नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की बेटी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की बहन प्रियंका गांधी वाड्रा आज यानी 28 नवंबर 2024 को एक सांसद के तौर पर संसद की सदस्य बन गईं। प्रियंका ने हिंदी में शपथ ली। इस दौरान उन्होंने राहुल की तरह हाथ में संविधान की कॉपी पकड़ी हुई थी।

4 लाख 10 हजार वोटों के अंतर से केरल की वायनाड सीट जीतकर प्रियंका गुरुवार जब संसद पहुंची तो तो सदन में एंट्री से पहले भाई राहुल गांधी ने उन्हें रोका और कहा- “स्टॉप, स्टॉप, स्टॉप… लेट मी ऑलसो टेक योर फोटो…”
17 साल की उम्र से कांग्रेस के लिए प्रचार करने वाली प्रियंका गांधी 52 साल तक कोई चुनाव नहीं लड़ीं। ऐसे में सवाल उठना स्वभाविक है कि आखिर प्रियंका को सांसद के तौर पर संसद पहुंचने में 35 साल का लंबा सफर क्यों तय करना पड़ा?
23 अक्टूबर 2024 को वायनाड की एक चुनावी जनसभा में प्रियंका गांधी ने कहा- ”17 साल की उम्र में मैंने अपनी पिता के लिए पहली बार प्रचार किया था। 35 साल से मैं अपनी मां, भाई और पार्टी के लिए कैम्पेन करती आ रही हूं। आज पहली बार मैं अपने लिए वोट मांग रही हूं।”
1989 के आम चुनाव में प्रियंका ने सबसे पहले अपने पिता राजीव गांधी के लिए प्रचार किया था। एक दशक बाद मां सोनिया गांधी ने अमेठी से चुनाव लड़ने का फैसला किया तो प्रियंका ने अमेठी में डेरा डाल दिया। 2004 में अमेठी सीट से भाई राहुल गांधी ने एंट्री ली तो सोनिया ने रायबरेली सीट चुनी। इसके बाद अमेठी और रायबरेली सीट जिताने का जिम्मा प्रियंका गांधी के पास ही रहा।
सोनिया गांधी : एन एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी लाइफ एन इंडियन डेस्टिनी किताब में वरिष्ठ पत्रकार रानी सिंह लिखती हैं– रॉबर्ट वाड्रा ब्रिटिश स्कूल में पढ़ते थे और प्रियंका जीसस एंड मैरी स्कूल में। स्कूलों का कॉमन सोशल गेदरिंग क्लब था। उसी कार्यक्रम में रॉबर्ट की मुलाकात प्रियंका से हुई। उस वक्त प्रियंका सिर्फ 13 साल की थी।
द रेड साड़ी में जेवियर मोरो लिखते हैं- सोनिया प्रियंका और रॉबर्ट की शादी के लिए राजी नहीं थीं। राहुल ने मां को समझाया तो सोनिया ने राहुल से कहा- अगर तुम और तुम्हारी बहन मेरे खिलाफ एकजुट हो रहे हो तो दूसरा मोर्चा खोलने में मेरी कोई रुचि नहीं है।
होनी को कौन टाल सकता है। आखिरकार 18 फरवरी 1997 को प्रियंका की शादी रॉबर्ट वाड्रा से संपन्न हुई। खास बात यह रही कि प्रियंका ने शादी में वही साड़ी पहनी थी जो उनके परनाना पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जेल में रहने के दौरान अपने हाथों से बनी थी।
प्रियंका के बारे में यह किस्सा आम है कि चुनाव प्रचार के दौरान वह कुछ अलग करके सबको चौंका देती हैं। 1999 के चुनाव में अरुण नेहरू रायबरेली से बीजेपी के टिकट पर मैदान में थे। रिश्ते में तो वह प्रियंका के चाचा लगते थे लेकिन रायबरेली की चुनावी बिसात पर तो वह विपक्षी दल के प्रत्याशी थे। तब एक चुनावी रैली में प्रियंका ने अपने संबोधन में कहा- आपने एक ऐसे शख्स को अपने क्षेत्र में आने कैसे दिया जिसने मेरे परिवार के साथ हमेशा गद्दारी की। नतीजा यह हुआ कि अरुण नेहरू यहां से बुरी तरह हारे। किस्मत का खेल देखिए, 26 जुलाई 2013 को जब अरुण नेहरू का निधन हुआ तो प्रियंका के बेटे रेहान ने उन्हें मुखाग्नि दी।
पार्टी की आंतरिक कलह हो, नेतृत्व का संकट हो या फिर बगावत जैसे कई मौकों पर प्रियंका संकटमोचक बनकर पार्टीं और परिवार के साथ खड़ी रहीं। गांधी परिवार के खासमखास माखनलाल फोतेदार लिखते हैं- सोनिया गांधी 2004 में अमेठी सीट छोड़कर रायबरेली जा रही थीं ताकि राहुल गांधी डेब्यू कर सकें। मुझसे सलाह मांगी गई तो मैंने बताया कि इंदिरा जी प्रियंका को राजनीति में देखना चाहती थीं। मेरी बात सुनकर सोनिया गांधी का चेहरा उतर गया। वह कमरे से बाहर चली गईं। बात में पता चला कि राहुल गांधी ही अमेठी से चुनाव लड़े।
दरअसल, गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत को लेकर सोनिया गांधी की सोच बहुत ही स्पष्ट थी कि कांग्रेस को एक फुलटाइम शख्सियत चाहिए। प्रियंका की शादी हो चुकी थी। दो बच्चे हो चुके थे। पार्टी और राजनीति में उलझने पर प्रियंका का वैवाहिक जीवन बिखर सकता था। इस वजह से सोनिया गांधी ने प्रियंका से प्रचार तो जरूर कराया लेकिन चुनाव लड़ाने के हमेशा खिलाफ रहीं। ऐसे में यह सवाल भी जायज है कि फिर वायनाड से प्रियंका को चुनाव क्यों लड़ाया गया?
कहते हैं राजनीति में कोई चीजें पहले से तय नहीं होतीं। परिस्थितियां आपकी योजनाएं तय करती हैं। वायनाड ने गांधी परिवार को दो बार जीत का सेहरा बांधकर अपनी वफादारी साबित की। वो भी उस परिस्थिति में जब राहुल गांधी को अमेठी की जनता ने नकार दिया था। प्रियंका गांधी के मार्फत गांधी परिवार ने यह संदेश दिया कि हम वायनाड या दक्षिण छोड़कर नहीं जा रहे हैं। वायनाड के मतदाताओं को संदेश दिया गया कि उन्हें गांधी के बदले गांधी ही दिया जा रहा है। और इस प्रकार से राजनीतिक जीवन में उठने-बैठने और पिता, मां और भाई समेत पार्टी के प्रचार की जिम्मेदारी संभालने के बावजूद सांसद के तौर पर संसद पहुंचने में प्रियंका को 35 साल का लंबा सफर तय करना पड़ा।




