नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च विधायी संस्थाओं में से एक राज्यसभा में आपराधिक मामलों का सामना कर रहे सांसदों की संख्या को लेकर एक नई रिपोर्ट ने भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चुनावी सुधारों के लिए काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और नेशनल इलेक्शन वॉच (NEW) के संयुक्त विश्लेषण के अनुसार, वर्तमान राज्यसभा सांसदों में लगभग 31 प्रतिशत सांसदों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की घोषणा की है, जबकि 16 प्रतिशत सांसद गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि राज्यसभा में धनबल का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। विश्लेषण के अनुसार, वर्तमान सांसदों में 14 प्रतिशत अरबपति (बिलियनेयर) हैं, जो भारतीय राजनीति में बढ़ती आर्थिक असमानता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्वरूप पर नई बहस को जन्म देता है।
ADR द्वारा सांसदों के चुनावी शपथपत्रों के आधार पर तैयार की गई इस रिपोर्ट के अनुसार, राज्यसभा के लगभग एक-तिहाई सदस्य ऐसे हैं जिन्होंने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की जानकारी दी है। इनमें हत्या का प्रयास, महिलाओं के खिलाफ अपराध, भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और अन्य गंभीर धाराओं से जुड़े मामले भी शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल राज्यसभा तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में लोकसभा और विभिन्न राज्य विधानसभाओं में भी आपराधिक मामलों वाले जनप्रतिनिधियों की संख्या बढ़ी है। चुनाव सुधारों की मांग करने वाले संगठन लंबे समय से इस प्रवृत्ति को भारतीय लोकतंत्र के लिए चिंताजनक बताते रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, कुल सांसदों में 16 प्रतिशत ने गंभीर आपराधिक मामलों की घोषणा की है। गंभीर मामलों में वे अपराध शामिल हैं जिनमें पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, अथवा जो हत्या, अपहरण, यौन अपराध, सांप्रदायिक हिंसा या भ्रष्टाचार जैसे आरोपों से जुड़े हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह आंकड़ा बताता है कि राजनीतिक दल चुनाव जीतने की क्षमता को उम्मीदवारों की स्वच्छ छवि पर प्राथमिकता दे रहे हैं। हालांकि भारतीय कानून के तहत केवल आरोप लग जाने से कोई व्यक्ति चुनाव लड़ने से अयोग्य नहीं होता, लेकिन बढ़ते आंकड़े लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर असर डाल सकते हैं।
ADR की रिपोर्ट का दूसरा महत्वपूर्ण निष्कर्ष सांसदों की आर्थिक स्थिति से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्यसभा के लगभग 14 प्रतिशत सांसद अरबपति हैं। राजनीति में धनबल का बढ़ता प्रभाव कोई नया विषय नहीं है, लेकिन राज्यसभा जैसे सदन में बड़ी संख्या में अत्यधिक संपन्न प्रतिनिधियों की मौजूदगी यह सवाल उठाती है कि क्या आम नागरिकों की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व संसद में हो पा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी प्रक्रिया में बढ़ते खर्च और राजनीतिक दलों के संसाधन-आधारित चयन तंत्र ने अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग के लिए राजनीति में प्रवेश आसान बनाया है, जबकि सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले उम्मीदवारों के लिए प्रतिस्पर्धा कठिन होती जा रही है।
ADR और अन्य चुनाव सुधार संगठनों ने समय-समय पर राजनीतिक दलों से ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देने से बचने की अपील की है जिन पर गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट भी कई फैसलों में राजनीतिक दलों को दागी उम्मीदवारों के चयन के कारण सार्वजनिक करने का निर्देश दे चुका है। इसके बावजूद आंकड़े बताते हैं कि स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। राजनीतिक दल यह तर्क देते हैं कि कई मामलों में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण मुकदमे दर्ज किए जाते हैं।
राज्यसभा को देश की संघीय संरचना और राज्यों के हितों की रक्षा करने वाला महत्वपूर्ण सदन माना जाता है। ऐसे में सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामलों और बढ़ती संपत्ति से जुड़े आंकड़े लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता पर बहस को और तेज कर सकते हैं।
ADR की रिपोर्ट एक बार फिर यह सवाल सामने लाती है कि क्या भारतीय राजनीति में चुनावी सफलता की कसौटी जनसेवा और स्वच्छ छवि होनी चाहिए या फिर धनबल और प्रभावशाली राजनीतिक नेटवर्क? आने वाले वर्षों में चुनाव सुधारों की दिशा और राजनीतिक दलों की जवाबदेही इस बहस के केंद्र में रहने वाली है।




