नई दिल्ली/जिनेवा। लोकतंत्र में जनता की आवाज को कितनी जगह मिल रही है और असहमति जताने वालों के साथ सत्ता का व्यवहार कैसा है? भारत में छात्र आंदोलनों, शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और उनसे जुड़े पुलिसिया प्रतिबंधों को लेकर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों की ताजा चिंता ने इन सवालों को फिर से केंद्र में ला दिया है। देश के विभिन्न हिस्सों में पिछले तीन महीनों से युवाओं के नेतृत्व में हो रहे प्रदर्शनों पर पुलिस की कार्रवाई को लेकर विशेषज्ञों ने भारतीय अधिकारियों से शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का सम्मान करने, मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच कराने और पीड़ितों को न्याय दिलाने की मांग की है।
जिनेवा से जारी बयान में संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने साफ तौर पर कहा है कि शांतिपूर्ण सभाओं पर कार्रवाई किसी अकेली घटना तक सीमित नहीं दिखाई देती, बल्कि यह एक व्यापक और चिंताजनक प्रवृत्ति का हिस्सा बन गई है। विशेषज्ञों ने पहले भी शांतिपूर्ण जमावड़े पर अनुचित पाबंदियों, जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग, मनमानी हिरासत, कथित जबरन गुमशुदगी और छात्र कार्यकर्ताओं को निशाना बनाए जाने जैसे मामलों पर भारतीय अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया है।
यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन सिर्फ असहमति जताने का माध्यम नहीं होते। वे सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने, सार्वजनिक समस्याओं को सामने लाने और जवाबदेही की मांग करने का संवैधानिक लोकतांत्रिक रास्ता हैं। जब इसी रास्ते को प्रतिबंधों, हिरासत और बल प्रयोग के जरिए सीमित किया जाता है, तो सवाल सिर्फ पुलिस की कार्रवाई का नहीं रह जाता, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक व्यवस्था की सेहत का बन जाता है।
छात्रों की आवाज और सत्ता की प्रतिक्रिया
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी संख्या में छात्र और उनके समर्थक शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सरकारी फैसलों के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर चुके हैं। हाल के प्रदर्शनों में मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने की शिकायतें भी प्रमुख मुद्दा बनी हैं। विशेषज्ञों को मिली जानकारी के अनुसार, इन कथित विलोपनों से लगभग 13 करोड़ लोगों के प्रभावित होने की आशंका जताई गई है। इनमें मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लोगों के प्रभावित होने की बात कही गई है।
मतदाता सूची में नाम का होना लोकतांत्रिक भागीदारी की बुनियादी शर्त है। इसलिए नाम हटाए जाने की शिकायतें सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया का मामला नहीं हैं। यदि किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटता है, तो उसके मतदान के अधिकार पर सीधा असर पड़ सकता है। हालांकि, 13 करोड़ लोगों से संबंधित आंकड़े और उनके प्रभावित होने की प्रकृति को स्वतंत्र रूप से सत्यापित करना जरूरी है। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने अपने बयान में इसे प्राप्त सूचनाओं के आधार पर उठाई गई चिंता के रूप में प्रस्तुत किया है।
विशेषज्ञों ने कहा कि प्रदर्शनों के शांतिपूर्ण स्वरूप के बावजूद निहत्थे छात्रों पर लाठीचार्ज किए जाने और हजारों लोगों को प्रदर्शन में शामिल होने से रोकने की खबरें मिली हैं। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस की कार्रवाई किस हद तक उचित ठहराई जा सकती है। किसी भी सरकार को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार का अर्थ नागरिकों की आवाज को दबाने की खुली छूट नहीं हो सकता। लोकतांत्रिक शासन की कसौटी यही है कि वह असहमति का सामना संवाद और जवाबदेही से करता है या उसे सुरक्षा संबंधी खतरे के रूप में पेश करके नियंत्रित करने की कोशिश करता है।
हजारों लोगों की हिरासत पर गंभीर चिंता
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने हाल में नई दिल्ली में सात हजार से अधिक युवाओं, पत्रकारों, मानवाधिकार रक्षकों, वकीलों और राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों को कथित तौर पर मनमाने ढंग से हिरासत में लिए जाने की खबरों पर भी चिंता जताई है। बयान के मुताबिक, हिरासत में लिए गए लोगों को दूर स्थित हिरासत केंद्रों में ले जाया गया। आरोप है कि उनके फोन जब्त किए गए और प्रदर्शनों से जुड़ी सामग्री मिटा दी गई। इनमें से अधिकतर लोगों को करीब 24 घंटे बाद रिहा कर दिया गया, जिनमें प्रदर्शनकारी नेता भी शामिल थे।
यदि किसी व्यक्ति को केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने या सरकार की आलोचना करने के कारण हिरासत में लिया जाता है, तो यह अभिव्यक्ति की आजादी और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार पर गंभीर सवाल खड़े करता है। इसी तरह, हिरासत के दौरान फोन जब्त करने और विरोध से संबंधित सामग्री मिटाने के आरोपों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। डिजिटल माध्यम आज नागरिकों के संवाद, संगठन और सार्वजनिक शिकायतों को सामने लाने के महत्वपूर्ण साधन हैं। इनके दुरुपयोग से न सिर्फ व्यक्तिगत आजादी, बल्कि सार्वजनिक विमर्श भी प्रभावित हो सकता है।
विशेषज्ञों को मिली जानकारी के मुताबिक, कुछ प्रदर्शनकारियों को चोटें आई हैं और कुछ ने हिरासत के दौरान दुर्व्यवहार किए जाने की शिकायत भी की है। बयान में यौन हिंसा और लैंगिक आधार पर दुर्व्यवहार की खबरों पर विशेष चिंता व्यक्त की गई है। ऐसे आरोपों की जांच संवेदनशीलता, निष्पक्षता और पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए की जानी चाहिए। दोषी पाए जाने वाले लोगों की जवाबदेही तय करना और पीड़ितों को उचित राहत देना किसी भी निष्पक्ष जांच का अनिवार्य हिस्सा है।
धारा 163 के इस्तेमाल पर दिखाया आईना
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के कथित व्यापक इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक, इस प्रावधान के जरिए सार्वजनिक सभाओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाने, सार्वजनिक परिवहन रोकने और इंटरनेट सेवाएं बंद करने जैसी कार्रवाइयों की खबरें मिली हैं। धारा 163 के तहत सक्षम प्राधिकारी कुछ परिस्थितियों में तत्काल रोकथाम संबंधी आदेश जारी कर सकता है। इसका उद्देश्य संभावित खतरे या सार्वजनिक अव्यवस्था को रोकना है। लेकिन इस प्रावधान का इस्तेमाल किस परिस्थिति में किया जा रहा है, प्रतिबंध कितने व्यापक हैं और क्या वे वास्तविक खतरे के अनुपात में हैं- इन सवालों की जांच जरूरी है।
कानून-व्यवस्था का हवाला देकर हर प्रदर्शन को रोक देना लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रशासनिक शक्तियों के बीच संतुलन को बिगाड़ सकता है। यदि कुछ स्थानों पर तनाव की आशंका है, तो उसका समाधान पूरे शहर या व्यापक क्षेत्र में अनिश्चितकालीन पाबंदियां लगाना नहीं हो सकता। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि प्रतिबंध क्यों जरूरी हैं, उनका दायरा क्या है और उन्हें जारी रखने की आवश्यकता की समीक्षा कैसे की जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय दायित्वों की भी दिलाई याद
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने कहा कि शांतिपूर्ण सभा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा जैसे अधिकारों की रक्षा भारत के अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों का हिस्सा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर किसी भी तरह की पाबंदी कानूनी आधार पर होनी चाहिए, उसका उद्देश्य वैध होना चाहिए और वह आवश्यक तथा परिस्थितियों के अनुपात में होनी चाहिए।
विशेषज्ञों ने भारतीय अधिकारियों से जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग तत्काल रोकने, व्यापक प्रदर्शन प्रतिबंध वापस लेने और बायोमेट्रिक निगरानी सहित डिजिटल निगरानी के दुरुपयोग तथा इंटरनेट बाधित करने जैसी कार्रवाइयों से बचने की अपील की है। उन्होंने पुलिस और उससे संबद्ध बलों के आचरण की स्वतंत्र, निष्पक्ष और विस्तृत जांच तत्काल शुरू करने की मांग भी की। इसके साथ ही जवाबदेही तय करने, पीड़ितों को न्याय और उचित क्षतिपूर्ति दिलाने तथा ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने पर जोर दिया है।
लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों की यह चिंता भारतीय लोकतंत्र के सामने एक बुनियादी सवाल रखती है कि क्या सरकार के खिलाफ उठने वाली आवाज को लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा माना जाएगा या उसे नियंत्रित करने की समस्या के रूप में देखा जाएगा?
सरकार की नीतियों से असहमति जताना, शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाना और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों की जांच मांगना अपने आप में अपराध नहीं है। यदि किसी प्रदर्शन के दौरान हिंसा होती है या कानून का उल्लंघन किया जाता है, तो संबंधित मामलों में कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसक गतिविधियों में शामिल लोगों के बीच फर्क करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। सभी प्रदर्शनकारियों को एक ही नजर से देखना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा।
इस पूरे मामले में सरकार और संबंधित प्रशासनिक संस्थाओं के सामने तीन स्पष्ट जिम्मेदारियां हैं। पहली, पुलिस कार्रवाई और हिरासत में दुर्व्यवहार के आरोपों की स्वतंत्र जांच कराना। दूसरी, प्रदर्शन पर लगाए गए प्रतिबंधों और डिजिटल निगरानी के इस्तेमाल की वैधता तथा आवश्यकता की समीक्षा करना। तीसरी, छात्रों, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों को बिना भय के अपनी बात रखने का अवसर देना।
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने विशेष रूप से कहा है कि शांतिपूर्ण सभा पर प्रतिबंधों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लैंगिक प्रभावों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। यह महज औपचारिक टिप्पणी नहीं, बल्कि इस बात की याद दिलाता है कि दमनकारी कार्रवाइयों का असर सभी लोगों पर एक जैसा नहीं पड़ता।
लोकतंत्र की मजबूती इस बात से तय नहीं होती कि सड़कों पर कितनी शांति दिखाई दे रही है, बल्कि इससे तय होती है कि नागरिकों को अपनी शिकायतें उठाने की कितनी स्वतंत्रता हासिल है। असहमति को दबाकर पैदा की गई खामोशी लोकतांत्रिक सहमति नहीं होती। भारत सरकार के लिए अब जरूरी है कि वह इन गंभीर आरोपों की पारदर्शी जांच सुनिश्चित करे और यह साबित करे कि लोकतंत्र में नागरिक अधिकार सत्ता की सुविधा पर निर्भर नहीं हैं।




