रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिका ने अब उन देशों पर भी दबाव बढ़ाने की दिशा में कदम तेज कर दिए हैं जो रूस से बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीद रहे हैं। अमेरिकी सीनेट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण रूस प्रतिबंध विधेयक को 86-12 के भारी बहुमत से आगे बढ़ा दिया। यह अभी कानून नहीं बना है, लेकिन इसे वर्ष के अंत तक पारित किए जाने की संभावना जताई जा रही है।
इस विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देगा। अमेरिकी सांसदों ने बहस के दौरान स्पष्ट रूप से भारत और चीन का नाम लेते हुए कहा कि यही दोनों देश रूस की ऊर्जा खरीद के सबसे बड़े खरीदार हैं। हालांकि यह विधेयक तुरंत 100% टैरिफ लागू नहीं करता, बल्कि राष्ट्रपति को आवश्यकता पड़ने पर शून्य से 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार (Authorization) देता है। अंतिम निर्णय भविष्य में अमेरिकी प्रशासन द्वारा लिया जाएगा।
अमेरिकी सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने दावा किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर 25% टैरिफ लगाए जाने के बाद भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद में करीब 50% की कमी की थी। ब्लूमेंथल ने यह भी स्पष्ट किया कि यह विधेयक किसी देश पर स्वतः टैरिफ नहीं लगाता, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति को 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव विशेष रूप से रूस से तेल और गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े देशों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
उन्होंने कहा कि इस विधेयक को इस तरह तैयार किया गया है ताकि अमेरिका के सहयोगी देशों को नुकसान न पहुंचे, जबकि रूस की ऊर्जा खरीद के जरिए उसकी अर्थव्यवस्था और युद्ध प्रयासों को समर्थन देने वाले देशों पर दबाव बनाया जा सके। ब्लूमेंथल ने कहा, “अगर हम इसे सरल और स्पष्ट शब्दों में कहें तो चीन और भारत इसके लिए सबसे बड़े जिम्मेदार हैं। यही देश रूस के तेल और गैस का अधिकांश हिस्सा खरीदते हैं। यही देश रूस की युद्ध मशीन को ईंधन दे रहे हैं और दुनिया के अन्य जरूरी मुद्दों पर भी अमेरिका की कोई मदद नहीं कर रहे हैं।”
अमेरिकी सीनेटर ने यह भी दावा किया कि हालिया टैरिफ नीति का असर देखने को मिला है। उनके अनुसार, ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत पर लगभग 25% टैरिफ लगाए जाने के बाद भारत ने रूस से तेल आयात में उल्लेखनीय कटौती की। हालांकि यह विधेयक अभी अंतिम रूप से पारित नहीं हुआ है। इसके कानून बनने से पहले इसे विधायी प्रक्रिया के अन्य चरणों से गुजरना होगा और भविष्य में किसी भी टैरिफ का निर्णय अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा इस कानून के तहत प्राप्त अधिकारों के आधार पर लिया जाएगा।
क्या है रूस प्रतिबंध विधेयक?
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी लगातार रूस की आय सीमित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए पहले रूस पर सीधे आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए। अब नई रणनीति उन देशों पर दबाव बनाने की है जो रूस से तेल और गैस खरीदकर उसकी अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहे हैं। प्रस्तावित विधेयक के अनुसार, रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अमेरिका अतिरिक्त टैरिफ लगा सकता है। अमेरिका को अधिकतम 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार होगा। इसका उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय कम करना बताया गया है। राष्ट्रपति को परिस्थितियों के अनुसार टैरिफ की दर तय करने का अधिकार मिलेगा।
क्या तुरंत लगेगा 100% टैरिफ? नहीं। यही इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। कई शुरुआती रिपोर्टों में यह धारणा बनी कि अमेरिका ने भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया है, जबकि वास्तविक स्थिति अलग है। यह सीनेट की प्रक्रिया का एक चरण है। विधेयक अभी अंतिम कानून नहीं बना है। आगे इसे विधायी प्रक्रिया के अन्य चरणों से गुजरना होगा। कानून बनने के बाद भी टैरिफ लगाना स्वतः अनिवार्य नहीं होगा। राष्ट्रपति परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेंगे कि टैरिफ लगाया जाए या नहीं और यदि लगाया जाए तो उसकी दर कितनी हो।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रियायती दरों पर रूस से कच्चे तेल का आयात काफी बढ़ाया। इससे भारत का ऊर्जा आयात बिल नियंत्रित रखने में मदद मिली। भारत लगातार यह कहता रहा है कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। तेल खरीद पूरी तरह राष्ट्रीय हित में की जाती है। भारत किसी एक देश पर निर्भर नहीं है। विदेश नीति रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांत पर आधारित है।
यदि भविष्य में यह विधेयक कानून बनता है और राष्ट्रपति वास्तव में भारत पर ऊंचे टैरिफ लागू करते हैं, तो इसका असर केवल ऊर्जा व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा। इससे भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में तनाव, ऊर्जा आयात की लागत बढ़ने की आशंका, भारत के निर्यातकों पर अतिरिक्त दबाव, रणनीतिक साझेदारी पर राजनीतिक असर और रूस से ऊर्जा खरीद की नीति पर नए सवाल खड़े हो सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और अमेरिका के व्यापक रक्षा, तकनीकी और इंडो-पैसिफिक सहयोग को देखते हुए किसी भी निर्णय में रणनीतिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश की जाएगी।
बहरहाल, अमेरिकी सीनेट का यह विधेयक बदलती रणनीति का एक संकेत है, जिसमें रूस पर सीधे प्रतिबंधों से आगे बढ़कर उसके प्रमुख ऊर्जा खरीदारों पर आर्थिक दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। भारत के सामने चुनौती दोहरी है। एक ओर उसे अपनी ऊर्जा जरूरतों को किफायती ढंग से पूरा करना है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी भी बनाकर चलना है। भले ही अभी यह विधेयक कानून नहीं बना है और भारत पर 100% टैरिफ तत्काल लागू नहीं हुए हैं। लेकिन संभावित अमेरिकी नीति और बढ़ते कूटनीतिक दबाव के संकेत के रूप में देखना जरूरी होगा।




