नई दिल्ली। मतदाता सूची का पुनरीक्षण लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक जरूरी प्रक्रिया है। इसका मकसद मृत, स्थानांतरित और दोहरी प्रविष्टियों वाले मतदाताओं की पहचान करके सूची को दुरुस्त करना है। लेकिन जब इसी प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं को नोटिस जारी होने लगें, पुराने रिकॉर्ड पर सवाल उठने लगें और लोगों को अपनी पात्रता साबित करने के लिए बार-बार दस्तावेज देने पड़ जाएं, तब चुनाव आयोग से यह पूछना जरूरी हो जाता है कि SIR की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और न्यायसंगत है।
दिल्ली में SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने इसी सवाल को केंद्र में ला दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। पीठ ने स्पष्ट किया कि बिहार में SIR की वैधता को लेकर पहले दिए गए फैसले का अर्थ यह नहीं है कि ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर मतदाता का नाम हटाने की प्रक्रिया को भी अंतिम रूप से वैध ठहरा दिया गया है।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि मतदाता सूची में विसंगतियां कैसे दूर की जाएं। असली सवाल यह है कि किसी नागरिक का नाम पहले से मतदाता सूची में दर्ज होने के बावजूद उसे दोबारा संदेह के घेरे में लाने का आधार क्या है? क्या कंप्यूटर सॉफ्टवेयर द्वारा चिह्नित किसी विसंगति को ही नाम हटाने या मतदाता को नोटिस जारी करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है? और क्या चुनाव आयोग की तकनीकी व्यवस्था किसी नागरिक के मताधिकार पर असर डालने से पहले मानवीय जांच और उचित सुनवाई सुनिश्चित कर रही है?
भारत के लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल सरकारी रिकॉर्ड नहीं है। यही वह दस्तावेज है जिसके जरिए नागरिक अपने मताधिकार का इस्तेमाल करता है। इसलिए इस सूची को शुद्ध बनाने की जिम्मेदारी जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण यह गारंटी भी है कि किसी पात्र मतदाता का नाम प्रशासनिक चूक, तकनीकी गड़बड़ी या अस्पष्ट नियमों के कारण सूची से बाहर न हो जाए।
बिहार के फैसले को हर मामले का जवाब नहीं मान सकते
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ दिल्ली में SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इस दौरान चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने बिहार में SIR से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने स्पष्ट किया कि बिहार में अदालत ने चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण कराने की शक्तियों को स्वीकार किया था, लेकिन वहां ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ को मतदाता सूची से नाम हटाने की एक अलग श्रेणी के रूप में नहीं अपनाया गया था।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि बिहार का फैसला इस मुद्दे पर बाध्यकारी मिसाल नहीं हो सकता, क्योंकि वहां यह सवाल अदालत के सामने था ही नहीं। पश्चिम बंगाल में इस व्यवस्था को अंतरिम तौर पर अनुमति दी गई थी, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उसकी वैधता पर अंतिम निर्णय हो चुका है। अब यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि SIR की वैधता और उसके भीतर अपनाए जा रहे प्रत्येक तरीके की वैधता दो अलग-अलग प्रश्न हैं। किसी प्रक्रिया को व्यापक रूप से वैध मान लेने का अर्थ यह नहीं हो सकता कि उसके तहत इस्तेमाल होने वाला हर नया नियम, हर तकनीकी मानक और हर प्रशासनिक तरीका भी स्वतः वैध हो जाए।
न्यायमूर्ति बागची ने यह भी कहा कि अदालत की टिप्पणियों को अंतिम निष्कर्ष की तरह नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने न्यायिक कार्यवाही की टिप्पणियों को संदर्भ से काटकर प्रकाशित किए जाने पर भी चिंता जताई। इसलिए फिलहाल अदालत की टिप्पणियों को अंतिम फैसला मानने के बजाय उन्हें उस कानूनी प्रश्न की पड़ताल के रूप में देखना चाहिए जिस पर सुनवाई अभी बाकी है।
‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ है क्या और कैसे हुई इसकी शुरुआत?
चुनाव आयोग SIR के दौरान मतदाताओं के रिकॉर्ड और दस्तावेजों में कथित विसंगतियों की पहचान करने के लिए सॉफ्टवेयर आधारित जांच का इस्तेमाल कर रहा है। इसमें नाम की वर्तनी में अंतर, माता-पिता से जुड़े विवरणों में विसंगति, उम्र के अंतर और पारिवारिक संबंधों से संबंधित कुछ निर्धारित पैटर्न शामिल रहे हैं। अलग-अलग चरणों में ऐसी विसंगतियों की श्रेणियां भी बढ़ाई गई हैं।
समस्या यह है कि किसी रिकॉर्ड में अंतर दिखाई देना और किसी मतदाता का मतदान करने के लिए अयोग्य होना दो अलग-अलग बातें हैं। नाम की वर्तनी में अंतर, पारिवारिक रिकॉर्ड में एक से अधिक लोगों का एक ही अभिभावक से जुड़ा होना या पुराने दस्तावेजों में विवरण अलग-अलग होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संबंधित व्यक्ति मतदाता बनने का पात्र नहीं है।
इसीलिए यह सवाल महत्वपूर्ण है कि सॉफ्टवेयर से सामने आए किसी पैटर्न की मानवीय स्तर पर जांच की जा रही है या नहीं। यदि किसी तकनीकी प्रणाली के संकेत के आधार पर बड़ी संख्या में नोटिस जारी किए जाते हैं, तो प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को समझना और मतदाता को अपनी बात रखने का वास्तविक अवसर देना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने इसी संदर्भ में सवाल उठाया कि क्या ऐसे पैटर्न तैयार कर देना अपने आप में मानवीय विवेक के इस्तेमाल के बराबर माना जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर नाम हटाने की वैधता पर अलग से विचार किया जाना बाकी है।
चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 को बिहार में SIR शुरू करने के आदेश में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ का उल्लेख नहीं किया था। इसके बाद 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को अन्य राज्यों के लिए जारी आदेशों में भी इस शब्द को शामिल नहीं किया गया था। लेकिन जैसे-जैसे SIR आगे बढ़ा, आयोग ने मतदाता सूची के रिकॉर्ड और मतदाताओं द्वारा जमा किए गए दस्तावेजों में विसंगतियों की पहचान के लिए केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल शुरू किया।
SIR के दूसरे चरण में नौ राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में छह श्रेणियों के तहत विसंगतियां चिह्नित की गईं। इनमें छह या उससे अधिक भाई-बहन होने की स्थिति, मतदाता या उसके माता-पिता के नाम की वर्तनी में अंतर और मतदाता तथा माता-पिता के बीच उम्र का अंतर 15 वर्ष से कम या 50 वर्ष से अधिक होना जैसे मानक शामिल थे। मई 2026 में शुरू हुए तीसरे चरण में ऐसी श्रेणियों की संख्या बढ़ाकर 11 कर दी गई।
यहीं से प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल पैदा होते हैं। किसी परिवार में भाई-बहनों की संख्या अधिक होना, पुराने दस्तावेज में नाम की वर्तनी अलग होना या उम्र के अंतर का निर्धारित पैटर्न से मेल न खाना अपने आप में किसी व्यक्ति की मतदाता पात्रता समाप्त होने का प्रमाण नहीं है। ऐसे मामलों में जांच की जरूरत हो सकती है, लेकिन जांच की जरूरत और नाम हटाने का वैधानिक आधार एक ही बात नहीं हैं।
न्यायमूर्ति बागची ने इसी संदर्भ में कहा कि आयोग ने कुछ पैटर्न तैयार किए हैं। अदालत को यह जांचना होगा कि केवल ऐसे पैटर्न बना देना क्या किसी मानवीय एजेंसी द्वारा दिमाग लगाने यानी स्वतंत्र विवेक के इस्तेमाल के बराबर है। इस टिप्पणी के केंद्र में एक बुनियादी प्रश्न है कि क्या सॉफ्टवेयर केवल संदिग्ध रिकॉर्ड की पहचान करने का साधन है या उसके संकेत व्यवहार में मतदाता को संदेह के दायरे में डालने वाली निर्णायक व्यवस्था बन रहे हैं? इसका जवाब आयोग को अपनी प्रक्रिया और मानकों के जरिए देना होगा।
2003 की मतदाता सूची में नाम था तो फिर दोबारा जांच क्यों?
सुनवाई का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वर्ष 2003 की मतदाता सूची से जुड़ा रहा। न्यायमूर्ति बागची ने सवाल उठाया कि जब आयोग की योजना के अनुसार 2003 की सूची में शामिल प्रविष्टियों की विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान जांच हो चुकी थी, तो अब उसी सूची में दर्ज किसी व्यक्ति की प्रविष्टि को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर दोबारा खोलने का औचित्य क्या है? उन्होंने कहा कि 2003 के बाद मतदाता सूचियों में सारांश पुनरीक्षण होते रहे, लेकिन SIR नहीं हुआ। ऐसे में यदि 2003 की सूची में दर्ज किसी व्यक्ति की प्रविष्टि अब तार्किक विसंगति बताकर फिर से जांच के दायरे में लाई जा रही है, तो इस कदम का आधार स्पष्ट होना चाहिए।
यहां अदालत ने किसी भी पुरानी प्रविष्टि को हमेशा के लिए अपरिवर्तनीय घोषित नहीं किया। मृत्यु, स्थायी स्थानांतरण, दोहरी प्रविष्टि या अन्य वैधानिक परिस्थितियों में मतदाता सूची में संशोधन आवश्यक हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या पुराने रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने के बावजूद केवल किसी नए तकनीकी पैटर्न के आधार पर व्यक्ति की पात्रता को दोबारा संदेहास्पद माना जा सकता है?
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी इसी मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने अपनी किसी भी सार्वजनिक सामग्री में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी है। यदि किसी मतदाता को नोटिस दिया जाता है, तो उसे यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उसके रिकॉर्ड में कौन-सी विसंगति पाई गई है, वह किस नियम के तहत जांच के दायरे में आया है और उसे अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए कौन-से दस्तावेज देने होंगे। अस्पष्ट मानकों के आधार पर नागरिकों से अपनी पात्रता साबित करने की अपेक्षा करना प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है।
दिल्ली में 19.34 लाख मतदाताओं को दिया गया नोटिस
सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने चुनाव आयोग की ओर से जारी एक प्रेस नोट का हवाला देते हुए दिल्ली में SIR के आंकड़े अदालत के सामने रखे। आयोग के अनुसार, दिल्ली की मतदाता सूची में SIR शुरू होने के समय 1,45,10,299 मतदाता दर्ज थे। 30 जून से 17 अगस्त 2026 के बीच गणना प्रपत्रों के वितरण की प्रक्रिया पूरी की गई। 17 अगस्त तक 97,53,577 मतदाताओं ने अपने गणना प्रपत्र जमा किए थे, जबकि 47,56,722 मतदाताओं के प्रपत्र वापस नहीं मिले। आयोग ने प्रपत्र वापस नहीं मिलने के पीछे अनुपस्थिति, स्थानांतरण, मृत्यु और दोहरी प्रविष्टि जैसे कारण बताए।
प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि मसौदा मतदाता सूची में शामिल 97,53,577 मतदाताओं में से 19,34,243 को सॉफ्टवेयर द्वारा चिह्नित ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर नोटिस जारी किए गए। यह आंकड़ा प्रक्रिया के व्यापक प्रभाव को सामने लाता है। हालांकि, नोटिस जारी होना और मतदाता का नाम अंतिम रूप से हटाया जाना एक ही बात नहीं है। इसी तरह, प्रपत्र वापस नहीं मिलने वाले सभी मतदाताओं को एक ही श्रेणी में रखना भी उचित नहीं होगा। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर जांच होने के कारण यह जरूरी हो जाता है कि आयोग अपने मानकों को स्पष्ट करे और प्रत्येक प्रभावित मतदाता को पर्याप्त अवसर दे।
Form 6 और Form 8 पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग के सामने एक व्यावहारिक समस्या भी रखी। दिल्ली जैसे महानगर में बड़ी संख्या में लोग रोजगार, कारोबार, पढ़ाई या निजी कारणों से अस्थायी रूप से बाहर रहते हैं। कई लोग अपना निवास स्थान बदल लेते हैं, जबकि कुछ लोग गणना प्रपत्र जमा करने की निर्धारित अवधि में शहर में मौजूद नहीं होते।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि ऐसी स्थिति में केवल मतदाताओं पर आयोग के पास पहुंचने की जिम्मेदारी डालने के बजाय आयोग को भी उनसे संपर्क करने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब आयोग यह मानकर चलता है कि गणना प्रपत्र पुराने पते पर पहुंचा दिया गया है, तो यह जरूरी नहीं कि संबंधित व्यक्ति अब भी उसी पते पर रह रहा हो।
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि चुनाव के समय लोग अपने मताधिकार को लेकर अधिक सक्रिय होते हैं, लेकिन जब चुनाव नहीं हो रहे होते और लोग अपने काम में व्यस्त होते हैं, तब उनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे हर परिस्थिति में अधिकारियों को अपने पते में बदलाव की सूचना देने के लिए तुरंत पहुंच जाएं।
न्यायमूर्ति बागची ने Form 6 और Form 8 के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया। Form 6 सामान्य तौर पर नए मतदाता के पंजीकरण के लिए होता है, जबकि Form 8 का इस्तेमाल मतदाता सूची में विवरण या निवास स्थान से जुड़े बदलावों के लिए किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति 2026 की मतदाता सूची में पहले से शामिल था, लेकिन वह अस्थायी या स्थायी रूप से स्थानांतरित होने अथवा दिल्ली से बाहर होने के कारण गणना प्रपत्र जमा नहीं कर सका, तो उससे Form 6 भरवाकर यह घोषणा करवाना कि उसका नाम पहले कभी मतदाता सूची में था ही नहीं, गलत स्थिति पैदा कर सकता है।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यदि आयोग 2003 की सूची को आधार बनाकर पूरी प्रक्रिया को नए सिरे से चला रहा है, तो संबंधित व्यक्ति से उस सूची में नाम होने या न होने के बारे में घोषणा मांगे जाने का तर्क समझा जा सकता है। लेकिन यदि 2026 की मतदाता सूची को आधार बनाया जा रहा है और व्यक्ति केवल स्थानांतरित हुआ है, तो उसे Form 8 के जरिए अपना विवरण ठीक कराने का अवसर दिया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि आयोग चाहे तो ऐसे मतदाताओं से गणना प्रपत्र न भर पाने का कारण बताने वाली घोषणा ले सकता था। यानी हर स्थिति में किसी नागरिक को नए मतदाता की तरह पेश करना ही एकमात्र रास्ता नहीं है।
30 अक्टूबर की समय सीमा पर आयोग को क्या कहा?
दिल्ली में दावे और आपत्तियां दाखिल करने की 30 अक्टूबर की समय सीमा को लेकर भी अदालत ने चुनाव आयोग से विचार करने को कहा। आयोग के वकील ने मौखिक रूप से आश्वासन दिया कि प्रपत्र जमा करने की समय सीमा बढ़ाई जाएगी और संबंधित कदम उठाए जाएंगे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस सुनवाई में समय सीमा बढ़ाने का औपचारिक आदेश नहीं दिया। पीठ ने मामले को दो सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करते हुए आयोग से अपने स्तर पर कदम उठाने की अपेक्षा की।
मुख्य न्यायाधीश ने आयोग को सुझाव दिया कि वह अपने अधिकारियों से चर्चा करे और Form 6 तथा Form 8 दोनों के माध्यम से आवेदन स्वीकार करने की व्यवस्था बनाए। उन्होंने कहा कि फिलहाल किसी कट-ऑफ तारीख के आधार पर लोगों को रोकने के बजाय इस प्रक्रिया को जारी रखा जाए और अखबारों तथा ऑनलाइन माध्यमों से सार्वजनिक सूचना दी जाए कि लोग आवेदन कर सकते हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि Form 6 या Form 8 के साथ जमा किए जाने वाले दस्तावेजों की जांच आयोग कर सकता है। यानी आवेदन स्वीकार करना और दस्तावेजों का सत्यापन करना अलग-अलग चरण हैं। प्रक्रिया को खुला रखने का अर्थ यह नहीं है कि हर आवेदन बिना जांच के स्वीकार कर लिया जाए। आयोग के वकील ने अदालत को बताया कि अगले दो सप्ताह में उठाए गए कदमों की जानकारी पीठ को दी जाएगी और इस बीच समय सीमा भी बढ़ाई जाएगी।
मतदाता सूची की शुद्धता या मताधिकार की परीक्षा?
चुनाव आयोग का दायित्व है कि मतदाता सूची में मृत व्यक्तियों, दोहरी प्रविष्टियों और गलत पते जैसी समस्याओं को दूर किया जाए। इस जिम्मेदारी पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। लेकिन प्रक्रिया का औचित्य तभी बना रह सकता है, जब उसके मानक स्पष्ट हों और किसी पात्र मतदाता को अपनी स्थिति समझाने का उचित अवसर मिले।
‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के मामले में यही बुनियादी कसौटी सामने आती है। यदि कोई सॉफ्टवेयर रिकॉर्ड में अंतर पहचानता है, तो आयोग को उस अंतर का कारण जांचना चाहिए। केवल किसी निर्धारित पैटर्न से मेल न खाने को नागरिक की पात्रता पर संदेह करने का अंतिम आधार नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए स्पष्ट नियम, दस्तावेजों का सत्यापन और मानवीय विवेक जरूरी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस व्यवस्था की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। लेकिन अदालत ने यह जरूर स्पष्ट कर दिया है कि बिहार में SIR को वैध ठहराए जाने को हर नई प्रक्रिया के लिए स्वतः मंजूरी नहीं माना जा सकता। आयोग को यह बताना होगा कि ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ की श्रेणियां किस आधार पर बनाई गईं, उनका इस्तेमाल किस तरह हो रहा है और उनसे प्रभावित मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा कैसे की जा रही है।
अब नजर दो सप्ताह बाद होने वाली सुनवाई और चुनाव आयोग द्वारा उठाए जाने वाले कदमों पर रहेगी। असली कसौटी यही होगी कि मतदाता सूची को शुद्ध बनाने की प्रक्रिया में नागरिकों का भरोसा मजबूत होता है या तकनीकी विसंगतियां उनके मताधिकार के रास्ते में नई बाधाएं खड़ी करती हैं।




