सुभाष गाताडे
संस्कृत का एक सुभाषित है- एक बिल्ली आंखें बंद करके दूध पीती है और सोचती है कि दुनिया उसे देख नहीं रही है। एक सदी बीत गयी, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से हिन्दुओं के संगठन (इसके बजाए इसे हिन्दू पुरुषों का संगठन कहना वाजिब होगा, क्योंकि इसमें हिन्दू महिलाओं को प्रवेश नहीं मिल सकता) की नींव पड़ी, जब नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, उनके राजनीतिक मार्गदर्शक डॉ. बी एस मुंजे और विनायक दामोदर सावरकर के भाई बाबाराव सावरकर तथा अन्य दो सहयोगियों ने संघ की स्थापना की थी। पिछले ही साल उसके निर्माण की सदी मनाई गयी थी।
आज संघ अपनी कामयाबी के उरूज़ पर कहा जा सकता है, जबकि उसके आनुषंगिक संगठन भारतीय जनता पार्टी के हाथों में सत्ता की बागडोर है और उसके अन्य सहयोगी जमातों के कारिंदे देश के अग्रणी संस्थाओं को नियंत्रित कर रहे हैं। हालांकि यह भी उतना ही सही है कि उसके निर्माण, उसके संचालन और उसकी भूमिका को लेकर वह हमेशा विवादों में रहा है। पिछले दिनों कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियंक खड़गे ने आरएसएस के पंजीकरण, उसके द्वारा किये जा रहे अकूत धन संग्रह और उसके हिसाब-किताब की जब बात उठायी, तब ये सवाल फिर ज़िंदा हो गए। शिक्षा संस्थानों के पाठ्यक्रमों में संघ के प्रभाव में लाये जा रहे बदलावों के बारे में अक्सर बात होती है, मगर इसी क़िस्म की कवायद में संघ अपने अतीत को लेकर भी सक्रिय है- यह बात कम ही लोग जानते हैं।
किसी के सिर पर एक सनक सवार है : ताजमहल या तेजो महालय?
अपनी दिवगंत पत्नी मुमताज़ महल की याद में मुग़ल सम्राट शाहजहां (1592–1666) द्वारा बनाया मकबरा/समाधि जो इंडो-इस्लामिक मुग़ल स्थापत्य कला की मिसाल समझा जाता है और दुनिया भर के यात्रियों के बीच ज़बरदस्त आकर्षण के केंद्र में रहता आया है, उसे लेकर एक बहस हिंदुत्व खेमे द्वारा बीते कई दशकों से चलायी जा रही है, जिसका ज़ोर यह साबित करने पर है कि वह मक़बरा नहीं, बल्कि शिव मंदिर है अर्थात तेजो महालय है। हालांकि आला अदालत से लेकर इतिहासकारों द्वारा इस मनगढ़ंत को बार-बार ख़ारिज किया जाता रहा है, लेकिन हिंदुत्ववादी ताक़तें अपनी संकीर्ण सियासत को आगे बढ़ाने के लिए समय-समय पर उसे उछालती रहती हैं।
याद रहे कि भारतीय सेना से सेवानिवृत्त पी. एन. ओक द्वारा सम्भवतः साठ के दशक में इसे पहले उठाया गया था। अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई में गठित एनडीए के पहले कार्यकाल (वर्ष 2000) के दौरान उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी, जिसमें ताजमहल का इतिहास बदलकर यह घोषित करने की मांग की गई थी कि उसका निर्माण एक हिंदू राजा ने कराया था। संभवतः उस समय का अनुकूल राजनीतिक वातावरण उन्हें और अधिक वैधता प्राप्त करने के लिए प्रेरित कर रहा था, लेकिन वे दुर्भाग्यवश ग़लत साबित हुए। सर्वोच्च न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की खंडपीठ ने इस भ्रामक याचिका को इन टिप्पणियों के साथ खारिज कर दिया : ‘किसी के सिर पर एक सनक सवार है, इसलिए यह याचिका दायर की गई है।’
यह रेखांकित करने योग्य है कि ऐसे झटकों ने इस सज्जन को भारत के ‘वास्तविक इतिहास’ को फिर से लिखने और उसका प्रचार करने के अपने ‘मिशन’ से नहीं रोका, जिसमें वे 1960 के दशक से लगे हुए थे। मराठी जानने वाला कोई भी व्यक्ति इसकी पुष्टि कर सकता है कि उनके लेख वहां की मराठी पत्रिकाओं में तब से प्रकाशित होने लगे थे, जब हिंदुत्व वर्चस्ववादी आंदोलन अभी हाशिए पर था। यह भी भूलना नहीं चाहिए कि आप उसे संकीर्णतावादी चिंतन का नतीजा कहें या सांप्रदायिक विचारों का प्रभाव, लेकिन ओक के ‘विचित्र दावों’ की भी पढ़े-लिखों के एक हिस्से में स्वीकार्यता थी।
यद्यपि पी. एन. ओक के सभी दावे जैसे कि ‘ईसाई धर्म और इस्लाम दोनों हिंदू धर्म से निकले हैं’ या ‘ताजमहल की तरह कैथोलिक वेटिकन, काबा और वेस्टमिंस्टर ऐबी भी कभी शिव के हिंदू मंदिर थे’ या ‘वेटिकन मूलतः एक वैदिक रचना थी, जिसे वाटिका कहा जाता था और पोप का पद भी मूलतः एक वैदिक पुरोहित परंपरा थी’ अथवा भारत में इस्लामी वास्तुकला के उनके पूर्णतः निषेध मुख्यधारा में स्वीकार नहीं किए गए, बल्कि अकादमिक जगत में अस्वीकार कर दिए गए; फिर भी उन्हें हिंदुत्व दक्षिणपंथ में लोकप्रिय समर्थन मिला, जिसने 1980 और 1990 के दशक में नई गति पकड़ी थी।
हिंदुत्व के दायरों के भीतर भी कुछ असहमति के स्वर थे, जिन्होंने ओक की लोकप्रियता को हिंदू कार्यकर्ताओं के बीच ‘घोर अपरिपक्वता’ का संकेत बताया, लेकिन ऐसे स्वर अल्पमत में थे। बेल्जियम के ओरिएंटलिस्ट और इंडोलॉजिस्ट कोएनराड एल्स्ट जो हिंदुत्व के प्रति सहानुभूति रखते हैं उनमें से एक थे। एनआरआई/पीआईओ समुदायों में ओक की ‘स्थायी लोकप्रियता’ का उल्लेख करते हुए और ताजमहल, लाल किला तथा विक्रमादित्य से संबंधित ओक के विभिन्न ‘ऐतिहासिक और भाषाई सिद्धांतों’ का खंडन करते हुए उन्होंने ज़ोर देकर कहा :
“समकालीन हिंदू कार्यकर्ताओं के बीच पी. एन. ओक के सिद्धांतों की लोकप्रियता घोर अपरिपक्वता का संकेत है। यह भारतीय इतिहास में धार्मिक संघर्ष के तथ्यों को लेकर भ्रम के साथ-साथ आत्ममुग्ध लालच और बाहरी लोगों द्वारा निर्मित हर प्रकार की मूल्यवान वस्तु पर हास्यास्पद स्वामित्व का दावा करने की विकृत इच्छा को दर्शाती है (मानो हिंदू धर्म की वास्तविक उपलब्धियां गर्व करने के लिए पर्याप्त न हों)।”
जैसा कि अपेक्षित था, इस आलोचना के बावजूद पी. एन. ओक या उनके विचारों की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई। यदि गहराई से देखा जाए, तो मुस्लिम शासकों द्वारा निर्मित स्मारकों और इमारतों के बारे में हिंदुत्व समर्थकों के अनेक दावों की जड़ें ओक के लेखन में मिलती हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ताजमहल का नाम बदलने संबंधी ओक की याचिका ख़ारिज किए जाने के काफी समय बाद भी, हिंदुत्व परिवार के एक प्रमुख नेता जो कभी संसद सदस्य भी रह चुके थे ने इसी ‘सिद्धांत’ को दोहराया। यह भी याद किया जा सकता है कि जब प्रो. वाई. सुदर्शन राव को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया (2015), तो उन्होंने स्वयं स्वीकार किया था कि वे बीआईएसएस (भारतीय इतिहास संकलन समिति) से जुड़े थे, जो स्वयं ओक द्वारा स्थापित संगठन था।
पी. एन. ओक 1917 -2007) का लगभग दो दशक पहले निधन हो चुका है, लेकिन हिंदुत्व वर्चस्ववादी शक्तियों का आक्रमणकारियों और उपनिवेशवादियों द्वारा तैयार भारत के इतिहास के पक्षपाती और विकृत संस्करणों को सुधारने का उत्साह अब हास्यास्पद स्तर तक पहुंच गया है। स्थिति यह है कि वे हर मस्जिद में शिवलिंग खोजने पर आमादा हैं, जैसा कि कुछ समय पहले उनके संघ के सुप्रीमो ने रेखांकित किया था। हमें यह उपदेश भी दिया जा रहा है कि यह आक्रमणकारी मानसिकता भारत के लिए एक खतरा है।
इतिहास का पुनर्लेखन : अपने घर से ही शुरुआत?
इतिहास के पुनर्लेखन की यह मुहिम स्वयं आरएसएस के अपने इतिहास को भी अछूता नहीं छोड़ पाई है। इस प्रयास की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति हमारे सामने डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (1888–1940), आरएसएस के संस्थापक सदस्य और उसके प्रथम सर्वोच्च नेता, की नई छवि के रूप में दिखाई देती है। उन्हें अब जन्मजात देशभक्त, भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले महान क्रांतिकारियों में से एक, समाज सुधारक, आधुनिक भारत के निर्माता आदि-आदि कहा जा रहा है। यह इस तथ्य की पूरी तरह उपेक्षा करता है कि अपने पूरे जीवन में उन्होंने अपना ध्यान हिंदू एकता के निर्माण, भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने पर दिया। वे औपनिवेशिक विरोधी आंदोलन के दौरान जेल अवश्य गए थे, लेकिन आरएसएस के सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी के सदस्य के रूप में। आज़ादी के पहले संघ का इतिहास इस बात की गवाही देता है कि उन्होंने अपने गुरु बी एस मुंजे (जो हिन्दू महासभा से सम्बद्ध थे), बाबाराव सावरकर आदि के साथ मिलकर 1925 में जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी, उसने कभी भी अपने कार्यकर्ताओं को औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष में शामिल होने का आह्वान नहीं किया।
अनेक मोनोग्राफ, पुस्तकें और पहले प्रकाशित ग्रंथों के संशोधित संस्करण जो हिंदुत्व के प्रति सहानुभूति रखने वाले लेखकों द्वारा लिखे गए हैं भी प्रकाशित हुए हैं, जो उनकी इस नई छवि पर ज़ोर देने का प्रयास करते हैं। वे उनके उथल-पुथल भरे जीवन के कई असुविधाजनक पहलुओं को मिटा देते हैं या उन पर रणनीतिक चुप्पी साध लेते हैं। इसी श्रृंखला में नवीनतम उदाहरण यह है कि उन्हें महाराष्ट्र के पुसद में आयोजित “जंगल सत्याग्रह” का नेता बताया जा रहा है, जिसे कांग्रेस के नेतृत्व वाले सविनय अवज्ञा आंदोलन के एक हिस्से के रूप में आयोजित किया गया था।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि आरएसएस के इतिहास के पुनर्लेखन का सिलसिला अपने परिवार के अंदर से ही शुरू होता दिखता है। ऐसी अधिकांश जीवनियां मुख्य रूप से डॉ. हेडगेवार को ही आरएसएस की स्थापना का श्रेय देती हैं तथा सुविधाजनक ढंग से इस तथ्य को भुला देती हैं कि जिस बैठक में (जो विजयादशमी के दिन नागपुर में आयोजित हुई थी) ऐसे संगठन की स्थापना का निर्णय लिया गया था, उसमें डॉ. बी. एस. मूंजे, डॉ. एल. वी. परांजपे, डॉ. बी. बी. थालकर और बाबूराव सावरकर (विनायक दामोदर सावरकर के भाई) भी उपस्थित थे और ये सभी हिंदू महासभा से जुड़े हुए थे। यह समझना कठिन नहीं है कि महासभा के इन नेताओं का उल्लेख क्यों नहीं किया जाता, क्योंकि वर्तमान आरएसएस नेतृत्व को आशंका है कि इससे हेडगेवार को अन्य सभी से ऊपर एक महान नेता के रूप में प्रस्तुत करने के उनके प्रयास प्रभावित होंगे।
डॉ. बी. एस. मूंजे हेडगेवार के मार्गदर्शक थे। उन्हीं के प्रयासों से हेडगेवार को कलकत्ता में चिकित्सा शिक्षा प्राप्त हुई। याद रहे, मुंजे स्वयं इटली जाकर मुसोलिनी से मिले थे, ताकि वहाँ के प्रयोगों से सीख सकें। उन्होंने स्वयं कहा था कि हमारी संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में इन्हें लागू किया जाएगा। पितृसंगठन और उसके प्रमुख नेताओं की छवि को नया रूप देने की यह प्रक्रिया काफी समय से चल रही है, लेकिन नरेंद्र मोदी जो स्वयं संगठन के प्रचारक रहे हैं के नेतृत्व में भाजपा के एक दशक से अधिक पहले सत्ता में आने के बाद इसे एक नई गति मिली है।
भविष्य का भारत
अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री के रूप में पहले कार्यकाल के दौरान आरएसएस द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम जो संगठन के पूरे इतिहास में अपनी तरह का पहला कार्यक्रम था- इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। इसके तहत आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का शीर्षक था ‘भविष्य का भारत’ जिसका आयोजन स्वयं आरएसएस ने राष्ट्रीय राजधानी में किया था, जिसमें उसके सर्वोच्च नेता मोहन भागवत मुख्य वक्ता थे। इसे अपनी तरह का पहला कार्यक्रम- एक जनसंपर्क अभियान बताया गया था, जिसका उद्देश्य संघ के विभिन्न मुद्दों पर दृष्टिकोण को स्पष्ट करना, उसकी विचारधारा और कार्यप्रणाली को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करना था। इसी उद्देश्य से समाज के विभिन्न क्षेत्रों से लोगों को इसमें आमंत्रित किया गया था। जब यह समाचार आया कि संघ प्रमुख सीधे अमेरिका से दिल्ली पहुंच रहे हैं जहां वे शिकागो में स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक भाषण की 125वीं वर्षगांठ के समारोह में भाग लेने गए थे तो इस प्रतीकात्मकता पर लोगों का ध्यान गया।
यह दर्ज है कि ‘भविष्य का भारत’ विषय पर आयोजित इस तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का अनेक टीवी चैनलों पर सीधा प्रसारण हुआ और टिप्पणीकारों के बीच मानो ‘बदले हुए आरएसएस’ की प्रशंसा करने की होड़ लग गई। अनेक उदारवादी भी इस भिन्न प्रकार के हिंदुत्व से प्रभावित दिखाई दिए, जहां वर्तमान सरसंघचालक ने स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस की भूमिका की सराहना की या यहां तक कि उस भाषण का उल्लेख किया, जो कथित रूप से सर सैयद अहमद ने आर्य समाज द्वारा सम्मानित किए जाने के अवसर पर दिया था। शायद उनके लिए यह भी आश्वस्त करने वाला था कि अपने भाषण में उन्होंने संविधान की प्रशंसा की और उसी क्रम में यह भी कहा कि “हिंदू राष्ट्र का अर्थ यह नहीं है कि उसमें मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं है। हम भारतीय संविधान का सम्मान करते हैं। इसे बनाने में बहुत विचार किया गया है। यह सर्वसम्मति से बनाया गया था। संघ कभी भी संविधान के विरुद्ध नहीं गया।”
दिलचस्प बात यह थी कि मोहन भागवत ने भारतीय संविधान के बारे में सकारात्मक बातें कहीं, उसकी रचना में लगे विचार और प्रयास की सराहना की, यह भी कहा कि पूरा कार्य ‘सर्वसम्मति’ से हुआ था और यह भी रेखांकित किया कि उनका संगठन अब उसका सम्मान करता है। सुनने में यह सब बहुत अच्छा लगा। लेकिन भागवत की ओर से यह स्पष्ट करना आवश्यक था कि आखिर आरएसएस ने संविधान का ‘सम्मान’ करना कब से शुरू किया, क्योंकि इससे कुछ ही महीने पहले उन्होंने स्वयं हैदराबाद में अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद को संबोधित करते हुए “देश की मूल्य व्यवस्था के अनुरूप संविधान और न्यायशास्त्र में परिवर्तन” की वकालत की थी।
उनसे यह भी पूछा जा सकता था कि हिंदू राष्ट्र की पूरी अवधारणा जो एक विशेष धर्म के लोगों की श्रेष्ठता पर आधारित है- संविधान के साथ कैसे संगत हो सकती है, जबकि संविधान प्रत्येक व्यक्ति को उसके धर्म, लिंग, जाति, क्षेत्र या नस्ल की परवाह किए बिना समान अधिकार और अवसर की गारंटी देता है। एक पूरक प्रश्न यह भी हो सकता था कि “हिंदू राष्ट्र में मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों का स्थान क्या होगा?” क्या वह स्थान निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा या किसी इस्लामी राष्ट्र में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति के समान होगा या उससे भिन्न? क्या अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक हिंदुओं की कृपा पर ही जीवन बिताते रहेंगे, जैसा कि भागवत के पूर्ववर्तियों ने दावा किया था- एक औपचारिक पदानुक्रमित संबंध में, मूलतः द्वितीय श्रेणी के नागरिकों के रूप में? या उन्हें भी राष्ट्र पर समान अधिकार प्राप्त होंगे? क्या उन्हें अब भी आंतरिक शत्रु घोषित किया जाएगा, जैसा कि दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में प्रतिपादित किया था?
दिलचस्प बात यह भी थी कि भागवत ने अपने भाषण में बड़ा ज़ोर देकर कहा था कि आरएसएस एक लोकतांत्रिक संगठन है, जो कथित रूप से अपने किसी भी सहयोगी संगठन पर रिमोट कंट्रोल नहीं चलाता और न ही वर्चस्व स्थापित करने की आकांक्षा रखता है। यह अलग बात है कि आरएसएस आज भी देश की लगभग आधी आबादी (महिलाओं) को समान सदस्य के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, जिससे वह मूलतः हिंदू पुरुषों का संगठन बना रहता है। अब यह इतिहास का हिस्सा है कि नागपुर की ही लक्ष्मी केलकर, जो स्वयं डॉ. हेडगेवार की समकालीन थीं और संगठन द्वारा किए जा रहे हिंदू एकता के कार्य से प्रभावित थीं, उन्होंने हेडगेवार से अनुरोध किया था कि महिलाओं को भी संगठन में शामिल होने दिया जाए। इस प्रस्ताव को डॉ. हेडगेवार ने तत्काल अस्वीकार कर दिया और उन्हें महिलाओं के लिए अलग संगठन बनाने की सलाह दी।
एक हस्तक्षेपकारी के रूप में इस बात का उल्लेख करना मौजूं होगा कि इस मोर्चे पर अर्थात स्त्रियों को संगठन में शामिल न करने के मसले पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मिस्र में बने संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ जैसा दिखता है, जिसका निर्माण (1928) हसन अल बन्ना ने किया था। इसने भी अपनी ‘भगिनी ब्रिगेड’ का निर्माण किया है और अपने विशाल दायरे में फैले उसके पितृसंगठन में एक भी स्त्री को स्थान नहीं दिया गया है।
अंत में, उस ‘ऐतिहासिक जनसंपर्क कार्यक्रम’ में उपस्थित लोगों और विश्लेषकों को सबसे अधिक आश्चर्य इस बात पर हुआ कि मोहन भागवत ने स्वयं आरएसएस के दो वरिष्ठ नेताओं, दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर (21 जून 1940-5 जून 1973) और तीसरे सरसंघचालक बालासाहेब देवरस (5 जून 1973-मार्च 1994) के बारे में लगभग पूर्ण मौन बनाए रखा। आख़िर ऐसी क्या बात थी, जिसने उन्हें उनके नाम और कार्यों का उल्लेख तक करने से रोक दिया, जबकि वे परिवार के बाहर के अनेक लोगों का उल्लेख करने में काफ़ी उदार थे?
एक प्रमुख अंग्रेज़ी दैनिक के संवाददाता/विश्लेषक ने तो यह भी गिना कि भागवत ने अपने पहले दो दिनों के व्याख्यानों में 32 अलग-अलग व्यक्तित्वों का कुल 102 बार उल्लेख किया, ताकि यह दिखाया जा सके कि संघ विविध स्रोतों की श्रेष्ठ बातों को आत्मसात करता है। वहीं आरएसएस के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार का सबसे अधिक बार उल्लेख हुआ और भागवत ने महात्मा गांधी, बी.आर. आंबेडकर, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सुभाष चंद्र बोस, वीर सावरकर, एम. एन. रॉय, एएमयू के संस्थापक सर सैयद अहमद ख़ान तथा कुछ कम प्रसिद्ध संघ नेताओं के साथ-साथ बुद्ध, ज़रथुस्त्र, रामकृष्ण परमहंस, दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, गुरु नानक और शिवाजी का भी उल्लेख किया।
रिपोर्टों के अनुसार गोलवलकर का उल्लेख तीसरे दिन प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान हुआ। संगठन के तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस की स्थिति तो और भी दयनीय रही। उनका नाम तक नहीं लिया गया। यह समझ से परे प्रतीत हो सकता है कि संगठन का वर्तमान सर्वोच्च नेता ‘भारत के भविष्य’ पर अपने विचार रखते हुए, संगठन से किसी भी प्रकार से जुड़े न रहने वाले लोगों को उसके ‘बदले हुए स्वरूप’ के बारे में समझाने का प्रयास करते हुए, संस्थापक और प्रथम सरसंघचालक पर विशेष ध्यान केंद्रित करता है, अनेक ऐसे लोगों का उल्लेख करता है जो या तो संगठन से जुड़े नहीं थे या उसकी गतिविधियों के आलोचक रहे थे, लेकिन उन दो प्रमुख नेताओं का नाम तक लेने से बचता है, जिन्होंने लगभग आधी शताब्दी तक संगठन का नेतृत्व और मार्गदर्शन किया। क्या यह चुप्पी अनजाने में थी, या फिर परिवार का एक सोचा-समझा निर्णय?
संघ परिवार गोलवलकर को भूलना क्यों चाहता है?
अब यह इतिहास का हिस्सा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक सदस्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने स्वयं माधव सदाशिव गोलवलकर को अपनी मृत्यु के बाद संगठन का नेतृत्व करने के लिए नामित किया था, जिन्होंने आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक के तौर पर पदभार तुरंत संभाला था। आरएसएस के अधिकांश विद्यार्थी इस तथ्य की अनदेखी कर देते हैं कि गोलवलकर औपचारिक रूप से 1937 में ही संगठन से जुड़े, वह भी एक टेढ़े-मेढ़े सफ़र से गुज़रने के बाद। उनके जीवनीकार यह भी बताते हैं कि वे पहले रामकृष्ण आश्रम में शामिल होकर संन्यासी बनना चाहते थे। उन्होंने अपने गुरु से 1937 में दीक्षा भी प्राप्त की थी और इस प्रकार उस संन्यासी परंपरा में प्रवेश किया था। लेकिन बाद में उनका मन बदल गया और उन्होंने शीघ्र ही उसे छोड़ दिया।
हेडगेवार के मार्गदर्शन और उनके द्वारा प्रदान किए गए दृष्टिकोण के अंतर्गत ही संगठन के नए स्वयंसेवक गोलवलकर ने अपनी पहली और अत्यंत विवादास्पद पुस्तक ‘वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ (1938–39) लिखी। डॉ. हेडगेवार ने इसके प्रकाशन में विशेष रुचि ली थी और अपने व्यक्तिगत मित्र माधव श्रीहरि अणे, जो कांग्रेस पार्टी के नेता थे, से इसकी भूमिका लिखने का भी आग्रह किया था। संघ के भीतर गोलवलकर गुरुजी जिन्हें लोकप्रिय रूप से इसी नाम से जाना जाता है को संगठन का प्रधान शिल्पकार कहा जाता है और समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचने के लिए संबद्ध (अनुषांगिक) संगठनों का नेटवर्क बनाने की संगठन की विशिष्ट पद्धति का श्रेय उन्हें दिया जाता है।
बालासाहेब देवरस, जो आरएसएस के तीसरे सरसंघचालक बने, जो गोलवलकर से पहले संगठन में शामिल हुए थे और युवावस्था में ही एक संगठनकर्ता के रूप में उभरे थे उन्हें इस बात के लिए याद किया जाता है कि उन्होंने आरएसएस को किसी भी अन्य सरसंघचालक की तुलना में सामाजिक सक्रियता से अधिक गहराई से जोड़ा और उसके जनाधार का विस्तार किया। हालांकि वे यह कार्य गोलवलकर की मृत्यु के बाद ही कर सके।
इस तथ्य को देखते हुए कि आरएसएस एक अत्यंत अनुशासित संगठन है, यह मान लेना अत्यधिक भोलेपन की बात होगी कि इन दोनों दिग्गजों को औपचारिक रूप से हाशिए पर डालना, तीन दिन की व्याख्यान शृंखला में उनके बारे में ठीक से बात न करना, केवल मोहन भागवत का व्यक्तिगत निर्णय रहा होगा। अधिक संभावना यही प्रतीत होती है कि आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व के बीच इस बात पर सहमति बन गई थी कि जितनी अधिक चर्चा गोलवलकर या देवरस की होगी, उतना ही कठिन होगा डॉ. हेडगेवार की छवि को “महामानव” के रूप में प्रस्तुत करना।
माधव सदाशिव गोलवलकर की जयंती जो आरएसएस द्वारा आयोजित उस “ऐतिहासिक संवाद” कार्यक्रम के एक वर्ष बाद आई, संघ परिवार के भीतर बदले हुए परिदृश्य का संकेतक मानी जा सकती है। इस पर व्यापक रूप से किसी का ध्यान नहीं गया। एक राष्ट्रीय दैनिक में हिंदुत्व ब्रिगेड के एक दूसरे दर्जे के नेता द्वारा लिखे गए एक इक्का-दुक्का लेख को छोड़ दें, तो शीर्ष नेतृत्व में से किसी ने भी संघ के दूसरे प्रमुख, जिन्होंने संगठन के संस्थापक के.बी. हेडगेवार के बाद नेतृत्व संभाला था, को याद करना भी आवश्यक नहीं समझा।
दिलचस्प बात यह रही कि ट्विटर पर सक्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के हुनर हाट में लिट्टी-चोखा खाने के अपने अनुभव पर तो ट्वीट किया, लेकिन उस दिन उनके टाइमलाइन पर गोलवलकर का एक भी उल्लेख नहीं था। यह कुछ अजीब लगा, क्योंकि अपनी पुस्तक ‘ज्योतिपुंज’ में जिसका प्रकाशन जनाब नरेंद्र मोदी के गुजरात मुख्यमंत्री पद के दौरान किया गया था, उन्होंने “महानतम समाजसेवियों” का जो वर्णन किया है, जिन्होंने “मातृभूमि को आलोकित करने के लिए अपना जीवन जला दिया,” इसमें उन्होंने गोलवलकर पर चालीस पृष्ठ समर्पित किए थे। उन्होंने लिखा था, “गोलवलकर गुरुजी का जीवन समर्पण का उत्कृष्ट उदाहरण है। गुरुजी में वे सभी गुण थे, जिनकी अपेक्षा अपने लक्ष्य के लिए जीने वाले व्यक्ति से की जाती है- धैर्य, दृढ़ निश्चय और निरंतरता।” एक हस्तक्षेपकारी के तौर पर यह भी बता दें कि इस किताब का एक अध्याय संघ के वर्तमान सुप्रीमो मोहन भागवत के पिता पर भी केंद्रित था जो कुछ समय तक संघ की तरफ से राज्य का जिम्मा संभाल रहे थे।
क्या मोदी और उनके वरिष्ठ सहयोगियों की यह चुप्पी अनजाने में थी या जानबूझकर? यह विश्वास करना कठिन है कि वे सभी मिलकर आरएसएस के सबसे लंबे समय तक (1940–1973) सरसंघचालक रहे व्यक्ति को अनजाने में भूल गए होंगे। यह उस दौर से बिल्कुल अलग दृश्य था, जब उनकी शताब्दी जयंती (2006) मनाई गई थी। उस समय पूरे देश में ब्लॉक स्तर पर हिंदू रैलियां आयोजित करते हुए एक व्यापक अभियान चलाया गया था। सेमिनार, संगोष्ठियां और व्याख्यान आयोजित किए गए, ताकि श्री गुरुजी के विचारों और दृष्टि का प्रचार किया जा सके, जैसा कि आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ ने कहा था।
वह ऐसा दौर था, जब गोलवलकर का महिमामंडन उन्हें मानव स्तर से कुछ ऊपर स्थापित कर रहा था, जैसा कि प्रो. जी. पी. देशपांडे, जो अग्रणी मार्क्सवादी विचारक और नाटककार भी थे तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उस वक़्त अध्यापन कर रहे थे ने उस समय ‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ में प्रकाशित एक लेख में लिखा था। देशपांडे “गोलवलकर” के नाम के साथ “श्री” जोड़ने की ओर संकेत कर रहे थे, जिसने उन्हें “लगभग पवित्र, किसी अवतार जैसा” बना दिया। “महाराष्ट्र के संदर्भ में इसका एक अतिरिक्त अर्थ या संकेत भी है। रहस्यवादी गुरुओं को प्रायः ‘श्री गुरुजी’ कहा जाता है। इस प्रकार आप देख सकते हैं कि गोलवलकर का अत्यंत सूक्ष्म महिमामंडन किया गया और यह नया संबोधन उन्हें मानवीय स्तर से कुछ ऊपर स्थापित करता है।”
तीन दिवसीय कार्यक्रम इस बात का स्पष्ट संकेत था कि “श्री गुरुजी” को धीरे-धीरे अदृश्य बनाने की यह प्रक्रिया किसी एक व्यक्ति का निर्णय नहीं था। यह केवल भागवत का नहीं, बल्कि संघ परिवार के सभी प्रमुख नेताओं का सामूहिक विचार था कि सार्वजनिक रूप से उनके नाम का उल्लेख करने से बचा जाए। इसका अंत कार्यक्रम के तीसरे दिन प्रश्नोत्तर सत्र में हुआ, जब यह दावा किया गया कि आरएसएस गोलवलकर की विवादास्पद पुस्तक ‘बंच ऑफ थॉट्स’ का संशोधित संस्करण प्रस्तुत करना चाहता है, जिसमें मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को “आंतरिक ख़तरे” बताया गया है। इससे उनके नाम को लेकर सामूहिक असहजता की पुष्टि होती है।
“आंतरिक ख़तरे” शीर्षक वाला अध्याय, जिसमें मुसलमान, ईसाई और कम्युनिस्ट नामक तीन उपखंड हैं, इस प्रकार शुरू होता है : “दुनिया के अनेक देशों के इतिहास ने यह दुखद शिक्षा दी है कि किसी देश के भीतर के शत्रुतापूर्ण तत्व राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बाहरी आक्रमणकारियों से कहीं ज्यादा बड़ा ख़तरा उत्पन्न करते हैं। दुर्भाग्य से राष्ट्रीय सुरक्षा का यह पहला पाठ वही है, जिसे अंग्रेजों के इस देश से जाने के बाद से लगातार हमारे देश में अनदेखा किया गया है।”
इस पुस्तक में भारतीय संविधान, आरक्षण नीति तथा स्वतंत्रता संग्राम और उसके वीर प्रतिभागियों के बारे में भी समान रूप से विवादास्पद टिप्पणियाँ की गई हैं। भागवत अच्छी तरह जानते थे कि नए रूप वाले आरएसएस के लिए गोलवलकर द्वारा प्रस्तुत मानव-विरोधी समाधान, यद्यपि वे संगठन की सामूहिक सोच की अभिव्यक्ति थे महंगे साबित होंगे। आरएसएस के सामने सबसे उपयुक्त रास्ता यही था कि उन विचारों को व्यक्त करने वाले व्यक्ति को “अलग-थलग” कर दें । इसमें यह तथ्य भी सहायक था कि डॉ. हेडगेवार ने बहुत कम लिखा था, इसलिए उन्हें आलोचनात्मक जांच-पड़ताल से अपेक्षाकृत आसानी से बचाया जा सकता था।
पुस्तक का नया संस्करण प्रकाशित करने के लिए भागवत द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण बहुत अधिक विश्वसनीय नहीं लगा और उनकी दुविधा को दर्शाता था : “जहाँ तक बंच ऑफ थॉट्स का संबंध है, उसका प्रत्येक कथन अपने समय और परिस्थितियों के संदर्भ में है… उनके स्थायी विचार एक लोकप्रिय संस्करण में हैं, जिसमें हमने वे सभी टिप्पणियां हटा दी हैं, जिनका संदर्भ केवल अस्थायी था और केवल उन्हीं बातों को रखा है, जो युगों तक प्रासंगिक रहेंगी। आपको वहां ‘मुसलमान दुश्मन हैं’ जैसी टिप्पणी नहीं मिलेगी।”
एक विश्लेषक के अनुसार, यह वैसा ही है जैसे यह कहना कि हिटलर की विश्वविख्यात किताब मीन कैम्फ (मेरा संघर्ष) जिसमें उनके नस्लवादी विचार ना केवल प्रगट होते हैं, बल्कि वह साथ ही साथ उस समस्या को सुलझाने के लिए नस्लीय सफ़ाये की बात कर रहे हैं- का एक “स्वच्छ” संस्करण तैयार किया जा सकता है, जिसमें यहूदियों को निशाना बनाने वाले प्रत्यक्ष संदर्भ हटा दिए जाएं, ताकि “अधिक स्वीकार्य और प्रिय हिटलर” प्रस्तुत किया जा सके।
इस प्रकार यह समझना कठिन नहीं है कि संघ सार्वजनिक रूप से गोलवलकर से दूरी क्यों बनाना चाहता है। यदि हम पंक्तियों के बीच पढ़ने का प्रयास करें, तो इसका अर्थ होगा- सार्वजनिक रूप से गोलवलकर से दूरी बनाना, ताकि संगठन के प्रमुख विचारक और निर्माता तथा गोलवलकर के वास्तविक शिक्षक डॉ. हेडगेवार को प्रश्नों और आगे की आलोचनात्मक जांच से बचाया जा सके।
नफ़रत के गुरु!
गोलवलकर के जीवन की दिशा पर एक सरसरी नज़र डालने से यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है। याद रखिए, गोलवलकर का जीवन विश्व इतिहास के ऐसे कालखंड में फैला हुआ था, जो कई दृष्टियों से अद्वितीय था। यह वह समय था, जब नाज़ीवाद और फ़ासीवाद पश्चिमी यूरोप को अपनी चपेट में लेने के लिए तैयार थे ; वह समय था, जब तीसरी दुनिया के अनेक देशों में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष अपने निर्णायक चरण के निकट पहुँच रहे थे। यह वह दौर भी था, जब सोवियत रूस में समाजवादी निर्माण के महान प्रयोग तथा कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले प्रचंड आंदोलनों की उभरती लहर उस युग की प्रमुख विशेषताएं सिद्ध हो रही थीं।
पश्चदृष्टि से देखें, तो कहा जा सकता है कि यह विश्व इतिहास का वह मोड़ था, जब सामंतवाद और उपनिवेशवाद की पुरानी दुनिया ढह रही थी और एक नई दुनिया उभर रही थी। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि अपनी विशिष्ट विश्वदृष्टि के कारण, जो “हिंदू धर्म की गौरवशाली परंपराओं” पर आधारित एक हिंदू राष्ट्र के निर्माण की आकांक्षा रखती थी, जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद की तुलना में मुसलमानों को बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानती थी, और जो नाज़ीवाद-फ़ासीवाद द्वारा किए गए “सामाजिक अभियांत्रिकी” के प्रयोगों से प्रेरणा लेती थी, गोलवलकर इस बात से अनभिज्ञ रहे कि दुनिया/मानवता एक बेहतर दिशा की ओर बढ़ रही थी।
जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, हिंदुत्व के उद्देश्य के लिए गोलवलकर का पहला सैद्धांतिक योगदान वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड (1938) शीर्षक वाली एक पुस्तिका के रूप में सामने आया था। यह किताब हिटलर द्वारा यहूदियों के “जातीय शुद्धीकरण” की प्रशंसा में इतनी स्पष्ट थी और “विदेशी नस्लों” के हिंदू नस्ल में विलय की इतनी निर्लज्ज समर्थक थी कि बाद के आरएसएस नेताओं ने पूरी कोशिश की कि यह धारणा बनाई जाए कि यह पुस्तिका गोलवलकर द्वारा लिखी ही नहीं गई थी, बल्कि यह बाबाराव सावरकर की राष्ट्र मीमांसा का मात्र अनुवाद थी।
हालांकि, यह एक अलग बात है कि वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड की 22 मार्च 1939 की अपनी भूमिका में स्वयं गोलवलकर ने राष्ट्र मीमांसा को अपनी “प्रेरणा और सहायता के प्रमुख स्रोतों में से एक” बताया था। अमेरिकी विद्वान जीन ए. करन (मूलतः सीआईए के एक व्यक्ति), जिन्होंने पचास के दशक की शुरुआत में आरएसएस पर विस्तृत अध्ययन किया, ने ‘मिलिटेंट हिंदु-इज्म इन इंडियन पॉलिटिक्स : ए स्टडी ऑफ द आरएसएस’ (1951) नामक एक पुस्तक लिखी, जो संघ के प्रति सहानुभूतिपूर्ण थी। इस किताब में उन्होंने पुष्टि की कि गोलवलकर की 77 पृष्ठों की यह पुस्तक 1938 में लिखी गई थी, जब हेडगेवार ने उन्हें आरएसएस का महासचिव नियुक्त किया था और इसे आरएसएस की “बाइबल” कहा था ।
तीसरा क्षेत्र, जिसमें गोलवलकर अपने समय से बहुत पीछे दिखाई दिए, वह था मनुस्मृति के आदेशों के प्रति उनका लगाव। जब नवस्वतंत्र भारत के नेता ऐसा संविधान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे, जो व्यक्तिगत अधिकारों की अक्षुण्णता पर आधारित हो और उन करोड़ों भारतीयों के लिए सकारात्मक भेदभाव के विशेष प्रावधान रखे, जिन्हें धार्मिक ग्रंथों का हवाला देकर मानवीय अधिकारों से वंचित रखा गया था, तब गोलवलकर ने फिर उसी मनुस्मृति को स्वतंत्र भारत का संविधान बनाने का समर्थन किया। 30 नवंबर 1949 को ‘ऑर्गनाइज़र’ में शिकायत की : “लेकिन हमारे संविधान में प्राचीन भारत की अद्वितीय संवैधानिक उपलब्धियों का कोई उल्लेख नहीं है। मनु के कानून स्पार्टा के लाइकर्गस या फ़ारस के सोलोन से बहुत पहले लिखे गए थे। आज भी ‘मनुस्मृति’ में प्रतिपादित कानून विश्व की प्रशंसा प्राप्त करते हैं और स्वाभाविक आज्ञापालन तथा अनुपालन उत्पन्न करते हैं। लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए इसका कोई महत्व नहीं है।”
जब चालीस के दशक के उत्तरार्ध में आंबेडकर और नेहरू के नेतृत्व में हिंदू कोड बिल के माध्यम से हिंदू महिलाओं को संपत्ति और उत्तराधिकार में सीमित अधिकार देने का प्रयास किया गया, तब गोलवलकर और उनके सहयोगियों ने इतिहास में पहली बार होने जा रहे हिंदू महिलाओं के इस ऐतिहासिक सशक्तिकरण का विरोध करने के लिए आंदोलन चलाने में कोई संकोच नहीं किया। उनका तर्क सरल था : यह कदम हिंदू परंपराओं और संस्कृति के प्रतिकूल है।
गोलवलकर की वैचारिक परियोजना की सीमाओं को उजागर करने वाले ऐसे अनेक उदाहरण गिनाए जा सकते हैं, जिन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण में बाधा का काम किया। किसी भी निष्पक्ष पर्यवेक्षक के लिए यह स्पष्ट है कि जिस प्रकार उन्होंने धर्म के आधार पर भारतीय जनता की व्यापक एकता में विभाजन पैदा करने का प्रयास किया, जिस प्रकार उन्होंने पश्चिमी यूरोप में नस्लीय शुद्धीकरण के प्रयोगों की प्रशंसा की और जिस प्रकार उन्होंने जीवन भर मनुस्मृति का महिमामंडन किया, उससे यह सिद्ध होता है कि उनकी परियोजना मूलतः सामाजिक सद्भाव के उद्देश्य के प्रतिकूल थी।
यह अलग बात है कि सांप्रदायिक एजेंडा अपनाने के बावजूद भारतीय समाज को पुनर्गठित करने की गोलवलकर की परियोजना धीरे-धीरे ही सही, आगे बढ़ती रही। हमारे समाज के एक हिस्से को अपने पक्ष में करने में गोलवलकर की परियोजना की सफलता निश्चित रूप से इस टिप्पणी से परे अलग विश्लेषण की मांग करती है। ऐसा नहीं था कि संघ ने उनकी दृष्टि पर पुनर्विचार न किया हो ; बल्कि उसने 2002 में गुजरात में “सफल प्रयोग” आयोजित करके या यह दिखाकर कि सीएए-एनपीआर-एनआरसी की त्रयी गोलवलकर और आरएसएस की दृष्टि की परिणति का प्रतिनिधित्व करती है, उसके प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी।
उनकी एकमात्र समस्या उस दृष्टि की प्रस्तुति को लेकर है जिसमें सामाजिक-राजनीतिक महत्व के विभिन्न मुद्दों पर समय-समय पर दिए गए उनके विवादास्पद वक्तव्यों और अनेक अवसरों पर उस “सुनियोजित अस्पष्टता” से आगे निकल जाने को देखते हुए जो उस संगठन की एक विशेषता थी, जिसका उन्होंने निर्माण किया। यह आश्चर्यजनक नहीं है कि हिंदुत्व परियोजना का विरोध करने वाले सभी लोगों के निशाने पर वे हमेशा रहे। सबसे अच्छी रणनीति यही प्रतीत होती है कि “सार्वजनिक रूप से उन्हें भुला दिया जाए” और व्यवहार में उनके मूल सार को पूरी तरह लागू किया जाए।
देवरस के इर्द-गिर्द चयनात्मक विस्मृति को समझना
भागवत द्वारा गोलवलकर को हटाया जाना समझा जा सकता था। हमने 2006 में उनकी जयंती समारोहों के दौरान भी आरएसएस के हलकों में ऐसी ही असहजता देखी थी। उस समय एक ओर वे गोलवलकर के ‘योगदानों’ की प्रशंसा कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर वे ‘चुपके-चुपके उनकी छवि को साफ-सुथरा बनाकर उन्हें भोली-भाली जनता के सामने एक अधिक स्वीकार्य, मानवीय चेहरे के रूप में प्रस्तुत करने में लगे हुए थे।’
लेकिन देवरस को भी क्यों हटा दिया गया? इस ‘ऐतिहासिक कार्यक्रम’ में उन्हें एक बार उल्लेख किए जाने योग्य भी क्यों नहीं समझा गया? उनका हटाया जाना और भी अधिक आश्चर्यजनक प्रतीत हुआ, क्योंकि अपने पूर्ववर्ती के विपरीत वे विवादास्पद नहीं रहे थे और उन्होंने हमेशा संगठन का अपेक्षाकृत सौम्य चेहरा प्रस्तुत करने का प्रयास किया था। आरएसएस के विशिष्टतावादी दृष्टिकोण के आलोचक भी स्वीकार करते हैं कि यदि गोलवलकर संगठन को मजबूत संगठनात्मक और वैचारिक आधार देने वाले प्रमुख व्यक्तित्व थे, तो देवरस ने आरएसएस के विचार को उन वर्गों तक पहुंचाने में मदद की, जिन्हें पहले बाहर रखा गया था। संघ के भीतर वे मुख्यतः आरएसएस के सामाजिक आधार का विस्तार करने और हिंदू समाज के सामाजिक रूप से वंचित वर्गों तक पहुँचने के लिए जाने जाते हैं।
जिस प्रकार 1954 में जिला प्रचारकों के सम्मेलन में गोलवलकर का भाषण आरएसएस के इतिहास में उनके संगठनात्मक और वैचारिक नेतृत्व को उजागर करने वाला एक ‘मील का पत्थर’ माना जाता है, उसी प्रकार मई 1974 में पुणे में ‘सामाजिक समता और हिंदू चेतना’ पर देवरस का भाषण संघ के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। अपने भाषण में हिंदू संगठन की समस्या के लिए बाहरी लोगों, विशेषकर मुसलमानों और ईसाइयों को दोष देने के बजाय उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ‘हमारे बीच सामाजिक असमानता हमारे पतन का एक कारण रही है। जाति और उपजाति की प्रतिद्वंद्विता तथा अस्पृश्यता जैसी विघटनकारी प्रवृत्तियां इसी सामाजिक असमानता की अभिव्यक्तियां रही हैं।’
कोई भी व्यक्ति यह अंतर देख सकता था कि गोलवलकर और देवरस हिंदुओं के असंगठित रहने के कारणों को किस प्रकार देखते थे। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि गोलवलकर ने जाति व्यवस्था और उससे जुड़ी बहिष्करण की संरचना को यथावत रखते हुए हिंदू एकता का अधिक ‘असमावेशी/बहिष्करणवादी’ मार्ग अपनाया, जबकि देवरस ने हिंदू एकता का अपेक्षाकृत अधिक ‘समावेशी’ मार्ग अपनाया। अपनी मृत्यु से मात्र चार वर्ष पहले गोलवलकर का मराठी समाचार पत्र ‘नवाकाल’ (1969) को दिया गया साक्षात्कार महाराष्ट्र में बड़े विवाद का कारण बना था, क्योंकि उसमें उन्होंने एक बार फिर मनुस्मृति की प्रशंसा की थी। जैसी कि पहले चर्चा की जा चुकी है, गोलवलकर को मनुस्मृति के विधानों के प्रति विशेष आकर्षण था।
ऐसा नहीं है कि देवरस मनुस्मृति के विरोधी थे। उनकी जीवनी देखने पर पता चलता है कि उन्होंने न तो कभी इसकी निंदा की, न ही इस पर प्रश्न उठाया और न ही जाति-उन्मूलन की बात की। लेकिन उन्होंने मूलतः अस्पृश्यता की निंदा की और इस बात पर ज़ोर दिया कि इसका पालन नहीं होना चाहिए, अन्यथा हिंदू एकता का लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकेगा।
आरएसएस के बदलते वातावरण का पहला सार्वजनिक संकेत देवरस की 1973 में दीक्षाभूमि की यात्रा से मिला। यही वह स्थान है, जहां आंबेडकर ने 1956 में अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। यही आंबेडकर थे, जिन्होंने 25 दिसंबर 1927 को सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति का दहन किया था, क्योंकि वह जाति व्यवस्था का समर्थन करती थी।
यह भी याद रखना चाहिए कि देवरस के ही आग्रह पर आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठन, भारतीय जनसंघ वगैरह, ऐतिहासिक बिहार आंदोलन (लोकप्रिय रूप से जेपी आंदोलन) में शामिल हुए थे, जिसके परिणामस्वरूप बाद में जनसंघ को गठबंधन सरकार में केंद्र में अल्पकालिक सत्ता मिली। यह सवाल क्या वाजिब नहीं है कि संघ विस्तार में इतनी अहम भूमिका निभाने के बावजूद उनके ही जमात के लोगों ने देवरस को इस क़ाबिल क्यों नहीं समझा कि उनका नाम भी उन 32 व्यक्तित्वों की फ़ेहरिस्त में शामिल हो, जिनका जिक्र मोहन भागवत ने किया था? क्या इसका कारण यह था कि भागवत आपातकाल के दौरान संघ परिवार और उसके संबद्ध संगठनों की उस कम गौरवपूर्ण भूमिका पर चर्चा से बचना चाहते थे, जब देवरस सर्वोच्च नेता थे? ऐसी भूमिका, जो उस आधिकारिक इतिहास से भिन्न है, जिसमें आरएसएस को उस दौर का महान और अडिग योद्धा बताया जाता है।
आपातकाल (1975) का लागू होना वास्तव में भारतीय लोकतंत्र का एक बहुत ‘अंधकारमय अध्याय’ था, जब जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े हज़ारों लोगों को जेल में डाल दिया गया था। आज किसी सामान्य व्यक्ति के लिए यह समझना कठिन हो सकता है जबकि आपातकाल के दौरान संघ परिवार के कार्यकर्ता जेलों में थे, उसके नेता, तपन बसु आदि के शब्दों में, ‘एक विचित्र द्वैत’ प्रदर्शित कर रहे थे। अपनी 1993 की पुस्तक ‘खाकी शॉर्ट्स एंड सैफरॉन फ्लेग्स’ (ओरिएंट लॉन्गमैन) में लेखक बताते हैं कि आरएसएस के शीर्ष नेताओं ने किस प्रकार प्रतिक्रिया दी।
‘आपातकाल के दौरान आरएसएस का रवैया एक विचित्र द्वैत को प्रकट करता है, जो 1948-49 के दिनों की याद दिलाता है।’ जबकि आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और संघ प्रमुख देवरस को जेल में डाल दिया गया था, उन्होंने भी 1948-49 में गोलवलकर की तरह ‘…शीघ्र ही आपातकालीन शासन से संवाद के रास्ते खोल लिए। अगस्त और नवंबर 1975 में उन्होंने इंदिरा गांधी को अत्यंत विनम्र पत्र लिखे, जिनमें आरएसएस पर लगे प्रतिबंध को हटाने के बदले सहयोग का आश्वासन दिया गया था। उन्होंने विनोबा भावे को आरएसएस और सरकार के बीच मध्यस्थ बनने के लिए राज़ी करने की कोशिश की और संजय गांधी की सहायता भी चाही।’
संघ के मुखपत्र पाञ्चजन्य (24 जुलाई 1977) में बापूराव मोघे ने भी स्वीकार किया था कि संघ प्रमुख द्वारा ऐसे पत्र लिखे गए थे। वकील और राजनीतिक टिप्पणीकार ए. जी. नूरानी अपनी पुस्तक द आरएसएस एंड द बीजेपी (लेफ्टवर्ड, 2000, दिल्ली) में बताते हैं कि ये पत्र ‘18 अक्टूबर 1977 को महाराष्ट्र विधानसभा के पटल पर रखे गए थे।’ वे आगे लिखते हैं, ‘उन्होंने 22 अगस्त को प्रधानमंत्री को पहला पत्र लिखा, जिसमें स्वतंत्रता दिवस पर उनके भाषण (संतुलित और अवसर के अनुरूप) के लिए उन्हें बधाई दी और आरएसएस पर लगा प्रतिबंध हटाने की प्रार्थना की। इसके बाद उन्होंने उन्हें इस बात पर भी बधाई दी कि सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों ने आपके चुनाव की वैधता को बरकरार रखा है। (11 नवंबर 1975)।’
यह जोड़ना आवश्यक है कि यद्यपि श्रीमती इंदिरा गांधी ने वह मामला जीत लिया था, लेकिन यह निर्णय गुण-दोष के आधार पर नहीं, बल्कि पूर्व-प्रभावी संवैधानिक संशोधन के आधार पर हुआ था। इन पत्रों में देवरस ने फिर से आरएसएस बंदियों की रिहाई और संगठन पर लगे प्रतिबंध को हटाने की अपील की। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आरएसएस का बिहार और गुजरात के आंदोलनों से कोई संबंध नहीं है। अंत में उन्होंने ‘राष्ट्रीय उत्थान’ के लिए ‘लाखों आरएसएस स्वयंसेवकों’ की सेवाएं सरकारी तथा गैर-सरकारी कार्यों के लिए देने की पेशकश भी की।
एक बात जिस पर शायद ध्यान न जाए, वह यह है कि इन पत्रों में संघ प्रमुख देवरस केवल आरएसएस की चिंता करते दिखाई देते हैं। अपने संगठन को एक निरंकुश शासन के प्रहार से बचाने के लिए वे यह घोषित करने को तैयार थे कि ‘यदि प्रतिबंध हटा लिया जाए, तो उनके लोग शासन की सेवा में उपस्थित रहेंगे।’ उन्होंने न तो सभी बंदियों की रिहाई की मांग की और न ही आपातकाल हटाने की। ऐसा प्रतीत होता है कि आरएसएस प्रमुख की एकमात्र समस्या यह थी कि उनके संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था ; अन्यथा इंदिरा सरकार जो कुछ कर रही थी, वह उन्हें स्वीकार्य था।
जब श्रीमती इंदिरा गांधी अपने रुख से नहीं हटीं, तो संघ प्रमुख ने 16 जुलाई 1976 को एक और पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने ‘पाकिस्तान और चीन के साथ संबंध सुधारने के आपके प्रयासों’ की प्रशंसा की और यह भी कहा कि उन्हें उनके संगठन के बारे में गलत जानकारी दी गई है। यह जांच का विषय है कि विनोबा भावे जैसे लोगों की मध्यस्थता से देवरस और इंदिरा गांधी के बीच किसी प्रकार का समझौता हुआ था या नहीं। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि शीर्ष स्तर से आरएसएस कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया गया था कि वे जेल से रिहाई के लिए एक लिखित आश्वासन दें। वह आश्वासन इस प्रकार था- ‘श्री … बंदी वर्ग … कारागार शपथपत्र पर यह स्वीकार करता है कि मेरी रिहाई की स्थिति में मैं ऐसा कोई कार्य नहीं करूंगा जो आंतरिक सुरक्षा और सार्वजनिक शांति के प्रतिकूल हो… मैं वर्तमान आपातकाल के विरुद्ध कोई कार्य नहीं करूंगा।’
प्रमुख समाजवादी कार्यकर्ता बाबा आढाव के अनुसार, देवरस ने स्वयं दिल्ली में एक प्रेस सम्मेलन में स्वीकार किया था कि उन्होंने इंदिरा गांधी को दो पत्र लिखे थे। समाजवादी आंदोलन के प्रमुख नेता मधु लिमये, जिन्होंने 19 महीने तीन जेलों में बिताए, जो आरएसएस प्रभाव वाले क्षेत्रों में थीं- आरएसएस बंदियों द्वारा लिखे गए क्षमा याचना पत्रों से परिचित थे। यह समझा जा सकता है कि आरएसएस, जिसने अपनी विश्वदृष्टि ‘वीरता’ और ‘कायरता’ की दो अवधारणाओं के इर्द-गिर्द निर्मित की है, इस अतीत को भुलाना चाहेगी, जब अडिग प्रतिरोध दिखाने के बजाय उसने झुकना पसंद किया।
भागवत भली-भांति जानते थे कि जैसे ही देवरस का उल्लेख होगा, कोई जिज्ञासु प्रतिभागी आपातकाल के दौरान उनके व्यवहार की व्याख्या मांग सकता है और इससे कई असुविधाजनक प्रश्न उठ सकते थे। लोग पूछ सकते थे कि अंडमान से शीघ्र रिहाई के लिए ब्रिटिश सरकार को दया याचिकाएं भेजने वाले सावरकर, ब्रिटिश शासन द्वारा रखी गई शर्तों का पालन करने का निर्णय लेने वाले गोलवलकर एक निरंकुश शासन के सामने झुककर अपने लोगों को बिना प्रश्न किए उसका अनुसरण करने को कहने वाले हेडगेवार तथा श्रीमती इंदिरा गांधी को अपने संगठन पर लगा प्रतिबंध हटाने के लिए पत्र लिखने वाले देवरस- ताकि वे और उनके लोग उनके द्वारा किए जा रहे ‘राष्ट्र-निर्माण’ के कार्य में शामिल हो सकें- इन सब में क्या अंतर है?
जब हेडगेवार ने देवरस को भगत सिंह से बचाने के लिए सात दिन का अध्ययन वर्ग आयोजित किया!
आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी शासन के सामने आरएसएस का नतमस्तक होना निश्चित रूप से परिवार के लिए एक ‘बुरी कहानी’ है, लेकिन शायद इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि मोहन भागवत के जनसंपर्क कार्यक्रम के दौरान लोगों के साथ उनकी महत्वपूर्ण बातचीत में उनका नाम क्यों नहीं आया। शायद इसका मुख्य कारण यह है कि आरएसएस ने स्वयं को औपनिवेशिक-विरोधी जनसंघर्ष से अलग रखा और देवरस ऐसे व्यक्ति के रूप में उभरते हैं, जो इस रुख से कभी सहज नहीं थे तथा जिन्होंने सर्वोच्च नेता के साथ अपने मतभेद स्वीकार करने में भी स्पष्टवादिता दिखाई।
बालासाहेब देवरस के युवावस्था से जुड़ा एक प्रसंग जिसे उन्होंने स्वयं सुनाया है- इस बात का बड़ा अंतर उजागर करता है कि स्वतंत्रता संघर्ष के संबंध में आरएसएस क्या दावा करता था और वास्तव में क्या करता था। उल्लेखनीय बात यह है कि इसे स्वयं आरएसएस से जुड़े लोगों ने ही प्रकाशित किया है : “जब हम कॉलेज में पढ़ते थे, तब हम भगत सिंह जैसे देशभक्तों के आदर्शों से प्रेरित महसूस करते थे। कई बार हमें ईमानदारी से लगता था कि भगत सिंह की तरह हमें भी कोई साहसिक कार्य करना चाहिए। आरएसएस के भीतर समकालीन राजनीति, क्रांति आदि विषयों पर, जो युवाओं को आकर्षित करते थे, अधिक चर्चा नहीं होती थी। इसलिए हम युवाओं का संघ की ओर आकर्षण कम हो गया था। जब भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दी गई, तो हम इतने उद्वेलित हुए कि हममें से कुछ ने घर छोड़कर अंग्रेजों को चुनौती देने के लिए कोई साहसिक कार्यक्रम शुरू करने का निर्णय लिया। हमें यह भी लगा कि डॉक्टर जी को बताए बिना हमें ऐसा कोई कठोर कदम नहीं उठाना चाहिए। मेरे मित्रों ने तय किया कि मैं डॉ. हेडगेवार को इसकी सूचना दूं।
हम सब डॉक्टर जी से मिलने गए और मैंने उनके सामने अपनी योजना रखी। जब डॉक्टर जी ने यह महान योजना सुनी, तो उन्होंने हमें इस योजना की मूर्खता समझाने और संघ के कार्य की श्रेष्ठता का बोध कराने के लिए एक बैठक आयोजित की। यह बैठक सात दिनों तक सुबह से शाम तक और फिर रात 10 बजे से सुबह 3 बजे तक चलती रही। डॉक्टर जी के गहन विचारों और उनके अमूल्य मार्गदर्शन को सुनकर हमारे विचारों और आदर्शों के प्रति हमारा दृष्टिकोण पूरी तरह बदल गया। उसी दिन से हमने अपनी अव्यावहारिक योजनाएं छोड़ दीं और जीवन में आगे बढ़ने का संकल्प लिया। हमारे जीवन को नई दिशा मिली और हमारा मन स्थिर हो गया।”
इस बात में कोई आश्चर्य नहीं कि हेडगेवार ने देवरस को स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने से बचा लिया। याद रखिए, यह पहली बार नहीं था, जब देवरस ने ब्रिटिश शासन के प्रति आरएसएस नेतृत्व के समझौतापरक रवैये पर अपने मतभेद व्यक्त किए थे। अपनी पुस्तक ‘द आरएसएस : आइकन्स ऑफ द इंडियन राइट’ में लेखक निलंजन मुखोपाध्याय लिखते हैं कि : “1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देवरस ने गोलवलकर से संपर्क किया और महात्मा गांधी के आंदोलन में शामिल होने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने आग्रह किया, “1931 में हेडगेवार ने परांजपे को संघ का दायित्व सौंपकर जंगल सत्याग्रह में भाग लिया था। आपने मुझे वास्तविक सरसंघचालक घोषित किया है और स्वयं को केवल कार्यवाहक बताया है। चूंकि आप पहले से ही संघ का संचालन कर रहे हैं, इसलिए मुझे भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल होने की अनुमति दीजिए, जबकि आप आरएसएस का कार्यभार संभाले रहें।” लेकिन गोलवलकर संघ को अराजनीतिक बनाए रखने के अपने संकल्प पर अडिग रहे।
इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि महान तिलका मांझी (1757 ई.) के नेतृत्व वाले संघर्ष से लेकर ऐतिहासिक भारत छोड़ो आंदोलन (1942) और रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह (1946) तक, भारत में लगभग 200 वर्षों के ब्रिटिश शासन का विभिन्न स्तरों पर और समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा प्रतिरोध किया गया। 20वीं शताब्दी के पहले भाग में कांग्रेस के नेतृत्व में विभिन्न ब्रिटिश-विरोधी शक्तियों का एकीकरण हुआ, कम्युनिस्ट आंदोलन का उदय हुआ, और भगत सिंह तथा चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों के नेतृत्व में क्रांतिकारी आंदोलन विकसित हुआ, जिसने औपनिवेशिक शासन के सामने गंभीर चुनौती प्रस्तुत की। सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय सेना का उदय भी उसी काल का एक यादगार अध्याय है। लेकिन इन सभी घटनाक्रमों और भारतीय जनता की स्वतंत्र होने की बढ़ती आकांक्षाओं ने भी हिंदुत्व विचारकों को अपने संगठनों को इस संघर्ष में शामिल होने के लिए प्रेरित नहीं किया।
वे हमें जो विश्वास दिलाना चाहते हैं, उसके विपरीत हिंदू सांप्रदायिकतावादियों और मुस्लिम सांप्रदायिकतावादियों के बीच कई समानताएं हैं। वीर सावरकर और गोलवलकर जैसे नेताओं के नेतृत्व वाले हिंदू सांप्रदायिकतावादी हों या मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाला समूह- दोनों ने ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में भाग नहीं लिया। ब्रिटिश शासन के प्रति उनका समर्थन इस तथ्य से भी स्पष्ट होता है कि हिंदू महासभा बंगाल और आज के पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन सरकारें चला रही थी। उस समय हिंदू महासभा के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी, शाहिद सुहरावर्दी के नेतृत्व वाली सरकार में, वरिष्ठ मंत्री थे, जबकि उनकी पार्टी के सर्वोच्च नेता सावरकर पूरे देश में सभाएं कर युवाओं से ‘हिंदूकरण करो राष्ट्र का और सैन्यीकरण करो हिंदुत्व का’ के नारे के साथ ब्रिटिश साम्राज्यवादी सेना में भर्ती होने की अपील कर रहे थे।
जिस किसी ने भी स्वतंत्रता संग्राम का अध्ययन किया है, वह जानता है कि हिंदुत्व संगठनों, विशेषकर आरएसएस के लिए यह एक ‘कमज़ोर पक्ष’ था। इस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है कि आरएसएस ने न केवल स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया, बल्कि ‘हिंदुओं को संगठित करने’ पर ध्यान केंद्रित किया और अपने कार्यकर्ताओं को भी आंदोलन में शामिल होने से हतोत्साह किया। वास्तव में उस उथल-पुथल भरे दौर में आरएसएस ने इतनी निंदनीय भूमिका निभाई कि आज उसके लिए अपनी निष्क्रियता का बचाव करना कठिन हो गया है। ऐसे असहज प्रश्नों से बचने के लिए वे या तो उस दौर के किसी नेता को अपना बताकर उसे हिंदुत्व के आदर्शों के निकट दिखाने का प्रयास करते हैं, या फिर संघर्ष में किसी अपेक्षाकृत छोटे पात्र को ‘वास्तविक नायक’ के रूप में प्रस्तुत करते हैं। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को धीरे-धीरे ‘जंगल सत्याग्रह के नेता’ के रूप में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया भी इसी दिशा में दिखाई देती है। शायद इस पूरे प्रसंग का विस्तार से अध्ययन करना आवश्यक है ताकि समझा जा सके कि यह कैसे किया जा रहा है।
हीरो हेडगेवार!
चार साल पहले केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने घोषणा की थी कि महाराष्ट्र के यवतमाल ज़िले के पुसद में 1930 के जंगल सत्याग्रह की स्मृति में एक नया संग्रहालय बनाया जाएगा। बताया गया कि इसे डॉ. के.बी. हेडगेवार को समर्पित किया जाएगा, ‘जिन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन के हिस्से के रूप में पुसद में आंदोलन का नेतृत्व किया था।’ इसमें कोई दो राय नहीं कि आरएसएस के पहले सरसंघचालक हेडगेवार और कुछ संस्थापक सदस्यों ने वास्तव में उपरोक्त सत्याग्रह में भाग लिया था। हेडगेवार को नौ महीने की जेल हुई थी, जिसे बाद में ब्रिटिश सरकार ने कम कर दिया था। लेकिन क्या महज़ इस आधार पर उनके नाम पर स्मारक बनाया जाना वाजिब होगा, क्योंकि वह सिर्फ़ एक सहभागी थे और सत्याग्रह का आवाहन कांग्रेस और उससे जुड़े क्षेत्रीय नेताओं ने किया था ! इस स्मारक को उस परिचित तर्क के आधार पर उचित ठहराया गया था कि जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब उसने स्वतंत्रता संग्राम के वास्तविक नायकों की उपेक्षा की, जिसे मोदी-नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अपने ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ के माध्यम से सुधार रही है।
लेकिन तथ्य इसके विपरीत हैं। जंगल सत्याग्रह का नेतृत्व नागपुर के वकील, स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस नेता एम.वी. अभ्यंकर, अमरावती के मराठी पत्रकार, नाटककार और स्वतंत्रता सेनानी वामनराव जोशी तथा शिक्षाविद, स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस नेशनलिस्ट पार्टी के संस्थापक एम.एस. ‘बापूजी’ अणे जैसे क्षेत्रीय नेताओं ने किया था। यही अणे बाद में गोलवलकर की अत्यंत विवादास्पद पुस्तक ‘वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ की प्रस्तावना भी लिखते हैं, जिसे आरएसएस आज भूल जाना चाहता है।
इस सत्याग्रह के आयोजन का उद्देश्य सरल था। यह गांधीजी की ऐतिहासिक दांडी यात्रा के समर्थन में ब्रिटिशों के उन दमनकारी वन कानूनों के विरोध का आंदोलन था, जो लोगों की जंगलों और वन उपज तक पहुँच को सीमित करते थे। महाराष्ट्र स्टेट गज़ेटियर्स (यवतमाल) इस आंदोलन का विवरण देते हुए लिखता है : “देश के अन्य भागों की तरह बरार में भी वन कानून का उल्लंघन किया गया। एम.वी. अभ्यंकर और वामनराव जोशी को उनके विरोध के कारण गिरफ्तार कर लिया गया। 10 जुलाई 1930 को बापूजी अणे ने ‘फॉरेस्ट सत्याग्रह’ का उद्घाटन करते हुए नेतृत्व संभाला। स्वयंसेवकों के एक दल के साथ उन्होंने यवतमाल के पुसद स्थित आरक्षित वन से घास काटी और गिरफ़्तार कर लिए गए। उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 379 के तहत ‘चोरी’ का आरोप लगाया गया और दोषी ठहराया गया… सत्याग्रह मध्य प्रांत और बरार में फैलने लगा। गोंड और अन्य आदिवासी समुदायों ने भी हज़ारों की संख्या में इसमें भाग लिया।”
इस इतिहास को देखते हुए क्या यह अधिक उचित नहीं होगा कि संग्रहालय अभ्यंकर, जोशी, हज़ारों आदिवासियों तथा अणे को समर्पित हो, जिन्होंने गांधीजी के नमक सत्याग्रह के समर्थन में विधान सभा से इस्तीफ़ा दे दिया था? इसे हेडगेवार की स्मृति को क्यों समर्पित किया जाए, जिन्होंने स्वयं अपने संगठन को आंदोलन में शामिल होने का आह्वान नहीं किया, बल्कि उत्सुक स्वयंसेवकों को भी सक्रिय रूप से इसमें भाग लेने से हतोत्साहित किया था?
हिंदुत्व के समर्थकों द्वारा लिखी गई हेडगेवार की जीवनियां भी इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि उन्होंने “संदेश भेजा कि संघ सत्याग्रह में भाग नहीं लेगा।” 1994 में सुरुचि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित सी.पी. भिशीकर की पुस्तक ‘संघ वृक्ष के बीज : डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार’ को हेडगेवार की आधिकारिक जीवनी माना जाता है। इसमें उस समय संगठन की सोच का विस्तार से उल्लेख है। वे लिखते हैं, “महात्मा गांधी ने लोगों से सरकार के विभिन्न कानूनों को तोड़ने का आह्वान किया था। गांधीजी स्वयं दांडी यात्रा करके नमक सत्याग्रह (37) शुरू कर चुके थे। डॉक्टर साहब [हेडगेवार] ने हर जगह संदेश भेजा कि संघ सत्याग्रह में भाग नहीं लेगा। हालांकि जो लोग व्यक्तिगत रूप से भाग लेना चाहते थे, उन्हें रोका नहीं गया। इसका अर्थ यह था कि संघ का कोई भी जिम्मेदार कार्यकर्ता सत्याग्रह में भाग नहीं ले सकता था।”
हेडगेवार सत्याग्रह में आरएसएस के प्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि अपनी व्यक्तिगत क्षमता में शामिल हुए। उद्देश्य यह था कि “उन्हें विभिन्न स्थानों के देशभक्त युवाओं से परिचित होने का अवसर मिलेगा… जिससे भविष्य में संघ के कार्यों के विस्तार में बहुत सहायता मिलेगी।” ये वाक्य ‘हेडगेवार : द इपोक मेकर’ (38) के पृष्ठ 111 पर दर्ज हैं, जिसे 2021 में एच.वी. शेषाद्रि द्वारा संपादित और साहित्य सिंधु प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया।
एन.एच. पालकर, जिन्होंने मराठी में हेडगेवार की जीवनी लिखी है और जिसकी भूमिका एम.एस. गोलवलकर, संघ के दूसरे सरसंघचालक, ने लिखी है, इस बात पर और प्रकाश डालते हैं कि हेडगेवार उन स्वयंसेवकों से क्या कहते थे, जो आंदोलन में शामिल होना चाहते थे : ‘यदि तुम्हें दो वर्ष की सज़ा मिले, तो क्या तुम उसके लिए तैयार हो?’ जब युवक इस दंड को सहने की तैयारी दिखाते, तब डॉक्टर [हेडगेवार] कहते, ‘जब तुम अंग्रेजों की सज़ा भुगतने के लिए इतना समय देने को तैयार हो, तो संघ के काम के लिए इतना समय क्यों नहीं दे सकते?’
1974 में भारतीय विचार साधना, नागपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगुरुजी समग्र दर्शन- एम.एस. गोलवलकर के हिंदी संकलित कार्य के चौथे खंड के पृष्ठ 39 और 40 पर भी एक ऐसा ही प्रसंग वर्णित है, जिसमें हेडगेवार के नेतृत्व में आरएसएस द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन से सचेत रूप से दूर रहने का उल्लेख है। ये सभी उदाहरण दिखाते हैं कि संघ नेतृत्व का समझौतापरक रवैया केवल जंगल सत्याग्रह तक सीमित नहीं था, बल्कि बाद के दौर में भी बना रहा।
हेडगेवार विश्व इतिहास के एक ऐसे विशिष्ट दौर में जीवित थे, जब पुराना सामंती उपनिवेशवाद टूट रहा था और एक नई दुनिया आकार ले रही थी। फिर भी वे हिंदुत्व की ‘गौरवशाली परंपराओं’ पर आधारित एक हिंदू राष्ट्र की कल्पना करते रहे, जिसमें मुसलमानों को ब्रिटिश उपनिवेशवादियों से भी बड़ा प्रतिद्वंद्वी माना गया। परिणामस्वरूप उन्होंने अपना पूरा जीवन अंग्रेजों के विरुद्ध उभरती हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़ने में लगा दिया। जंगल सत्याग्रह में उनकी भागीदारी का उद्देश्य ब्रिटिश शासन का विरोध करना या औपनिवेशिक शासन के प्रति आक्रोश व्यक्त करना नहीं था, बल्कि क्षेत्र के युवाओं से संपर्क स्थापित करना और “उन्हें आरएसएस के दायरे में लाना” था।
संघ परिवार के समर्थक चाहे जो दावा करें, हेडगेवार की नई छवि उभारने की कवायद अंदर से खोखली है। उन्हें जंगल सत्याग्रह का नेता घोषित करना उन देशभक्तों के साथ अन्याय होगा, जिन्होंने जोखिम उठाया। हक़ीक़त यही है कि संघ को औपचारिक तौर पर भी इस सत्याग्रह से दूर रखने के लिए सक्रिय हेडगेवार- जिनका मकसद कुछ युवकों को ‘संघ के दायरे में लाना था’ देशभक्तों का उपहास करने में भी संकोच नहीं करते थे, जो देश की स्वतंत्रता के लिए जेल गए थे। हेडगेवार : द इपोक मेकर के अनुसार उन्होंने कहा था : “आजकल जेल जाना देशभक्ति का प्रतीक माना जाता है… जब तक इस प्रकार की क्षणिक भावना की जगह स्थायी समर्पण और निरंतर प्रयास नहीं आते, तब तक देश का उद्धार नहीं हो सकता।”
हमें ये सभी तथ्य जनता के सामने रखने चाहिए ; ये सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं और स्पष्ट करते हैं कि प्रस्तावित संग्रहालय एक काल्पनिक विचार को समर्पित है। ऐसा गढ़ा हुआ अतीत इतिहास को जीवित नहीं करेगा, बल्कि आंदोलन के वास्तविक नेताओं को मौन कर देगा और उन्हें प्रभावी रूप से इतिहास से ग़ायब कर देगा। नागरिकों को सरकार से कहना चाहिए कि यदि हेडगेवार पर संग्रहालय बनना ही है, तो वह जनता के कर के धन पर नहीं बनना चाहिए।
जो लोग भारत को हिंदू राष्ट्र में बदलना चाहते हैं, वे अपने संस्थापकों को महान नायकों के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं। उनके प्रयास तीसरे सरसंघचालक बालासाहेब देवरस के उस कथन की याद दिलाते हैं, जो प्रसिद्ध लेखक-पत्रकार रामबहादुर राय के अनुसार जनसत्ता हिंदी समाचार पत्र (28 जून 2003) में प्रकाशित हुआ था: “हम स्वतंत्रता की बस पकड़ने से चूक गए।” समाचार पत्र के अनुसार देवरस ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था कि औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष के दौरान स्थापित होने के बावजूद आरएसएस स्वतंत्रता को निकट आता नहीं देख सका और “घटनाओं के प्रवाह से अभिभूत हो गया।”
शायद हिंदुत्व के समर्थकों को यह स्वीकार करने की आवश्यकता है कि वे वास्तव में बस चूक गए थे, क्योंकि वे एक अलग बस में सवार हो गए थे, जिसने उन्हें इतिहास के गलत पक्ष पर पहुंचा दिया। और तमाम देशभक्त और क्रान्तिकारी ताक़तों का यह जिम्मा बनता है कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस विवादास्पद अतीत से पूरी तरह वाक़िफ़ रहे। उन्हें इस बात का बार-बार एहसास दिलाते रहने की ज़रूरत है कि अब आप कितनी भी क़वायद कर लें, इसमें अपना नाम दर्ज नहीं कर सकते हैं।
(लेखक वामपंथी विचारक और दलित व मानवाधिकार आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता हैं।)




