प्रयागराज। इलाहाबाद में शनिवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम महज एक राजनीतिक सभा नहीं रहा। मंच पर एक के बाद एक छात्रों ने पेपर लीक, बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता और शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। बारिश के बीच तीन घंटे से अधिक समय तक जुटी युवा भीड़ ने रोजगार के सवाल को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया। कार्यक्रम का अंदाज भी पारंपरिक राजनीतिक सभाओं से अलग था। मंच, बड़ी स्क्रीन और तेज रफ्तार प्रस्तुति ने इसे किसी रॉक कॉन्सर्ट जैसा माहौल दिया। राहुल गांधी ने भी अपने पारंपरिक सादे सफेद टी-शर्ट की जगह गुलाबी शर्ट पहनकर युवाओं के बीच अपनी बात रखी। उनके भाषण का सबसे बड़ा सवाल था- आखिर देश में नौकरियां हैं कहां?
‘डेटा आपका, डर आपका और दौलत किसी और की’
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि आज के युवा जिस डेटा का निर्माण कर रहे हैं, उसका इस्तेमाल बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां अपनी संपत्ति बढ़ाने के लिए कर रही हैं। दूसरी ओर रोजगार के अवसर लगातार सिकुड़ रहे हैं और युवा गिग वर्कर के रूप में काम करने को मजबूर हो रहे हैं। राहुल ने इसे ‘21वीं सदी का मजदूर’ बताया। ‘डेटा आपका, डर आपका और दौलत किसी और की’। कायस्थ पाठशाला मैदान में बड़ी संख्या में जुटे युवाओं को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि वह युवाओं के दर्द और उनकी उस क्षमता की बात करना चाहते हैं, जिसके जरिए वे डेटा तैयार करते हैं। उनके मुताबिक, समस्या यह है कि युवा डेटा पैदा करते हैं, लेकिन उस डेटा से पैदा होने वाली संपत्ति किसी और के हाथ में चली जाती है।
राहुल ने कहा कि 21वीं सदी में डेटा से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बनाई जा सकती है, लेकिन AI से डेटा नहीं बनाया जा सकता। उनके मुताबिक जिस तरह पेट्रोल के बिना पेट्रोल इंजन काम नहीं कर सकता, उसी तरह डेटा के बिना AI भी संभव नहीं है। उनका तर्क था कि डेटा की असली ताकत युवाओं की कल्पनाशीलता और उनकी भागीदारी से आती है, इसलिए उस पर युवाओं का अधिकार होना चाहिए।
डिग्री रोजगार की गारंटी नहीं देती
राहुल गांधी के मुताबिक, मौजूदा व्यवस्था ने युवाओं को एक ऐसे ‘चक्रव्यूह’ में फंसा दिया है, जहां परिवार लाखों रुपये खर्च करके बच्चों को इंजीनियरिंग, मेडिकल या पोस्टग्रेजुएशन की पढ़ाई कराते हैं। बदले में उन्हें डिग्री मिलती है, लेकिन वह डिग्री रोजगार की गारंटी नहीं देती। डिग्री के बाद भी सवाल वही- रोजगार कहां? राहुल गांधी ने दावा किया कि एक हजार युवाओं में से केवल 12 को नौकरी मिलती है। उन्होंने युवाओं की सोशल मीडिया पर बढ़ती निर्भरता पर भी निशाना साधा।
“आपका डेटा लिया जाता है, बड़ी कंपनियों को दिया जाता है और फिर आपसे कहा जाता है- डिलीवरी करो, ऐप पर काम करो, गाड़ी चलाओ, गिग वर्कर बनो। लेकिन सवाल मत पूछो- देश में नौकरियां कहां हैं?”
राहुल ने कहा कि युवाओं को लगातार रील देखने और बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है और यह 21वीं सदी की एक नई लत बन गई है। उनका आरोप था कि युवाओं का डेटा लिया जाता है, बड़ी कंपनियों को दिया जाता है और फिर उन्हीं युवाओं से कहा जाता है- डिलीवरी करो, ऐप पर काम करो, गाड़ी चलाओ, गिग वर्कर बनो। लेकिन एक सवाल मत पूछो- देश में नौकरियां कहां हैं? यही सवाल कार्यक्रम का केंद्रीय राजनीतिक संदेश बन गया।
निजीकरण से घटती सरकारी नौकरियां?
राहुल गांधी ने बड़ी स्क्रीन पर प्रस्तुतियों के जरिए यह बताने की कोशिश की कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के निजीकरण से सरकारी नौकरियों के अवसर कम हो रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि छोटे और मझोले उद्योगों तथा उद्यमिता को पर्याप्त ऋण और समर्थन नहीं मिलने से युवाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते नहीं बन पा रहे हैं। उनके मुताबिक विनिर्माण क्षेत्र भी कमजोर हुआ है और दूसरी तरफ बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां रोजगार के बजाय AI को बढ़ावा दे रही हैं। राहुल ने इस पूरी प्रक्रिया को मौजूदा आर्थिक व्यवस्था की बड़ी खामी के रूप में पेश किया।
मंच पर गूंजी छात्रों की पीड़ा, पेपर लीक कब तक?
कार्यक्रम में सबसे प्रभावशाली हिस्सा वह रहा जब अलग-अलग छात्रों को मंच पर बुलाकर अपनी समस्याएं बताने का मौका दिया गया। कई छात्रों ने प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ियों और पेपर लीक का मुद्दा उठाया। कुछ ऐसे छात्र भी मंच पर आए जो हालिया छात्र आंदोलनों में शामिल रहे थे। इससे सभा का राजनीतिक भाषण सीधे युवाओं के व्यक्तिगत अनुभवों से जुड़ गया। राहुल गांधी ने छात्रों से पूछा कि अगर वे अपनी पसंद की परीक्षा पास नहीं कर पाते तो उनका बैकअप प्लान क्या है। जवाब मिला- कोई बैकअप प्लान नहीं है। राहुल ने कहा कि यदि कांग्रेस सत्ता में आती है तो वह युवाओं के लिए ऐसी योजना बनाने पर काम करेगी।
स्क्रीन पर मोदी, शाह, अडानी और भागवत
कार्यक्रम की राजनीतिक धार उस समय और तेज हो गई जब मंच के पीछे लगी बड़ी स्क्रीन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, उद्योगपति गौतम अडानी और RSS प्रमुख मोहन भागवत की तस्वीरें दिखाई गईं। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी के Gen-Z को संबोधित करने वाले पहले Instagram संदेश का स्क्रीनशॉट भी दिखाया। इसके अलावा हाल के युवा प्रदर्शनों के दौरान वायरल हुए सरकार विरोधी मीम्स भी कार्यक्रम का हिस्सा बने। राहुल गांधी ने इन तस्वीरों को मौजूदा सत्ता व्यवस्था से जोड़ते हुए आरोप लगाया कि पूरी व्यवस्था अडानी की संपत्ति बढ़ाने, ‘मो-शा’ को सत्ता में बनाए रखने और RSS की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए काम कर रही है। उनका दावा था कि इस व्यवस्था में भारत के छात्रों के लिए कुछ खास नहीं है।
‘डर खत्म करने का काम आपने किया’
राहुल गांधी ने हाल के छात्र आंदोलनों का जिक्र करते हुए युवाओं की तारीफ की। उन्होंने कहा कि छात्रों ने वह काम किया जो उनकी पिछली पीढ़ी नहीं कर पाई- देश में मौजूद डर की भावना को चुनौती दी। राहुल ने कहा कि युवाओं ने सरकार का सीधे सामना किया और देश को बदलने की दिशा में कदम उठाया। उनके मुताबिक, छात्रों के सपने सीमित नहीं हैं। कोई डॉक्टर बनना चाहता है, कोई इंजीनियर, कोई वकील तो कोई IAS या IPS अधिकारी।
ऊर्जा असीमित है, लेकिन रास्ते बंद हैं
राहुल ने कहा कि यही वजह है कि आज का युवा निराश और परेशान है। ‘नफरत से नहीं, व्यवस्था बदलकर जवाब दो।’ हालांकि राहुल गांधी ने अपने भाषण के अंत में एक अलग राजनीतिक संदेश भी दिया। उन्होंने छात्रों से प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह, अडानी या मोहन भागवत से नफरत नहीं करने की अपील की। उनका कहना था कि व्यवस्था को नफरत और हिंसा के बिना बदलना होगा। यह संदेश राहुल के भाषण के उस हिस्से से अलग था, जिसमें उन्होंने मौजूदा सत्ता व्यवस्था पर तीखे आरोप लगाए थे।
बारिश में भी तीन घंटे डटे रहे छात्र
कार्यक्रम को लेकर शुरुआत में ही विवाद पैदा हो गया था। कायस्थ पाठशाला ट्रस्ट ने राहुल गांधी के कार्यक्रम को अनुमति देने से इनकार कर दिया था। कांग्रेस के दबाव के बाद कार्यक्रम की अनुमति मिली। शनिवार को लगातार बारिश होती रही। मैदान का केवल कुछ हिस्सा ही कैनवास से ढका था। इसके बावजूद छात्र तीन घंटे से अधिक समय तक कार्यक्रम स्थल पर मौजूद रहे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रा स्वाति सोनकर ने कहा कि राहुल गांधी ने छात्रों की समस्याओं को सुनकर उनके मुद्दे उठाए हैं और शिक्षा व्यवस्था में प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक सुधार की जरूरत है। उन्होंने स्कूलों की खराब स्थिति और विश्वविद्यालयों में मूल्यांकन व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उनके मुताबिक कई छात्रों को अपनी कॉपियों की स्क्रूटिनी के लिए प्रति पेपर 2,500 रुपये तक देने पड़ते हैं।
उत्तर प्रदेश ही नहीं, बिहार से भी पहुंचे छात्र
‘छात्रों की गूंज’ में उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से छात्र पहुंचे थे। बड़ी संख्या में छात्र बिहार से भी आए। कार्यक्रम से पहले इलाहाबाद में राहुल गांधी के खिलाफ पोस्टर भी लगाए गए थे। इनमें ‘राहुल! झारखंड कब जाओगे’ और ‘Meet of Hypocrisy’ जैसे नारे लिखे थे। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कई पोस्टर हटा दिए। दरअसल, झारखंड में लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर ABVP के छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं। झारखंड की सत्ता में शामिल कांग्रेस ने इन प्रदर्शनों को समर्थन दिया है और राहुल गांधी के जल्द ही वहां भी ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम करने की बात कही है।
रोजगार का सवाल बनेगा अगली राजनीति का केंद्र?
इलाहाबाद का कार्यक्रम एक बड़े राजनीतिक संकेत की तरफ इशारा करता है। पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता, बेरोजगारी, निजीकरण और गिग इकॉनमी- ये ऐसे मुद्दे हैं जिनका सीधा संबंध देश की युवा आबादी से है।
राहुल गांधी ने इन्हीं मुद्दों को जोड़कर एक राजनीतिक नैरेटिव बनाने की कोशिश की है। लेकिन सवाल सिर्फ यह नहीं है कि राहुल गांधी इन मुद्दों को कितनी प्रभावी ढंग से उठाते हैं।
असली सवाल यह है कि क्या विपक्ष युवाओं के रोजगार संकट को एक ठोस राजनीतिक एजेंडे में बदल पाएगा? क्योंकि डिग्री लेने के बाद जब युवा परीक्षा के लिए सालों इंतजार करता है, पेपर लीक के कारण परीक्षा रद्द होती है या नौकरी के बजाय ऐप आधारित अस्थायी काम ही उसका विकल्प बचता है, तब सवाल केवल राजनीतिक नहीं रह जाता। वह सवाल सीधे परिवार, शिक्षा और भविष्य से जुड़ जाता है। और शायद इसीलिए इलाहाबाद में राहुल गांधी के मंच से बार-बार गूंजता सवाल- ‘नौकरियां कहां हैं?’ आने वाले दिनों की राजनीति में ज्यादा बड़ा सवाल बन सकता है।




