18वीं लोकसभा के गठन के लिए पूरा देश इस वक्त चुनाव के दौर से गुजर रहा है। चार चरण के चुनाव के बाद 379 सीटों पर मतदान संपन्न हो चुका है। तमाम राजनीतिक दल सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं, लेकिन बीजेपी नीत एनडीए गठबंधन के सर्वमान्य नेता नरेंद्र मोदी और अमित शाह अपनी रैलियों में लगातार एक नारा लगा रहे हैं- अबकी बार 400 पार। अब इस नारे की हकीकत का असली पता तो 4 जून 2024 को ही लग पाएगा, लेकिन चुनावी गणित के जरिये एक विश्लेषण तो किया ही जा सकता है कि इसमें कितना दम है।
देश की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी (BJP) के चुनावी प्रदर्शन की बात करें तो इसने पिछले दो लोकसभा चुनावों यानी 2014 और 2019 में अकेले दम पर बहुमत के जादुई आंकड़े को पार किया है। देश के राजनीतिक नक्शे पर नजर दौराएं तो उत्तर भारत का हिस्सा तो भगवा नजर आएगा, लेकिन दक्षिण भारत के राज्यों में भगवा रथ पर ब्रेक लग जाती है। चुनावी आंकड़े भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि दक्षिण के राज्यों में बीजेपी का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है, सिर्फ कर्नाटक को छोड़कर। ऐसे में 2024 में पार्टी का जोर दक्षिण के राज्यों में सफलता पाने का है।
भाजपा के सबसे लोकप्रिय नेता और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) पूरे दमखम के साथ दक्षिण की जनता का वोट हासिल करने की कोशिश में जी-जान से जुटे हैं। पीएम मोदी इन राज्यों में लगातार रैलियों को संबोधित कर रहे हैं और अबकी बार 400 पार के नारे से बीजेपी के पक्ष में माहौल बना रहे हैं।
दरअसल, बीजेपी के पास उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में विस्तार के कम ही विकल्प बचे हैं। मसलन, गुजरात में पार्टी को 26 में से 26 लोकसभा सीटों पर जीत मिली है। हरियाणा में भी कुछ ऐसा ही है। सारी 10 सीटें बीजेपी के पास ही है। इसी तरह से हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, दिल्ली और उत्तराखंड की भी सारी लोकसभा सीटों पर 2019 में बीजेपी को जीत मिली है। मध्य प्रदेश की 29 सीटों में से 28 पर बीजेपी जीती थी।
महाराष्ट्र में 25 में से 23 सीटें, राजस्थान की 25 में से 24 सीटें, उत्तर प्रदेश में 80 में से 62 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी। झारखंड की 14 में 13 सीटों पर पार्टी ने दांव लगाया था और 11 पर जीत मिली थी, वहीं छत्तीसगढ़ की 11 में से 9 सीट बीजेपी जीत चुकी है। इसी तरह से मणिपुर और मेघालय की भी दो-दो सीटों में से एक-एक सीट पर बीजेपी को जीत मिली थी। मिजोरम और नागालैंड में एक-एक लोकसभा सीट है, इन सीटों को भी बीजेपी ने जीता था। ऐसे में विस्तार के लिए बीजेपी के पास अब पश्चिम बंगाल और ओडिशा के बाद दक्षिण के राज्यों का ही विकल्प बचता है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि बीजेपी को अगर अपना वोट बैंक बढ़ाना है तो दक्षिण के राज्यों में ही बढ़ाना पड़ेगा। हालांकि पार्टी और उसके कद्दावर नेता नरेंद्र मोदी चुनाव से कुछ महीने पहले से ही दक्षिण भारत को संदेश देना शुरू कर चुके थे। आप जरा पाछे मुड़कर देखेंगे तो पाएंगे कि जब अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम होना था, उस वक्त पीएम मोदी दक्षिणी राज्यों का दौरा कर रहे थे। तब वह कश्मीर से कन्याकुमारी तक को जोड़ने की बात कर रहे थे। अपने भाषणों में उत्तर और दक्षिण को जोड़ने की बात कर रहे थे।
आपको याद हो तो उन्होंने भारतीय संसद के नए भवन में सेंगोल की स्थापना करके भी ऐसा ही संदेश दे रहे थे। पिछले साल की 28 मई को संसद की नई बिल्डिंग में पूजा के लिए भी दक्षिण भारत के ही पुजारियों को बुलाया गया था। याद हो तो केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने तब चेन्नई में पत्रकारों से बात करते हुए कहा भी था कि सेंगोल को नए संसद में रखा जाना तमिलनाडु के लिए गर्व की बात है।
असल में कर्नाटक को छोड़ दें तो दक्षिण के बाकी चारों राज्यों में बीजेपी की पहचान एक उत्तर भारतीय पार्टी की है। इसे काऊ बेल्ट की पार्टी भी कहा जाता है। ओपिनियन पोल्स बता रहे हैं कि भाजपा कर्नाटक में पहले से कुछ बेहतर कर सकती है, लेकिन कितना बेहतर करेगी यह तो 4 जून को ही पता चलेगा। तेलंगाना में भाजपा के पास 17 में से 4 सीटें हैं। अमित शाह कह तो रहे हैं कि इस बार डबल डिजिट पहुंचेगा लेकिन हवा जिस तरह से उल्टी बहने लगी है, फिलहाल ऐसा होता दिख नहीं रहा है। तमिलनाडु में हो सकता है वोट शेयर बढ़ जाए। केरल से उम्मीद पालना बेमानी ही होगी। हां, आंध्र प्रदेश में गठबंधन होने से बीजेपी को फायदा मिल सकता है, लेकिन कितना यह कहना आसान नहीं होगा।
आंध्र प्रदेश में कुल 25 लोकसभा सीटें हैं। यहां पीएम मोदी की बीजेपी के साथ एनडीए में चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (TDP) और पवन कल्याण की पार्टी जनसेना साथ में है। एनडीए के सामने है जगन मोहन रेड्डी की पार्टी युवजन श्रमिक रायथू कांग्रेस पार्टी।
2019 के लोकसभा चुनाव में आंध्र प्रदेश में भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली थी। जबकि पार्टी ने 24 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। राज्य में जगन की YSRCP को 25 में से 22 सीटों पर और चंद्रबाबू नायडू की TDP को 3 सीटों पर जीत मिली थी। कांग्रेस का भी खाता नहीं खुल पाया था।
तेलगांना में 2019 के चुनाव में BJP ने सभी 17 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जीत मिली सिर्फ चार पर। वहीं के. चंद्रशेखर राव की पार्टी TRS जो अब BRS हो गई है को 9, कांग्रेस को 3 और AIMIM को एक सीट पर जीत मिली थी।
2 जून 2014 को आंध्र प्रदेश से तेलंगाना अलग हुआ था। 2014 के लोकसभा चुनाव में 42 सीटों पर चुनाव हुए, जिसमें तब तेलंगाना की 17 सीट भी शामिल थी। रिजल्ट क्या रहा? जगन की YSRCP को 9, TDP को 16, तेलंगाना राष्ट्र समिति को 11 सीटों पर जीत मिली। इसके अलावा भाजपा को 3 और कांग्रेस को 2 सीटों पर जीत मिली थी। 1 सीट AIMIM के खाते में गई थी।
कनार्टक की बात करें तो लोकसभा चुनाव 2024 के लिए भाजपा और एच. डी. देवेगौड़ा की पार्टी जनता दल (सेक्युलर) का गठबंधन है। सामने है कांग्रेस। 2019 के लोकसभा चुनाव में कर्नाटक में भाजपा ने सभी 28 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। जीत मिली 25 पर। राज्य में कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) को 1-1 सीट पर जीत मिली थी, वहीं 1 सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार को जीत मिली थी। 2014 में भी BJP ने राज्य में सभी 28 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। जीत मिली थी 17 पर। तब कांग्रेस को 9 और जनता दल (सेक्युलर) को 2 सीटों पर जीत मिली थी।
तमिलनाडु में लोकसभा की कुल 39 सीटें हैं। पिछले लोकसभा चुनाव (2019) में भाजपा ने मात्र 5 पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जीत एक पर भी नहीं मिली। एम. के. स्टालिन की पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) को 23, कांग्रेस को 8, CPI को 2, CPIM को 2, ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) को एक, विदुथलाई चिरुथिगल काची (VCK) को एक और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को एक सीट पर जीत मिली थी। 2014 में BJP ने यहां 9 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और जीत मिली थी एक सीट पर। इस साल AIADMK को 37 सीटों पर जीत मिली थी। बाकी की एक सीट पर पट्टाली मक्कल काची (PMK) पार्टी को जीत मिली थी।
केरल (Kerala) की बात करें तो यहां लोकसभा की कुल 20 सीटें हैं। 2019 में BJP ने 15 पर दांव लगाया था, मगर जीत एक पर भी नसीब नहीं हुई। इस साल राज्य में कांग्रेस को 15 और अन्य को 5 सीटों पर जीत मिली थी। इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा यहां खाता नहीं खोल पाई थी जबकि 18 सीटों पर उसने अपने उम्मीदवार उतारे थे। तब यहां कांग्रेस को 8, CPIM को 5 और अन्य को 7 सीटें मिली थीं।
अब BJP के नजरिए से इन पांचों राज्यों के आंकड़े को एक जगह इकट्ठा करके दक्षिण में पार्टी के ओवरऑल प्रदर्शन को देखें तो दक्षिण भारत के इन 5 राज्यों में लोकसभा की कुल 129 सीटें हैं। 2019 में भाजपा को इनमें से 29 सीटों पर जीत मिली थी। इससे पहले 2014 में BJP को 21 सीटों पर जीत मिली थी।
अब अगर हम कर्नाटक को हटा दें तो भाजपा के सीटों की हालत पतली दिखती है। कर्नाटक को छोड़कर दक्षिण के बाकी चार राज्यों में लोकसभा की कुल 101 सीटें हैं। 2019 में भाजपा को इन चारों राज्यों में सिर्फ 4 सीटों पर जीत मिली थी वो भी सिर्फ आंध्र प्रदेश में। 2014 में भी पार्टी को चारों राज्यों में चार सीटों पर ही जीत मिली- एक तमिलनाडु में और तीन आंध्र प्रदेश में।
इन आंकड़ों से साफ जाहिर होता है कि भाजपा ने इस बार जो 400 पार का नारा दिया है उसके लिए दक्षिण के इन 5 राज्यों की राजनीति को भेदना जरूरी है। अबकी बार 400 पार के नारे को साकार करने के लिए BJP को उत्तर भारत में 2019 की सफलता को दोहराते हुए दक्षिण की कम से कम 70 सीटों पर जीत दर्ज करनी होगी। अब इस आंकड़े को हासिल करना किसी चमत्कार से कम नहीं होगा जो चार चरण के चुनाव के बाद होता दिख नहीं रहा है।




