नरेंद्र मोदी सरकार ने IDBI बैंक में अपनी और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की कुल 60.72 फीसदी हिस्सेदारी कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स से जुड़ी कंपनी को बेचने की मंजूरी दे दी है। 14 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने 52,878 करोड़ रुपये के इस सौदे को हरी झंडी दी। इसके तहत सरकार की 30.48 फीसदी और LIC की 30.24 फीसदी हिस्सेदारी बेची जाएगी। सौदे के बाद सरकार के पास 15 फीसदी और LIC के पास 19 फीसदी हिस्सेदारी बचेगी।
सरकार इसे बैंकिंग क्षेत्र के पुनर्गठन और निजी पूंजी के लिए नए अवसर के तौर पर पेश कर रही है। क्योंकि साल 2022 में एअर इंडिया को बेचे जाने के बाद सरकार का यह सबसे बड़ा विनिवेश है और रकम के लिहाज से एअर इंडिया के ₹18 हजार करोड़ के सौदे से लगभग तीन गुना बड़ा। लेकिन इस चमकदार घोषणा के पीछे एक बुनियादी सवाल भी खड़ा है कि जिस बैंक को संकट से उबारने में सार्वजनिक धन लगा, उसकी हालत सुधरने और मुनाफा कमाने के बाद उसका नियंत्रण निजी हाथों में सौंपने का औचित्य क्या है? और सबसे बढ़कर, इस फैसले में जनता के हित का हिसाब कहां है?
इस सौदे को केवल 52,878 करोड़ रुपये की बड़ी रकम के चश्मे से देखना सरकार की सुविधा के हिसाब से पूरी कहानी पढ़ने जैसा होगा। सरकार को बिक्री से कितनी रकम मिलेगी, यह जानना जरूरी है। लेकिन उतना ही जरूरी यह जानना है कि इस संपत्ति को खड़ा करने, इसके संकट को संभालने और इसकी वित्तीय हालत सुधारने में सार्वजनिक संसाधनों की कितनी कीमत लगी। क्या सरकार ने केवल निवेश और बिक्री मूल्य का अंतर निकालकर अपना काम पूरा मान लिया है? क्या इस गणना में समय के साथ पैसे की कीमत में आया बदलाव, पहले से मौजूद सरकारी हिस्सेदारी की लागत, LIC को मिले लाभांश, बैंक की भावी कमाई और उसे अपने पास रखने की संभावित लागत शामिल है? जब तक इन सवालों के जवाब एक साथ सार्वजनिक नहीं किये जाते, तब तक यह कहना जल्दबाजी होगी कि सौदा जनता के लिए कितना लाभकारी है।
IDBI बैंक की बदहाली कोई काल्पनिक कहानी नहीं थी। खराब ऋृणों और लगातार घाटे ने उसे गंभीर संकट में पहुंचा दिया था। भारतीय रिजर्व बैंक ने मई 2017 में बैंक को त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई यानी प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (PCA) के दायरे में रखा था। उस समय बैंक के कामकाज पर प्रतिबंध लगाए गए थे। बाद में वित्तीय हालत सुधरने पर मार्च 2021 में ये प्रतिबंध हटा दिए गए। सरकार के अपने दस्तावेज बताते हैं कि बैंक को संकट से उबारने के लिए सरकार और LIC को पूंजी लगानी पड़ी थी। यानी जब जोखिम बड़ा था, तब सार्वजनिक संसाधनों की भूमिका अहम थी।
अब तस्वीर बदल चुकी है। बैंक के सकल गैर-निष्पादित ऋृण यानी NPA का अनुपात सितंबर 2018 के 31.78 फीसदी से घटकर मार्च 2026 में 2.32 फीसदी रह गया। यह कोई मामूली सुधार नहीं है। यह बताता है कि संकटग्रस्त बैंक की वित्तीय स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर बैंक को सुधारने के लिए सार्वजनिक पूंजी की जरूरत थी, तो उसकी सुधरी हुई स्थिति का लाभ जनता को किस रूप में मिलेगा? क्या सार्वजनिक हिस्सेदारी बेच देना ही सुधार का स्वाभाविक अंतिम चरण है? या बैंक को मजबूत बनाकर उसके मुनाफे का इस्तेमाल सार्वजनिक बैंकिंग व्यवस्था और अर्थव्यवस्था की जरूरतों के लिए भी किया जा सकता था?
सरकार के सामने निजीकरण के पक्ष में कई तर्क मौजूद हैं। निजी निवेश से नई पूंजी, तकनीक और प्रबंधन क्षमता आ सकती है। सरकार यह भी कह सकती है कि उसे हर व्यावसायिक संस्था का संचालन अपने हाथ में रखने के बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत ढांचे और दूसरी सार्वजनिक जरूरतों पर ध्यान देना चाहिए। ये तर्क अपने आप में खारिज नहीं किए जा सकते। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी संस्था का स्वामित्व बदलना ही उसकी दक्षता बढ़ाने का एकमात्र रास्ता है? और अगर सरकार ने बेचने का फैसला कर ही लिया है, तो क्या उसने यह सार्वजनिक किया है कि बैंक को आगे अपने पास रखने और निजी नियंत्रण सौंपने के बीच तुलनात्मक लाभ-हानि का आंकलन कैसे किया गया?
सरकार की जवाबदेही यहीं से शुरू होती है। बिक्री की रकम को निवेश से ऊपर बताकर मुनाफे का दावा करना आसान है। लेकिन सार्वजनिक संपत्ति का मूल्यांकन केवल उसके अतीत में लगाए गए धन से नहीं होता। उसके वर्तमान कारोबार, भविष्य की आय, बाजार में स्थिति और उस सार्वजनिक भूमिका को भी समझना पड़ता है, जिसे वह निभा सकती है। अगर बैंक आने वाले वर्षों में कमाई करता, तो उस कमाई का लाभांश सार्वजनिक हिस्सेदारों को भी मिलता। दूसरी ओर, भविष्य की कमाई निश्चित नहीं है; बैंक को पूंजी, तकनीक और जोखिम प्रबंधन में निवेश की जरूरत भी पड़ सकती है। इसलिए असली सवाल बिक्री के पक्ष या विपक्ष में नारा लगाने का नहीं, बल्कि दोनों विकल्पों का पारदर्शी और विश्वसनीय आंकलन सामने रखने का है।
सौदे की कीमत को लेकर भी सार्वजनिक बहस जरूरी है। सरकार ने जिस कीमत पर बिक्री को मंजूरी दी है, उसके मुताबिक प्रति शेयर मूल्य 81 रुपये है। सरकार के अनुसार, बोली की तुलना के लिए निर्धारित मूल्य 75.99 रुपये प्रति शेयर था और सफल बोली उससे अधिक रही। लेकिन बाजार में शेयर का भाव और किसी बैंक के नियंत्रणकारी हिस्से का दीर्घकालिक मूल्य एक ही चीज नहीं हैं। ऐसे में जनता को यह जानने का अधिकार है कि स्वतंत्र मूल्यांकन में बैंक की भविष्य की कमाई, जोखिम, संपत्ति, देनदारियों और नियंत्रण बदलने से पैदा होने वाले लाभ का कितना हिसाब लगाया गया। प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया होना महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रक्रिया की मौजूदगी अपने आप में यह साबित नहीं करती कि जनता को अधिकतम संभव मूल्य मिला है।
इस सौदे में एक और पहलू है, जिसे केवल शेयर बाजार की भाषा में नहीं समझा जा सकता। बैंक सिर्फ जमा और कर्ज का कारोबार करने वाली मशीन नहीं है। बैंकिंग व्यवस्था छोटे कारोबारियों, किसानों, वेतनभोगियों और उन लोगों की आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी है, जिनके लिए सस्ती और सुलभ बैंकिंग जरूरी है। किसी बैंक की ग्रामीण शाखाओं, छोटे कर्जदारों तक पहुंच और सार्वजनिक योजनाओं को लागू करने की क्षमता का महत्व भी है। यह मान लेना ठीक नहीं कि निजी प्रबंधन आते ही ये सारी जिम्मेदारियां खत्म हो जाएंगी। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि सरकार साफ बताए कि नियंत्रण हस्तांतरण के बाद किन सार्वजनिक दायित्वों को कैसे सुरक्षित रखा जाएगा और उनकी निगरानी कौन करेगा।
सरकार और LIC की कुल हिस्सेदारी सौदे के बाद 34 फीसदी रह जाएगी। इसका मतलब साफ है कि मालिकाना हक का केंद्र बदलने जा रहा है, भले ही सार्वजनिक संस्थाओं की हिस्सेदारी पूरी तरह समाप्त नहीं होगी। इसलिए बैंक के भविष्य को लेकर कुछ बुनियादी प्रश्नों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए। क्या शाखाओं और सेवाओं से जुड़ी कोई बाध्यकारी शर्त होगी? कर्मचारियों के हितों की रक्षा कैसे होगी? छोटे कर्जदारों और कम लाभ वाले क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं की निरंतरता कैसे सुनिश्चित की जाएगी? ग्राहक शिकायतों और सेवा की गुणवत्ता की निगरानी किस तरह होगी? नियामकीय निगरानी के अलावा, क्या ऐसे सार्वजनिक दायित्वों के लिए स्पष्ट और मापने योग्य मानक भी तय किए गए हैं?
गौर करने की बात यह भी है कि IDBI की बिक्री का असर इस एक बैंक तक सीमित नहीं रहेगा। 2021 के केंद्रीय बजट में सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के दो बैंकों के निजीकरण की मंशा भी जाहिर की थी। लेकिन संभावित बैंकों के नामों को लेकर चर्चाओं और किसी औपचारिक सरकारी निर्णय में अंतर है। इसलिए किसी दूसरे बैंक की बिक्री को तय मान लेना सही नहीं होगा। फिर भी IDBI का सौदा भविष्य में सार्वजनिक बैंकिंग के बारे में होने वाली बहस की महत्वपूर्ण कसौटी बनेगा। यदि सरकार इसे सफल सुधार का उदाहरण बताती है, तो उसे इसके आर्थिक परिणामों और सार्वजनिक हित पर असर का पूरा मूल्यांकन भी सामने रखना चाहिए।
यहां सवाल निजी पूंजी के विरोध का नहीं है। सवाल यह है कि सार्वजनिक धन से संकट झेलने वाली संस्था को सुधारने के बाद उसके नियंत्रण के हस्तांतरण का फैसला किस कसौटी पर लिया गया। क्या सरकार ने निवेश की तारीखों और वास्तविक लागत का पूरा ब्यौरा दिया है? क्या लाभांश और भविष्य की संभावित आय को शामिल करके सार्वजनिक हिस्सेदारी का मूल्यांकन किया गया है? क्या बिक्री की रकम के इस्तेमाल और उससे मिलने वाले सार्वजनिक लाभ का स्पष्ट खाका मौजूद है? और क्या बैंक की सामाजिक जिम्मेदारियों को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त शर्तें तय की गई हैं?
लोकतंत्र में सरकार को सार्वजनिक संपत्ति के बारे में फैसले लेने का अधिकार है, लेकिन उस अधिकार के साथ जवाबदेही भी आती है। जनता के संसाधनों से जुड़ा कोई बड़ा फैसला केवल प्रेस विज्ञप्ति, बिक्री की रकम और सुधार के दावों के सहारे अंतिम रूप से उचित नहीं ठहराया जा सकता। उसे आंकड़ों, तुलनात्मक मूल्यांकन और सार्वजनिक हित की स्पष्ट कसौटियों पर परखा जाना चाहिए।
IDBI बैंक की बिक्री इसलिए एक साधारण विनिवेश सौदा नहीं है। यह उस आर्थिक नीति की परीक्षा भी है, जिसमें सरकार संकट के समय सार्वजनिक पूंजी का सहारा लेती है और सुधार के बाद निजी नियंत्रण को आगे बढ़ाती है। यदि यह फैसला वास्तव में जनता के हित में है, तो उसका प्रमाण भी जनता के सामने रखा जाना चाहिए। सवाल यह नहीं कि बैंक कितने में बिका; सवाल यह है कि जनता की संपत्ति, उसकी भावी कमाई और उसकी सार्वजनिक भूमिका का पूरा मूल्यांकन किए बिना सरकार जनता के फायदे का दावा कैसे कर सकती है?




