Jharkhand Assembly Election Results 2024 : झारखंड में बीजेपी का दांव आखिरकार उल्टा पड़ ही गया। कांग्रेस और राजद के साथ गठबंधन में चुनाव लड़कर हेमंत सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा को सरकार बनाने के लिए एक बार फिर से जनादेश मिल गया है। 23 नवंबर 2024 को आए नतीजों में झामुमो गठबंधन यानी इंडिया ब्लॉक ने 81 विधानसभा सीटों में से 56 सीटें हासिल कीं। मतलब बहुमत से 15 सीटें ज्यादा। अकेले झामुमो के खाते में 34 सीटें गईं। भाजपा गठबंधन सिर्फ 24 सीटें जीत सका। मतलब बहुमत से 13 सीटें कम। हालांकि, झामुमो का वोट शेयर 23.47% है, जबकि भाजपा का वोट शेयर लगभग 10 प्रतिशत ज्यादा 33.20% है।

चुनाव नतीजे आने के बाद झारखंड चुनाव के लिए 50% एग्जिट पोल गलत साबित हुए। विधानसभा चुनाव की वोटिंग खत्म होने के बाद झारखंड में 8 एग्जिट पोल आए थे। इनमें से 4 में भाजपा गठबंधन, जबकि 2 में इंडिया गठबंधन की सरकार बनने का अनुमान जताया गया था। बाकी 2 एग्जिट पोल्स ने हंग असेंबली के आसार जताए थे। एक्सिस माइ इंडिया का एग्जिट पोल सबसे सटीक रहा जिसने इंडिया ब्लॉक को 53 सीटें और एनडीए गठबंधन को 25 सीटें दी थी।
इस चुनाव की एक और खास बात यह रही कि बीजेपी ने नई सीट जीतने पर फोकस किया था। हालांकि इसमें बीजेपी ने 11 नई सीटें तो जीतीं लेकिन 15 ऐसी सीटें गंवा दीं जहां 2019 में जीत मिली थी। दूसरी तरफ हेमंत सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा ने 30 में से 26 सीटें बरकरार रखीं। इसके अलावा 8 नई सीटें भी जीतीं। कांग्रेस ने 16 में से 11 सीटें बरकरार रखी और 5 नई सीटें भी जीतीं।
बीजेपी को सबसे ज्यादा नुकसान अपने गढ़ माने जाने वाले छोटा नागपुर इलाके में हुआ है। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी यहीं से आते हैं। इसके अलावा आदिवासी बहुल संथाल परगना में बीजेपी लगभग साफ हो गई है। यहां की 18 सीटों में से बीजेपी सिर्फ एक सीट जीत पाई। चंपाई सोरेन के इलाके कोल्हान में बीजेपी ने 2 नई सीटें जीती हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने आदिवासी बहुत संथाल परगना और कोल्हान का गढ़ बरकरार रखा, साथ ही छोटा नागपुर इलाके में 6 नई सीटें जीत लीं। हेमंत सोरेन को मिले इस जनादेश के पीछे इन वजहों का बड़ा योगदान रहा।
1. आदिवासियों को भरोसा दिलाया कि ये उनकी सरकार है : झारखंड में चुनाव जीतने के लिए आदिवासी बाहुल्य 28 सीटों को जीतना जरूरी होता है। हेमंत सोरेन ने पूरे कार्यकाल के दौरान इन सीटों पर पकड़ बनाए रखी। कभी भी आदिवासियों को नाराज नहीं होने दिया। दो साल पहले जब नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज का विरोध हुआ तो हेमंत ने इनपर ताला लगवा दिया। सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए कैंप लगाए। भले ही काम छोटे थे, लेकिन जब लोगों का काम हुआ तो उन्होंने इसे खूब प्रचारित किया। बीजेपी और आरएसएस आदिवासियों को हिंदू मानते हैं, लेकिन झारखंड के आदिवासी खुद को ‘सरना’ मानते हैं। वो चाहते हैं कि सरकारी दस्तावेज में उनके धर्म के आगे ‘सरना’ लिखा जाए। जेएमएम ने चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया है कि वो झारखंड में सरना धर्म को लागू करेगी। नवंबर 2020 में हेमंत सोरेन सरकार ने विधानसभा में एक दिन का विशेष सत्र बुलाकर जनगणना में ‘सरना’ को अलग धर्म के रूप में शामिल करने का प्रस्ताव पारित किया। जेएमएम ने आदिवासी वोटरों को भरोसा दिलाया कि धर्म वाले कॉलम का सपना जेएमएम ही पूरा कर सकती है। कहने का मतलब यह कि हेमंत सोरेन आदिवासियों को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहे कि ये उनकी सरकार है।
2. मइयां सम्मान योजना ने पलट दिया खेल : सीएम हेमंत सोरेन ने विधानसभा चुनाव से चार महीने पहले मइयां सम्मान योजना शुरू की थी। इसके तहत पहले एक हजार रुपए महीने दिए जाते थे। बीजेपी ने दांव खेला और गोगो दीदी योजना के तहत हर महीने की 11 तारीख को 2100 रुपए देने का वादा किया था। पलटवार करते हुए हेमंत सोरेन ने विधानसभा चुनाव की घोषणा से ठीक पहले 14 अक्टूबर को मंईयां सम्मान योजना की राशि 1000 रुपए से बढ़ाकर 2500 रुपए करने का प्रस्ताव कैबिनेट से पास कर दिया और चुनाव से पहले एक किस्त भी दे दी। हेमंत सोरेन का यह दांव गेमचेंजर साबित हुआ। महिला वोटर पूरी तरह से जेएमएम और इंडिया गठबंधन के पक्ष में आ गया।
3. किसानों का 400 करोड़ का कर्जा माफ : मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सितंबर में राज्य के किसानों का 2 लाख रुपए तक का कर्ज माफ करने का ऐलान कर दिया। इससे झारखंड के 1 लाख 76 हजार 977 किसानों को सीधा फायदा हुआ। इसके लिए 400.66 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ सरकार पर पड़ा। साथ ही हेमंत सरकार ने राज्य में हर महीने 200 यूनिट तक बिजली खपत करने पर कोई बिजली बिल नहीं लेने का फैसला किया। कुल मिलाकर इससे राज्य के 45 लाख 77 हजार 616 बिजली उपभोक्ताओं को फ्री बिजली मिली। इसके अलावा अगस्त 2024 तक की बकाया बिल की राशि भी माफ कर दी। झारखंड देश के उन पांच राज्यों में से एक है, जहां ओल्ड पेंशन स्कीम लागू है। इस स्कीम से 1.16 लाख कर्मचारियों को फायदा मिला है।
4. हेमंत की गिरफ्तारी को आदिवासी अस्मिता से जोड़ा गया : हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी एक बड़ा फैक्टर साबित हुई। झारखंड आंदोलन के पीछे का मकसद अलग आदिवासी राज्य था। जेएमएम ने चुनाव में हेमंत की गिरफ्तारी को झारखंड और आदिवासी अस्मिता का मुद्दा बना लिया। इस रणनीति से न केवल जेएमएम एकजुट हुई, बल्कि हेमंत की छवि भी वोटरों में मजबूत हुई। जेएमएम ने दावा किया कि ईडी और सीबीआई की कार्रवाई झारखंड की चुनी हुई सरकार और आदिवासी नेतृत्व को कमजोर करने की साजिश है। इससे झारखंड का वोटर प्रभावित हुआ और उसने फिर हेमंत सोरेन पर भरोसा जताया।




