मुरलीधरन
भारत के संविधान की शुरुआत “हम, भारत के लोग…” से होती है। ये सिर्फ प्रस्तावना के शब्द नहीं, बल्कि भारतीय गणराज्य की बुनियादी राजनीतिक अवधारणा हैं। इनमें यह विचार निहित है कि संप्रभुता जनता में है और नागरिकता किसी विशेषाधिकार का नाम नहीं, बल्कि गणराज्य की सदस्यता का संवैधानिक आधार है। इसके साथ समान अधिकार, समान सम्मान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में समान भागीदारी जुड़ी हुई है।
इसी संदर्भ में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण हो जाता है। 17 जुलाई 2026 को कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एसआईआर नागरिकता निर्धारित करने की प्रक्रिया नहीं है और मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटाए जाने का अर्थ यह नहीं है कि उसकी नागरिकता समाप्त हो गई। यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है जब मतदाता सत्यापन को नागरिकता और उससे जुड़े अधिकारों के व्यापक सवालों से जोड़कर देखा जा रहा है। लेकिन यहीं से असली सवाल भी पैदा होता है कि अगर एसआईआर नागरिकता तय करने की प्रक्रिया नहीं है, तो इसके दौरान किसी व्यक्ति की मतदाता पात्रता पर उठे सवालों के सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक परिणाम कितनी दूर तक जा सकते हैं?
भारत को देखने के दो नज़रिए
एसआईआर की प्रक्रिया को भारत के विचार को लेकर चल रही गहरी वैचारिक लड़ाई से अलग करके नहीं समझा जा सकता। आज़ाद भारत का जन्म राष्ट्रवाद की अलग-अलग और विरोधी धारणाओं के बीच से हुआ था। इनमें से एक धारणा संविधान में अभिव्यक्त हुई है, जिसमें भारत को लोगों की संप्रभुता पर आधारित एक गणतंत्र के रूप में देखा गया है, जहां धर्म, जाति या सामाजिक पृष्ठभूमि से परे, हर नागरिक को समान राजनीतिक अधिकार मिलने थे।
दूसरी अवधारणा एम.एस. गोलवलकर की किताब ‘वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ (हम, या हमारा परिभाषित राष्ट्रीयत्व) में पेश की गई है, जिसके अनुसार, भारत को मुख्य रूप से एक हिंदू राष्ट्र माना गया है, जहाँ राष्ट्रीय पहचान संवैधानिक नागरिकता से कम और सांस्कृतिक जुड़ाव से ज़्यादा तय होती थी। यह फ़र्क बहुत महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ सालों में मोदी सरकार ने नागरिकता से जुड़े जो कई तरह के कदम उठाए हैं, उन्हें समझने के लिए यह बात बहुत ज़रूरी है।
संविधान के अनुसार, नागरिकता ही राजनीतिक सदस्यता का आधार है। कोई व्यक्ति अपने धर्म, जाति, भाषा या सांस्कृतिक पहचान की वजह से गणतंत्र का हिस्सा नहीं बनता। अंबेडकर, जो राष्ट्र की सांप्रदायिक अवधारणाओं के कड़े आलोचक भी थे, ने कहा था: “भले ही यह अजीब लगे, लेकिन ‘एक राष्ट्र बनाम दो राष्ट्र’ के मुद्दे पर सावरकर और जिन्ना एक-दूसरे के विरोधी होने के बजाय, इस पर पूरी तरह सहमत हैं। दोनों ही इस बात से सहमत हैं और न सिर्फ सहमत हैं, बल्कि ज़ोर भी देते हैं कि भारत में दो राष्ट्र हैं : एक मुस्लिम राष्ट्र और दूसरा हिंदू राष्ट्र। उनके बीच मतभेद सिर्फ़ उन शर्तों और नियमों को लेकर है, जिनके आधार पर इन दोनों राष्ट्रों को बनाना चाहिए।”
सार्वभौमिक मताधिकार की जनवादी बुनियाद
भारतीय संविधान ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को लोकतंत्र की बुनियादी शर्त बनाया। अनुच्छेद 325 धर्म, नस्ल, जाति या लिंग के आधार पर किसी व्यक्ति को मतदाता सूची से बाहर रखने की मनाही करता है, जबकि अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार की व्यवस्था करता है। मतदान का अधिकार इसलिए महज चुनाव में हिस्सा लेने का अधिकार नहीं है। यह वह माध्यम है जिसके जरिए नागरिक अपनी राजनीतिक संप्रभुता का इस्तेमाल करते हैं।
दिल्ली के जीबी रोड की यौनकर्मी रीता के अनुभव में इस अधिकार का अर्थ बेहद स्पष्ट दिखाई देता है। द हिंदू की 9 अगस्त 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने मतदान को “किसी हद तक बराबरी का एहसास” देने वाला अनुभव बताया। सामाजिक कलंक, आर्थिक कठिनाई और बहिष्करण के बीच यह एहसास कि उनके वोट का मूल्य भी किसी अमीर और प्रभावशाली व्यक्ति के वोट के बराबर है, बराबरी वाली नागरिकता की ताकत को सामने लाता है। यही वजह है कि मतदाता सूची का शुद्ध और नियमित रूप से अद्यतन होना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह भी है कि इस प्रक्रिया में वास्तविक मतदाताओं को मनमाने ढंग से बाहर न किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट के स्पष्टीकरण की भी सीमाएं हैं
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव आयोग मतदाता सूची में संशोधन तो कर सकता है, लेकिन नागरिकता तय नहीं कर सकता, फिर भी चुनावी सत्यापन के दौरान प्रतिकूल निष्कर्ष के ऐसे परिणाम हो सकते हैं, जो चुनावी प्रक्रिया से कहीं आगे तक जाते हैं। जिस व्यक्ति की पात्रता पर सवाल या विवाद पैदा होता है, उसे लंबी प्रशासनिक जांच, कानूनी कार्यवाही और अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है।
डॉ. खालिदा खातून का अनुभव इस मुश्किल को अच्छी तरह दिखाता है। 23 अप्रैल, 2026 को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखते हुए, उन्होंने बताया कि उन्हें तब कैसा लगा, जब उन्हें पता चला कि उनका नाम “जांच-पड़ताल” के दायरे में डाल दिया गया है- जिसका मतलब था कि उन्हें “संदिग्ध” मतदाता मान लिया गया है। उन्होंने अपनी पढ़ाई-लिखाई के कागज़ात, आज़ादी से पहले की ज़मीन के दस्तावेज़ और अपने दादा-दादी व परदादा के नाम जमा किए, यह उम्मीद करते हुए कि मामला ठीक हो जाएगा। फिर भी, उनके अनुसार, ये दस्तावेज़ जमा करने के बाद भी उन्हें “अमान्य और अवैध मतदाता” घोषित कर दिया गया। “मतदाता सूची की जांच” और “नागरिकता की जांच” के बीच का फ़र्क तब बहुत धुंधला हो गया, जब एक मशहूर अंग्रेज़ी अख़बार के पूर्व संपादक के पासपोर्ट नवीनीकरण तभी किया गया, जब यह सरकार के लिए शर्मिंदगी की वजह बन गया।
कागज़ नहीं दिखाएंगे का संदर्भ
पिछले एक दशक में, देश में नागरिकता, दस्तावेज़ों और पहचान को केंद्र में रखकर कई कवायदें की गई हैं। इनमें असम में नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी), नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लागू करना, देशव्यापी एनआरसी करने के लिए बार-बार आए प्रस्ताव और तथाकथित “अवैध घुसपैठियों” के ख़िलाफ़ लगातार गढ़े जा रहे आख्यान शामिल हैं। एसआईआर को इसी व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। हालांकि इन सभी कदमों की अपनी अलग-अलग खासियतें हैं, लेकिन कुल मिलाकर, इन्होंने एक ऐसा माहौल बनाने में योगदान दिया है, जिसमें नागरिकता को तेज़ी से दस्तावेज़ों, सत्यापन और सरकारी जांच-पड़ताल से जोड़ा जा रहा है। यह अकारण नहीं था कि सीएए/एनआरसी विरोधी प्रदर्शनों के दौरान “कागज़ नहीं दिखाएंगे” विरोध का एक सशक्त नारा बन गया था।
शक के दायरे में नागरिकता
अल्पसंख्यकों को अलग-थलग करने में योगदान देने के मामले में एसआईआर कोई छोटा-मोटा कदम नहीं है, जिन्हें बार-बार शक की नज़र से देखा जाता है। मुस्लिम, खासकर सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले मुस्लिम, एनआरसी और सीएए पर चल रही प्रक्रिया को इसी बहस के संदर्भ में देखते हैं। उनकी चिंताएं ऐसे माहौल में पैदा होती हैं, जहां “घुसपैठियों” को बाहर निकालने की तीखी आवाज़ें आम हो गई हैं और नागरिकता व अपनेपन के सवालों के मायने बदल गए हैं।
8 मई, 2026 को ‘द टेलीग्राफ’ में लिखते हुए, यामिनी अय्यर ने एक हिंदू और एक मुस्लिम महिला के अनुभवों के बीच अंतर को बताया है। यामिनी ने टिटागढ़ की झुग्गियों में रहने वाली एक हिंदू महिला का अनुभव साझा किया है, जिसकी बेटियों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। वह बताती हैं कि महिला अपनी बेटियों के अस्तित्व को “साबित” करने के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ जुटाने में परेशान हो रही थी। उसकी हताशा साफ़ झलक रही थी : “इंसान तो बस अपने अस्तित्व का सबूत देने वाले दस्तावेज़ जुटाते-जुटाते ही मर जाएगा; मरने के बाद भी हमें दस्तावेज़ ही देने होंगे।”
अय्यर ने जिन मुस्लिमों से मुलाक़ात की, उनकी प्रतिक्रिया अलग तरह की थी। वे गुस्सा करने की स्थिति में नहीं थे; इसके बजाय, उनमें सूची में वापस आने के रास्ते खोजने और राज्य द्वारा वैध नागरिक के तौर पर पहचाने जाने की एक शांत बेचैनी थी। साहिदा फ़कीर के परिवार ने भी यही कोशिश की, लेकिन वे नाकाम रहे। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की 10 अगस्त, 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नवी मुंबई के एक बाज़ार से इस 40 साल की बंगाली महिला को उठा लिया गया। परिवार ने उसका जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र, उसके माता-पिता के ज़मीन के कागज़ात और बाकी सभी उपलब्ध पहचान-पत्र दिखाए, लेकिन वे पर्याप्त नहीं लगे। उठाए जाने के तीन दिन के अंदर ही उसे असम की सीमा के रास्ते से बांग्लादेश भेज दिया गया।
सबूत का बोझ किस पर?
साहिदा की तरह, हर किसी के पास मांगे गए दस्तावेज़ नहीं होते। गरीबी, पलायन, विस्थापन, आवास स्थल में बदलाव, शादी, प्राकृतिक आपदाएं वगैरह, ये सभी चीज़ें किसी व्यक्ति के दस्तावेज़ी सबूत पेश करने की क्षमता पर असर डालती हैं। राशन कार्ड, जो पहले हर काम के लिए इस्तेमाल होने वाला दस्तावेज़ था, उससे अब हम एक ऐसे दौर में पहुंच गए हैं, जहाँ पासपोर्ट को भी बस एक मामूली ‘यात्रा दस्तावेज़’ माना जाता है। ज़ाहिर है, बार-बार दस्तावेज़ जमा करने का बोझ उन लोगों पर ज़्यादा पड़ता है, जो सरकारी प्रक्रियाओं को समझने और उनसे निपटने में सबसे कम सक्षम होते हैं — जैसे गरीब परिवार, प्रवासी मज़दूर, महिलाएं, दलित, आदिवासी, धार्मिक अल्पसंख्यक, बुज़ुर्ग और विकलांग लोग।
असम का अनुभव भी देता है चेतावनी
13 जुलाई, 2026 को एक और अहम फ़ैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया में गंभीर कमियां पाते हुए असम के विदेशी अधिकरण के कई फ़ैसलों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि नागरिकता से जुड़ी कार्यवाही यांत्रिक, मनमानी या एकतरफ़ा नहीं हो सकती। इसका असर असम से बाहर ज़्यादा पड़ता हैं। नागरिकता ही नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की बुनियाद है। इसलिए ऐसी प्रक्रियाएं, जिनसे यह तय हो कि किसी व्यक्ति को नागरिक माना जाए या नहीं, उन्हें निष्पक्षता, सोच-समझकर फ़ैसला लेने और उचित कानूनी प्रक्रिया जैसी संवैधानिक गारंटियों के अनुरूप होना चाहिए।
असम का अनुभव एक महत्वपूर्ण चेतावनी देता है। एनआरसी को नागरिकों की पहचान करने की एक प्रशासनिक प्रक्रिया के रूप में पेश किया गया था। व्यवहार में, यह आज़ाद भारत में दस्तावेज़ों की जाँच-पड़ताल की सबसे बड़ी प्रक्रियाओं में से एक बन गई, जिसके कारण 19 लाख से ज़्यादा लोगों को अंतिम सूची से बाहर कर दिया गया। एसआईआर की वजह से पहले ही करोड़ों लोगों को मतदाता सूची से हटाया जा चुका है।
अपील का अधिकार कितना प्रभावी?
जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं, उन्हें भरोसा दिया जाता है कि उनके पास अपील करने का कानूनी अधिकार है। लेकिन पश्चिम बंगाल से सामने आ रहे अनुभव इनकी प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करते हैं। नाम हटाए जाने के खिलाफ़ चुनौतियों की सुनवाई के लिए बनाए गए अपीलीय अधिकरण पहले से ही कई लाख मामलों के भारी बैकलॉग का सामना कर रहे हैं। अनुमानों के अनुसार, इन मामलों के निपटारे में दशकों लग जाएंगे।
इसके अलावा, यह भी एक बड़ा सवाल है कि इस अधिकार का इस्तेमाल करने की क्षमता किन लोगों के पास है? एक दिहाड़ी मज़दूर कितने दिनों का काम छोड़ने को तैयार होगा? क्या प्रवासी मज़दूर, बुज़ुर्ग आदिवासी, मदद पर निर्भर विकलांग और गरीब परिवार के लोग, जो कागज़ात जुटाने के लिए ही संघर्ष कर रहे होंगे, एक साधन-संपन्न व्यक्ति की तरह ही अपील की प्रक्रिया तक पहुँच पाएँगे?
असली सवाल राजनीतिक संदर्भ का
लोकतांत्रिक अधिकार से इस इंकार को उस राजनैतिक संदर्भ से अलग नहीं किया जा सकता, जिसमें एसआईआर थोपा जा रहा है। यही वह राजनीतिक संदर्भ है, जिसने मुस्लिमों और हाशिए पर मौजूद अन्य समुदायों के बीच वास्तविक चिंता पैदा की है, जिन्हें भाजपा-आरएसएस द्वारा लगातार शक के दायरे में रखा जा रहा है। इसलिए, मौजूदा बहस के सांप्रदायिक पहलू को सिर्फ़ एसआईआर से जुड़े कानूनी प्रावधानों की जांच करके नहीं समझा जा सकता। इसे उस राजनीतिक माहौल के संदर्भ में समझना होगा, जिसमें ये प्रावधान लागू किए जा रहे हैं। जो प्रशासनिक शक्तियां आम तौर पर निष्पक्ष लग सकती हैं, वे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और कानूनी उपायों तक असमान पहुंच वाली स्थितियों में इस्तेमाल किए जाने पर बहुत असमान नतीजे दे सकती हैं।
संविधान को कमजोर करने का रास्ता
दस्तावेज़ों पर बार-बार ज़ोर देना, कुछ समुदायों की नागरिकता पर सवाल उठाने वाले राजनीतिक अभियान चलाना और बड़े पैमाने पर प्रशासनिक प्रक्रियाओं के ज़रिए नागरिकता को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिशें- ये सभी भारतीय गणराज्य के स्वरूप को बदलने की व्यापक राजनीतिक परियोजना का हिस्सा हैं। अंबेडकर की चेतावनी भविष्यमूलक साबित हुई है। 4 नवंबर, 1948 को संविधान सभा में उन्होंने कहा था-
“हालांकि हर व्यक्ति लोकतांत्रिक संविधान के शांतिपूर्ण कामकाज के लिए संवैधानिक नैतिकता के प्रसार की ज़रूरत को मानता है, लेकिन इससे जुड़ी दो ऐसी बातें हैं, जिन्हें दुर्भाग्य से आम तौर पर नहीं समझा जाता। पहली बात यह है कि प्रशासन के स्वरूप का संविधान के स्वरूप से गहरा संबंध होता है। प्रशासन का स्वरूप संविधान के स्वरूप के अनुरूप और उसी की भावना के अनुसार होना चाहिए। दूसरी बात यह है कि संविधान का स्वरूप बदले बिना ही, प्रशासन के स्वरूप में बदलाव करके संविधान को बिगाड़ना, और प्रशासन को संविधान की मूल भावना के खिलाफ या असंगत बनाना पूरी तरह से संभव है।”
यही चेतावनी आज के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण सवाल बनकर सामने आती है। अब यह बात साबित हो रही है कि न्यूरेमबर्ग जैसे कानून के बिना भी संविधान को कमजोर किया जा सकता है। संविधान को कमजोर करने के लिए हमेशा संविधान की धाराओं को बदलना जरूरी नहीं होता। कभी-कभी प्रशासनिक प्रक्रियाओं, सत्यापन की कसौटियों और नागरिकों पर डाले गए प्रमाण के बोझ के जरिए भी नागरिकता के अर्थ को धीरे-धीरे बदला जा सकता है। इसलिए एसआईआर पर बहस का असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किसका नाम मतदाता सूची में रहेगा और किसका नहीं। असली सवाल यह है कि भारतीय गणराज्य अपने नागरिकों को किस नजर से देखता है- समान अधिकारों वाले नागरिक के रूप में या लगातार अपनी नागरिकता साबित करने वाले संदिग्ध व्यक्ति के रूप में? यही वह बिंदु है जहां एसआईआर की बहस वोटर लिस्ट से आगे निकलकर संविधान और भारतीय गणराज्य के भविष्य की बहस बन जाती है।
(लेखक माकपा के केंद्रीय सचिव मंडल के सदस्य हैं।)




