Dr. Manmohan Singh : भारत के आर्थिक सुधारों का मसीहा

देश के 13वें प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह एक ‍प्रसिद्ध अर्थशास्त्री के साथ पंडित जवाहर लाल नेहरू की तरह ऐसे प्रधानमंत्री बने जिन्होंने लगातार दो बार पद पर रहने का सम्मान पाया। इतना ही नहीं, वे देश के पहले ऐसे सिख थे जो कि प्रधानमंत्री बने। इन्हें 21 जून 1991 से 16 मई 1996 तक पीवी नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व काल में वित्त मन्त्री के रूप में किए गए आर्थिक सुधारों का भी श्रेय दिया जाता है। प्रधानमंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह का कार्यकाल 22 मई 2004 से 26 मई 2014 तक रहा।

डॉ. मनमोहन सिंह के जीवन में अहम पड़ाव
1957 से 1965 – चंडीगढ़ स्थित पंजाब विश्वविद्यालय में अध्यापक
1969 से 1971 – दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रोफ़ेसर
1976 – दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मानद प्रोफ़ेसर
1982 से 1985 – भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर
1985 से 1987 – योजना आयोग के उपाध्यक्ष
1990 से 1991 – भारतीय प्रधानमन्त्री के आर्थिक सलाहकार
1991 – नरसिंहराव के नेतृत्व वाली काँग्रेस सरकार में वित्त मन्त्री
1991 – असम से राज्यसभा के सदस्य
1995 – दूसरी बार राज्यसभा सदस्य
1996 – दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में मानद प्रोफ़ेसर
1999 – दक्षिण दिल्ली से लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन हार गये।
2001 – तीसरी बार राज्य सभा सदस्य और सदन में विपक्ष के नेता
2004 से 2014 – भारत के प्रधानमन्त्री

डॉ. मनमोहन सिंह का जन्म अविभाजित पंजाब के गांव गाह में 24 सितम्बर, 1932 को सरदार गुरुमुख सिंह और अमृत कौर के घर हुआ था। जब वे बहुत छोटे थे तभी उनकी मां का निधन हो गया था। बाद में उनके दादा-दादी ने उनका पालन पोषण किया और वे उनके करीब रहे।

देश विभाजन के बाद उनका परिवार अमृतसर आ गया जहां के हिंदू कॉलेज में उन्होंने पढ़ाई की। इसके बाद पंजाब यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में उन्होंने स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्रियां लीं। बाद में, कई वर्ष ब्रिटेन में रहकर कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों से भी अर्थशास्त्र की पढ़ाई की।

ऑक्सफोर्ड से डॉक्टरेट की उपाधि हासिल करने के बाद उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में तीन वर्ष तक काम किया। पर 70 के दशक में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में पढ़ाने के साथ-साथ विदेशी व्यापार मंत्रालय के सलाहकार के तौर पर काम किया। तब इस विभाग के केन्द्रीय मंत्री ललित नारायण मिश्रा ने उनकी योग्यता को पहचाना और उन्हें अपना सलाहकार बनाया था।

वर्ष 1982 में उन्हें रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाया गया और बाद में वे योजना आयोग से जुड़े। 1990 में यहां काम करने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने उन्हें अपना वित्त मंत्री बनाया। तब भारत की अर्थव्यवस्था बहुत ही खस्ताहाल थी और डॉ. सिंह ने इसे सुधारा। 

डॉ. मनमोहन सिंह की सुझाई नीतियों से देश में आर्थिक सुधार के दरवाजे खुले। 1991 में पीवी नरसिम्हा राव की अगुवाई में कांग्रेस सरकार बनी थी, तब वित्त मंत्री की कमान डॉ. मनमोहन सिंह ने संभाली थी। उस वक्त देश की माली हालत बेहद खराब थी। विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ एक अरब डॉलर रह गया था।

पूर्ववर्ती चंद्रशेखर सरकार को तेल-उर्वरक के आयात के लिए 40 करोड़ डॉलर जुटाने के लिए 46.91 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान में गिरवी रखना पड़ा था। उसी दौर में मनमोहन सिंह आर्थिक उदारीकरण की नीति लेकर आए।

24 जुलाई, 1991 का दिन भारत की आर्थिक आजादी का दिन कहा जाता है। इस दिन पेश बजट ने भारत में नई उदार अर्थव्यवस्था की नींव रखी थी। डॉ. सिंह ने बजट में लाइसेंस राज को खत्म करते हुए, कंपनियों को कई तरह के प्रतिबंधों से मुक्त किया था। आयात-निर्यात नीति बदली गई थी, जिसका उद्देश्य आयात लाइसेंसिंग में ढील और निर्यात को बढ़ावा देना था। यही नहीं, विदेशी निवेश के रास्ते खोल दिए गए। सॉफ्टवेयर निर्यात के लिए आयकर अधिनियम की धारा 80एचएससी के तहत टैक्स में छूट की घोषणा भी की गई थी।

इस महत्वपूर्ण बजट को आधुनिक भारत के इतिहास में सबसे बड़ी घटनाओं में से एक माना जाता है। डॉ. सिंह की आर्थिक नीतियों का ही कमाल था कि दो साल यानी 1993 में ही देश का विदेशी मुद्रा भंडार एक अरब डॉलर से बढ़कर 10 अरब डॉलर हो गया। यही नहीं, 1998 में यह 290 अरब डॉलर तक पहुंच गया था।

हालांकि चुनावों में कांग्रेस सरकार हार गई, लेकिन डॉ. सिंह के काम को सराहते हुए लम्बे समय से मंत्री रहे पी. चिदम्बरम ने उन्हें भारत का देंग शियाओ पिंग बताया। 1993 में उन्होंने सिक्युरिटीज घोटाले के बाद वित्तमंत्री पद से इस्तीफे की पेशकश की लेकिन राव ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया। वे 1991 में असम से राज्यसभा के सदस्य बने और 1996 में दक्षिण दिल्ली से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा, लेकिन वे हार गए। पर वे राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष बने रहे।

14वीं लोकसभा के आम चुनावों में कांग्रेस जीती और कांग्रेस के नेतृत्व में बने यूपीए गठबंधन की कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने उन्हें प्रधानमंत्री घोषित कर दिया। 22 मई, 2004 को वे पहली बार प्रधानमंत्री बने।

अपने पहले कार्यकाल में डॉ. सिंह ने अर्थव्यवस्था को उदारीकृत करने का काम किया और देश के तीव्र विकास के लिए पूर्व वित्त मंत्री पी. चि‍दम्बरम के साथ मिलकर भारतीय बाजार को विकसित करने के उपाय किए। वे बैंकिंग और वित्तीय सेक्टरों को सुधारना चाहते थे। साथ ही, वे चाहते थे कि किसानों को कर्ज से मुक्ति मिले और बुनियादी संरचना के क्षेत्र में तीव्र और बड़े पैमाने कर विकास हों।

पूर्व प्रधानमंत्री ने स्वास्थ्य रक्षण और शिक्षा के प्रसार के लिए कई कार्यक्रम चलाए। आठ नए आईआईटी (जी) की स्थापना, सर्व शिक्षा अभियान, मध्यान्ह भोजन योजना, एनआईए की स्थापना, यूनिक आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया का गठन जैसे कई अन्य उपाय हैं जिन्हें विभिन्न उद्‍देश्यों के लिए देश में चलाया गया।

मनमोहन सरकार ने मनरेगा को चलाया और आरटीआई जैसे कानून भी बनाए। हालांकि उनकी सरकार की यह कहकर आलोचना भी की गई कि यूपीए-2 के कार्यक्राल में केन्द्र नीतिगत मामलों को लेकर लकवाग्रस्त हो गई थी। इसी तरह ज्यादातर लोग मानते हैं कि निजी तौर पर डॉ. सिंह ईमानदार थे, लेकिन उनकी सरकार के मंत्री घोटालों में फंसे रहे।

जहां तक डॉ. मनमोहन सिंह के निजी जीवन का सवाल है तो 1958 में उनका गुरशरण कौर से विवाह हुआ था। इस विवाह की भी अजब-गजब कहानी है। कब और डॉ. मनमोहन सिंह गुरशरण कौर के प्यार में पड़े और कैसे शादी के मुकाम तक पहुंची यह प्रेम कहानी? रोचक किस्सा है।

मनमोहन सिंह और गुरशरण कौर की पहली मुलाकात एक साधारण सी घटना थी, जब मनमोहन सिंह एक युवा अर्थशास्त्री थे और गुरशरण कौर एक टीचर। दोनों के बीच एक सादगी और सहजता थी जो धीरे-धीरे गहरी दोस्ती में बदलती चली गई। इसके बाद दोनों ने एक-दूसरे से शादी करने का फैसला किया। दोनों ने पारंपरिक भारतीय रीति-रिवाजों के अनुसार शादी किया।

दरअसल, 1957 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जब डॉ. मनमोहन सिंह भारत लौटे तो उनके परिवार ने उनकी शादी के लिए रिश्ते देखना शुरू किया और एक समृद्ध परिवार से प्रस्ताव भी आया। लेकिन लड़की पढ़ी-लिखी नहीं थी। तब मनमोहन सिंह ने दहेज लेने से इंकार करते हुए साफ किया था, “मुझे दहेज नहीं एक पढ़ी-लिखी लड़की चाहिए।”

इस बीच गुरशरण कौर की बड़ी बहन बसंत ने मनमोहन सिंह के बारे में सुना था और उनके लिए रिश्ता लेकर आईं। उनकी पहली मुलाकात छत पर हुई, जहां गुरशरण कौर सफेद सलवार-कुर्ते में दिखाई दीं थी। इतिहास में एमए कर रही गुरशरण को देखकर मनमोहन सिंह ने तुरंत ‘हां’ कर दी और इस तरह उनके रिश्ते की शुरुआत हुई।

पहली मुलाकात के बाद एक संगीत कार्यक्रम में गुरशरण कौर ने कीर्तन गाया, जिसमें उनके गुरु ने आलोचना कर दी। इस पर मनमोहन सिंह ने कहा, “नहीं, उन्होंने बहुत अच्छा गाया।” उनकी तारीफ ने गुरशरण को प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने गुरशरण को अपने घर नाश्ते पर बुलाया, जहां उन्होंने अंडे और टोस्ट पेश किये थे। ये उनके अंदाज में इम्प्रेस करने का एक तरीका था जो उनके सरल और सशक्त व्यक्तित्व को दर्शाता था।

डॉ. मनमोहन और गुरशरण की तीन बेटियां हैं जिनके नाम क्रमश: उपिंदर सिंह, दमन सिंह और अमृत सिंह हैं। उपिंदर दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर हैं और वे छह पुस्तकें लिख चुकी हैं।

दमन सिंह एक लेखिका और उपन्यासकार हैं। वे आईपीएस, अशोक पटनायक से विवाहित हैं। तीसरी बेटी अमृत सिंह अमेरिकी सिविल लिबर्टीज यूनियन की स्टाफ वकील हैं। मनमोहन और गुरशरण दोनों ही कोहली खानदान से हैं, लेकिन दोनों में से किसी ने इसे अपना उपनाम नहीं बनाया।

मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री कार्यकाल कई घोटालो से भी घिरा रहा। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, स्वतन्त्र भारत के इतिहास का सबसे बड़ा वित्तीय घोटाला माना जाता है। इस घोटाले में भारत के नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक विनोद राय की रिपोर्ट के अनुसार एक लाख 76 हजार करोड़ रुपये का घपला हुआ था।

विपक्ष के भारी दबाव के बाद मनमोहन सरकार में संचार मन्त्री ए. राजा को न केवल अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा, बल्कि उन्हें जेल भी जाना पडा। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह की चुप्पी पर भी सवाल उठाया।

इसके अतिरिक्त 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन को लेकर संचार मन्त्री एं राजा की नियुक्ति के लिये हुई पैरवी के सम्बन्ध में नीरा राडिया, पत्रकारों, नेताओं और उद्योगपतियों से बातचीत के बाद डॉ॰ मनमोहन सिंह की सरकार भी कटघरे में आ गयी थी।

मनमोहन सिंह के कार्यकाल में देश में कोयला आवंटन के नाम पर भी करीब 26 लाख करोड़ रुपये की लूट हुई और सारा कुछ प्रधानमंत्री की देखरेख में हुआ क्योंकि यह मंत्रालय उन्हीं के पास था।

इस महा घोटाले का राज यह है कोयले का कैप्टिव ब्लॉक, जिसमें निजी क्षेत्र को उनकी मर्जी के मुताबिक ब्लॉक आवंटित कर दिया गया। इस कैप्टिव ब्लॉक नीति का फायदा हिंडाल्को, जेपी पावर, जिंदल पावर, जीवीके पावर और एस्सार जैसी कंपनियों ने खूब उठाया। यह नीति खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दिमाग की उपज थी।

हालांकि उनके प्रधानमंत्रित्व या वित्त मंत्री के कार्यकाल में जो भी घोटाले हुए उसमें डॉ. मनमोहन सिंह की छवि बेदाग रही और कोर्ट के फैसले में कहीं भी किसी तरह के घोटाले का दाग मनमोहन सिंह पर चिपक नहीं सका। राजनीतिक तौर पर जरूर मनमोहन सिंह को बदनाम किया गया और उसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस नीत यूपीए की सरकार 2014 में सत्ता से बाहर हो गई।

अप्रैल 2024 में राज्यसभा का कार्यकाल पूरा करने के बाद डॉ. मनमोहन सिंह ने खुद को राजनीति से पूरी तरह से अलग कर लिया था क्योंकि वह काफी वृद्ध हो गए थे। उन्हें व्हील चेयर पर संसद आना पड़ता था। 26 दिसंबर 2024 गुरुवार रात को वह अपने घर में बेहोश हो गए थे। उन्हें तुरंत दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां रात 9:51 बजे उनका निधन हो गया। 92 साल की उम्र में डॉ. मनमोहन सिंह भले ही इस देश और दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि डॉ. मनमोहन सिंह को भारत के आर्थिक मसीहा के तौर पर देश हमेशा याद करेगा।

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प्रवीण कुमार
मैं कौन हूं, क्या हूं, क्यों हूं, यह सब खुद मुझे भी नहीं पता क्यों कि खुद के बारे में बताना, जताना या उकेरना सबसे मुश्किल काम होता है। हां! बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और गीता के दर्शन से मैंने अपने जीवन को संवारने की कोशिश जरूर की है। बिहार के बेगूसराय जिले का रहने वाला हूं। जाने-अनजाने में पत्रकारिता के आंगन में ढाई दशक से अधिक वक्त से कूद-फांद कर रहा हूं। शुरूआती दौर में जी भरकर देश के तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में वैचारिक लेखन किया। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर लिखने में अपनी रूचि रहती है। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर लेखन कर रहा हूं। डिजिटल और सोशल मीडिया कंसल्टेंट के तौर भी हाथ साफ करता रहता हूं। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान फेक न्यूज़ की बयार को गहराई से जांचा परखा था। उससे पहले नोएडा स्थित ज़ी न्यूज़ में हिन्दी वेबसाइट की शुरूआत कर काफी लंबा वक्त गुजारा। इससे भी पीछे का पूछेंगे तो करीब डेढ़ दशक तक दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, अमर उजाला, दैनिक भास्कर समेत कई राष्ट्रीय व क्षेत्रीय अखबारों के संपादकीय विभाग में अलग-अलग भूमिकाओं को निभाते हुए एक पत्रकार के तौर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की, एक बेहतर इंसान भी बनने की कोशिश की, पर कितना बन पाया ये सब ''ऊपर वाले पर'' छोड़ता हूं...

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