राजनीति में वंशवाद : करुणानिधि की स्टाइल को स्टालिन ने दोहरा दिया

राजनीति में वंशवाद या परिवारवाद कोई नई बात नहीं है। लेकिन भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में वंशवाद के नाम पर बीते रविवार को जो हुआ वह थोड़ा अलग है। यहां ऐसा दूसरी बार हुआ है, जब एक मुख्यमंत्री पिता अपने बेटे को डिप्टी सीएम की कुर्सी पर बैठा दिया हो। खास बात यह है कि दोनों बार एक ही परिवार ने ऐसा किया।

याद हो तो साल 2009 में एम.के. स्टालिन को भी उनके पिता और तत्कालीन मुख्यमंत्री मुत्तुवेल करुणानिधि ने डिप्टी सीएम बना दिया था और अब स्टालिन ने अपने बेटे उदयनिधि को। उदयनिधि अपने दादा और पिता के बाद राज्य सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका पाने वाले अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी के नेता हैं।

हालांकि स्टालिन जब डीएमके की युवा इकाई के सचिव बने थे तब भी इसे वंशवाद की राजनीति कहकर आलोचना की गई थी। ये अलग बात है कि अपनी मेहनत से स्टालिन ने साबित कर दिया कि उन्हें सत्ता सिर्फ इसलिए नहीं मिली है क्योंकि वह करुणानिधि के बेटे हैं। विपक्षी पार्टी एआईएडीएमके प्रवक्ता कोवई सत्यन ने कहा है कि डीएमके का मतलब सिर्फ एक परिवार है- करुणानिधि, स्टालिन और उदयनिधि।

अपने दादा और पिता के बाद उदयनिधि राज्य सरकार में बड़ी भूमिका पाने वाले अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी के नेता हैं। डीएमके में पिछले 55 सालों में सिर्फ दो अध्यक्ष हुए हैं। 1969 से 2018 तक करुणानिधि और उनके निधन के बाद एम.के. स्टालिन अध्यक्ष हैं। और अब डिप्टी सीएम बनाकर उदयनिधि के लिए जमीन तैयार की जा रही है।

साल 1949 में जब सीएन अन्नादुरई ने द्रविड़ मुन्नेत्र कडगम पार्टी बनाई थी तो करुणानिधि इसके पहले कोषाध्यक्ष बनाए गए थे। 1952 में करुणानिधि की लिखी फिल्म पराशक्ति रिलीज हुई तो उनका नाम पूरे दक्षिण भारत में सबकी जुबान पर आ गया।

साल 1969 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री अन्नादुरई की जब कैंसर से मौत हो गई तो तमिल फिल्म स्टार और डीएमके नेता एमजी रामचंद्रन की मदद से करुणानिधि पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेताओं को साइड करके मुख्यमंत्री बन गए थे।

इसी तरह से करुणानिधि को अपने छोटे बेटे एम.के. स्टालिन को राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए परिवार के भीतर ही कई बार लड़ाई लड़नी पड़ी। साल 2007 में करुणानिधि को पार्टी और सत्ता में दबदबा कायम करने की चुनौती उनके नाती दयानिधि मारन से मिल रही थी। दयानिधि रिश्ते में करुणानिधि के भांजे मुरासोली मारन के बड़े बेटे थे। वह पार्टी में एक गुट बनाकर खुद को राजनीतिक तौर पर मजबूत कर रहे थे।

जब इसकी भनक करुणानिधि को लगी तो एक षड्यंत्र रचकर उसे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। और इस तरह से करुणानिधि ने अपने बेटे स्टालिन के लिए रास्ता साफ कर दिया। यहां तक कि जब बड़े बेटे अलागिरी ने स्टालिन के खिलाफ अपनी नाराजगी जताई तो 25 जनवरी 2014 को करुणानिधि ने उसे भी पार्टी से सस्पेंड कर दिया था। तब करुणानिधि ने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार भी किया था कि स्टालिन को ज्यादा जिम्मेदारियां देने की वजह से एमए अलागिरी ने उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया है। करुणानिधि के निधन के बाद स्टालिन पार्टी अध्यक्ष और फिर 2021 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने।

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले स्टालिन के बेटे उदयनिधि ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। डीएमके ने उन्हें युवा विंग का प्रमुख बनाया। इसके बाद उदयनिधि ने एक ईंट हाथ में लेकर पूरे राज्य का दौरा किया। इससे पूरे राज्य में उनकी छवि हीरो की बन गई। 2 साल बाद 2021 में वह पहली बार विधायक और फिर अपने पिता स्टालिन की सरकार में मंत्री बन गए।

2 सितंबर 2023 को सनातन धर्म पर दिए अपने बयान की वजह से वह काफी चर्चित हो गए। इस बयान में उदयनिधि ने कहा था- सनातन धर्म लोगों को जाति और धर्म के नाम पर बांटने वाला विचार है। इसे खत्म करना मानवता और समानता को बढ़ावा देना है। जिस तरह हम मच्छर, डेंगू, मलेरिया और कोरोना को खत्म करते हैं, उसी तरह सिर्फ सनातन धर्म का विरोध करना ही काफी नहीं है। इसे समाज से पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए।

27 नवंबर 1977 को जन्मे उदयनिधि स्टालिन अपने चार साल के राजनीतिक करियर में विधायक से डिप्टी सीएम बन गए हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि डीएमके कार्यकर्ता पार्टी में उदयनिधि का कद बढ़ाए जाने की मांग कर रहे थे। उन्हें सरकार में भी पदोन्नति देने की मांग की जा रही थी, ताकि 2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को फायदा मिले।

तमिलनाडु के चेपॉक थिरुवल्लिकेनी सीट से विधायक उदयनिधि स्टालिन ने 2008 में फिल्म कुरुवी के साथ फिल्म प्रोड्यूसर के रूप में करियर की शुरुआत की थी। 2021 में विधान सभा का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। 14 दिसंबर 2022 को पिता एमके स्टालिन के मंत्रिमंडल में युवा कल्याण और खेल विकास मंत्री बने और अब डिप्टी सीएम।

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प्रवीण कुमार
मैं कौन हूं, क्या हूं, क्यों हूं, यह सब खुद मुझे भी नहीं पता क्यों कि खुद के बारे में बताना, जताना या उकेरना सबसे मुश्किल काम होता है। हां! बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और गीता के दर्शन से मैंने अपने जीवन को संवारने की कोशिश जरूर की है। बिहार के बेगूसराय जिले का रहने वाला हूं। जाने-अनजाने में पत्रकारिता के आंगन में ढाई दशक से अधिक वक्त से कूद-फांद कर रहा हूं। शुरूआती दौर में जी भरकर देश के तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में वैचारिक लेखन किया। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर लिखने में अपनी रूचि रहती है। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर लेखन कर रहा हूं। डिजिटल और सोशल मीडिया कंसल्टेंट के तौर भी हाथ साफ करता रहता हूं। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान फेक न्यूज़ की बयार को गहराई से जांचा परखा था। उससे पहले नोएडा स्थित ज़ी न्यूज़ में हिन्दी वेबसाइट की शुरूआत कर काफी लंबा वक्त गुजारा। इससे भी पीछे का पूछेंगे तो करीब डेढ़ दशक तक दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, अमर उजाला, दैनिक भास्कर समेत कई राष्ट्रीय व क्षेत्रीय अखबारों के संपादकीय विभाग में अलग-अलग भूमिकाओं को निभाते हुए एक पत्रकार के तौर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की, एक बेहतर इंसान भी बनने की कोशिश की, पर कितना बन पाया ये सब ''ऊपर वाले पर'' छोड़ता हूं...

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