सत्य प्रकाश
जब युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा न मिले तो वह या तो विध्वंस करती है या शिकार बन जाती है। आज भारत की जेनरेशन-जी (Gen-Z) एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां वह या तो देश का भविष्य गढ़ सकती है या फिर एक बार फिर ‘क्रांति’ के नाम पर मोहरा बन सकती है।
भारत के पड़ोसी अफगानिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल- इन चारों देशों में बीते दो दशकों में ऐसी साज़िशें रची गईं जिनमें सत्ता से बाहर हुए नेताओं, विफल बुद्धिजीवियों और विदेशी फंडिंग से पोषित संगठनों ने युवाओं की ऊर्जा को भड़काया और तबाह किया।
श्रीलंका में ‘जनता की क्रांति’ का अंत नए तानाशाह के जन्म के साथ हुआ। बांग्लादेश में लोकतंत्र की आड़ में कट्टरवाद को बढ़ावा मिला। नेपाल में माओवादी क्रांति ने एक संप्रभु हिंदू राष्ट्र को राजनीतिक भ्रम और सांस्कृतिक विघटन की खाई में धकेल दिया और अफगानिस्तान– वहां तो 20 साल की आज़ादी का अंत एक आतंकी शासन के पुनः आगमन से हुआ।
इन सभी प्रयोगों में एक समानता थी- युवाओं को भड़काया गया, सत्ता हासिल की गई, फिर उन्हें भुला दिया गया। भारत में भी आज कई ऐसे बौद्धिक-राजनीतिक गिरोह सक्रिय हैं, जो जेन-जी को बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, न्याय का अभाव जैसे शब्दों से गुदगुदाकर उसे सड़क पर लाना चाहते हैं।
इन गिरोहों का मकसद समस्या का समाधान नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन है– वो भी लोकतांत्रिक तरीके से नहीं, बल्कि अराजकता फैला कर। इनके लिए जेन-जी एक ‘टूल’ है जिसे उपयोग कर सत्ता का सिंहासन पाया जा सकता है, फिर चाहे देश की सामाजिक और सांस्कृतिक नींव ही क्यों न हिल जाए।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि जेन-जी को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है? जवाब बेहद सरल है क्योंकि ये पीढ़ी शिक्षित है, पर भ्रमित है। डिजिटल टूल से लैस है, लेकिन वैचारिक स्पष्टता से कोसों दूर। आत्मनिर्भर बनना चाहती है, लेकिन मार्गदर्शन की कमी है। आज यह पीढ़ी सोशल मीडिया पर वायरल ट्रेंड से लेकर स्ट्रीट प्रोटेस्ट तक सक्रिय है, लेकिन उसे पता नहीं है कि उसके कंधों पर बंदूक रखकर कौन चला रहा है?
हर बार जब भारत किसी समस्या से उबरने लगता है, वामपंथी बुद्धिजीवी नया ‘कारण’ पेश करते हैं। कुछ इस तरह से- कश्मीर में आतंकवाद है “विकास की कमी” की वजह से। भूमिहीनता की वजह से पैदा हो रहा है नक्सलवाद। बेरोजगारी और भविष्य के भय से जेन-जी में पैदा हो रहा आक्रोश।
लेकिन इन सवालों का जवाब कौन देगा कि सुकमा में स्कूल जलाने वाला कौन था?
ठेकेदारों की हत्या कर सड़क रोकने वाला कौन था? योजनाओं को रोककर क्षेत्र को अंधकार में धकेलने वाला कौन था? जवाब बड़ा सीधा है- वही लोग जो आज भी जेन-जी को उसी रास्ते पर मोड़ना चाहते हैं।
बीते एक दशक में भारत सरकार ने आतंकवाद, उग्रवाद और नक्सलवाद पर स्पष्ट नीति अपनाई है। यह पहला मौका है जब राज्य और केंद्र के बीच सुरक्षा तंत्र समन्वय स्थापित किया गया है। इंटेलिजेंस नेटवर्क मज़बूत है और स्थानीय प्रशासन को जवाबदेह बनाया गया है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह साफतौर पर कह चुके हैं कि जब तक नक्सलवाद को वैचारिक, आर्थिक और कानूनी समर्थन देने वाले चेहरों को बेनकाब नहीं किया जाएगा, तब तक जंग अधूरी रहेगी।
ऐसे में असल जेन-जी जो खेतों में काम कर रहा है, कारखानों में मशीनों के साथ जूझ रहा है, कोचिंग सेंटरों में UPSC, SSC, NEET की तैयारी कर रहा है या अपने परिवार, गांव और राष्ट्र के लिए संघर्ष कर रहा है जिसे सड़कों पर उकसाने वाले फ्री वाई-फाई थिंक टैंक उसकी मेहनत की नुमाइश अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में करना चाहते हैं उनके खिलाफ कार्रवाई करनी होगी और जेन-जी को दिशा देना होगा।
भारत की जेनरेशन-जी को क्रांतिकारी नहीं, रचनात्मक बनाना होगा। उसे अराजकता का वाहक नहीं, विकास का वाहक बनाना होगा। उसे राजनीतिक मोहरा नहीं, राष्ट्रीय नेतृत्वकर्ता बनाना होगा। जो लोग उसे उसके भविष्य से काटकर, अपने सत्ता स्वप्न पूरे करना चाहते हैं उन्हें बेनकाब करने की ज़रूरत है।
ध्यान रहे इतिहास इस बात का गवाह है कि “हर बार जब कोई पीढ़ी भटकी, देश ने सदियां गंवाईं।” लेकिन अब और नहीं। जेन-जी तैयार है, देश के लिए। क्रांति नहीं, निर्माण के लिए। यही समय है जब नेताओं, नीतिकारों और समाजशास्त्रियों को समझना होगा कि जेन-जी कोई ‘राजनीतिक प्रयोगशाला’ नहीं है। यदि उनकी ऊर्जा को दिशा नहीं दी गई, तो यह देश के लिए एक गंभीर सामाजिक संकट बन सकता है।
सरकार की नीति अब स्पष्ट है– नक्सलवाद, उग्रवाद और आतंकवाद पर सख्त रुख, और साथ ही विकास के माध्यम से युवाओं तक अवसरों की पहुंच। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि समाज में वैचारिक स्पष्टता आए कि कौन इस पीढ़ी को गुमराह कर रहा है और क्यों?




