‘भू-राष्ट्रवाद’ से ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की ओर

सत्य प्रकाश

सांस्कृतिक जागरण के साथ राजनीतिक चेतना का समागम भारत में राष्ट्रवाद का मूल रहा है। ‘भारत’ की अवधारणा केवल निश्चित भूमि और राजसत्ता तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह धर्म और सामाजिक आचरण में भी समाहित है। उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में हिन्द महासागर तक तथा पश्चिम में सिन्धु के मुहाने से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र की घाटी तक फैली भारत भूमि और सामाजिक एवं सांस्कृतिक जिजीविषा, विविधताओं और विरोधाभासों से भरी है। सैंकडों भाषायें एवं बोलियां तथा विचारधारायें हैं। आचार-विचार की भिन्नता हैं और जीवन पद्धति समान नहीं है। इन सबके बीच सांस्कृतिक चेतना ‘भारत प्राण’ है जो समय समय में प्रस्फुटित होती है और एक नये सामाजिक संचार का उदघोष करती है। नरेंद्र मोदी सरकार की नीति भारत के ‘भू-राष्ट्रवाद’ से बाहर ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के रुप को मजबूती देने की है।

स्वतंत्रता संग्राम में प्राणतत्व रहा राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में वर्ष भर के उत्सव घोषित करना नरेंद्र मोदी सरकार का उस दिशा में एक ओर कदम है जिसमें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को सुद्ढद करने पर बल दिया जा रहा है। इससे पहले सरकार ने बौद्ध धर्म से संबंधित देशों में महात्मा बुद्ध के जीवन से जुडे प्रतीकों की प्रदर्शनी आरंभ की है। देश के भीतर भी इसी पर आधारित कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं। सिख धर्म से जुडी दिल्ली से पटना की ‘जोडे यात्रा’ भी इसी प्रयास का हिस्सा है। सरकार राजमामा अहिल्याबाई, चित्तूर की रानी चेन्नम्मा, बाजीराव पेशवा, बिरसा मुंडा, गोलाप बरबोरा जैसे नायकों को महिमा मंडित कर रही है जिससे युवा वर्ग के समक्ष नये आदर्श प्रस्तुत हो सके।

‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने पर आयोजित किये जा रहे समारोह राष्ट्र के सांस्कृतिक पुन जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेंगे। इसने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को प्रेरित किया और राष्ट्रीय गौरव एवं एकता को बनाए रखा। वर्ष 2025 में वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं। बंकिम चंद्र चटर्जी ने सात नवंबर 1875 को अक्षय नवमी के शुभ अवसर पर राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ की रचना की।

वंदे मातरम् पहली बार साहित्यिक पत्रिका बंग दर्शन में उनके उपन्यास आनंदमठ में क्रमबद्ध तरीके से और बाद में वर्ष 1882 में एक स्वतंत्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। उस अवधि के दौरान भारत प्रमुख सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवर्तनों से गुजर रहा था और राष्ट्रीय पहचान और औपनिवेशिक शासन के प्रति विरोध भी बढ़ रहा था। इस गीत में मातृभूमि को शक्ति, समृद्धि और दिव्यता का प्रतीक बताते हुए भारत की एकता और आत्म-सम्मान की जागृत भावना को काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी गई। यह जल्दी ही राष्ट्र के प्रति समर्पण का एक स्थायी प्रतीक बन गया। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी, 1950 को घोषणा की कि स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान सम्मान दिया जाएगा।

वंदे मातरम् का मूल भाव ‘भारत’ है। भारत की शाश्वत संकल्पना जिसने मानवता के प्रथम पहर से खुद को गढ़ना शुरू कर दिया, जिसने युगों-युगों को एक-एक अध्याय के रूप में पढ़ा। भारत की संकल्पना एक वैचारिक शक्ति है। उठती-गिरती दुनिया से अलग अपना स्वतंत्र अस्तित्व बोध होना और ह्दय की गहराई, अनुभवों के निचोंड़, संवेदनाओं की असीमता को प्राप्त करके वंदे मातरम् जैसी रचना मिलती है। इसलिए गुलामी के उस कालखंड में वंदे मातरम् इस संकल्प का उद्घोष बन गया था। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था, “बंकिमचंद्र की आनंदमठ केवल उपन्यास नहीं है, ये स्वाधीन भारत का एक स्वप्न है”। आनंदमठ में वंदे मातरम् के प्रसंग, शब्द और भाव के अपने गहरे निहितार्थ हैं। वंदे मातरम् हर दौर में, हर कालखंड में प्रासंगिक है, इसने अमरता को प्राप्त किया है।

वंदे मातरम की पहली पंक्ति है- “सुजलाम् सुफलाम् मलयज-शीतलाम्, सस्यश्यामलाम् मातरम्।” अर्थात्, प्रकृति के दिव्य वरदान से सुशोभित हमारी सुजलाम् सुफलाम् मातृभूमि को नमन। महात्मा गांधी ने सन 1927 में कहा था- “वंदे मातरम् हमारे सामने संपूर्ण भारत का ऐसा चित्र उपस्थित कर देता है, जो अखंड है।” श्री अरबिंदो ने वंदे मातरम् को एक गीत से भी आगे, उसे एक मंत्र कहा था। उन्होंने कहा- ये एक ऐसा मंत्र है जो आत्मबल जगाता है। भीकाजी कामा ने भारत का जो ध्वज तैयार करवाया था उसमें बीच में भी लिखा था- “वंदे मातरम्।”

बंकिम बाबू ने जब वंदे मातरम् की रचना की थी, तब भारत अपने उस स्वर्णिम दौर से बहुत दूर जा चुका था। विदेशी आक्रमणकारियों के हमले और लूटपाट, अंग्रेजों की शोषणकारी नीति, गरीबी और भुखमरी के चंगुल में राष्ट्र कराह रहा था। बंकिम बाबू ने बुरे हालात में  समृद्ध भारत का आह्वान किया। क्योंकि उन्हें विश्वास था कि मुश्किलें कितनी भी क्यों नहीं हों, भारत अपने स्वर्णिम दौर को पुनर्जीवित कर सकता है।

सन् 1875 में बंकिम बाबू ने बंगदर्शन में “वंदे मातरम्” प्रकाशित किया और देखते ही देखते वंदे मातरम् भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कोटि-कोटि जनों का स्वर बन गया। आज़ादी की लड़ाई का शायद ही ऐसा कोई अध्याय होगा, जिससे वंदे मातरम् किसी न किसी रूप से जुड़ा नहीं था। सन 1896 में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कलकत्ता अधिवेशन में वंदे मातरम् गाया। सन 1905 में बंगाल का विभाजन हुआ। ये देश को बांटने का अंग्रेजों का एक खतरनाक प्रयोग था। लेकिन, वंदे मातरम् उन मंसूबों के आगे चट्टान बनकर के खड़ा हो गया। बंगाल के विभाजन के विरोध में सड़कों वंदे मातरम् था।

वंदे मातरम् से जुड़ा एक और विषय है, जिसकी चर्चा करना उतना ही आवश्यक है। आज़ादी की लड़ाई में वंदे मातरम् की भावना ने पूरे राष्ट्र को प्रकाशित किया था। लेकिन दुर्भाग्य से, सन् 1937 में वंदे मातरम् के महत्वपूर्ण पदों के एक हिस्से को अलग कर दिया गया था। वंदे मातरम् को तोड़ दिया गया था। वंदे मातरम् के इस विभाजन ने देश के विभाजन के बीज भी बो दिये थे। वही विभाजनकारी सोच देश के लिए आज भी चुनौती बनी हुई है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में प्रतीकों, भावनाओं और अवधारणओं की मुख्य भूमिका होती है। इसी को ध्यान में रखकर मोदी सरकार अन्य देशों के साथ ऐसे सामाजिक और सांस्कृतिक सूत्र खोज रही है और उन्हें सहेज रही है जो भारतीयता को आकार देते हैं।

पूर्वी एशियाई देशों, पडोसी देशों और रुस में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों की प्रदर्शनी भारत और अन्य देशों के बीच सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों को मजबूत करती है। यह भगवान बुद्ध से प्रेरित शांति और करुणा की साझा विरासत का भी प्रतीक है। ये प्रदर्शनी शांति, करुणा और एकता का एक शाश्वत प्रतीक है, जो उस आध्यात्मिक बंधन की पुष्टि करती है जो भगवान बुद्ध की अनंत शिक्षाओं के माध्यम से भारत को इन देशों के लोगों से जोड़ता है। बौद्ध धर्म सदियों से भूटान की पहचान का आधार रहा है और इसकी संस्कृति, शासन और ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस (जीएनएच) के दर्शन को आकार देता रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूटान यात्रा भी इसी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रतीक है। इस अवसर पर भगवान बुद्ध से जुडी एक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया जा रहा है। क्यीचू लखांग ( 7वीं शताब्दी ) जैसे प्राचीन अभयारण्यों से लेकर प्रतिष्ठित पारो ताकत्संग तक, गुरु पद्मसंभव की शिक्षाएं भूटान के आध्यात्मिक जीवन और राष्ट्रीय लोकाचार को प्रेरित करती रही हैं। ये प्रदर्शनी भारत की अपनी बौद्ध विरासत को दुनिया के साथ साझा करने की निरंतर परंपरा का हिस्सा हैं। यह मंगोलिया, थाईलैंड, वियतनाम और रूस के कलमीकिया क्षेत्र में सफल अंतर्राष्ट्रीय अवशेष प्रदर्शनियों के बाद आयोजित की जा रही है। इसमें पिपराहवा रत्न अवशेष भी शामिल है । हाल में ही कोरिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड और श्रीलंका में रामायण को आधार बनाकर कार्यक्रम आयोजित किये हैं।

ज्ञान भारतम् एक दूरदर्शी पहल है जिसका उद्देश्य भारत की प्राचीन पांडुलिपियों को समझना और समकालीन समय में उनकी स्थायी प्रासंगिकता को पुनः स्थापित करना है। यह पहल भारत की अपनी पांडुलिपि संपदा को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने की सांस्कृतिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है। ज्ञान भारतम ढांचे के अंतर्गत, प्रमुख कार्यान्वयन भागीदारों के रूप में पूरे भारत में 12 संकुल केंद्र और पांच स्वतंत्र केंद्र स्थापित किए गए हैं। ये केंद्र इस पहल के पांच प्रमुख कार्यक्षेत्रों सर्वेक्षण और सूचीकरण, संरक्षण और क्षमता निर्माण, प्रौद्योगिकी और डिजिटलीकरण, भाषा विज्ञान और अनुवाद और अनुसंधान, प्रकाशन तथा प्रसार कार्य को आगे बढ़ाएंगे।

भारत की पाण्डुलिपि विरासत को पुनर्जीवित करने के मिशन में क्षेत्रीय समन्वय और संस्थागत स्वायत्तता दोनों सुनिश्चित करना है। ज्ञान भारतम भारत की विशाल पांडुलिपि विरासत की पहचान, दस्तावेज़ीकरण, संरक्षण, डिजिटलीकरण और संवर्धन के लिए है। इस पहल का उद्देश्य इस अमूल्य विरासत को राष्ट्रीय और वैश्विक, दोनों ही मंचों पर सुलभ बनाने के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल भंडार (एनडीआर) का निर्माण करना है।

एक अन्य कदम भारत की सांस्कृतिक विविधता के बीच संपर्क सूत्र तलाशना और उन्हें पुनर्जीवित करना है। हजारों वर्षों से भारत के पवित्र तीर्थ 12 ज्योतिर्लिंग, चार धाम और 50 से अधिक शक्तिपीठ इस देश को जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। तीर्थयात्राओं की परंपराएं आज भी जीवन से स्पंदित हैं। काशी तमिल संगमम् और सौराष्ट्र तमिल संगमम् जैसे आयोजन उत्तर और दक्षिण भारत के हृदयों को जोड़ते हैं। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा और जीवनदर्शन को पूरे विश्व में फैलाने का माध्यम बन गया है।

भारत की सैकड़ों भाषाएं और बोलियां इसके उदार और सृजनशील चरित्र की पहचान हैं। अतीत में कभी भी किसी भाषा को विभाजन या शत्रुता का औजार नहीं बनाया गया। तमिल, जो विश्व की सबसे प्राचीन भाषाओं में से एक है और संस्कृत जो ज्ञान की अनंत निधि है। दोनों ही अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के साथ सामंजस्यपूर्वक सह-अस्तित्व में हैं। केंद्र सरकार शिक्षा में क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा दे रही है और नागरिकों को अनेक भारतीय भाषाएं सीखने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। इससे राष्ट्र की एकता की बुनावट और मजबूत हो रही है।                    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)

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सत्ता विमर्श डेस्क
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