नई दिल्ली। आगामी 5 फरवरी को होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए आम आदमी पार्टी (AAP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच जोर-शोर से पोस्टर पॉलिटिक्स जारी है। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में पोस्टर पॉलिटिक्स या कहें पोस्टर वॉर की रणनीति, राजनीतिक और सामाजिक परिपेक्ष्य में एक खतरनाक दिशा की ओर इशारा करती है। आज यह सिर्फ चुनावी प्रचार का एक तरीका नहीं रह गया है, बल्कि यह विभिन्न राजनीतिक दलों की मानसिकता, चुनावी उद्देश्यों और उनके सामाजिक संदेश को विकृत तरीके से जनता तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण जरिया भी बन गया है।
इस चुऩावी विश्लेषण में हम दिल्ली विधानसभा चुनाव में पोस्टर वॉर की गहराई से समीक्षा करेंगे और उसके विभिन्न पहलुओं पर विचार करेंगे। लेकिन उससे पहले एक नजर राजनीतिक दलों के उन पोस्टरों पर डालेंगे कि इस चुनावी पोस्टर वॉर में कौन किस स्तर तक नीचे गिर रहा है…
आम आदमी पार्टी (आप) के पोस्टर में इस बार भाजपा नेताओं के साथ-साथ कांग्रेस नेता राहुल गांधी और संदीप दीक्षित की भी तस्वीर नजर आई। आप ने दोनों को बेइमानों की सूची में दिखाया। आप ने पहली बार राहुल गांधी पर भी पोस्टर के जरिए निशाना साधा। वहीं, भाजपा ने एक्स पर शेयर किए पोस्टर में आप नेताओं को गुंडा कहा है। इसमें अरविंद केजरीवाल, ताहिर हुसैन, अमानतुल्लाह खान, नरेश बाल्यान, मोहिंदर गोयल, संजय सिंह, सोमनाथ भारती, ऋतुराज झा, अखिलेश पति त्रिपाठी के नाम हैं। मनीष सिसोदिया को इस पोस्टर से बाहर रखा गया है।
7 जनवरी को आप ने अमित शाह को चुनावी मुसलमान बताया था। चुनावी हिंदू वाले पोस्टर के जवाब में चुनावी मुसलमान का पोस्टर जारी किया है। इसमें अमित शाह टोपी पहने दिखाई दे रहे हैं। पोस्टर में लिखा है- कभी सोचा है बीजेपी को चुनाव आते ही मुसलमानों की इतनी याद क्यों आती है।
इससे पहले 4 जनवरी को भाजपा ने एक पोस्टर में कहा था- दिल्ली के राजा बाबू ने आम आदमी बनकर ठगा। भाजपा ने आप संयोजक अरविंद केजरीवाल को ‘दिल्ली का राजा बाबू’ कहा था। पोस्टर पर लिखा था- आप प्रजेंट्स- करोड़ों का शीशमहल। पोस्टर में 1994 में आई गोविंदा की फिल्म राजा बाबू के गेटअप में केजरीवाल को दिखाकर सीएम आवास पर हुए खर्च को दिखाया गया था।
इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 3 जनवरी को दिल्ली चुनाव प्रचार के दौरान दिल्ली की आप सरकार को आप-दा सरकार बताया था। उन्होंने कहा था कि सत्ता में खुद को कट्टर बेईमान बताने वाले लोग बैठे हैं जो खुद शराब घोटाले के आरोपी हैं। ये चोरी भी करते हैं और सीनाजोरी भी। पीएम ने इस चुनाव के लिए नारा दिया कि आपदा को हटाना है, भाजपा को लाना है। इसके बाद दिल्ली भाजपा ने फिल्म पुष्पा के फेमस डायलॉग फ्लावर नहीं फायर है मैं को रीक्रिएट करते हुए लिखा- आप नहीं आप-दा है मैं। पोस्टर में केजरीवाल को पुष्पा के स्टाइल में दिखाया गया था।
पीएम मोदी की तरफ से केजरीवाल को आपदा कहे जाने के बाद अरविंद केजरीवाल ने कहा कि आपदा दिल्ली में नहीं भाजपा में आई हुई है। भाजपा के पास न तो सीएम का चेहरा है और न ही एजेंडा। इसके बाद आप ने सोशल मीडिया पर अमित शाह को लेकर एक पोस्टर जारी किया। इसमें लापता लेडीज फिल्म के पोस्टर की तर्ज पर अमित शाह को लापता दूल्हा बता दिया गया।
इससे पहले 2 जनवरी को भाजपा ने हर्षद मेहता पर बनी वेब सीरीज स्कैम के पोस्टर पर केजरीवाल का फोटो लगाया था। कैप्शन में लिखा था- दिल्ली में केजरीवाल का नया खेल! वोटों का फर्जीवाड़ा करके सत्ता बचाने की कोशिश। मकान मालिक को नहीं पता और उसके घर के पते पर सैकड़ों वोट बना दिया था इस ठग ने वो भी एक विशेष समुदाय का (और नए वोटर की उम्र- 40 साल से लेकर 80 साल तक)।
पिछल साल 31 दिसंबर को भाजपा ने एक्स पर एक पोस्टर जारी कर इसमें अरविंद केजरीवाल को भूल-भुलैया फिल्म के छोटा पंडित (राजपाल यादव) के किरदार में दिखाया था। भाजपा ने उन्हें चुनावी हिंदू तक बता दिया था। पोस्टर पर भाजपा ने लिखा- चुनावी हिंदू केजरीवाल जो 10 साल से इमामों को सैलरी बांटता रहा, जो खुद और उनकी नानी प्रभु श्रीराम का मंदिर बनने से खुश नहीं थे, जिसने मंदिर और गुरुद्वारों के बाहर शराब के ठेके खोले, जिसकी पूरी राजनीति हिन्दू विरोधी रही उसे अब चुनाव आते ही पुजारियों और ग्रंथियों की याद आई?
पोस्टरों का राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
दिल्ली, जो अपने विविधतापूर्ण सामाजिक और बड़े शहरी ढांचे के लिए जानी जाती है, एक विशेष स्थान है जहां चुनावी प्रचार के लिए पोस्टरों का उपयोग बेहद प्रभावशाली साबित होता दिख रहा है। पोस्टर एक कम लागत वाला, लेकिन प्रभावी तरीका है, जो जनसमूह तक जल्दी और आसानी से अपना संदेश देने में कामयाब होता है। दिल्ली जैसे महानगरीय समाज में, जहां विभिन्न वर्ग, धर्म, और जातियां एक साथ बसी हुई हैं, पोस्टर वॉर चुनाव प्रचार का एक सशक्त माध्यम बन गए हैं।
पोस्टर वॉर में व्यक्तिगत हमले और संघर्ष
पोस्टर वॉर का एक विवादास्पद पहलू यह है कि इसमें अक्सर व्यक्तिगत हमलों का सहारा लिया जाता है। विरोधी पार्टियां एक-दूसरे के नेताओं को न केवल उनके कार्यों के आधार पर, बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर भी निशाना बनाती हैं। यह न केवल चुनावी नैतिकता पर सवाल उठाता है, बल्कि समाज में तनाव और नफरत को भी बढ़ावा देता है। इस रिपोर्ट में हमने ऊपर पोस्टर वॉर की जिन घटनाओं का जिक्र किया है उससे आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं।
पोस्टरों के माध्यम से चुनावी प्रचार केवल राजनीति से जुड़ा नहीं होता, बल्कि यह समाज की मन:स्थिति पर भी अपना असर डालती है। दिल्ली जैसे बड़े शहर में, जहां लोग व्यस्त होते हैं और चुनावी प्रचार के अन्य पारंपरिक तरीकों से जुड़ पाना मुश्किल होता है, पोस्टर एक प्रभावी उपाय बन गया है। रंगों, डिज़ाइन और संदेशों का चुनाव इस बात का ध्यान रखकर किया जाता है कि हर पोस्टर अपने लक्ष्य तक आसानी से पहुंचे और राजनीतिक दलों के संदेश को असरदार तरीके से लोगों तक पहुंचाए।
चुनावी नैतिकता और सोशल मीडिया का प्रभाव
पोस्टर वॉर में नैतिकता का सवाल भी उठता है। कई बार पोस्टरों में अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया जाता है, जो न केवल समाज में नफरत फैलाता है, बल्कि चुनावी प्रक्रिया को भी सवालों के घेरे में ला देता है। इसके अलावा, डिजिटल मीडिया के उदय के साथ, पोस्टरों का प्रभाव अब केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहा। सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर भी पोस्टरों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है, जो विशेष रूप से युवा मतदाताओं तक पहुंचने के लिए एक नया और प्रभावी रास्ता बन चुका है।
जहां एक ओर पोस्टर वॉर राजनीतिक दलों के प्रचार के लिए एक सशक्त उपकरण साबित हो रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके कुछ नकरात्मक पहलू भी हैं। चुनावी प्रचार को शांति और सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ाना जरूरी है। इसके लिए जरूरी है कि चुनावी प्रचार में जातिवाद या सांप्रदायिक तनाव फैलाने वाली सामग्री के प्रयोग पर पाबंदी को लेकर चुनाव आयोग को अपनी भूमिका निभानी चाहिए। इसके साथ ही, चुनाव आयोग को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि पोस्टरों का इस्तेमाल सही दिशा में हो और वह चुनावी नियमों के तहत हो। किसी भी पार्टी को पोस्टर के जरिए व्यक्तिगत हमला करने या गलत प्रचार करने का अवसर नहीं मिलना चाहिए।
बहरहाल, दिल्ली विधानसभा चुनाव में पोस्टर वॉर केवल चुनावी प्रचार का एक तरीका नहीं रह गया है, बल्कि यह एक जटिल राजनीतिक और सामाजिक तमाशा बन चुका है। यह राजनीतिक दलों की रणनीतियों, उनके संदेशों और उनके समाज में प्रभाव को दर्शाता है। हालांकि, इस प्रचार के सकारात्मक पहलुओं के साथ-साथ इसके नकरात्मक पहलुओं को भी समझने और सुधारने की जरूरत है, ताकि यह लोकतंत्र की भावना को प्रोत्साहित करने का काम कर सके, न कि समाज में विभाजन और तनाव का कारण बने।




