डॉ. मुकेश बत्रा की ‘टॉक्सिक’ लॉन्च, शत्रुघ्न सिन्हा बोले- ‘एक बार दोस्त बन गए तो हमेशा दोस्त’

पद्मश्री डॉ. मुकेश बत्रा की नई पुस्तक ‘Toxic: Stories, Science, and Remedies for a Cleaner Mind, Body and Spirit’ का नई दिल्ली में विमोचन हुआ। शत्रुघ्न सिन्हा और मेनका गांधी की मौजूदगी में हुए कार्यक्रम में डॉ. बत्रा ने प्रदूषण, डिजिटल निर्भरता, तनाव, रिश्तों और भावनात्मक संघर्षों को आधुनिक जीवन की ‘टॉक्सिसिटी’ से जोड़ा। 

नई दिल्ली। आधुनिक जीवन की रफ्तार, सुविधाओं और उपलब्धियों के बीच इंसान के सामने ऐसे कई खतरे खड़े हो गए हैं, जिन्हें वह अक्सर बीमारी का नाम देने से पहले पहचान भी नहीं पाता। प्रदूषित हवा और पानी से लेकर असंतुलित जीवनशैली, डिजिटल निर्भरता, तनाव, जहरीले रिश्ते, डर, लालच और भीतर जमा होती नकारात्मकता तक- क्या ये सब मिलकर इंसान के जीवन को धीरे-धीरे ‘टॉक्सिक’ बना रहे हैं? पद्मश्री डॉ. मुकेश बत्रा की नई पुस्तक ‘Toxic: Stories, Science, and Remedies for a Cleaner Mind, Body and Spirit’ इसी सवाल को केंद्र में रखती है।

नई दिल्ली के द ललित होटल में आयोजित एक कार्यक्रम में पुस्तक का विमोचन अभिनेता और पूर्व सांसद शत्रुघ्न सिन्हा तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने किया। डॉ. मुकेश बत्रा ने यह पुस्तक स्वामी शैलेंद्र सरस्वती के साथ लिखी है और इसे ब्लूम्सबरी इंडिया ने प्रकाशित किया है। प्रकाशक के अनुसार पुस्तक 16 जून 2026 को प्रकाशित हुई और इसमें आधुनिक जीवन में दिखाई देने वाली बाहरी तथा आंतरिक ‘टॉक्सिसिटी’ को अलग-अलग स्तरों पर समझने की कोशिश की गई है।

डॉक्टर के अनुभव से निकला आधुनिक जीवन का आईना

डॉ. मुकेश बत्रा की पहचान लंबे समय से होम्योपैथी चिकित्सा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में रही है। पुस्तक के प्रकाशक के मुताबिक वे डॉ. बत्रा हेल्थकेयर के संस्थापक और चेयरमैन एमेरिटस हैं और 2012 में उन्हें चिकित्सा के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। लेकिन ‘टॉक्सिक’ में उनका फोकस केवल बीमारी और उसके उपचार तक सीमित नहीं है। पुस्तक का मूल सवाल ही यह है कि बीमारी को केवल शरीर में तलाशना पर्याप्त है या उस वातावरण, मानसिक स्थिति, रिश्तों और जीवनशैली को भी देखना होगा जिसमें व्यक्ति जी रहा है।

विमोचन के अवसर पर डॉ. बत्रा ने कहा कि उन्होंने यह पुस्तक किसी एक मरीज का निदान करने के लिए नहीं लिखी है। उनके मुताबिक वह एक ऐसी सभ्यता के गवाह हैं जो धीरे-धीरे खुद को ही जहरीला बना रही है- कभी प्रदूषकों के माध्यम से और कभी अपने ही विचारों के जरिए। उनकी चिंता का दायरा इसलिए बड़ा है क्योंकि इसमें हवा, पानी और भोजन के प्रदूषण के साथ-साथ मन और भावनाओं का प्रदूषण भी शामिल है। पुस्तक के आधिकारिक विवरण में भी चिंता, लालच, नफरत, जुनून, भय और असंतुलित मान्यताओं को ऐसी ‘अदृश्य विषाक्तताओं’ के रूप में देखा गया है, जो व्यक्ति के मानसिक और भावनात्मक जीवन को प्रभावित कर सकती हैं।

‘इतने चिंतित हैं कि बता भी नहीं पाते कि समस्या क्या है’

डॉ. बत्रा ने कहा कि आज बहुत से लोग इतने चिंतित, थके हुए या भीतर से परेशान हैं कि वे यह तक नहीं बता पाते कि आखिर उनके साथ गलत क्या हो रहा है। बीमारी का कोई स्पष्ट नाम न होने के बावजूद बेचैनी मौजूद रहती है। यही वह जगह है जहां पुस्तक बाहरी प्रदूषण से आगे बढ़कर मनुष्य के आंतरिक संसार की पड़ताल करती है।

उनके मुताबिक लगातार तनाव, रिश्तों में खिंचाव और हर समय कुछ और हासिल करने की इच्छा व्यक्ति के भीतर ऐसी स्थिति पैदा कर सकती है, जहां संतोष के लिए जगह कम होती जाती है। उन्होंने इसी संदर्भ में गालिब की मशहूर पंक्ति ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ और लोकप्रिय वाक्य ‘दिल मांगे मोर’ का जिक्र किया। उनका संकेत था कि इच्छाएं जीवन को आगे बढ़ाने की ताकत भी देती हैं, लेकिन जब लगातार अधिक पाने की चाह ही जीवन का केंद्र बन जाए तो वह असंतोष और लालच का रूप ले सकती है।

जब सेहत की सलाह भी मुश्किल हो जाए

‘टॉक्सिक’ में पर्यावरणीय प्रदूषण और व्यक्तिगत स्वास्थ्य के बीच संबंध को भी प्रमुखता दी गई है। डॉ. बत्रा ने कहा कि किसी व्यक्ति को स्वस्थ रहने के लिए नियमित टहलने की सलाह देना भी उस समय जटिल हो जाता है, जब जिस हवा में वह सांस ले रहा है वही प्रदूषित हो। यानी स्वास्थ्य को केवल व्यक्तिगत अनुशासन का सवाल मान लेना पर्याप्त नहीं है। जिस हवा में व्यक्ति सांस लेता है, जिस पानी को पीता है, जिस भोजन का सेवन करता है और जिस सामाजिक तथा डिजिटल वातावरण में समय बिताता है, उसका भी उसके जीवन पर असर पड़ता है। पुस्तक का प्रकाशकीय विवरण भी इसी व्यापक दृष्टिकोण की पुष्टि करता है। इसमें प्रदूषण की परंपरागत समझ को हवा, पानी, भोजन और मिट्टी तक सीमित न रखते हुए मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक स्तरों पर मौजूद दबावों से जोड़ने की कोशिश की गई है।

शत्रुघ्न सिन्हा ने याद की पुरानी दोस्ती

कार्यक्रम में अभिनेता और पूर्व सांसद शत्रुघ्न सिन्हा की मौजूदगी ने आयोजन को एक अलग आत्मीयता दी। डॉ. बत्रा के साथ अपनी पुरानी दोस्ती को याद करते हुए उन्होंने कहा, “एक बार दोस्त बन गए, तो हमेशा दोस्त रहते हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि बात केवल दोस्ती की नहीं है, बल्कि दोनों एक-दूसरे के प्रशंसक भी हैं। उनके शब्दों में डॉ. बत्रा के साथ उनके संबंध में लंबे समय की व्यक्तिगत आत्मीयता और पारस्परिक सम्मान दोनों दिखाई दिए।

डॉ. बत्रा ने मनोरंजन उद्योग से जुड़े अपने अनुभवों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि ग्लैमर और सफलता के पीछे लगातार एक ऐसा दबाव काम करता रहता है, जिसे बाहर से देखना आसान नहीं होता। हर फिल्म, हर रिलीज और हर सार्वजनिक प्रतिक्रिया कलाकार के लिए भावनात्मक परीक्षा बन सकती है।

इसी संदर्भ में उन्होंने कहा- “हर शुक्रवार भगवान बॉक्स ऑफिस पर बैठते हैं।” इस टिप्पणी के जरिए उन्होंने फिल्म उद्योग की उस अनिश्चितता की ओर इशारा किया जिसमें किसी कलाकार की मेहनत और भविष्य पर दर्शकों की प्रतिक्रिया का तत्काल असर पड़ सकता है। यह बात शत्रुघ्न सिन्हा जैसे लंबे समय तक फिल्म उद्योग का हिस्सा रहे अभिनेता की मौजूदगी में और अधिक अर्थपूर्ण हो गई। डॉ. बत्रा ने मनोरंजन जगत से जुड़े अपने मरीजों और अनुभवों के आधार पर यह समझने की कोशिश की कि सार्वजनिक चमक के पीछे निजी दबाव किस तरह काम करते हैं।

बेजुबानों के लिए हमेशा खड़े रहे डॉ. बत्रा : मेनका गांधी

कार्यक्रम में मेनका गांधी ने डॉ. मुकेश बत्रा के व्यक्तित्व के मानवीय पक्ष को विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने उन्हें एक बेहतरीन इंसान बताते हुए कहा कि वे हमेशा बेजुबानों के लिए खड़े रहे हैं। मेनका गांधी ने होम्योपैथी से अपने जुड़ाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि होम्योपैथी उनके लिए विशेष महत्व रखती है और वे इसका इस्तेमाल पशुओं के स्वास्थ्य के लिए भी करती हैं। इस तरह कार्यक्रम में ‘टॉक्सिक’ की चर्चा केवल किताब तक सीमित नहीं रही। एक तरफ डॉ. बत्रा ने आधुनिक जीवन में बढ़ती मानसिक, सामाजिक और पर्यावरणीय विषाक्तता की बात की, तो दूसरी तरफ मेनका गांधी की टिप्पणी ने करुणा, पशु-कल्याण और दूसरे जीवों के प्रति जिम्मेदारी के सवाल को भी चर्चा से जोड़ दिया।

डिजिटल दुनिया भी बन रही है ‘टॉक्सिक’

डॉ. बत्रा की पुस्तक के पीछे एक महत्वपूर्ण चिंता डिजिटल जीवन को लेकर भी है। अगस्त में पुस्तक पर हुई एक अन्य चर्चा में उन्होंने डिजिटल निर्भरता और जहरीले रिश्तों को आधुनिक समय की नई ‘टॉक्सिसिटी’ बताया था। आज व्यक्ति का एक बड़ा हिस्सा स्क्रीन पर बीतता है। सूचना, मनोरंजन, सामाजिक संपर्क और काम- सब कुछ डिजिटल माध्यमों से जुड़ता जा रहा है। लेकिन इसी के साथ तुलना, लगातार उपलब्ध रहने का दबाव, सूचनाओं की अधिकता और सोशल मीडिया से पैदा होने वाली बेचैनी भी बढ़ सकती है। डॉ. बत्रा की चिंता यही है कि जो चीज सुविधा के लिए बनाई गई थी, वह कब आदत और फिर निर्भरता में बदल जाती है, इसका अहसास कई बार व्यक्ति को देर से होता है।

जहरीले रिश्तों की पहचान भी जरूरी

‘टॉक्सिक’ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रिश्तों से जुड़ा है। पुस्तक की आधिकारिक जानकारी में भी जहरीले रिश्तों, भय, अस्वस्थ भावनात्मक स्थितियों और मानसिक दबाव को आधुनिक जीवन की अदृश्य विषाक्तताओं में शामिल किया गया है। डॉ. बत्रा के मुताबिक हर कठिन रिश्ता जहरीला नहीं होता, लेकिन जब किसी रिश्ते में लगातार अपमान, नियंत्रण, भावनात्मक थकान या व्यक्ति के आत्मसम्मान में गिरावट आने लगे तो उस रिश्ते के स्वरूप पर विचार करना जरूरी हो जाता है। यह सवाल परिवार, दोस्ती, कामकाज और सामाजिक संबंधों- हर स्तर पर लागू हो सकता है। यहीं पुस्तक चिकित्सा से आगे बढ़कर आत्मचिंतन का विषय बनती है। सवाल केवल यह नहीं है कि शरीर में कौन-सी बीमारी है, बल्कि यह भी है कि व्यक्ति किस तरह के माहौल में रह रहा है और अपने भीतर क्या जमा कर रहा है।

शरीर से आगे मन और कर्म की बात

सह-लेखक स्वामी शैलेंद्र सरस्वती ने कार्यक्रम में चर्चा को व्यक्ति के आंतरिक जीवन की ओर मोड़ा। उन्होंने कहा कि बात सिर्फ शरीर की नहीं है। व्यक्ति को अपने विचारों, भावनाओं और कर्मों पर भी उतना ही ध्यान देना चाहिए। यही ‘टॉक्सिक’ की केंद्रीय अवधारणा भी है—बाहरी दुनिया को साफ करने की कोशिश के साथ भीतर जमा चीजों को पहचानना। पुस्तक में वास्तविक जीवन की कहानियों, वैज्ञानिक तथ्यों और व्यावहारिक उपायों को एक साथ रखने की कोशिश की गई है। प्रकाशक के अनुसार इसमें स्वास्थ्य और आत्म-जागरूकता से जुड़े अभ्यास तथा उपाय भी दिए गए हैं और किसी भी उपचार को योग्य चिकित्सकों के मार्गदर्शन में अपनाने पर जोर दिया गया है।

असली सवाल- हम क्या ग्रहण कर रहे हैं?

डॉ. मुकेश बत्रा की ‘टॉक्सिक’ का सबसे बड़ा सवाल शायद यही है कि आधुनिक मनुष्य रोज क्या ग्रहण कर रहा है। केवल भोजन नहीं, बल्कि विचार, सूचनाएं, रिश्ते, बातचीत, सामाजिक वातावरण और डिजिटल सामग्री भी उसके मानसिक संसार का हिस्सा बन रहे हैं। जून 2026 में प्रकाशित यह 160 पृष्ठों की पुस्तक इसी व्यापक सवाल को कहानियों, विज्ञान और उपचार संबंधी दृष्टिकोण के जरिए सामने रखती है।

विमोचन के दौरान शत्रुघ्न सिन्हा की पुरानी दोस्ती, मेनका गांधी की करुणा और डॉ. बत्रा की चिकित्सा यात्रा- तीनों अलग-अलग संदर्भों से एक ही सवाल की ओर लौटते दिखाई दिए: क्या स्वस्थ जीवन का मतलब केवल बीमारी से मुक्त होना है, या हमें उस पूरे वातावरण को भी बदलना होगा जिसमें हमारा शरीर, मन और आत्मिक संसार सांस लेता है?

‘टॉक्सिक’ इसी सवाल को पाठकों के सामने रखती है और शायद इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यही है कि यह ‘जहर’ को केवल उस चीज के रूप में नहीं देखती जिसे हम शरीर के बाहर पहचान सकें, बल्कि उन चीजों को भी पहचानने की कोशिश करती है जो धीरे-धीरे हमारे भीतर जगह बना लेती हैं।

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सत्ता विमर्श डेस्क
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