SIR पर घिरा चुनाव आयोग, हलफनामे में दिया आधा-अधूरा जवाब

SIR की प्रक्रिया से लेकर Form-6 और ECINet तक उठते सवालों ने चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर खड़े किए गंभीर सवाल; सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे के बावजूद कई सवाल अनुत्तरित हैं। जवाबदेही की चुनौती बरकरार।

लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकारें चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि जनता के भरोसे की बुनियाद भी है। इस भरोसे की रक्षा करने की जिम्मेदारी जिस संस्था पर है, यदि उसी के कामकाज, निर्णय लेने की प्रक्रिया और पारदर्शिता पर सवाल उठने लगें तो यह चिंता किसी एक राजनीतिक दल या चुनाव तक सीमित नहीं रह जाती। यह लोकतंत्र के भविष्य से जुड़ा सवाल बन जाता है।

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठे सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल चुनाव आयोग का हलफनामा इसी गंभीर संकट की ओर इशारा करता है। हलफनामे से उम्मीद थी कि वह आयोग के कामकाज पर उठ रहे संदेह को दूर करेगा, लेकिन उपलब्ध विवरण इसके उलट तस्वीर पेश करते हैं। कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं, मसलन निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता पर संदेह बरकरार है और गलतियों को सुधारने की पहल के बावजूद जवाबदेही तय करने का स्पष्ट संकेत हलफनामें में नहीं मिलता।

चुनाव आयोग की संवैधानिक हैसियत उसे सरकारों और राजनीतिक दलों से स्वतंत्र रहकर काम करने की जिम्मेदारी सौंपती है। संविधान का अनुच्छेद 324 आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति देता है। इस शक्ति का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाना है, न कि उसे किसी एक व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर कर देना।

अंग्रेजी दैनिक The Indian Express की पड़ताल के आधार पर उठे सवालों का एक महत्वपूर्ण पहलू आयोग के भीतर मौजूद तीन सदस्यीय व्यवस्था की भूमिका से जुड़ा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में आयोग के भीतर आंतरिक संतुलन और परामर्श की व्यवस्था कमजोर होने के आरोप सामने आए हैं। चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू की ओर से 10 महीने में 14 आपत्तियां दर्ज किए जाने का उल्लेख इस बहस को और गंभीर बनाता है।

आयोग ने अपने हलफनामे में इन आपत्तियों को सामान्य परामर्श प्रक्रिया का हिस्सा बताकर निर्णय व्यवस्था को उचित ठहराने की कोशिश की है। लेकिन यहां असली सवाल आपत्तियों की संख्या का नहीं, बल्कि उनकी प्रकृति और टाइमिंग का है। यदि अधिकांश आपत्तियां ऐसे आदेशों और फैसलों को लेकर थीं, जो पहले ही जारी किए जा चुके थे या जिनके बारे में दोनों चुनाव आयुक्तों को समय पर जानकारी नहीं दी गई थी, तो इसे सामान्य परामर्श कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

परामर्श का अर्थ यह कतई नहीं हो सकता कि किसी निर्णय के बाद दूसरे सदस्यों को उसकी जानकारी दे दी जाए या उनकी आपत्तियों को रिकॉर्ड में दर्ज कर लिया जाए। वास्तविक परामर्श वह है, जिसमें निर्णय लेने से पहले संबंधित सदस्यों को जानकारी मिले, उनकी राय सुनी जाए और असहमति की स्थिति में उस पर गंभीरता से विचार हो। यदि फैसले पहले हो जाएं और आपत्तियां बाद में दर्ज हों, तो सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का औचित्य ही सवालों के घेरे में आ जाता है।

यहां यह भी समझना जरूरी है कि तीन सदस्यीय आयोग में हर मतभेद अपने आप में संस्थागत संकट का प्रमाण नहीं है। लोकतांत्रिक संस्थाओं में असहमति स्वाभाविक है। संकट तब पैदा होता है, जब असहमति को निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखा जाए, सूचना तक समान पहुंच न हो और संस्था की सामूहिक जिम्मेदारी केवल कागजों तक सिमट जाए।

Form-6 में बदलाव वापस, लेकिन गलती की जिम्मेदारी कौन लेगा?

मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए फॉर्म-6 महत्वपूर्ण है। ऐसे में पहली बार मतदाता बनने वाले लोगों के लिए ऑनलाइन Form-6 की प्रक्रिया में किए गए विवादित बदलाव केवल तकनीकी मामला नहीं हैं। इनका सीधा संबंध नागरिक के मताधिकार और चुनावी प्रक्रिया तक उसकी पहुंच से है। आयोग ने विवादित बदलावों को वापस लेने और ECINet की कानूनी अनुपालना की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों को शामिल करते हुए समिति गठित करने की पहल की है। इसे सुधार की दिशा में कदम माना जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि यदि व्यवस्था में बदलाव उचित नहीं थे तो आयोग ने इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार क्यों नहीं किया? उन बदलावों के लिए जिम्मेदारी किसकी थी? और भविष्य में यह सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्था बनाई गई है कि ऐसी स्थिति दोबारा पैदा न हो?

किसी गलती को सुधार देना और उसके लिए जवाबदेही तय करना दो अलग-अलग बातें हैं। पहली से तत्काल समस्या कम हो सकती है, लेकिन दूसरी के बिना संस्थागत सुधार अधूरा रहता है। यदि किसी तकनीकी बदलाव से मतदाता के अधिकार प्रभावित होने की आशंका पैदा हुई तो केवल पुरानी व्यवस्था बहाल कर देना पर्याप्त नहीं है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि बदलाव किस प्रक्रिया के तहत किया गया, उसकी जांच किसने की और उसे लागू करने से पहले उसके कानूनी प्रभावों का आंकलन क्यों नहीं हुआ।

ECINet जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग चुनावी प्रक्रिया को अधिक सुगम, तेज और पारदर्शी बनाने के लिए होना चाहिए। लेकिन तकनीक तभी लोकतांत्रिक है, जब वह कानून के अधीन हो और नागरिकों के अधिकारों को मजबूत करे। यदि सॉफ्टवेयर के नियम किसी वैधानिक प्रक्रिया को बाधित करने लगें, तो तकनीकी दक्षता का दावा नागरिक अधिकारों की कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

गोवा के 97 मतदाता और सॉफ्टवेयर का अनुत्तरित सवाल

गोवा का मामला इस पूरे विवाद की गंभीरता को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, अंतिम मतदाता सूची से बाहर रह गए 97 मतदाताओं में से 88 ने बाद में Form-6 के माध्यम से दोबारा आवेदन किया। यह आंकड़ा बताता है कि मतदाता सूची से बाहर होना केवल कागजी प्रविष्टि का मामला नहीं, बल्कि नागरिकों को अपनी पात्रता साबित करने और सूची में वापस आने के लिए अतिरिक्त प्रक्रिया से गुजरने की स्थिति भी पैदा कर सकता है। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि फरवरी में सॉफ्टवेयर ने निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ERO) के उन फैसलों को लागू होने से क्यों रोका, जिनके तहत मतदाताओं के नाम हटाने के निर्णय पलटे जाने थे?

यदि किसी सक्षम अधिकारी ने नियमों के तहत किसी मतदाता का नाम बहाल करने का निर्णय लिया था तो सॉफ्टवेयर के स्तर पर उस फैसले को बाधित करने का आधार क्या था? क्या यह तकनीकी खामी थी, किसी प्रशासनिक निर्देश का परिणाम था या प्रणाली में ऐसी कोई शर्त मौजूद थी, जिसने अधिकारी के वैधानिक अधिकार को सीमित कर दिया? इन प्रश्नों का उत्तर देना जरूरी है।

यहां किसी अनियमितता को बिना जांच के अंतिम रूप से साबित मान लेना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी स्वीकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे सवालों को केवल तकनीकी विषय बताकर टाल दिया जाए। जब सॉफ्टवेयर का संचालन मतदाता सूची और मताधिकार को प्रभावित करता है, तो उसके निर्णयों की जांच, ऑडिट और जवाबदेही अनिवार्य हो जाती है। लोकतंत्र में अधिकारी के फैसले को किसी अस्पष्ट तकनीकी बाधा के कारण निष्प्रभावी होने से रोकने के लिए स्पष्ट नियम होने चाहिए। तकनीक प्रशासन की सहायता कर सकती है, लेकिन उसे कानून और वैधानिक अधिकारों के ऊपर नहीं रखा जा सकता।

पश्चिम बंगाल : फैसले किसके थे और जानकारी किससे छिपी रही?

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ अपीलों का मामला भी इसी तरह के प्रश्न खड़े करता है। आयोग के हलफनामे में कहा गया कि इन आदेशों के खिलाफ अपील राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय की ओर से दाखिल की गई थीं। लेकिन इतना भर कह देने से पूरा विवाद समाप्त नहीं होता। सवाल यह है कि जब चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने पहले इस मामले पर जानकारी मांगी थी, तब उन्हें पूरी जानकारी क्यों नहीं दी गई? इतनी व्यापक प्रक्रिया आयोग के नाम पर आगे बढ़ती रही, तो उसके भीतर निर्णयों और कानूनी कदमों की जानकारी साझा करने की व्यवस्था क्या थी?

किसी राज्य में मतदाता सूची का पुनरीक्षण लाखों नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए उससे जुड़े निर्णयों, अपीलों और निर्देशों की संस्थागत निगरानी जरूरी है। यदि आयोग के दो सदस्यों को ही महत्वपूर्ण घटनाक्रम की जानकारी समय पर नहीं मिलती है तो आम मतदाता के लिए पूरी प्रक्रिया को समझना और उस पर भरोसा करना कितना कठिन हो सकता है, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है।

यह केवल आंतरिक प्रशासन का मामला नहीं है। यह उस संस्था की जवाबदेही का भी मामला है, जिसे निष्पक्ष चुनावों का संरक्षक बनाया गया है। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता इस बात से तय नहीं होगी कि वह अपने हलफनामे में कितनी मजबूती से अपनी निर्णय प्रक्रिया का बचाव करता है। उसकी कसौटी यह होगी कि वह उठाए गए सवालों का कितना स्पष्ट, तथ्यपूर्ण और संतोषजनक जवाब देता है।

SIR में न्यायिक प्रक्रिया के सामने भी बाधाएं

विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया से जुड़ी परेशानियां अब न्यायिक स्तर पर भी सामने आ रही हैं। पश्चिम बंगाल में SIR से प्रभावित लोगों की अपीलों पर निर्णय लेने के लिए अदालत द्वारा नियुक्त न्यायाधिकरणों के न्यायाधीशों ने आयोग के पोर्टल पर आधार प्रमाणीकरण की अनिवार्यता से जुड़ी समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया है। यह स्थिति गंभीर है। जब मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों को राहत देने के लिए न्यायिक व्यवस्था के माध्यम से अपील का रास्ता उपलब्ध कराया जाता है, तब उस रास्ते को सुचारु रूप से चलाना भी उतना ही जरूरी है। यदि पोर्टल की तकनीकी या प्रक्रियागत शर्तें न्यायाधिकरणों के कामकाज में बाधा बन रही हैं, तो आयोग को तत्काल समाधान तलाशना चाहिए।

आधार प्रमाणीकरण और पहचान सत्यापन से जुड़े नियमों का पालन किस सीमा तक आवश्यक है, इसका निर्धारण संबंधित कानूनी प्रावधानों और न्यायिक निर्देशों के अनुरूप होना चाहिए। लेकिन किसी भी प्रक्रिया का संचालन इस तरह नहीं होना चाहिए कि पात्र नागरिक को राहत पाने में अनावश्यक बाधाओं का सामना करना पड़े।

SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है। इस उद्देश्य की आड़ में यदि पात्र मतदाताओं को अपने नाम बचाने या दोबारा दर्ज कराने के लिए जटिल प्रक्रियाओं से गुजरना पड़े, तो पूरी कवायद की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। मतदाता सूची की शुद्धता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी पात्र नागरिक का मताधिकार प्रशासनिक या तकनीकी अड़चनों की वजह से प्रभावित न हो।

सुप्रीम कोर्ट : संवैधानिक शक्ति के साथ जवाबदेही भी

चुनाव आयोग की स्वतंत्रता लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति नहीं है। संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उनके कामकाज को पारदर्शी और कानूनसम्मत बनाए रखना भी है। सुप्रीम कोर्ट के सामने चुनौती यह है कि वह आयोग की संवैधानिक स्वायत्तता को सुरक्षित रखते हुए उसे अपनी प्रक्रियाओं में सुधार करने के लिए प्रेरित करे। अनुच्छेद 324 के तहत आयोग को मिली शक्तियां स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए हैं। इन शक्तियों का औचित्य तभी कायम रह सकता है, जब उनका इस्तेमाल पारदर्शी तरीके से हो और प्रभावित नागरिकों को प्रभावी राहत मिल सके।

अदालत के सामने अब सिर्फ यह प्रश्न नहीं है कि आयोग ने हलफनामा दाखिल कर दिया या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या हलफनामे ने उन परिस्थितियों का संतोषजनक निवारण किया गया है जिनके कारण विवाद पैदा हुआ? क्या आयोग ने निर्णय प्रक्रिया, आंतरिक असहमति, तकनीकी बाधाओं और मतदाताओं के अधिकारों से जुड़े सवालों का पूरा उत्तर दिया है? और क्या भविष्य में ऐसी समस्याओं को रोकने के लिए ठोस सुधार किए जाएंगे? इन प्रश्नों का समाधान केवल आश्वासनों से नहीं होगा। आयोग को निर्णयों से संबंधित रिकॉर्ड, प्रक्रियागत नियमों, सॉफ्टवेयर के संचालन और मतदाता सूची से नाम हटाने या बहाल करने की व्यवस्था के बारे में आवश्यक पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी। जहां गलती हुई है, वहां उसकी पहचान और जवाबदेही तय होनी चाहिए।

लोकतंत्र में भरोसा आदेश से नहीं, पारदर्शिता से बनता है

चुनाव आयोग के हलफनामे में उठे सवालों का महत्व किसी एक राज्य, एक चुनाव आयुक्त या SIR की एक प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। यह उस बुनियादी भरोसे से जुड़ा मामला है, जिसके आधार पर नागरिक मानते हैं कि उनका वोट सुरक्षित है, उनकी पात्रता का निष्पक्ष आंकलन होगा और किसी प्रशासनिक या तकनीकी व्यवस्था के कारण उन्हें लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा।

आयोग के सामने अवसर है कि वह आलोचना को संस्थागत सुधार का आधार बनाए। उसे स्पष्ट करना होगा कि महत्वपूर्ण निर्णय किस प्रक्रिया से लिए गए, आंतरिक असहमतियों को किस तरह दर्ज और संबोधित किया गया, तकनीकी प्रणालियों ने वैधानिक फैसलों को प्रभावित क्यों किया और विवादित बदलावों के लिए जिम्मेदारी किसकी थी। केवल सवालों को सामान्य परामर्श का हिस्सा बताना या गलतियों को चुपचाप सुधार देना पर्याप्त नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट को भी यह सुनिश्चित करने की दिशा में आगे बढ़ना होगा कि आयोग की स्वतंत्रता के साथ पारदर्शिता और जवाबदेही की शर्तें कमजोर न पड़ें। क्योंकि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता किसी पदाधिकारी के दावे से नहीं, उसके कामकाज की निष्पक्षता से स्थापित होती है। लोकतंत्र में मतदाता केवल वोट डालने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि सत्ता के गठन का वास्तविक आधार है। यदि उसी के अधिकारों की रक्षा करने वाली संस्था के कामकाज पर लगातार सवाल उठते रहें और उनके जवाब अधूरे रह जाएं, तो संकट केवल आयोग की छवि का नहीं रहता। वह जनता के लोकतांत्रिक भरोसे का संकट बन जाता है। और इस भरोसे को बचाने का पहला कदम है- सवालों का स्पष्ट जवाब, प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और गलतियों के लिए जवाबदेही।

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प्रवीण कुमार
पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक का अनुभव रखता हूं। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों के साथ काम करते हुए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर निरंतर लेखन करता आ रहा हूं। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं और डिजिटल मीडिया कंसल्टेंसी से भी जुड़ा हूं। बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और भगवत गीता के विचार मेरे लेखन और जीवन-दृष्टि को दिशा देते हैं।

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