सत्य प्रकाश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की संयुक्त अरब अमीरात और यूरोप के चार देशों (इटली, नीदरलैंड, स्वीडन और नार्वे) की यात्रा ने वैश्विक शक्ति संतुलन के बीच भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को नई मजबूती दी है। ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी साझेदारी, रक्षा सहयोग और व्यापारिक समझौतों के जरिए भारत ने यह स्पष्ट किया है कि वह बदलती विश्व व्यवस्था में अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए एक भरोसेमंद वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है।
प्रधानमंत्री की यह यात्रा ऐसे वक्त में हुई है जब दुनिया के दो दिग्गज और धुर विरोधी देशों के शीर्ष नेता चीन के शी जिनपिंग और अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप एक साथ बैठे और बैठक में कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ सका। ऊर्जा सुरक्षा में भारत के लिए रुस महत्वपूर्ण स्रोत है और यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात से कच्चा तेल खरीदने का दीर्घकालिक समझौता किया। यूरोप के लिए चीन महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता देश है जबकि भारत ने पूर्वी देशों की कंपनियों को लुभाने का प्रयास किया है।
पीएम मोदी की यह यात्रा बहुध्रुवीय विश्व की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है जिसने पश्चिम एशिया और यूक्रेन युद्ध के बीच भारत को भरोसेमंद और मजबूत सहयोगी के रूप में स्थापित करने में सहायता की है। कई देशों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विमान को आसमान में सुरक्षा प्रदान करना और उन्हें सम्मानित करना यह दर्शाता है कि अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में भारत का प्रभाव और स्वीकार्यता बढ़ रही है।
इस यात्रा से यह भी साफ हुआ कि चीन का मुकाबला करने के लिए अमेरिका का और रूस का सामना करने के लिए यूरोप का साथ भारत दे सकता है लेकिन राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता नहीं होगा। भारत की विदेश नीति भारत और भारतीयों के हितों के अनुरूप रहेगी। भारत के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मई 2026 की यह आधिकारिक यात्रा भारत-यूरोप संबंधों को रणनीतिक, आर्थिक और तकनीकी स्तर पर एक नई दिशा देने वाली साबित हुई है। यह दौरा वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत को एक विश्वसनीय और मजबूत वैश्विक साझेदार के रूप में स्थापित करता है। यूरोप की इस यात्रा का प्रभाव लंबे समय तक देखने को मिलेगा।
नॉर्वे यात्रा में भारत-ईएफटीए व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते की समीक्षा की गई। इसके तहत नॉर्डिक देशों से भारत में अगले 15 वर्षों में 100 अरब डॉलर के निवेश और 10 लाख रोजगार सृजन के लक्ष्य को मजबूती मिली है। इस यात्रा ने हाल ही में अंतिम रूप दिए गए भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते के क्रियान्वयन और द्विपक्षीय व्यापार बाधाओं को दूर करने का मार्ग प्रशस्त किया है। भारत और नॉर्वे ने अपने संबंधों को ‘ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ में अपग्रेड किया है। इसके जरिए ग्रीन हाइड्रोजन, नवीकरणीय ऊर्जा, एलएनजी आपूर्ति और पर्यावरण अनुकूल तकनीकों में सहयोग बढ़ेगा। ओस्लो में आयोजित तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन (19 मई 2026) के माध्यम से भारत ने समुद्री सुरक्षा, नीली अर्थव्यवस्था और आर्कटिक क्षेत्र के सतत विकास में अपनी हिस्सेदारी मजबूत की है। नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर के साथ वार्ता में प्रधानमंत्री मोदी ने यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति की आवश्यकता दोहरायी।
स्वीडन ने प्रधानमंत्री मोदी को सर्वोच्च राजकीय सम्मान ‘रॉयल ऑर्डर ऑफ द पोलर स्टार’ प्रदान किया। नॉर्वे ने भी उन्हें विशेष सम्मान दिया। स्वीडन की यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने रिश्तों को ‘रणनीतिक साझेदारी’ के रूप में बढाया, जिसके तहत रक्षा, एआई, सेमीकंडक्टर और अंतरिक्ष क्षेत्र में संयुक्त अनुसंधान को बढ़ावा मिलेगा। नीदरलैंड् के साथ व्यापार एवं कृषि तकनीक में सहयोग पर सहमति जतायी गयी। इस यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आज के दौर में यूरोप, अमेरिका (डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की नीतियों) के इतर भारत को एक बेहद विश्वसनीय, स्थिर और अपरिहार्य आर्थिक और रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रहा है।
इटली के साथ द्विपक्षीय व्यापार को वर्ष 2029 तक 20 अरब यूरो तक पहुंचाने के रोडमैप (संयुक्त रणनीतिक कार्ययोजना 2025-29) को और पुख्ता किया गया। इटली के साथ भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा और ‘स्पार्कल-एयरटेल ब्लू-रमन’ सबमरीन केबल नेटवर्क को सक्रिय कर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करने पर विशेष जोर दिया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यूरोपीय देशों की यात्रा का अमेरिका पर गहरा भू-राजनीतिक और रणनीतिक प्रभाव पड़ा है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अमेरिका लगातार चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए ‘फ्रेंड-शोरिंग’ की वकालत करता रहा है।
स्वीडन और नीदरलैंड जैसी तकनीकी महाशक्तियों के साथ रक्षा, सेमीकंडक्टर और एआई में समझौतों से अमेरिका को यह संकेत गया है कि भारत अब उन्नत तकनीकों के लिए केवल अमेरिकी बाजारों पर निर्भर नहीं है, बल्कि यूरोप के साथ मिलकर एक मजबूत स्वतंत्र समूह बना रहा है। इस यात्रा के दौरान भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को जो ऐतिहासिक गति मिली है, वह अमेरिकी व्यापारिक हितों के लिए एक बड़ी प्रतिस्पर्धा खड़ी कर सकती है। अमेरिका द्वारा यूरोपीय देशों पर लगाए जा रहे संभावित टैरिफ के जवाब में, यूरोप अब भारत को एक बड़े और सुरक्षित बाजार के रूप में देख रहा है, जिससे अमेरिकी निर्यातकों पर दबाव बढ़ेगा।
अमेरिका अक्सर भारत पर यूक्रेन संकट और पश्चिम एशिया के मुद्दों पर पश्चिमी देशों के रुख के साथ पूरी तरह खड़े होने का दबाव बनाता रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने यूरोपीय नेताओं के साथ बैठक में यह साफ कर दिया कि भारत शांति के लिए बातचीत और कूटनीति के अपने स्वतंत्र रास्ते पर कायम रहेगा। यह अमेरिका के ‘गठबंधन आधारित’ कूटनीतिक दबाव को कमजोर करता है।
प्रधानमंत्री मोदी की इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी के बीच हुई वार्ता में इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर को तेजी से आगे बढ़ाने पर सहमति बनी। इटली पहले ही चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ से बाहर हो चुका है। इटली का यह कदम भारत के साथ मिलकर इस नए मार्ग को सक्रिय करना चीन के व्यापारिक एकाधिकार और पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के सामरिक महत्व को सीधी चुनौती देता है। चूंकि इससे कॉरिडोर से चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (बीआरआई ) को टक्कर मिली है। इससे अमेरिका को चीन का प्रभाव रोकने के प्रयासों को संजीवनी मिली है। इटली की यात्रा के दौरान ईएमर्ईसी कॉरिडोर को तेजी से लागू करने पर चर्चा हुई। इसलिए भारत-यूरोप के बीच इस पर बढ़ी सक्रियता का अमेरिका ने स्वागत किया है।
स्वीडिश रक्षा कंपनी ‘साब’ (एसएएबी ) का भारत में पहला 100% एफडीआई-संचालित रक्षा विनिर्माण संयंत्र (कार्ल गुस्ताफ संयंत्र ) लगाना इस बात का प्रमाण है कि भारत रक्षा आयात में विविधता ला रहा है। यह अमेरिकी रक्षा कंपनियों जैसे लॉकहीड मार्टिन, बोइंग के लिए भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगा। इससे अमेरिका को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि भारत अमेरिकी रणनीतिक प्राथमिकताओं जैसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन का मुकाबला करने में एक अहम साझेदार जरूर है, लेकिन वह वैश्विक मंच पर अपनी शर्तों पर अपनी आर्थिक और तकनीकी संप्रभुता को आगे बढ़ाएगा।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस यात्रा का चीन पर गहरा रणनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रभाव पड़ा है। चीन ने इस यात्रा को बहुत गंभीरता से लिया है। इसके जरिए भारत ने यूरोपीय महाद्वीप में चीनी प्रभाव को सीधे तौर पर चुनौती दी है और खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित किया है। यूक्रेन युद्ध और ताइवान तनाव के कारण यूरोपीय कंपनियां चीन पर अपनी अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए ‘डी-रिस्किंग’ नीति अपना रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने यूरोपीय व्यापारिक नेतृत्व को आश्वस्त किया कि भारत एक स्थिर लोकतांत्रिक और विनिर्माण विकल्प है। इससे चीन से फैक्ट्रियों और आपूर्ति श्रृंखला के भारत में स्थानांतरित होने की रफ्तार तेज होगी। नीदरलैंड्स और स्वीडन के साथ भारत ने सेमीकंडक्टर, क्रिटिकल मिनरल्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर महत्वपूर्ण समझौते किए हैं। स्वीडन जैसे देशों ने पहले ही चीनी टेलीकॉम कंपनियों को अपने नेटवर्क से बाहर किया है। अब वे भारत को अपने ‘रिसर्च और टेक पार्टनर’ के रूप में चुन रहे हैं, जिससे इस क्षेत्र में चीन का तकनीकी प्रभाव सीमित हो रहा है।
नॉर्वे में आयोजित तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन के माध्यम से भारत ने आर्कटिक क्षेत्र और समुद्री सुरक्षा में अपनी भूमिका बढ़ाई है। चीन अब तक यूरोप के नॉर्डिक देशों में निवेश के जरिए अपनी पैठ बना रहा था, लेकिन भारत के इस आक्रामक कूटनीतिक कदम ने हिंद-प्रशांत से लेकर यूरोपीय समुद्रों तक चीन को संतुलित करने का काम किया है। स्वीडन की रक्षा कंपनियों का ‘मेक इन इंडिया’ के तहत भारत में अत्याधुनिक सैन्य हथियारों का विनिर्माण चीन के लिए चिंता का विषय है। भारत की बढ़ती सैन्य और तकनीकी क्षमता वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के खिलाफ देश की स्थिति को और मजबूत करती है। इससे साफ है कि भारत केवल अमेरिकी रणनीतियों का हिस्सा बनकर ही चीन का मुकाबला नहीं कर रहा, बल्कि अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का उपयोग करते हुए यूरोप के साथ स्वतंत्र आर्थिक और तकनीकी गठबंधन बना रहा है, जो चीन के वैश्विक दबदबे को सीधे तौर पर कम करता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस यात्रा का रूस पर बहुत ही संतुलित, कूटनीतिक और दूरगामी प्रभाव पड़ा है। यह यात्रा एक ऐसे समय पर हुई है जब यूक्रेन संकट के कारण यूरोपीय देश रूस को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग करने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि भारत रूस का एक पुराना और विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार बना हुआ है। नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर सहित यूरोपीय नेताओं ने यह उम्मीद जताई कि भारत रूस से तेल आयात कम करके उस पर युद्धविराम का दबाव बनाएगा। हालांकि यूरोप ने सार्वजनिक रूप से भारत की अपनी ऊर्जा जरूरतों (रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने) के फैसले का सम्मान किया। यह रूस के लिए राहत की बात है, क्योंकि भारत ने पश्चिमी दबाव के आगे झुके बिना रूस के साथ अपने आर्थिक संबंधों को मजबूत बनाए रखा है।
नॉर्वे और अन्य यूरोपीय देशों ने खुले तौर पर माना है कि भारत के रूस के साथ ‘सीधे और गहरे संबंध’ हैं। यह रुस के लिए कूटनीतिक खिड़की है जिसका प्रयोग किया जा सकता है। यूरोपीय नेताओं ने पीएम मोदी से अपील की है कि वे रूस के साथ अपने प्रभाव का उपयोग यूक्रेन में युद्धविराम और शांति स्थापित करने के लिए करें। इससे रूस के लिए यह साफ हो गया है कि यूरोप भी भारत को एक ऐसे एकमात्र वैश्विक पुल के रूप में देखता है जो दोनों पक्षों के बीच संवाद स्थापित करवा सकता है।
हालांकि रूस भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता रहा है, लेकिन भारत ने यूरोपीय रक्षा फर्मों के साथ हाथ मिलाकर संदेश दिया है कि वह रक्षा तकनीक, एआई, और सेमीकंडक्टर समझौतों के जरिए धीरे-धीरे अपनी सैन्य निर्भरता कम रहा है। नॉर्वे में आयोजित तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में भारत ने आर्कटिक क्षेत्र में अपनी वैज्ञानिक और रणनीतिक भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया। रूस का आर्कटिक क्षेत्र में सबसे बड़ा नियंत्रण है और भारत-रूस पहले से ही आर्कटिक में साथ काम कर रहे हैं, इसलिए नॉर्डिक देशों के साथ भारत का बढ़ता सहयोग रूस के लिए इस संवेदनशील क्षेत्र में एक भू-राजनीतिक संतुलन बनाने का प्रयास करता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यात्रा के पहले चरण में 15 मई 2026 को संयुक्त अरब अमीरात पहुंचे और दोनों देशों के बीच ‘व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ को एक नए युग में प्रवेश कराया है। केवल कुछ घंटों के इस दौरे में भारत और यूएई ने ऊर्जा सुरक्षा, अत्याधुनिक तकनीक, बुनियादी ढांचे और रक्षा जैसे क्षेत्रों में सात बड़े और गेम-चेंजिंग समझौते किए हैं। इस यात्रा के दूरगामी प्रभाव होंगे। भारत की ‘ऊर्जा सुरक्षा’ को अभूतपूर्व मजबूती देने के लिए सामरिक पेट्रोलियम रिजर्व मजबूती देने के लिए भारत की आईएसपीआरएल और अबू धाबी की राष्ट्रीय तेल कंपनी अदनोक के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ। इसके तहत अदनोक भारत के विशाखापत्तनम और चंडीखोल (ओडिशा) स्थित भूमिगत भंडारों में तीन करोड़ बैरल (30 मिलियन बैरल) तक कच्चा तेल स्टोर करेगी। यह वैश्विक संकट या युद्ध की स्थिति में भारत को ऊर्जा बैकअप देगा। इंडियन ऑयल और अदनोक गैस के बीच दीर्घकालिक आपूर्ति समझौता हुआ, जो देश के करोड़ों घरों के लिए रसोई गैस की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करेगा।
यूएई ने इस यात्रा के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था और बैंकिंग क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए सीधे पांच अरब डॉलर के नए निवेश की घोषणा की है। रक्षा और सैन्य औद्योगिक सहयोग में दोनों देशों ने एक नए रक्षा साझेदारी ढांचे पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत अब दोनों देश केवल हथियारों की खरीद-बिक्री नहीं करेंगे, बल्कि सैन्य तकनीक को साझा करेंगे, साइबर रक्षा और सुरक्षित संचार प्रणालियों पर मिलकर काम करेंगे। यह यात्रा दर्शाती है कि पश्चिम एशिया के मौजूदा तनावों के बीच भी भारत और यूएई के रिश्ते पूरी तरह मजबूत और स्थिर हैं। चीन और पाकिस्तान के पारंपरिक प्रभाव को पीछे छोड़ते हुए भारत अब यूएई का सबसे खास रणनीतिक, आर्थिक और डिजिटल साझेदार बनकर उभरा है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)




