चढ़ावे की हेराफेरी : पकड़े गए तो चोर, वरना समझो साधु

राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले में जांच की प्रक्रिया, जवाबदेही, ट्रस्ट की भूमिका और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करते हुए यह लेख बताता है कि आखिर क्यों लगातार बढ़ते जा रहे हैं सवाल।

राधा रमण

एक माह बीत जाने के बावजूद अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला ‘ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता गया’ की मानिन्द लगातार उलझता जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दी गई 15 दिनों की समय सीमा भी समाप्त हो गई। इस बीच उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) को जांच पूरी करने की अवधि बढ़ाकर 15 जुलाई तक कर दी गई थी, हालांकि समय सीमा पूरी हो जाने के बाद भी इस लेख के लिखे जाने तक एसआईटी ने अंतिम रिपोर्ट नहीं सौंपी है। आमतौर पर पहले एफआईआर कराई जाती है, फिर जरूरत पड़ने पर एसआईटी गठित की जाती है।

लेकिन इस मामले में पहले एसआईटी का गठन किया गया, फिर उसकी प्रारंभिक रिपोर्ट आने के बाद एफआईआर दर्ज की गई। जबकि पकड़े गए लोगों से जून के पहले हफ्ते में यानि मामले का खुलासा होने के पहले ही नकदी की बरामदगी करा ली गई थी। यह बात श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य भी मीडिया से बातचीत में बताते हैं। अब सवाल यह कि जांच चढ़ावा चोरी की पड़ताल के लिए हो रही है या मामले को उलझाने के लिए, क्योंकि जांच के दौरान ही राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।

विपक्ष खासकर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, शिवसेना (उद्धव)  और कांग्रेस के कुछ नेता इसके लिए राज्य और केंद्र सरकार पर निशाना साध रहे हैं, तो सत्ताधारी पक्ष के लोग और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मस्जिदों में घपले पर चुप रहने के लिए विपक्ष को कोस रहे हैं। मुद्दे की बात कोई नहीं करता। उत्तर प्रदेश में निकट भविष्य में विधानसभा के चुनाव होने हैं। इसलिए नेताओं में एक-दूसरे पर छींटाकशी का मौका बैठे-बिठाये मिल गया है। सताधारी जमात के कुछ नेता तो यहां तक कहते हैं कि चोरी हमारे अराध्य के मंदिर में हुई है और हम इसकी जांच करा रहे हैं। इसमें विपक्षी दलों को बोलने का कोई हक नहीं है। जांच के बाद जो कसूरवार पाये जाएंगे, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।

उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष सतीश महाना तो चार हाथ आगे जाकर कह रहे हैं कि जिन्होंने श्रद्धापूर्वक दान नहीं दिया था, उन्हीं का पैसा चोरी हुआ है। जिन्होंने श्रद्धापूर्वक दान दिया है और दान का हिसाब नहीं मांग रहे हैं, उनका पैसा सुरक्षित है। पता नहीं महाना जी श्रद्धा मापक यंत्र कहां से खोज लाए हैं। मुझे कहने दीजिए कि यह उनका अहंकार बोल रहा है और अहंकार पतन का कारण बनता है। मंदिर, मस्जिद हो या गिरजाघर, यह किसी की जागीर नहीं होती। इसका निर्माण समाज के सहयोग से होता है। इसलिए समाज के किसी भी तबके को इसकी अव्यवस्था के खिलाफ बोलने और आवाज उठाने का उतना ही हक है। फिर अयोध्या का राममंदिर तो भगवान में आस्था रखनेवाले देश-विदेश के सनातनी लोगों के चंदे से बना है। इसमें दो राय नहीं होनी चाहिए कि इस कुकृत्य से आम जनमानस की आस्था को आघात लगा है।

इस बीच, 6 जुलाई 2026 को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक आयोजित की गई। जो जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक ट्रस्ट के अधिकांश सदस्य महासचिव चंपत राय के इस्तीफे के पक्ष में नहीं थे। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविन्ददेव गिरि कहते हैं कि रामभक्तों की आस्था को ठेस पहुंची है। जो सोचा नहीं जा सकता था, वो काम हो गया। इससे ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को बहुत वेदना हुई है। जब तक न्याय ठीक से नहीं हो जाता, अपराधी पकड़े नहीं जाते, तब तक उनका ट्रस्ट में बने रहना उचित नहीं लगता। उन्होंने अपना त्यागपत्र दिया है।

कहने का तात्पर्य यह कि चढ़ावा चोरी की बात तो ट्रस्ट के लोग भी मानते हैं। नहीं मानते तो एसआईटी बनाने और एफआईआर कराने सामने नहीं आते। लेकिन जवाबदेही कोई नहीं लेना चाहता। यह तो भला हो ट्रस्टी के परासरण का जिन्होंने बैठक में ऑनलाइन जुड़कर स्क्रीन पर संविधान के कुछ पन्ने दिखाते हुए क्लॉज पढ़े। इससे सदस्यों को पता चला कि उनके पास स्वीकार करने या अस्वीकार करने के विचार के लिए ऑप्शन ही नहीं है। ये इस्तीफा देते ही स्वीकार हो गया है। इस तरह चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्र का इस्तीफा स्वीकार किया गया और मंदिर के प्रबंधक गोपाल राव को तत्काल प्रभाव से कार्य से विरत किया गया। ट्रस्टी कृष्णमोहन को ट्रस्ट का कार्यवाहक महासचिव बनाया गया।

बैठक के अगले दिन श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के निवर्तमान महासचिव चंपत राय ने चुप्पी तोड़ी। उन्होंने चढ़ावे की गिनती में गड़बड़ी का ठीकरा डॉ अनिल मिश्र और बैंक अधिकारियों सिर थोप दिया। अजीब लीपापोती चल रही है। कोषाध्यक्ष अपनी जवाबदेही नहीं मानते। वह इस्तीफा देने की बात पर भड़क जाते हैं। चंपत राय अपने को पाक-साफ और बेदाग़ बताते हैं। मंदिर के चढ़ावा गिनती वाले कक्ष की सीसीटीवी रिकार्ड 45 दिन से पहले का नहीं है और उन 45 दिनों में ही चोरी की 70 वारदातें सामने आ गई हैं। एसआईटी की गोपनीय रिपोर्ट जगजाहिर हो रही है।

ट्रस्ट के अनुरोध पर गठित एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट ट्रस्ट के ही एक पदेन सदस्य उत्तर प्रदेश गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव संजय प्रसाद को सौंप दी गई। आखिर चल क्या रहा है ? तभी तो अखिलेश यादव इसे ‘फुनगी को फांसी, शाखाओं को माफी’ की संज्ञा देते हैं। उधर, चढ़ावा चोरी का आरोप लगाने वाले पूर्व विधायक पवन पाण्डेय कहते हैं कि –

अपील भी तुम, दलील भी तुम, गवाह भी तुम, वकील भी तुम।
जिसे भी चाहो हराम कह दो, जिसे भी चाहो हलाल कर दो।।

बहरहाल, श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ इसकी सुनवाई कर रही है। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार, केंद्र सरकार और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को नोटिस जारी किया है। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित एसआईटी से अब तक की जांच की स्टेटस रिपोर्ट मांगी है। साथ ही सरकार से कहा है कि एसआईटी के सदस्यों के बारे में भी बताए।

सुप्रीम कोर्ट ने सीसीटीवी का रिकार्ड भी सुरक्षित रखने के निर्देश दिए हैं, लेकिन रिकार्ड तो महज 45 दिन के ही हैं। चढ़ावे की चोरी कितने दिनों से चल रही है और अब तक कितना माल साफ हुआ, इसका पता कैसे चलेगा? जांच कब तक चलेगी और दोषियों से कितनी रिकवरी होती है तथा उन्हें क्या सजा होती है, इस पर सबकी नजर है। मामले का निस्तारण जितनी जल्दी हो जाए, उतना ही अच्छा है, क्योंकि चुनावी वर्ष में यह चढ़ावा चोरी कहीं योगी आदित्यनाथ के गले की हड्डी न बन जाए। ज्ञात रहे कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही भारत सरकार ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया था। अच्छा है अदालत ही दूध का दूध, पानी का पानी करे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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सत्ता विमर्श डेस्क
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