नेहा बोरा ने लिखा धांसू आर्टिकल; पूछा- सत्ता से सवाल करने वालों से शांति की गारंटी क्यों?

दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बाद नेहा बोरा को ₹10,000 के पीस बॉन्ड और ज़मानत का नोटिस मिलने के मामले ने नागरिक अधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस में AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा का यह लेख SIR, मताधिकार, पुलिस कार्रवाई और लोकतांत्रिक असहमति के सवालों की पड़ताल करता है।

आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखकर ₹10,000 के पीस बॉन्ड और ज़मानत के नोटिस को लेकर शांतिपूर्ण विरोध, संवैधानिक अधिकारों और सत्ता की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। नेहा ने लिखा है- मेरी आपत्ति सिर्फ़ ₹10,000 के बॉन्ड पर नहीं है। सवाल यह है कि क्या बिना किसी ठोस सबूत के, एहतियात के नाम पर लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करने वालों को सार्वजनिक शांति के लिए ख़तरा बताया जा सकता है?

नेहा आगे लिखती हैं- स्पेशल एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने मुझसे पूछा है कि मुझसे ₹10,000 का बॉन्ड और एक ज़मानती क्यों न लिया जाए, ताकि जांच के दौरान मैं शांति बनाए रखूं। इस नोटिस ने मेरे सामने एक सीधा सवाल खड़ा कर दिया है। यह कौन-सी शांति है, जिसे बनाए रखने के लिए मुझसे गारंटी मांगी जा रही है? और मैंने ऐसा क्या किया है, जिससे इस शांति के भंग होने की आशंका पैदा हो गई? इस सवाल का जवाब खोजने के लिए यह समझना जरूरी है कि हम सड़कों पर क्यों उतरे थे।

दिल्ली की सड़कों पर छात्र, कार्यकर्ता, वकील और आम नागरिक मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), मताधिकार छिनने के ख़तरे और चुनाव आयोग की जवाबदेही को लेकर सवाल उठा रहे हैं। हमारी चिंता यह है कि मतदाता सूची से नाम हटने की प्रक्रिया कहीं लोगों के सबसे बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार को कमजोर न कर दे। किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से कट जाना महज कागजी कार्रवाई नहीं है। इसका अर्थ है कि शासन किसके हाथ में होगा, यह तय करने में उसकी आवाज़ शामिल होगी या नहीं। उसे बराबरी का नागरिक माना जाएगा या नहीं। और क्या लोकतंत्र राजनीतिक समानता का अपना वादा निभा पाएगा?

हमने मुख्य चुनाव आयुक्त से जवाबदेही मांगी, क्योंकि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना जिस संस्था की जिम्मेदारी है, उसे जनता के प्रति जवाबदेह भी होना चाहिए। हम लोकतंत्र के खिलाफ नहीं, बल्कि उसकी रक्षा के लिए सड़कों पर उतरे थे। ऐसे में सवाल है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की माँग सार्वजनिक शांति के लिए खतरा कैसे बन सकती है? संवैधानिक संस्थाओं से सवाल पूछना कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती कैसे हो सकता है? और लोकतंत्र को मजबूत करने की कोशिश शांति की दुश्मन कैसे बन सकती है?

इसके साथ यह सवाल भी जुड़ा है कि सड़कों पर हमारे साथ क्या हुआ। हमें बार-बार रोका गया, घसीटा गया, हिरासत में लिया गया और प्रदर्शन स्थलों तक पहुंचने से रोका गया। पुलिसकर्मियों के साथ हाथापाई की घटनाओं में मुझे भी चोटें आईं। मैंने अपने शरीर पर खरोंचों और चोट के निशान दिखाए हैं। दूसरी महिला प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों ने भी पुलिस की ज्यादती के आरोप लगाए हैं। 16 अक्टूबर को मुझे मंडी हाउस से हिरासत में लिया गया और पूरी रात पुलिस हिरासत में बितानी पड़ी। इन घटनाओं के बाद मुझे एक नोटिस थमा दिया गया, जिसमें आशंका जताई गई है कि मुझसे शांति भंग हो सकती है।

क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, SIR वापस लेने और 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून को रद्द करने की माँग वाले मेरे नारे शांति भंग करने वाले हैं? NEET पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन के दौरान भी मैं 23 दिन तक भूख हड़ताल पर बैठी थी। मैंने यह रास्ता इसलिए चुना था कि हमारी न्याय की मांग सुनी जाए। मेरा मकसद कभी शांति भंग करना नहीं रहा। मैंने सिर्फ़ इस धारणा को स्वीकार करने से इनकार किया है कि शांति का अर्थ अन्याय के सामने चुप रहना है।

नोटिस में जिन आधारों का उल्लेख किया गया है, वे प्रदर्शनों, नारों और भीड़ के जुटने से संबंधित हैं। उनमें मेरे किसी हिंसक कृत्य का जिक्र नहीं है। दूसरी ओर, तस्वीरें, वीडियो और गवाहियां उन घटनाओं पर सवाल उठाती हैं, जिनमें प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किए जाने के आरोप लगे हैं। यानी मुझसे यह भरोसा मांगा जा रहा है कि मैं शांति बनाए रखूंगी, लेकिन जिन लोगों पर कानून-व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी है, उनके हाथों प्रदर्शनकारियों के साथ हुई कथित ज्यादती की जवाबदेही का सवाल पीछे छूट जाता है।

आखिर हम शांति का अर्थ क्या समझने लगे हैं? क्या सड़कों का खाली हो जाना ही शांति है? क्या प्रदर्शनकारियों को खदेड़ देने, हिरासत में ले लेने या डराकर घर बैठा देने के बाद छाने वाला सन्नाटा शांति कहलाएगा? जिन लोगों ने अन्याय का सामना किया है, उनकी आवाज़ ही बंद कर दी जाए, तो क्या उस समाज को वास्तव में शांत कहा जा सकता है? इतिहास शांति की एक ऐसी परिभाषा भी दिखाता है, जो व्यवस्था के पीछे छिपे अन्याय को सामने लाती है।

रोमन साम्राज्य के दौर को ‘पैक्स रोमाना’ यानी ‘रोमन शांति’ के नाम से जाना जाता है। इसे स्थिरता और व्यवस्था का दौर बताया गया, लेकिन यह साम्राज्यवादी विस्तार, दासता और सैन्य प्रभुत्व से भी जुड़ा था। शासकों के लिए जो व्यवस्था शांति का प्रतीक थी, उसके अधीन रहने वाले लोगों के लिए वह जरूरी नहीं कि शांति का अनुभव रही हो।

यह इतिहास एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है। क्या बिना न्याय के भी व्यवस्था थोपी जा सकती है? क्या जिस पीड़ा से विरोध पैदा होता है, उसे दूर किए बिना विरोध को चुप कराया जा सकता है? क्या असमानता और हिंसा की परिस्थितियों को जस का तस बनाए रखकर शांति की घोषणा कर देना पर्याप्त है? एक लोकतांत्रिक गणराज्य में शांति की परिभाषा इतनी सीमित नहीं हो सकती।

मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने अपनी किताब ‘स्ट्राइड टुवर्ड फ्रीडम’ (1958) में सच्ची शांति को केवल तनाव की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि न्याय की मौजूदगी से जोड़कर देखा। अपने प्रसिद्ध ‘बर्मिंघम जेल से पत्र’ (1963) में भी उन्होंने नकारात्मक शांति और सकारात्मक शांति के बीच अंतर स्पष्ट किया। नकारात्मक शांति का अर्थ तनाव का अभाव है, जबकि सकारात्मक शांति न्याय पर आधारित होती है।

विरोध तनाव पैदा कर सकता है। वह समाज को असहज कर सकता है और सत्ता में बैठे लोगों को उन सवालों का सामना करने के लिए मजबूर कर सकता है, जिनसे वे बचना चाहते हैं। लेकिन अन्याय पर सवाल उठने से पैदा हुई बेचैनी को स्वयं अन्याय के बराबर नहीं माना जा सकता। असहमति को दबाकर पैदा की गई शांति और न्याय के आधार पर कायम शांति में बुनियादी अंतर है।

मुझे रामधारी सिंह दिनकर की रचनाएं भी याद आती हैं। ‘रश्मिरथी’ में कृष्ण हस्तिनापुर जाते हैं, ताकि न्यायपूर्ण समझौते के जरिए युद्ध टाला जा सके। जब अधिकारों का उचित बंटवारा मुश्किल दिखने लगता है, तब भी वे केवल पांच गांव मांगते हैं। यह प्रसंग बताता है कि न्याय की मांग संघर्ष को बढ़ाने के लिए ही नहीं, बल्कि उसे रोकने के लिए भी होती है। समस्या तब पैदा होती है, जब न्याय की न्यूनतम मांग भी स्वीकार करने से इनकार कर दिया जाता है।

दिनकर ने ‘कुरुक्षेत्र’ में लिखा है, “शान्ति नहीं तब तक, जब तक सुखभाग न नर का सम हो।” यह पंक्ति याद दिलाती है कि शांति और समानता को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। जब तक अधिकारों और अवसरों में बराबरी नहीं होगी, तब तक शांति का दावा अधूरा रहेगा।

शांति की घोषणा केवल सत्ता में बैठे लोग नहीं कर सकते। उसका वास्तविक अर्थ जनता के अनुभव से तय होता है। क्या लोगों को बराबरी का भरोसा है? क्या संस्थाएं निष्पक्ष हैं? क्या नागरिकों की बात सुनी जाती है? और क्या वे यह विश्वास कर सकते हैं कि मुश्किल सवाल पूछने के कारण उनके अधिकारों पर चोट नहीं की जाएगी? इन सवालों के जवाब ही बताते हैं कि समाज में शांति कितनी वास्तविक है।

हमारे संविधान में अनुच्छेद 19(1)(A) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(B) के तहत शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार इकट्ठा होने का अधिकार देता है। ये अधिकार संविधान में निर्धारित उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं। सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना राज्य की वैध जिम्मेदारी है, लेकिन इस जिम्मेदारी को नागरिकों की स्वतंत्रता सीमित करने का मनमाना आधार नहीं बनाया जा सकता।

वृंदा ग्रोवर सहित कई वकील और नागरिक अधिकारों के पैरोकार शांतिपूर्ण विरोध पर रोक लगाने वाली पुलिस की कार्रवाइयों के औचित्य और वैधता पर सवाल उठाते रहे हैं। किसी निषेधाज्ञा का जारी होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि हर परिस्थिति में नागरिकों की स्वतंत्रता पर लगाई गई रोक उचित है। ऐसी कार्रवाई की वैधता, आवश्यकता और अनुपातिकता की कसौटी पर जांच होनी चाहिए।

हिंसा रोकना राज्य की जिम्मेदारी है। लेकिन इस जिम्मेदारी का अर्थ केवल प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करना नहीं है। इसमें नागरिकों को पुलिस की ज्यादती से बचाना और यह सुनिश्चित करना भी शामिल है कि वे अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल सुरक्षित ढंग से कर सकें। कानून-व्यवस्था का तकाजा नागरिकों की आवाज़ बंद करना नहीं, बल्कि उनके अधिकारों की रक्षा करते हुए सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना है।

इसलिए नोटिस को लेकर मेरी आपत्ति सिर्फ़ ₹10,000 के बॉन्ड और एक ज़मानती तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या बिना किसी ठोस आधार के, केवल एहतियात के नाम पर, लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करने वालों को सार्वजनिक शांति के लिए खतरा बताया जा सकता है? और जब सत्ता से सवाल पूछना, सत्ता के संभावित दुरुपयोग से भी अधिक खतरनाक मान लिया जाए, तब लोकतंत्र का क्या होगा?

लोकतंत्र हमसे यह वादा नहीं करता कि समाज में असहमति नहीं होगी। वह हमें असहमति के साथ जीने, एक-दूसरे की गरिमा और स्वतंत्रता का सम्मान करने तथा मतभेदों के बावजूद समान अधिकारों की रक्षा करने का रास्ता देता है। हमारी सड़कें कभी-कभी नारों से भरेंगी। संस्थाओं से सवाल पूछे जाएंगे। सरकार की आलोचना होगी। ये लोकतंत्र की विफलता के संकेत नहीं हैं। ये इस बात के संकेत भी हो सकते हैं कि नागरिक अब भी अपनी आवाज़ की ताकत और सामूहिक प्रयास से बदलाव की संभावना में भरोसा रखते हैं।

चिंता इस बात की नहीं होनी चाहिए कि लोग विरोध कर रहे हैं। चिंता तब होनी चाहिए, जब वे विरोध करने से डरने लगें। मैं उस देश में रहना चाहती हूं, जिसकी कल्पना रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी- “जहां मन भय से मुक्त हो और सिर ऊंचा हो।” ऐसा देश, जहां नागरिक बिना भय के सवाल पूछ सकें। जहां युवा संविधान की रक्षा के लिए एकत्र हों और उन्हें बल प्रयोग या हिरासत के डर का सामना न करना पड़े। जहां पुलिस उन नागरिकों की भी रक्षा करे, जो सरकार से असहमत हैं। और जहां शांति बनाए रखने का अर्थ चुप्पी बनाए रखना न हो।

हम सड़कों पर इसलिए आए, क्योंकि हमें भरोसा है कि लोकतंत्र की रक्षा करना जरूरी है। हम सवाल पूछते रहेंगे, क्योंकि सवाल पूछने का अधिकार अपने साझा भविष्य को गढ़ने के अधिकार से अलग नहीं है। शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र की शांति के लिए खतरा नहीं है। वह शांति को न्यायपूर्ण, समावेशी और सभी नागरिकों के लिए सार्थक बनाने का एक जरूरी माध्यम है।

Previous articleलोकतंत्र को भरोसा चाहिए जनाब, बैरिकेड्स नहीं!
Next articleजरांगे बनाम शिंदे : मराठा आरक्षण की लड़ाई में आखिर क्यों टूटा भरोसा?
सत्ता विमर्श डेस्क
सत्ता विमर्श (Satta Vimarsh) नाम ही हमारी पहचान है। हमारा मानना है कि सब कुछ सत्ता के इर्द-गिर्द तय होता है, सरकार भी और सरोकार भी। लेकिन, इस सत्ता में हमारी-आपकी भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सत्ता में बैठे लोगों की। इसीलिए सत्ता और सरोकार से जुड़े मुद्दों पर विमर्श जरूरी है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here