आडवाणी को गुस्सा क्यों आता है?

कृष्ण किशोर पांडेय

देश के पूर्व उप-प्रधानमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ सांसद तथा मार्गदर्शक मंडल के सदस्य लालकृष्ण आडवाणी संसद की कार्यवाही पूरे शीतकालीन सत्र में नहीं चल पाने से यदि आहत हैं और लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने तक की बात कर रहे हैं तो यह समझने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि समस्या कितनी गंभीर है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही 75 से ऊपर की उम्र वालों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठने लायक न समझा हो और उन्हें उपेक्षित कर दिया हो लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि लालकृष्ण आडवाणी का भारत की संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली का अनुभव इतना परिपक्व है कि उससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा रखने वाले लोग भी अगर गंभीरता से विचार करें तो उन्हें भी लगेगा कि लालकृष्ण आडवाणी, मनमोहन सिंह, मुरली मनोहर जोशी, यशवंत सिन्हा जैसे नेताओं के अनुभव से लाभ उठाया जाए तो यह देशहित में होगा।

आडवाणी क्षुब्ध क्यों हैं और समस्या कितनी गंभीर है उसपर विचार करना आज बहुत जरूरी हो गया है। वास्तविकता यह है कि देश में संविधान लागू होने से लेकर अब तक लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हो चुकी है। चूंकि हर वयस्क व्यक्ति मतदाता है इसलिए वह राजनीतिक वास्तविकताओं को किसी भी हद तक समझता भी है। राजनीतिक जागरूकता इतनी बढ़ी है कि अर्धशिक्षित और अशिक्षित व्यक्ति भी राजनीतिक वास्तविकता को समझना चाहता है। उसे ऐसा लगने लगा है कि उसका विकास और उसका वर्तमान तथा भविष्य सब कुछ राजनीति से जुड़ा हुआ है।

संसद और विधानसभाओं में क्या हो रहा है और कैसे हो रहा है उसे जानने के बारे में लोगों की दिलचस्पी बढ़ती जा रही है। इसलिए नि:संदेह हम सबके लिए यह जानना जरूरी हो गया है कि संसद का अभी समाप्त हुआ शीतकालीन सत्र बेकार क्यों चला गया। सबको पता है कि संसद सत्र के दौरान एक दिन में देश का कितना पैसा खर्च होता है। इसलिए भी इसपर विचार करना जरूरी हो गया है कि संसद की कार्यवाही क्यों नहीं चली और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।

यह जानना इसलिए भी जरूरी है कि अभी तो एक सत्र में ऐसी स्थिति देखी गई है, परंतु कुछ हफ्तों बाद संसद का बजट सत्र भी शुरू होने वाला है। अगर तब भी ऐसा ही गतिरोध बना रहा तो बजट कैसे पास होगा और फिर देश का काम कैसे होगा। एक सवाल और उठता है कि अगर सरकार को यह भरोसा है कि बजट सत्र के दौरान कोई गतिरोध नहीं होता या अगर होगा भी तो उसे संभाल लिया जाएगा तो फिर वैसी अक्लमंदी शीतकालीन सत्र के दौरान क्यों नहीं दिखाई गई। इतना पैसा क्यों बेकार होने दिया गया।

संसदीय लोकतंत्र की प्रणाली जब से अपनाई गई तब से लेकर आज तक संसद और विधानसभाओं में बहुत कुछ देखने को मिला है। संविधान की व्यवस्था के अनुसार बहुमत प्राप्त दल अपना नेता चुनता है जो देश में प्रधानमंत्री और राज्यों में मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभालता है। कई बार ऐसा हुआ है कि किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो कई दल आपस में मिलकर अपना नेता चुनते हैं और वही नेता प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री होता है।

एक बार तो ऐसा भी हुआ है कि वीपी सिंह की सरकार को बचाने के लिए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों ने बाहर से समर्थन दिया था। 1969 के बाद जब कांग्रेस का विभाजन हुआ तो इंदिरा गांधी की अल्पमत सरकार को वामपंथी दलों ने बाहर से समर्थन दिया था। मतलब यह कि लोकसभा में किसी एक पार्टी बहुमत हो या कुछ पार्टियां एक साथ मिलकर सरकार चलाने की जिम्मेदारी उठाए या एक अल्पमत की सरकार बने और कुछ पार्टियां बाहर से समर्थन देकर उस सरकार को चलाएं, लेकिन एक बात निश्चित है कि संविधान की व्यवस्था के अनुसार संसद और विधानसभाओं को कानून बनाने की जिम्मेदारी का निर्वहन करना होता है।

जाहिर है कि संविधान को यह भी पता है कि जिसे जिम्मेदारी सौंपी गई है उसके सामने बाधाएं भी आएंगी और मुश्किलें भी पैदा होंगी। इसलिए जिम्मेदारी सौंपने के साथ-साथ उसे कुछ विशेष अधिकार भी दिए गए हैं। संसद का कोई भी सदन हो या विधानमंडल का कोई सदन, जैसे सत्ता पक्ष जनता के द्वारा चुना जाता है उसी तरह से विपक्षी दलों में भी जो सदस्य हैं उन्हें भी जनता ही सांसद या विधायक के रूप में चुनती है। इसलिए सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को जो जिम्मेदारियां मिली हैं उनका उल्लेख संविधान में किया गया है।

संविधान की व्यवस्थाओं के अलावा सदन की कार्यवाही चलाने के लिए समय-समय पर नियम कानून बनाए गए हैं और अनेक परंपराएं भी उनमें जुड़ गई हैं। आज की स्थिति में अगर कोई यह कहता है कि संसद की या विधानसभा की कार्यवाही के संचालन के बारे में कोई भ्रम है तो यह उचित नहीं है। आज संविधान की व्यवस्था, कार्यवाही संबंधी नियम कानून, परंपराएं और कार्यवाही का लंबा अनुभव इन सबको मिलाकर देखा जाए तो स्थिति बिलकुल साफ है।

सदन को चलाने की जिम्मेदारी सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की है इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन संविधान की व्यवस्था के अनुसार यह भी बिलकुल साफ है कि अधिक जिम्मेदारी सरकार की ही है क्योंकि कानून बनाने के लिए विधेयक प्रस्तुत करने से लेकर उसे पारित कराने तक की जिम्मेदारी का निर्वहन उसे ही करना होता है। इसीलिए सदन की अध्यक्षता करने वाले अध्यक्ष या सभापति प्राय: सरकार चलाने वाले दल या मोर्चे के सदस्य होते हैं।

सदन की कार्यवाही के संचालन में पीठासीन अध्यक्ष का अधिकार भी बहुत व्यापक है। अगर कोई सदस्य या सदस्यों का समूह जान बूझकर कार्यवाही के संचालन में बाधा डालते हैं तो उन्हें हर तरह से नियंत्रण में रखने के लिए अध्यक्ष को अधिकारों से भी लैस किया गया है। यहां तक कि मार्शल के जरिये ऐसे सदस्यों को सदन से बाहर भी निकाला जा सकता है।

संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष का होना भी उतना ही अनिवार्य है जितना सत्ता पक्ष का होना। दोनों पक्षों के सदस्यों को जनता ने ही चुना है इसलिए सामान्यत: किसी भी सदस्य से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाएगा। विभिन्न सदनों में ये भी देखा गया है कि कई बार संक्षिप्त बहस के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की सहमति से विधेयक पारित हो जाता है।

बहुत सारे विधेयक ऐसे होते हैं जिनपर विपक्ष विरोध करता है या संशोधन पेश करता है फिर भी सत्ता पक्ष अपने बहुमत की मदद से विधेयक पारित करवाता है। यह प्रक्रिया लंबे समय से चली आ रही है और संसदीय लोकतंत्र का अभिन्न अंग होने के कारण यह प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी। यह भी बिलकुल साफ है कि राजनीतिक दल अपनी विचारधारा के आधार पर ही किसी विधेयक का समर्थन या विरोध करते हैं। कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जिनपर सभी दलों में सहमति भी होती है। इसलिए यह समझने में कोई दिक्कत नहीं कि सत्ता पक्ष और विपक्ष का आपसी रिश्ता कोई दुश्मनी का नहीं, बल्कि नीतिगत मतभेदों का है जिसमें सहमति और असहमति दोनों की गुंजाइश है।

संविधान की व्यवस्था के अंतर्गत सबको अपने-अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना है। इतना ही नहीं, सत्ता पक्ष हो विपक्ष हर सदस्य के काम को जनता देख और परख रही है। पांच साल बाद वह सदस्यों के कामकाज के बारे में अपना फैसला भी सुना देती है। भारत में संविधान सबसे ऊपर है। उसकी व्यवस्था के अनुसार विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका सबको काम करना होता है। कोई किसी से बड़ा नहीं है और कोई किसी से छोटा नहीं है।

संविधान में यह भी साफ है कि संविधान की व्याख्या और उसकी रक्षा का अधिकार भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पास है। अब सवाल यह उठता है कि 2016 का संसद का शीतकालीन सत्र इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया? सबको पता है कि मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले के बाद यह सत्र शुरू हुआ। सरकार में भाजपा के अलावा कुछ और दल शामिल हैं और वे सभी इस फैसले के स्वभाविक पैरोकार हैं।

दूसरी ओर विपक्ष में अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियों के सांसद शामिल हैं। सत्ता पक्ष के सांसदों ने स्वभाविक और अपेक्षित रूप से इस फैसले को सही बताया और इसमें कुछ अस्वाभाविक भी नहीं है। लेकिन अलग-अलग विचारधाराओं वाले विपक्ष में शामिल दलों की एकजुटता नोटबंदी के खिलाफ देखी गई जो अपने आपमें एक महत्वपूर्ण घटना है। सत्ता पक्ष और विपक्ष का टकराव दो मुद्दों पर शुरू हुआ जो सत्र के अंत तक जारी रहा।

विपक्ष की पहली मांग थी कि नोटबंदी के मुद्दे पर बहस हो और बहस के बाद मतदान कराया जाए। विपक्ष की दूसरी मांग थी कि प्रधानमंत्री सदन में आएं और इस मुद्दे पर बहस में भाग लें। सत्ता पक्ष ने न तो पहली मांग मानी और न ही दूसरी। गतिरोध दोनों सदनों में जारी रहा। सदन की कार्यवाही क्यों नहीं चली इसके बारे में दोनों पक्ष एक-दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं।

सवाल ये उठता है कि सत्ता पक्ष इस मुद्दे पर बहस के बाद मतदान कराने से क्यों भागता रहा जबकि उसे पता था कि बहुमत उसके पास है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो स्वयं नोटबंदी के फैसले के सूत्रधार हैं उन्हें सदन में जाकर अपनी बात कहने और बहस में भाग लेने में क्या परेशानी थी।

विपक्ष तो अधिकांश मुद्दों पर सरकार के फैसलों या विधेयकों का विरोध करता ही है। कानून की सीमा में रहते हुए यह विरोध चलता रहता है। सरकार के मंत्री और प्रधानमंत्री विपक्ष की आपत्तियों का जवाब देते हैं। ज्यादा से ज्यादा यही होता है कि सरकार के जवाब से विपक्ष संतुष्ट नहीं होता है और उस मुद्दे पर मतदान होता है।

हो सकता है सत्ता पक्ष यह सोच रहा हो कि राज्यसभा में सरकार को बहुमत नहीं है लेकिन यह स्थिति तो पिछले ढाई साल से है। सरकार ने पिछले ढाई साल में कई विधेयक पारित भी कराये हैं। और नोटबंदी के मुद्दे पर भी स्वभाविक प्रक्रिया अपनाई जा सकती थी। सरकार के मंत्री लोग इस मुद्दे पर भी संसद के दोनों सदनों में अपनी बात कहते रहे और विपक्ष की आपत्तियों का जवाब भी देते रहे।

असली सवाल यह है कि प्रधानमंत्री ने विपक्ष की मांग सदन में जाकर अपनी बात कहने से खुत को क्यों रोका? सदन के बाहर प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर भी काफी कुछ कहा तो फिर सदन में जाने और बोलने से परहेज क्यों? यह शायद पहला मौका था कि संसद में अच्छा खासा बहुमत रहने के बावजूद प्रधानमंत्री यह कहें कि विपक्ष उन्हें बोलने नहीं दे रहा। प्रधानमंत्री बोलने के लिए तैयार होते तो इसके बाद दोनों सदनों के अध्यक्षों की यह जिम्मेदारी बनती कि वे प्रधानमंत्री के बोलने के दौरान बाधा न उत्पन्न होने दें। कम से कम प्रधानमंत्री को बोलने का प्रयास तो करना चाहिए था।

विरोध करना या हंगामा करना या कार्यवाही ठप करना विपक्ष के लिए कोई नई बात नहीं है। अगर याद हो तो साल 2012 में संसद के मानसून सत्र में कुल 20 बैठकें होनी थी और हुईं सिर्फ 6 बैठकें। तब मामला यूपीए सरकार में कोल ब्ल़ॉक आवंटन में घोटाले का था। राज्यसभा के तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने तब कहा था कि संसद चलाने की जिम्मेदारी सरकार की है। प्रधानमंत्री सदन के नेता हैं और उनके बिना चर्चा करना सदन का अपमान है। इसी तरह से लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने कहा था कि संसद ठप करना हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है। अरुण जेटली और सुषमा स्वराज आज सरकार में क्रमश: वित्त मंत्री और विदेश मंत्री हैं। सदन के नेता नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं।

संविधान के अनुसार भारत का प्रधानमंत्री सिर्फ बहुमत प्राप्त दल का ही नेता नहीं, वह सदन का भी नेता है और देश का भी। प्रधानमंत्री से यह अपेक्षा की जाती है कि वह पार्टी, संसद, जनता और स्थापित मान्यताओं के बीच समन्वय का काम करे। अगर प्रधानमंत्री ऐसा नहीं कर पाता तो यह संदेह पैदा होना स्वभाविक है कि वह अपने कर्तव्य को पूरा करने के प्रति जागरूक नहीं है। जब अपने फैसले के बारे में प्रधानमंत्री विभिन्न मंचों पर जाकर यह दावा कर सकते हैं कि यह फैसला व्यापक देशहित में है तो फिर इसी बात को संसद में पूरी दृढता के साथ क्यों नहीं रख सके।

यहां तो एक ही निष्कर्ष निकलता है कि प्रधानमंत्री सिर्फ उन्हीं मंचों से बोलना चाहते हैं जहां उनसे कोई सवाल पूछने वाला नहीं हो। संसद में बोलने से प्रधानमंत्री मोदी इसलिए कतरा रहे हों कि विपक्ष उनके सामने सवाल खड़ा करेगा। तो क्या पिछले ढाई साल में यह पहला मौका है कि प्रधानमंत्री मोदी विपक्ष के सवालों का सामना करने से घबरा रहे हैं? दूसरा सवाल यह भी कि क्या उनकी पार्टी भी उनकी मजबूरी समझती है और विपक्षी दलों की भूमिका में खुद को ढाल रही है?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और राजनीतिक चिंतक हैं। इस आलेख में उनके विचार निजी हैं।)

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सत्ता विमर्श डेस्क
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