफ कर रहे हैं। अगर हिंदू धर्म की व्याख्या यह है कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई जगह न चाहने वाला व्यक्ति हिंदू नहीं हो सकता, तो भारत की राजनीति में भी इस सिद्धांत की स्पष्ट मौजूदगी दिखनी चाहिए। अगर हर इंसान की गरिमा बराबर है तो किसी नागरिक के साथ उसकी धार्मिक पहचान के कारण होने वाले भेदभाव पर वही आवाज उठनी चाहिए जो न्यूयॉर्क में उठी है।
अगर विविधता भारत की ताकत है तो उस विविधता को कमजोर करने वाली हर राजनीति का विरोध होना चाहिए। क्योंकि किसी भी विचार की विश्वसनीयता उसके सबसे सुविधाजनक मंच पर नहीं, बल्कि उसके सबसे कठिन समय में तय होती है। अमेरिका में खड़े होकर भारत की उदार और समावेशी परंपरा की बात करना अच्छी बात है। लेकिन भारत में उसी परंपरा की रक्षा के लिए खड़ा होना उससे कहीं बड़ी बात है। विदेश में भारतीय संस्कृति की महानता बताना आसान है; अपने देश में उसी संस्कृति के भीतर मौजूद असहिष्णुता के सवालों से आंख मिलाना कठिन हो जाता है। विदेश में ‘वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी’ कहना आसान है; देश में ‘वन इंडिया, वन इक्वल डिग्निटी’ के लिए खड़ा होना मुश्किल हो जाता है।
और यही मुश्किल सवाल आज मोहन भागवत के सामने है। अगर वे कहते हैं कि सत्य एक है और इंसान उसी सत्य की अलग-अलग व्याख्या करते हैं, तो फिर किसी एक धार्मिक पहचान को राष्ट्र की पहचान के साथ पूरी तरह जोड़ने की कोशिश का विरोध भी उसी तर्क से होना चाहिए। अगर वे कहते हैं कि मनुष्य अपने दिमाग में बने ‘सॉफ्टवेयर’ का कैदी है और उसका सॉफ्टवेयर उसके सत्य को देखने का नजरिया तय करता है, तो फिर धार्मिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होने की जिम्मेदारी सबसे पहले उन लोगों की होनी चाहिए जिनके पास समाज को दिशा देने का दावा है।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है। यह विविधता केवल भाषाओं और संस्कृतियों की नहीं है; यह आस्थाओं की भी है। यही कारण है कि भारतीय संविधान ने नागरिक को उसकी धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर समान अधिकार दिए। लोकतंत्र का अर्थ यही है कि बहुमत सरकार बना सकता है, लेकिन बहुमत नागरिकता की गुणवत्ता तय नहीं कर सकता। सरकार बहुमत की हो सकती है, राष्ट्र सभी का होता है। यही फर्क किसी भी सभ्य लोकतंत्र को भीड़ के शासन से अलग करता है।
इसलिए जब मोहन भागवत कहते हैं कि दुनिया की हर चीज को अपना मानना चाहिए, लेकिन मालिक की तरह नहीं, भाई की तरह, तो इस विचार को भारत की राजनीति पर भी लागू करने की जरूरत है। भारत किसी एक धर्म, एक जाति, एक भाषा या एक राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। भारत उन सभी का है जो इसके नागरिक हैं। किसी को भी दूसरे नागरिक से यह कहने का अधिकार नहीं कि उसकी आस्था, उसकी पहचान या उसका अस्तित्व इस देश में कमतर है।
यही वह बिन्दू है जहां संघ प्रमुख के शब्दों को, उनके वक्तव्यों को संघ की राजनीतिक-सामाजिक भूमिका से जोड़कर देखना जरूरी है। क्योंकि संघ केवल एक आध्यात्मिक या सांस्कृतिक संस्था नहीं है। भारतीय राजनीति में उसका व्यापक प्रभाव है और उसकी विचारधारा से जुड़ी राजनीतिक ताकत आज देश की सत्ता में है। इसलिए संघ प्रमुख की कही हुई बातों की राजनीतिक जिम्मेदारी भी स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है।
अगर भागवत को लगता है कि राजनीति ‘मैं और मेरा’ के स्वार्थ में फंस गई है तो उन्हें भारत में भी यह सवाल उठाना चाहिए कि राजनीति में धर्म और धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल कहां तक जायज है। अगर उन्हें लगता है कि विविधता भारत की ताकत है तो उन्हें भारत में भी यह कहने से चूकना नहीं चाहिए कि अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा और सम्मान पर कोई समझौता नहीं हो सकता। अगर वे मानते हैं कि हर इंसान की गरिमा समान है तो उन्हें यह भी कहना चाहिए कि किसी भी नागरिक की गरिमा उसकी धार्मिक पहचान से कम या ज्यादा नहीं हो सकती। और अगर वे यह सब कहेंगे तो उनके अमेरिकी और कनाडाई भाषणों की विश्वसनीयता कई गुना बढ़ जाएगी। क्योंकि तब कोई यह नहीं कह सकेगा कि संघ प्रमुख का विदेश में एक चेहरा और भारत में दूसरा चेहरा है।
मोहन भागवत को यह समझना होगा कि राष्ट्र दोहरे चरित्र से नहीं बनता। राष्ट्र दोहरे मानदंडों से भी मजबूत नहीं होता। किसी राष्ट्र की नैतिक शक्ति इस बात में समाहित होती है कि वह अपने सिद्धांतों को मंच और परिस्थिति के हिसाब से नहीं बदलता। जो बात विदेश में सही है, वह देश में भी सही होनी चाहिए। जो बात न्यूयॉर्क में मानवता का सिद्धांत है, वह भारत में भी नागरिक अधिकार का सिद्धांत होना चाहिए। जो बात टोरंटो में भाईचारे का संदेश है, वह भारत में राजनीतिक आचरण का आधार भी बनना चाहिए। भारत को आज इसी निरंतरता की जरूरत है।
मोहन भागवत के विदेशी संबोधनों में अगर एक उदार, समावेशी और बहुलतावादी भारत की तस्वीर दिखाई देती है तो देश को उसी तस्वीर की जरूरत है। लेकिन यह तस्वीर भाषणों से नहीं बनेगी। इसके लिए उस राजनीति को चुनौती देनी होगी जो धर्म को नागरिकता से ऊपर रखती है, उस भाषा को रोकना होगा जो समाज को ‘हम’ और ‘वे’ में बांटती है और उस चुप्पी को तोड़ना होगा जो किसी समुदाय के खिलाफ होने वाली नफरत को सामान्य बनने देती है।
इसलिए मोहन भागवत के भाषणों को खारिज करने के बजाय उनसे एक बड़ा सवाल पूछना चाहिए- क्या आप जिस भारत की बात अमेरिका और कनाडा में कर रहे हैं, वही भारत आपको अपने देश में भी दिखाई देता है? अगर दिखाई देता है तो फिर उसके खिलाफ उठती आवाजों के साथ खड़े होने की जरूरत है। और अगर नहीं दिखाई देता तो उसे बदलने की जिम्मेदारी केवल समाज की नहीं, उन सभी शक्तियों की है जो समाज और राजनीति को प्रभावित करती हैं। क्योंकि भारत को विदेशों में अपनी महान परंपरा का परिचय देने से ज्यादा जरूरत अपने भीतर उस परंपरा को जीवित रखने की है।
‘एक विश्व, एक मानवता’ का संदेश तभी सार्थक होगा जब भारत के भीतर भी हर नागरिक को यह भरोसा हो कि वह पहले नागरिक है, बाद में किसी धर्म, जाति या समुदाय का सदस्य। और शायद यही वह कसौटी है जिस पर मोहन भागवत के अमेरिका-कनाडा के भाषणों को भी परखा जाना चाहिए। कथनी और करनी के बीच की दूरी जितनी कम होगी, विचार उतना ही विश्वसनीय होगा। वरना दुनिया को मानवता का पाठ पढ़ाने वाला कोई भी राष्ट्र अपने भीतर के सवालों से बच नहीं सकता।





मोहन भागवत से इस लेख में जो क़ैफ़ियत तलब की गयी है वह बिल्कुल दुरुस्त है। विलियम सायर द्वारा राइज़ एंड फ़ॉल ऑफ़ थर्ड राइख़ में लिखे की याद आ गई जिसमें ज़िक्र है कि कैसे multiple speak by the ministers of Hitler had been the chief characteristics of the Nazi Party .
Good article. Appropriate reply and questions to Mohan Bhagwat. I just remember the writings of ,the veteran journalist from the USA ,William Shire’s book Rise and Fall of the Third Reikh led by Hitler. He has mentioned in his book the chief propaganda characteristics of the Nazi Ministers who used their “multi speaks” as the weapon of their tactics to confuse the masses and consolidated their own strengths