टीवी न्यूज चैनल्स की मनमानी पर सरकारी ब्रेक, नेहा सिंह राठौर प्रकरण ने बढ़ाई जवाबदेही!

आतंकवाद विरोधी अभियानों की लाइव कवरेज, भड़काऊ बहस, अपराध की सनसनीखेज रिपोर्टिंग और एआई के इस्तेमाल पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की नसीहत। राष्ट्रीय महिला आयोग की कार्रवाई के बीच मीडिया की जवाबदेही और सरकारी नियंत्रण की सीमा पर नई बहस।

निजी सेटेलाइट न्यूज चैनलों पर प्रसारित होने वाली खबरों, बहसों और दृश्यों की जिम्मेदारी को लेकर केंद्र सरकार ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 21 अक्टूबर को सभी निजी सैटेलाइट टीवी चैनलों को एडवाइजरी जारी कर प्रोग्राम कोड का पालन करने, एंटी नेशनल और सांप्रदायिक भावनाओं को बढ़ावा देने वाले कंटेंट से बचने, अपराध की सनसनीखेज रिपोर्टिंग पर रोक लगाने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का सावधानी से इस्तेमाल करने की सलाह दी है।

सरकार की यह एडवाइजरी ऐसे समय में आई है, जब लोक गायिका नेहा सिंह राठौर से जुड़ी एक कथित तौर पर गलत और अपमानजनक टीवी रिपोर्ट को लेकर मीडिया की जवाबदेही पर विवाद खड़ा हुआ है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने 19 अक्टूबर को इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए संबंधित मीडिया नियामकों और मंत्रालय से कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा था। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि नई एडवाइजरी सीधे इसी प्रकरण के कारण जारी की गई है। फिर भी, दोनों घटनाओं के बीच की टाइमिंग इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की जवाबदेही और उसकी निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठाता है।

मंत्रालय की एडवाइजरी में कहा गया है कि कुछ निजी टीवी चैनलों पर निर्धारित प्रोग्राम कोड का पालन नहीं किया जा रहा है। केबल टेलीविजन नेटवर्क (रेगुलेशन) एक्ट, 1995 और इसके तहत बनाए गए नियमों के मुताबिक प्रसारित कार्यक्रमों को निर्धारित मानकों के अनुरूप होना चाहिए। मंत्रालय के अनुसार, इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी (IDC) ने भी कुछ प्रसारणों को प्रोग्राम कोड की भावना के अनुरूप नहीं पाया है। एडवाइजरी में चैनलों को खबरों के चयन, संपादन, प्रस्तुति और प्रसारण के हर स्तर पर अधिक सावधानी बरतने को कहा गया है। इसका दायरा केवल राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी खबरों तक सीमित नहीं है। इसमें लाइव डिबेट, अपराध और हिंसा की रिपोर्टिंग, संवेदनशील दृश्य, महिलाओं की निजता, भारत के नक्शे और एआई से तैयार सामग्री तक को शामिल किया गया है।

मंत्रालय ने सुरक्षा बलों के आतंकवाद विरोधी अभियानों की लाइव कवरेज पर रोक का पालन करने को दोहराया है। ऐसे अभियानों के दौरान मीडिया की जानकारी अधिकृत अधिकारी की ओर से दी जाने वाली ब्रीफिंग तक सीमित रहनी चाहिए। ऑपरेशन समाप्त होने के बाद जारी जानकारी के आधार पर ही आगे की रिपोर्टिंग की जानी चाहिए। पुराने दृश्यों को जरूरत पड़ने पर टाइम-स्टैंप के साथ दिखाने की सलाह भी दी गई है, ताकि दर्शक उन्हें लाइव प्रसारण न समझें।

मंत्रालय ने टीवी डिबेट और पैनल चर्चाओं में सांप्रदायिक या राष्ट्र-विरोधी भावनाओं को बढ़ावा देने वाली सामग्री से बचने को कहा है। चैनलों को पैनलिस्टों के चयन और कार्यक्रमों के संचालन में सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। आपत्तिजनक या भड़काऊ सामग्री सामने आने पर म्यूट करने, डिस्क्लेमर देने, कार्यक्रम रोकने अथवा प्रसारण फीड बंद करने जैसे उपाय अपनाने की बात भी कही गई है। अपराध और हिंसा से जुड़ी खबरों के मामले में चैनलों को सत्यापित तथ्यों के आधार पर संतुलित रिपोर्टिंग करनी चाहिए। हिंसक या परेशान करने वाले दृश्यों को बार-बार दिखाने, उन्हें लूप में चलाने और गैरकानूनी व्यवहार को सामान्य या आकर्षक रूप में प्रस्तुत करने से बचने को कहा गया है। जरूरत पड़ने पर ऐसे दृश्यों को ब्लर या मास्क करने की सलाह दी गई है।

एडवाइजरी में जनरेटिव एआई समेत कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपकरणों के इस्तेमाल पर भी सावधानी बरतने को कहा गया है। मंत्रालय के मुताबिक, एआई का उपयोग सहायक भूमिका में होना चाहिए और इससे खबरों की सटीकता, प्रामाणिकता या संवेदनशीलता प्रभावित नहीं होनी चाहिए। चैनलों को अपने संपादकीय और कंटेंट समीक्षा तंत्र को मजबूत करने तथा कर्मचारियों के लिए नियमित प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने की सलाह भी दी गई है। इसके अतिरिक्त, प्रसारण और डिजिटल प्रस्तुतियों में सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित भारत के आधिकारिक नक्शे का इस्तेमाल करने तथा यौन अपराधों के पीड़ितों की पहचान उजागर न करने संबंधी कानूनी प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करने पर जोर दिया गया है।

नेहा सिंह राठौर प्रकरण ने बढ़ाई जवाबदेही पर बहस

दरअसल, नेहा सिंह राठौर प्रकरण को लेकर 19 अक्टूबर 2026 को राष्ट्रीय महिला आयोग ने स्वतः संज्ञान लिया था, जिसमें एबीपी न्यूज चैनल पर लोक गायिका को कथित सेक्स रैकेट से जोड़ने वाली सामग्री प्रसारित करने के आरोप लगे थे। आयोग के अनुसार, सार्वजनिक आलोचना के बाद संबंधित चैनल ने रिपोर्ट को तथ्यात्मक रूप से गलत माना और माफी की रिपोर्ट भी जारी की। आयोग ने मीडिया नियामक और स्वनियामक संस्थाओं के जरिए समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने तथा महिलाओं के चरित्रहनन और डिजिटल उत्पीड़न के खिलाफ सुरक्षा उपायों पर जोर दिया।

इस घटनाक्रम से स्पष्ट होता है कि मीडिया की जवाबदेही का सवाल केवल सरकार और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित खबरों तक सीमित नहीं है। किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, निजता और गरिमा को नुकसान पहुंचाने वाली गलत रिपोर्टिंग भी उतनी ही गंभीर चिंता का विषय है। खबरों की पुष्टि किए बिना आरोपों को प्रसारित करना और फिर उनके प्रभावों से बच निकलना पत्रकारिता के बुनियादी मानकों पर सवाल खड़े करता है।

लेकिन यहां एक दूसरा पहलू भी है। ‘एंटी नेशनल’ या ‘भड़काऊ’ कंटेंट जैसी व्यापक अभिव्यक्तियों का इस्तेमाल किस आधार पर होगा और उनकी व्याख्या कौन करेगा? किसी प्रसारण में हिंसा भड़काने, जानबूझकर गलत जानकारी फैलाने और सार्वजनिक हित में सरकार की आलोचना करने के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। सरकार की आलोचना अपने आप में राष्ट्र-विरोधी गतिविधि नहीं है। इसलिए एडवाइजरी का इस्तेमाल करते समय स्पष्ट मानदंड, निष्पक्ष कार्रवाई और उचित शिकायत निवारण व्यवस्था महत्वपूर्ण होंगे।

न्यूज चैनलों को कानून और पत्रकारिता के मानकों का पालन करना चाहिए। गलत खबर, अपमानजनक प्रस्तुति, सांप्रदायिक उकसावे और बिना पुष्टि के लगाए गए आरोपों से लोगों को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करना जरूरी है। साथ ही, लोकतंत्र में मीडिया का काम सिर्फ आधिकारिक सूचनाओं को प्रसारित करना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना और सार्वजनिक हित के मुद्दों को सामने लाना भी है।

इसलिए नई एडवाइजरी की कसौटी सिर्फ यह नहीं होगी कि चैनलों ने निर्देशों का पालन किया या नहीं। यह भी देखना होगा कि नियमों का इस्तेमाल गलत सूचना और गैर-जिम्मेदार प्रसारण को रोकने के लिए होता है या वैध आलोचना को सीमित करने का आधार बनता है। नेहा सिंह राठौर प्रकरण और नई एडवाइजरी के बीच प्रत्यक्ष कारण-संबंध अभी स्थापित नहीं है, लेकिन दोनों ने मीडिया की जिम्मेदारी, नियामक निगरानी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संतुलन पर बहस को प्रासंगिक बना दिया है।

लोकतंत्र में जिम्मेदार पत्रकारिता और स्वतंत्र पत्रकारिता एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक होनी चाहिए। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि खबरों की विश्वसनीयता बनी रहे, नागरिकों की गरिमा सुरक्षित रहे और सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार भी कमजोर न पड़े।

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प्रवीण कुमार
पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक का अनुभव रखता हूं। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों के साथ काम करते हुए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर निरंतर लेखन करता आ रहा हूं। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं और डिजिटल मीडिया कंसल्टेंसी से भी जुड़ा हूं। बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और भगवत गीता के विचार मेरे लेखन और जीवन-दृष्टि को दिशा देते हैं।

1 COMMENT

  1. बढ़िया पेशकश. गद्य शैली परिपक्वता लिये हुए है

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