चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे सवालों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को Form 6 में किए गए कथित बदलावों पर बहुत ही अहम टिप्पणी की है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि Form 6 में किए गए किसी भी बदलाव को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि चुनाव आयोग की रिपोर्ट सामने आने के बाद वह यह देखना चाहेगी कि आखिर इस वैधानिक प्रपत्र में बदलाव किसने किया।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इसलिए अहम है क्योंकि Form 6 कोई सामान्य प्रशासनिक कागज नहीं, बल्कि पहली बार मतदाता बनने वाले नागरिकों के लिए मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने का वैधानिक प्रपत्र है। आरोप है कि इसके ऑनलाइन संस्करण में ऐसा नया हिस्सा जोड़ दिया गया था, जिसमें आवेदक के माता-पिता की पिछली विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के दौरान मतदाता सूची में स्थिति से जुड़ी जानकारी मांगी गई। सवाल यह है कि जब मूल वैधानिक प्रपत्र में कोई संशोधन नहीं हुआ तो ऑनलाइन व्यवस्था में यह अतिरिक्त शर्त किस अधिकार के तहत जोड़ दिया गया?
मामला सिर्फ एक ऑनलाइन फॉर्म में कुछ अतिरिक्त कॉलम जोड़ने का नहीं है। असली सवाल चुनावी लोकतंत्र की उस बुनियादी व्यवस्था का है जिसमें किसी नागरिक का मतदाता बनने का अधिकार नियमों से संचालित होता है, न कि चुनाव आयोग के किसी अधिकारी या डिजिटल पोर्टल पर बैठे किसी तंत्र की मनमर्जी से।
सोमवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इसी दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने Form 6 में कथित रूप से किए गए बदलाव का मुद्दा अदालत के सामने रखा।
उन्होंने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि दिल्ली में SIR की प्रक्रिया के दौरान Form 6 में दो नई शर्तें जोड़ दी गई थीं। उनके अनुसार, इन बदले हुए फॉर्मों के आधार पर नए मतदाताओं को नोटिस तक जारी किए गए। गुरुस्वामी ने अदालत के सामने सवाल उठाया कि जब निर्धारित कार्यक्रम के दौरान वैधानिक फॉर्म में इस तरह का संशोधन नहीं किया जा सकता तो फिर यह बदलाव हुआ कैसे?
इस पर CJI सूर्यकांत ने बेहद स्पष्ट टिप्पणी की- “किसी भी संशोधित Form 6 को हमारी मंजूरी नहीं मिली है।”
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि जब चुनाव आयोग की रिपोर्ट अदालत के सामने आएगी तो अदालत यह देखना चाहेगी कि “किसने क्या बदला।” यही एक वाक्य इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल बन गया है कि आखिर Form 6 में बदलाव किसने किया?
याचिका में आरोप लगाया गया है कि जुलाई 2026 में ECINET पोर्टल पर पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में डिजिटल स्तर पर बदलाव किया गया। याचिकाकर्ता का दावा है कि यह बदलाव बिना किसी वैधानिक अधिकार और बिना Registration of Electors Rules, 1960 में संशोधन के किया गया।
मामले को और गंभीर बनाने वाला आरोप यह है कि याचिका के अनुसार, 13 अगस्त 2026 को आयोग के एक आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने इस बदलाव को ‘अनधिकृत और अवैध’ बताते हुए इसे तत्काल वापस लेने का निर्देश दिया था। लेकिन आरोप है कि इसके बावजूद बदला हुआ फॉर्म पोर्टल पर उपलब्ध रहा।
यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला सिर्फ प्रशासनिक चूक का नहीं रह जाता। तब सवाल यह बनता है कि एक संवैधानिक संस्था के भीतर लिए गए फैसले को ही क्या उसके अपने आदेश के बावजूद लागू रखा गया? यही वह बिंदु है जहां चुनाव आयोग की संस्थागत पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े होते हैं।
कानून नहीं बदला तो फॉर्म कैसे बदल गया?
Form 6 मतदाता पंजीकरण से संबंधित नियमों के तहत निर्धारित वैधानिक प्रपत्र है। इसलिए उसमें कोई भी महत्वपूर्ण बदलाव सामान्य प्रशासनिक सुविधा के नाम पर नहीं किया जा सकता। उसके लिए वैधानिक आधार चाहिए।
याचिका का मूल तर्क भी यही है कि Registration of Electors Rules, 1960 में संशोधन किए बिना Form 6 में एकतरफा बदलाव करने का चुनाव आयोग का कोई अधिकार नहीं था।
यहां सबसे अहम प्रश्न यह है कि क्या डिजिटल पोर्टल किसी वैधानिक नियम से ऊपर हो सकता है? यदि कानून में फॉर्म का एक प्रारूप तय है और उस कानून में संशोधन नहीं हुआ, तो किसी पोर्टल पर उसका दूसरा संस्करण किस आधार पर लागू किया जा सकता है? चुनाव आयोग को इस सवाल का जवाब देना होगा। और केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि बाद में उस अतिरिक्त घोषणा को हटा दिया गया। क्योंकि लोकतंत्र में गलती का सवाल सिर्फ यह नहीं होता कि गलती बाद में सुधारी गई या नहीं। सवाल यह भी होता है कि गलती करने का अधिकार किसे दिया गया था और उस गलती से कितने नागरिक प्रभावित हुए।
SIR के नाम पर मतदाता बनने की राह कठिन?
पूरे विवाद की पृष्ठभूमि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR है। मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के नाम पर चल रही इस प्रक्रिया को लेकर पहले से ही राजनीतिक और कानूनी बहस चल रही है। लेकिन जब SIR से जुड़े प्रावधान किसी ऐसे फॉर्म में दिखाई देने लगें जिसका इस्तेमाल पहली बार मतदाता बनने वाले नागरिक करते हैं, तब चिंता और बढ़ जाती है। युवा मतदाताओं के सामने सवाल पैदा होता है कि क्या पहली बार मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए उन्हें अपने माता-पिता की पिछली मतदाता सूची से जुड़ी स्थिति भी साबित करनी होगी? यदि ऐसा है तो इसका वैधानिक आधार क्या है? और यदि वैधानिक आधार नहीं है तो क्या किसी नागरिक को ऐसी अतिरिक्त शर्त के कारण मताधिकार की प्रक्रिया में रोका या परेशान किया जा सकता है?
चुनाव आयोग की सफाई ने सवाल खत्म नहीं किए
26 सितंबर को चुनाव आयोग ने Form 6 को लेकर सफाई दी थी कि SIR अवधि के बाहर Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित फॉर्म ही इस्तेमाल किए जाएंगे। आयोग ने यह भी कहा था कि SIR के लिए Form 6 से जुड़ी घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है। लेकिन अब CJI सूर्यकांत की टिप्पणी ने इस पूरे मामले का एक नया पहलू सामने लाकर रख दिया है।
अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि उसने Form 6 में किए गए किसी भी संशोधन को मंजूरी नहीं दी है। इससे चुनाव आयोग की उस व्याख्या पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है जिसमें सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही या आदेश का हवाला देकर बदले हुए प्रावधानों को उचित ठहराने की कोशिश की गई थी।
अदालत का संदेश साफ है कि कोर्ट ने जो मंजूर किया है, वही अदालत के रिकॉर्ड से तय होगा; उसके नाम पर किसी अतिरिक्त बदलाव को वैधता नहीं दी जा सकती। सवाल सिर्फ Form 6 का नहीं, चुनाव आयोग के इकबाल का भी है। इस विवाद को सिर्फ तकनीकी या प्रशासनिक मामला मानना बड़ी भूल होगी।
भारत में चुनाव आयोग से नागरिकों की सबसे बड़ी अपेक्षा यही है कि वह सत्ता से समान दूरी रखते हुए चुनावी प्रक्रिया के हर चरण में निष्पक्षता और कानून का पालन सुनिश्चित करे। मतदाता सूची उसी प्रक्रिया की बुनियाद है। यदि मतदाता सूची में नाम जोड़ने वाले फॉर्म में ही ऐसे बदलाव कर दिए जाएं जिनका आधार कानून में दिखाई न देता हो, तो सवाल उठेंगे ही।
और जब मामला पहली बार वोट देने वाले युवाओं का हो तो सवाल और गंभीर हो जाता है। क्योंकि लोकतंत्र में मतदाता से यह नहीं पूछा जा सकता कि “तुम्हें वोट देने का अधिकार क्यों चाहिए?” बल्कि राज्य को यह सुनिश्चित करना होता है कि योग्य नागरिक को मतदाता बनने से अनावश्यक रूप से रोका न जाए।
अब गेंद चुनाव आयोग के पाले में
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। लेकिन CJI सूर्यकांत की टिप्पणी ने विवाद के केंद्र में मौजूद सवाल को बिल्कुल साफ कर दिया है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने बदलाव को मंजूरी नहीं दी थी तो वह बदलाव किसने किया?
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि मतदाता सूची से जुड़े इस बदलाव का उनके आधिकारिक दायित्वों से कोई तार्किक या कानूनी संबंध नहीं था और इसे व्यक्तिगत आपराधिक जवाबदेही के दायरे में देखा जाना चाहिए। इन आरोपों की अंतिम सच्चाई अदालत की जांच और उपलब्ध रिकॉर्ड से ही तय होगी। लेकिन लोकतंत्र के लिए इतना सवाल उठना भी गंभीर है कि मतदाता बनने की प्रक्रिया में वैधानिक फॉर्म आखिर किसकी अनुमति से बदला गया?
अब चुनाव आयोग को सिर्फ यह नहीं बताना है कि फॉर्म वापस ले लिया गया या नियमों के मुताबिक नया फॉर्म लागू कर दिया गया। उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि बदलाव का आदेश किसने दिया, किस अधिकार के तहत दिया, किस स्तर पर उसे मंजूरी मिली और आपत्ति सामने आने के बाद भी वह कितने समय तक पोर्टल पर क्यों बना रहा। क्योंकि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता केवल चुनाव कराने से नहीं बनती। वह इस बात से बनती है कि मतदाता को अपने अधिकार के लिए आयोग के सामने खड़ा न होना पड़े।
Form 6 का विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह चुनाव आयोग की तकनीकी व्यवस्था से निकलकर अब सीधे कानून, अधिकार और जवाबदेही के सवाल तक पहुंच चुका है। और सुप्रीम कोर्ट ने जब यह कह दिया है कि “किसने क्या बदला, हम देखना चाहेंगे” तो अब असली परीक्षा चुनाव आयोग की है। सवाल Form 6 के एक कॉलम का नहीं है। सवाल यह है कि चुनावी लोकतंत्र में नियम बनाएगा कौन- कानून या चुनाव आयोग का डिजिटल सिस्टम?




