डॉ. शोभा राम शर्मा
सत्व या अस्तित्व के अपने मूल अर्थ से भटककर आज सत्ता उस सामर्थ्य या अधिकार की वाचक मात्र कैसे बन गई जिसके बल पर सत्तासीन शासक शासितों पर नियंत्रण रखता है- यह एक अलग ही कहानी है। अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जीव-जगत को जिस समस्या से जूझना पड़ता है, मानव इतिहास के आदिकाल में आदि मानव को भी अस्तित्व के उसी संकट से रू-ब-रू होना पड़ता था।
अपने और अपनों की सुरक्षा के लिए उसे एक ओर तो प्राकृतिक प्रकोप झेलने पड़ते थे तो दूसरी ओर न केवल हिंसक पशु, बल्कि अपने जैसों से भी अपनी और अपनों की रक्षा करनी पड़ती थी। कालांतर में अपने अनुभवों के बल पर आदि मानव जिस नतीजे पर पहुंचा वह था सत्ता के वर्तमान अर्थ का प्रारंभिक स्वरुप जिसे पारिवारिक सत्ता का नाम दिया जा सकता है।
मातृ सत्तात्मक समाज ने जब पितृ सत्तात्मक समाज की ओर कदम बढ़ाए तो सत्ता का दायरा भी बढ़ता चला गया। पहले परिवार पर अनुभवी बुजुर्ग का नियंत्रण रहता था, आखेट आदि में उसी का अनुभव काम आता था और उन्हीं की सदिच्छा पर अर्जित सामग्री का आवंटन भी होता था, यह सत्ता का एक सीधा-सादा स्वरुप था। आखेट युग से चारागाह युग में प्रवेश करते ही चारागाहों और पालतू पशुओं पर नियंत्रण के लिए विभिन्न कबीलों में आपसी संघर्ष की नौबत आती ही थी और इसी तरह सत्ता का खेल जटिल होने लगा।
कृषि आधारित व्यवस्था में जमीन पर अधिकार के लिए जो खूनी खेल आरंभ हुआ उसका एक यह परिणाम निकला कि जिसकी लाठी में जोर था उसने जमीन और जमीन पर निर्भर रहने वाले पर अपनी सत्ता स्थापित कर ली। राजा को यह अधिकारी किसी ईश्वर ने नहीं उसकी लाठी ने दिया था, लेकिन शासन या ओझाओं की अगली पीढ़ी के पंडे पुजारियों ने राजा की सत्ता को ईश्वरेच्छा का नाम दे दिया।
आदि मानव के लिए प्राकृतिक शक्तियां एक अबूझ पहेली थीं। जादू-टोना या टोटकों द्वारा शासन या ओझाओं ने जिस मायावी सत्ता की नींव रखी उसी ने आगे धर्म और अध्यात्म का बाना पहनकर राजतंत्र को और मजबूती प्रदान कीं। बहुदेववाद एक तरह से सत्ता के बंटवारे का एक कमजोर आधार था जिसे एकेश्वरवाद के एकतंत्र ने दृढता प्रदान की।
लेकिन, व्यवहार में किसी विशालकाय राज्य को नियंत्रित रखना किसी एक के बस की बात नहीं थी। उसके लिए छुटभैये अधिकारियों की फौज रखना जरूरी हो गया। फलतः सामंती व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ और धर्म के ठेकेदार भी सत्ता के उस खेल के भागीदार बने रहे।
यह भी सच है कि सत्ता सदा किसी एक का होकर नहीं रही। समाज के ताने-बाने में जब भी उलझाव की स्थिति उत्पन्न होती है, सत्ता एक के हाथ से दूसरे के हाथ चली जाती है और ऐसी हर क्रांति अगली क्रांति के लिए जमीन तलाशने लगती है। सत्ता के सताए जब उठ खड़े होते हैं तो विचार भी अपना रंग बदलने लगता है।
औद्योगिक क्रांति से पूर्व यह विचार परोसा गया कि लोगों के आपसी विचार-विमर्श ने ही सत्ता किसी एक व्यक्ति या वर्ग विशेष को सौंपने का मन बनाया होगा। इसी में यह संकेत भी निहित था कि अब राजतंत्र की जगह जनतांत्रिक व्यवस्था ही उसका विकल्प होगी। कुछ अंशों में हुआ भी यही। लेकिन, जनतंत्र के नाम पर एक वर्ग विशेष ने सत्ता हथिया ली, धन-बल, जन-बल पर भारी पड़ गया और सत्ता वर्ग विशेष की चेरी बनकर रह गई। अस्तित्व का वही पुराना संकट आज भी लगभग उसी पुराने रूप में विद्यमान है।
सत्ता आशंकाग्रस्त रहता है कि पता नहीं कब उसके हाथ से सत्ता की बागडोर फिसल जाए या छीन ली जाए और सत्ता से बाहर उसी प्रवृति के लोग सत्ता हथियाने की जोड़-तोड़ में संलग्न रहते हैं। जिंदाभर रहने की जगह सत्ता के सुखभोग की अनियंत्रित लिप्सा निरंतर प्रबल होती गई और आज वही और भी बड़े संकट का कारण बन गई है।
भौतिक सुखों का कायल सांसारिक व्यक्ति ही नहीं, संसार के माया-मोह से विरक्ति का उपदेश देने वाले संत-महंत और बाबा लोग भी इससे अछूते नहीं हैं। उनके भक्तों, चेले-चांटों की फौज आश्रमों की चकाचौंध और जनसामान्य पर उनका दबदबा उसी सत्ता सुख-भोग का दूसरा रूप है। येन-केन-प्रकारेण सत्ता सुख पाने की होड़ आज कोढ़ में खाज बनकर रह गई है।
राजनीतिक ठगी का आज ऐसा बोलबाला है जैसा पहले कभी नहीं था। एक दूसरे पर अपनी सत्ता स्थापित करने के छोटे-बड़े प्रयास पहले भी होते रहे, लेकिन इधर दो-दो विश्वयुद्धों ने मानवता को जिस तरह से लहूलुहान किया उसकी सानी नहीं मिलती। हर तिकड़म को बड़े-बड़े आदर्शों की आड़ में इस तरह पेश किया जाता है कि सामान्य लोग उसके झांसे में आने से बच नहीं पाते।
छल से या बल से सत्ता तक पहुंचने के हर प्रयास के पीछे भौतिक सुख-समृद्धि के ही सपने जुड़े होते हैं और उनकी पूर्ति के लिए कुछ भी किया जाना जायज मान लिया जाता है। साम्राज्यवादी सोच इसी का नतीजा है। किसी हवाई आदर्श का बहाना लेकर एक देश दूसरे देश पर हमला करने से परहेज नहीं करता और यह सब राजनीति के धूर्त खिलाड़ियों की शह पर होता है। विजेता को पराजितों पर मनमानी करने का लाइसेंस मिल जाता है और फिर जो प्रतिक्रया होती है उसके पीछे भी वही सत्ता सुख झांकता नजर आता है।
वस्तुतः यह है तो अस्तित्व का ही संघर्ष, किन्तु अपने सीमित दायरे से जब वह आगे निकल जाता है तो अस्तित्व के संकट में बदल जाता है और हम एक दूसरे को अपने अस्तित्व का दुश्मन मानने लग जाते हैं। दुनिया में शोषण, लूट, ठगी, हत्या जैसे घिनौने अपराधों के पीछे यही एक बड़ा कारण नजर आता है। हम मान बैठते हैं कि सत्ता के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता, इसलिए चाहे जो हो सत्तासीन होना ही आज का परमधर्म है।
काल्पनिक ईश्वरीय सत्ता दुनिया में उतनी असरदार कभी नहीं रही जितनी ठोस भौतिक सत्ता रही है और आज यहां-वहां जितने भी राजनीतिक प्रपंच देखने को मिलते हैं वे सब इसी सत्ता के लिए होते हैं। क्या कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि सत्ता की भूख हद से आगे न बढ़ पाए?
यह तो एक सच्चाई है कि सत्ता अस्तित्व के संघर्ष से अलग-थलग नहीं की जा सकती, लेकिन उसे संयमित और नियंत्रित रखने का कोई न कोई रास्ता तो खोजा ही जाना चाहिए। एक ऐसी व्यवस्था होनी ही चाहिए जिसमें सबल निर्बल की बेचारगी का लाभ न उठा सके। कोई ऐसा सामाजिक ढांचा विकसित होना ही चाहिए जिसमें निर्बल के अधिकारों से सबल खिलवाड़ न कर सके।
लेकिन, ऐसा सत्तासीनों की भलमनसाहत के भरोसे होना नामुमकिन है। इसके लिए निर्बल वर्ग को ही आगे आना होगा और उसी को संघर्ष करना होगा। एक ऐसी व्यवस्था के लिए जिसमें किसी के भी अस्तित्व पर संकट का ग्रहण न लग पाए और सभी को सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार मिल सके। जीव जगत में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो सोचने-समझने की शक्ति रखता है और आज दुनिया में जिस तरह के आंदोलन चल रहे हैं उनसे तो यही लगता है कि एक न एक दिन मानव जाति उस व्यवस्था को कायम करके ही दम लेगी।
(लेखक राजनीतिक व सामाजिक चिंतक हैं।)




