दिल्ली में नौवां मुख्यमंत्री चुनने के लिए बिछी बिसात

सत्य प्रकाश
दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 के लिए चुनाव आयोग ने आगामी 5 फरवरी को इलेक्शन कराने की घोषणा की है। इसके साथ ही दिल्ली के नौवें मुख्यमंत्री के लिए राजनीतिक संघर्ष तेज हो गया है। अंतर्राष्ट्रीय पहचान रखने वाली दिल्ली, जो राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र भी है, का मुख्यमंत्री राज्य स्तर पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपना प्रभाव रखता है। लिहाजा इस चुनाव के माध्यम से दिल्ली का भविष्य निर्धारित होगा। यह चुनाव तीन प्रमुख राजनीतिक दलों आम आदमी पार्टी (आप), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के बीच त्रिकोणीय मुकाबले के तौर पर देखा जा रहा है।

दिल्ली विधानसभा में कुल 70 सीटें हैं और करीब 1.55 करोड़ मतदाता 13,000 से अधिक मतदान केंद्रों पर अपने मत का उपयोग करेंगे। पिछला विधानसभा चुनाव फरवरी 2020 में हुआ था जिसमें आम आदमी पार्टी को बड़ी सफलता मिली थी। इस बार भी आप ने अपने संयोजक और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को फिर से अपनी पार्टी का चेहरा घोषित किया है। हालांकि पार्टी ने आधिकारिक रूप से अरविंद केजरीवाल के नाम की घोषणा नहीं की है। वहीं भाजपा और कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर कोई पत्ते नहीं खोले हैं। भाजपा के संभावित उम्मीदवारों में साहिब सिंह वर्मा, रमेश विधूडी, विजय गोयल और स्मृति ईरानी का नाम चल रहा है। कांग्रेस की ओर से अजय माकन, संदीप दीक्षित और देवेंद्र यादव के नाम मुख्यमंत्री पद के दावेदारों के रूप में उभरकर सामने आए हैं। इसके अतिरिक्त बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने भी सभी 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है।

दिल्ली में मुख्यमंत्री का पद भले ही संवैधानिक रूप से केंद्र शासित प्रदेश होने की वजह से एक पूर्ण राज्य स्तरीय नहीं हो, लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री की भूमिका राजनीतिक, प्रशासनिक और अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। यही वजह है कि राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में स्थित इस शहर में मुख्यमंत्री का पद विशेष महत्व रखता है।

दिल्ली का मुख्यमंत्री पद : एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
दिल्ली में अब तक आठ शख्सियत मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो चुके हैं। पहली बार दिल्ली के मुख्यमंत्री पद पर चौधरी ब्रह्मप्रकाश पदासीन हुए थे, जो 17 मार्च 1952 से 12 फरवरी 1955 तक मुख्यमंत्री रहे। दरियागंज विधानसभा सीट के तत्कालीन विधायक गुरूमुख निहाल सिंह 12 फरवरी 1955 से एक नवंबर 1956 तक मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद दिल्ली विधानसभा को खत्म कर दिया गया था।

90 के दशक की बात करें तो पांच साल के कार्यकाल में तीन बार मुख्यमंत्री बदले गए। मोतीनगर सीट से तत्कालीन भाजपा विधायक मदन लाल खुराना 2 दिसंबर 1993 से 26 जनवरी 1996 तक मुख्यमंत्री रहे। शालीमार बाग विधानसभा के विधायक साहिब सिंह वर्मा 26 फरवरी 1996 से 12 अक्टूबर 1998 तक मुख्यमंत्री रहे। भाजपा की तेज तर्रार नेता सुषमा स्वराज 12 अक्टूबर 1998 से लेकर 3 दिसंबर 1998 तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं।

बाद में सत्ता बदली और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता तथा दिल्ली विधानसभा की नई दिल्ली विधानसभा सीट से विधायक शीला दीक्षित लगातार 15 साल 25 दिन तक मुख्यमंत्री रहीं। शीला दीक्षित 3 दिसंबर 1998 से लेकर 28 दिसंबर 2013 तक मुख्यमंत्री रही थीं। शीला दीक्षित ने 15 वर्षों तक मुख्यमंत्री पद का कार्यभार संभाला जो दिल्ली के लिए एक महत्वपूर्ण अवधि मानी जाती है। उन्होंने दिल्ली के विकास में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए, जिनका असर आज भी देखा जाता है।

नई दिल्ली विधानसभा सीट से आम आदमी पार्टी के विधायक बनने वाले अरविंद केजरीवाल 28 दिसंबर 2013 से 21 सितंबर 2024 तक दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे हैं। कालकाजी विधानसभा सीट से आप विधायक आतिशी मार्लेना 21 सितंबर 2024 से दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं। हालांकि केजरीवाल के कार्यकाल के दौरान दिल्ली में कई विवाद भी होते रहे, लेकिन उनकी नीतियों और योजनाओं ने दिल्लीवासियों के बीच एक मजबूत समर्थन भी हासिल किया है। अब देखना यह है कि क्या वे फिर से दिल्ली के मुख्यमंत्री बनते हैं या फिर भाजपा और कांग्रेस अपने नए चेहरों के साथ चुनावी मैदान में बाजी मारती है।

दिल्ली का राजनीति प्रभाव और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
दिल्ली विधानसभा का गठन 1952 में हुआ था। इसके पहले दिल्ली में राज्य सरकार का गठन नहीं हुआ था और यह केंद्र सरकार के सीधे नियंत्रण में था। 1956 में दिल्ली विधानसभा को समाप्त कर दिल्ली महानगर परिषद का गठन किया गया। यह परिषद केवल सलाहकार की भूमिका में थी और इसके पास कानून बनाने का कोई अधिकार नहीं था। लेकिन 1991 में 69वां संविधान संशोधन अधिनियम लागू किया गया। इसके तहत दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के रूप में फिर से स्थापित किया गया और दिल्ली विधानसभा का फिर से गठन हुआ। इस संशोधन के बाद से दिल्ली में सरकार बनने की प्रक्रिया शुरू हुई और धीरे-धीरे दिल्ली विधानसभा ने अपनी अहमियत बढ़ाई।

दिल्ली के मुख्यमंत्री का चुनाव अब न सिर्फ राज्य के प्रशासन के दृष्टिकोण से, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी एक अहम भूमिका निभाता है। दिल्ली का मुख्यमंत्री केंद्र सरकार के साथ सीधा संवाद करता है और यह शहर अपने प्रशासनिक निर्णयों के माध्यम से पूरे देश को प्रभावित करता है। इसके साथ ही, दिल्ली में केंद्र सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों के कार्यान्वयन की दिशा में भी मुख्यमंत्री का योगदान महत्वपूर्ण होता है।

चुनावों की दिशा और भविष्य की उम्मीदें
आगामी पांच फरवरी को होने वाले चुनाव और 8 फरवरी को आने वाले नतीजे न सिर्फ दिल्ली के बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी बदलाव की दिशा तय करेगा। आम आदमी पार्टी, भाजपा और कांग्रेस के बीच की प्रतिस्पर्धा दिलचस्प रहेगी और दिल्ली के मतदाता यह निर्णय करेंगे कि किस पार्टी का नेतृत्व उनके लिए उपयुक्त है। इस बार दिल्ली में मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर सभी प्रमुख दलों के भीतर एक अनिश्चितता बनी हुई है, लेकिन जैसा कि आम आदमी पार्टी ने अरविंद केजरीवाल को अपना संभावित चेहरा घोषित किया है, भाजपा और कांग्रेस के लिए यह समय उनके खुद के राजनीतिक रणनीतियों को नए रूप में प्रस्तुत करने का होगा। दिल्ली के मुख्यमंत्री का चुनाव इस बार भी देशभर की राजनीति के लिए एक अहम परीक्षा साबित होगा और आने वाला परिणाम राष्ट्रीय राजनीति में बदलाव का संकेत दे सकते हैं।

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सत्ता विमर्श डेस्क
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1 COMMENT

  1. सत्य प्रकाश जी , निष्पक्ष आलेख लिखा है।समयानुसार बदलते नेताओं का समुचित विश्लेषण। दिल्ली भारत का दिल है। हार्दिक बधाई!😊👌👌

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