UP RAJYA SABHA ELECTION 2026 : भाजपा के टिकट में छिपा है 2027 का चुनावी गणित

उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए भाजपा ने जिन आठ उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं, उनमें 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति साफ दिखाई देती है। तीन ओबीसी, दो दलित और तीन सवर्ण चेहरों के जरिए पार्टी ने सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश की है।

सत्य प्रकाश

उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए होने वाला चुनाव अब महज उच्च सदन के लिए प्रतिनिधि चुनने की कवायद नहीं रह गया है। 16 अक्टूबर को होने वाले इस चुनाव की असली राजनीतिक अहमियत इस बात में है कि इसके नतीजे 2027 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीतिक दिशा का संकेत देंगे। भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा के लिए अपने आठ उम्मीदवारों के नाम जिस तरह से तय किए हैं, उसमें संसद के उच्च सदन से ज्यादा नजर अगले विधानसभा चुनाव की जमीन पर दिखाई देती है।

भाजपा ने धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडे, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार को उम्मीदवार बनाया है। इस उम्मीदवारी में सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि पार्टी ने अपने किसी भी मौजूदा राज्यसभा सांसद को दोबारा टिकट नहीं दिया। इनमें केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बी.एल. वर्मा जैसे नाम भी शामिल हैं। यानी भाजपा ने इस बार राज्यसभा की सूची में सिर्फ चेहरे नहीं बदले हैं, बल्कि संदेश भी बदलने की कोशिश की है। और वह संदेश है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की प्राथमिकता केवल बड़े और चर्चित नेताओं पर निर्भर रहने की नहीं, बल्कि संगठन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और स्थानीय राजनीतिक प्रभाव वाले चेहरों के सहारे चुनावी आधार को और व्यापक बनाने की है।

पांच ओबीसी-दलित चेहरे, निशाने पर PDA

भाजपा के आठ उम्मीदवारों में तीन ओबीसी और दो अनुसूचित जाति के चेहरे हैं। धर्मपाल सिंह लोधी समुदाय से आते हैं और योगी सरकार में मंत्री हैं। प्रकाश पाल भाजपा के पिछड़ा वर्ग मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष हैं और पाल-बघेल समुदाय में खासा प्रभाव रखते हैं। श्रुति गंगवार कुर्मी समुदाय से आती हैं और रुहेलखंड की राजनीति में उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ पूर्व केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार की विरासत भी जुड़ी है। दलित प्रतिनिधित्व के लिए विद्यासागर सोनकर और प्रियंका सिंह रावत को जगह दी गई है। सोनकर भाजपा के पुराने संगठनात्मक चेहरों में हैं, जबकि प्रियंका रावत बाराबंकी से पूर्व लोकसभा सांसद रही हैं। इस तरह भाजपा ने ओबीसी और दलित प्रतिनिधित्व को केवल संख्या के रूप में नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक समूहों से जोड़ने की कोशिश की है।

यही वह बिंदु है जहां भाजपा की रणनीति सीधे समाजवादी पार्टी के PDA- पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण से टकराती दिखाई देती है। अखिलेश यादव की राजनीति में PDA जिस तरह एक केंद्रीय राजनीतिक नारे और सामाजिक गठजोड़ के रूप में उभरा है, उसके जवाब में भाजपा ने यादव के बाहर के पिछड़े वर्गों को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश और तेज की है। दरअसल उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़ा वर्ग एक एकरूप सामाजिक समूह नहीं है। यादवों की राजनीतिक लामबंदी और गैर-यादव पिछड़ी जातियों के बीच भाजपा की पैठ ने पिछले कुछ चुनावों में अलग-अलग राजनीतिक समीकरण बनाए हैं। लोधी, कुर्मी, पाल-बघेल जैसे समूहों को प्रतिनिधित्व देकर भाजपा इसी गैर-यादव ओबीसी आधार को मजबूत बनाए रखने का संकेत दे रही है।

सवर्ण आधार भी नजरअंदाज नहीं

अगर भाजपा केवल पिछड़े और दलित समीकरण पर निर्भर रहती तो उसके पारंपरिक सामाजिक आधार में असहजता पैदा हो सकती थी। इसलिए तीन सवर्ण चेहरों को भी सूची में जगह दी गई है। राधाकांत ओझा और गोपी कृष्ण पांडे ब्राह्मण प्रतिनिधित्व का संकेत देते हैं, जबकि राम प्रताप सिंह चौहान ठाकुर समुदाय और संगठनात्मक राजनीति से जुड़े चेहरे हैं। इस तरह भाजपा ने एक तरफ सामाजिक विस्तार की कोशिश की है तो दूसरी तरफ अपने पारंपरिक सवर्ण आधार को भी यह संदेश दिया है कि चुनावी समीकरण बदलने के बावजूद उसकी राजनीतिक हिस्सेदारी कम नहीं होने वाली। यानी सूची का गणित मोटे तौर पर यही कहता है- ओबीसी को विस्तार, दलितों को प्रतिनिधित्व और सवर्णों को निरंतरता। यही भाजपा की सामाजिक इंजीनियरिंग का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

दिग्गजों की जगह संगठन के चेहरे

इस सूची का दूसरा महत्वपूर्ण संदेश जातीय समीकरण से अलग संगठन को लेकर है। पार्टी ने केंद्रीय स्तर के चर्चित चेहरों और मौजूदा सांसदों को दोबारा मौका देने के बजाय प्रदेश की जमीन से जुड़े नेताओं को आगे किया है। यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्यसभा का टिकट आमतौर पर राजनीतिक दलों के लिए वरिष्ठ नेताओं, संसदीय अनुभव वाले चेहरों या केंद्रीय राजनीति में सक्रिय नेताओं को समायोजित करने का माध्यम माना जाता रहा है। भाजपा ने इस बार उस परंपरा से हटकर संगठनात्मक पृष्ठभूमि वाले चेहरों को प्राथमिकता दी है। इसका अर्थ यह भी निकाला जा सकता है कि पार्टी 2027 की चुनावी मशीनरी को अभी से मजबूत करना चाहती है। राज्यसभा में जाने वाला नेता केवल संसद का सदस्य नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए सामाजिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का चेहरा भी बन सकता है।

महिला प्रतिनिधित्व का भी ध्यान

आठ उम्मीदवारों में दो महिलाएं- श्रुति गंगवार और प्रियंका सिंह रावत हैं। दोनों की राजनीतिक पृष्ठभूमि अलग है। श्रुति गंगवार के साथ रुहेलखंड और कुर्मी सामाजिक आधार का समीकरण है, जबकि प्रियंका रावत अवध क्षेत्र और दलित प्रतिनिधित्व के साथ महिला चेहरे के रूप में सामने आती हैं। इससे भाजपा ने महिला मतदाताओं के बीच अपने राजनीतिक संदेश को भी मजबूत करने की कोशिश की है। उत्तर प्रदेश में महिला मतदाता अब किसी भी चुनाव में निर्णायक राजनीतिक शक्ति बन चुकी हैं। ऐसे में राज्यसभा जैसे चुनाव में भी महिला प्रतिनिधित्व को सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण के साथ जोड़ना भाजपा की व्यापक चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।

क्षेत्रीय संतुलन भी कम महत्वपूर्ण नहीं

उम्मीदवारों की सूची को केवल जातीय चश्मे से देखना भी अधूरा होगा। भाजपा ने अलग-अलग क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है। रुहेलखंड से लेकर अवध, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वांचल और मध्य उत्तर प्रदेश तक पार्टी ने ऐसे चेहरे चुने हैं जिनका अपने-अपने क्षेत्रों में सामाजिक या संगठनात्मक संपर्क है। राज्यसभा का चुनाव भले ही विधानसभा की तरह सीधे जनता के बीच नहीं होता, लेकिन उसके लिए चुने गए राजनीतिक चेहरे आने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी की क्षेत्रीय पहुंच के विस्तार में भूमिका निभा सकते हैं। यानी भाजपा ने एक साथ तीन स्तरों पर संतुलन साधने की कोशिश की है- जाति, क्षेत्र और संगठन।

भाजपा ने उत्तराखंड की राज्यसभा सीट के लिए दिनेश आर्य को उम्मीदवार बनाया है। उनका दलित पृष्ठभूमि से होना उत्तराखंड के अलावा उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों के राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है। दोनों राज्यों के सीमावर्ती इलाकों में सामाजिक और राजनीतिक संपर्क होने के कारण इस चयन को केवल उत्तराखंड तक सीमित करके देखना भाजपा की व्यापक चुनावी रणनीति को नजरअंदाज करना होगा।

अब असली खेल राज्यसभा के गणित का

उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान होना है। मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है। इस चुनाव में एक उम्मीदवार को पहली वरीयता के 37 मत चाहिए। भाजपा के नेतृत्व वाले खेमे के पास सहयोगियों और कुछ समर्थक विधायकों को मिलाकर लगभग 294 का प्रभावी समर्थन बताया जा रहा है। आठ उम्मीदवारों को जिताने के लिए 296 मत चाहिए। यानी भाजपा के सामने आठवीं सीट के लिए कम से कम दो अतिरिक्त मतों का गणित है। इसीलिए राज्यसभा चुनाव में केवल उम्मीदवारों की घोषणा ही महत्वपूर्ण नहीं है। असली मुकाबला अब उन अतिरिक्त मतों को जुटाने का है।

भाजपा सात सीटें अपने दम पर सुरक्षित करने की स्थिति में है। आठवीं सीट के लिए उसे अतिरिक्त समर्थन की जरूरत है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के पास दो उम्मीदवारों को जिताने का पर्याप्त गणित है। लेकिन यदि सपा तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो मुकाबला सीधे दसवीं सीट पर आ जाएगा और फिर क्रॉस वोटिंग, प्रथम वरीयता के मत और छोटे दलों तथा असंबद्ध विधायकों की भूमिका निर्णायक हो सकती है। सपा ने फिलहाल प्रो. रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नथवानी को उम्मीदवार बनाया है। रामगोपाल यादव पार्टी के पुराने और प्रभावशाली संगठनात्मक चेहरे हैं, जबकि धनराज नथवानी का चयन पारंपरिक समाजवादी राजनीति से अलग पृष्ठभूमि के कारण चर्चा में है।

राज्यसभा चुनाव से बड़ा है 2027 का संदेश

दरअसल, इस चुनाव का महत्व सिर्फ यह तय करना नहीं है कि राज्यसभा में उत्तर प्रदेश से किस पार्टी के कितने सांसद जाएंगे। इससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि दोनों प्रमुख दल 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए किस तरह की राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं। भाजपा के उम्मीदवारों की सूची को देखें तो संदेश साफ है। पार्टी एक तरफ अपने पुराने सवर्ण आधार को बनाए रखना चाहती है, दूसरी तरफ गैर-यादव ओबीसी और दलित वर्गों में अपनी पकड़ को कमजोर नहीं होने देना चाहती। महिला प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय संतुलन इसके अतिरिक्त आयाम हैं।

इसके मुकाबले समाजवादी पार्टी की चुनौती यह है कि PDA को केवल चुनावी नारे से आगे बढ़ाकर स्थायी सामाजिक गठबंधन में कैसे बदला जाए। भाजपा का नया टिकट वितरण इसी चुनौती का जवाब देने की कोशिश करता दिखाई देता है। इसलिए राज्यसभा चुनाव का परिणाम चाहे जो हो, राजनीतिक रूप से इसका असर 16 अक्टूबर की मतगणना से कहीं आगे जाएगा। जिस दल की रणनीति यहां सफल होती है, वह 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल कर सकता है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा की 10 सीटों का यह चुनाव दरअसल 2027 की 403 सीटों वाली बड़ी लड़ाई का पहला गंभीर शक्ति-परीक्षण बन चुका है। भाजपा ने अपने पत्ते खोल दिए हैं। अब देखना यह है कि अखिलेश यादव का PDA इन सामाजिक समीकरणों की काट किस तरह तैयार करता है और सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राज्यसभा का यह छोटा-सा चुनाव 2027 की बड़ी चुनावी कहानी की दिशा पहले ही तय कर देगा?

Previous articleFORM 6 पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक : हमारी मंजूरी नहीं थी, तो फिर किसने बदला चुनावी फॉर्म?
Next articleज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर अड़ा विपक्ष, राहुल बोले- CEC से मिलकर पूछूंगा, ‘वोट चोरी’ क्यों की?
सत्ता विमर्श डेस्क
सत्ता विमर्श (Satta Vimarsh) नाम ही हमारी पहचान है। हमारा मानना है कि सब कुछ सत्ता के इर्द-गिर्द तय होता है, सरकार भी और सरोकार भी। लेकिन, इस सत्ता में हमारी-आपकी भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सत्ता में बैठे लोगों की। इसीलिए सत्ता और सरोकार से जुड़े मुद्दों पर विमर्श जरूरी है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here