मणिपुर से जामिया तक सवालों के घेरे में मोदी का राजधर्म

मणिपुर में हिंसा, अरुणाचल में जनाक्रोश और दिल्ली के जामिया में छात्रों के आंदोलन पर पुलिस की कार्रवाई के बीच काशी एयर शो में पीएम मोदी की मौजूदगी। क्या सत्ता के उत्सव में नागरिकों की पीड़ा और लोकतांत्रिक जवाबदेही पीछे छूट रही है?

लोकतंत्र में सत्ता की असली परीक्षा उसके उत्सवों से नहीं, संकट के समय उसके आचरण से तय होती है। जब देश के किसी हिस्से में लोग हिंसा के साये में जी रहे हों, कहीं विकास परियोजना को लेकर जनता और सरकार आमने-सामने हों और देश की राजधानी में छात्र अपने लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हों, तब सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री की भूमिका केवल सरकार की उपलब्धियों का प्रदर्शन करने तक सीमित नहीं रह सकती। उनसे यह अपेक्षा भी की जाती है कि वे देश के नागरिकों की पीड़ा, असुरक्षा और असंतोष को समझें और उसके समाधान के लिए जवाबदेही तय करें।

25 अक्टूबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी में भारतीय वायुसेना के ‘विंग्स ओवर गंगा’ एयर शो में शामिल हुए। वायुसेना की क्षमता का प्रदर्शन राष्ट्रीय सुरक्षा और गौरव से जुड़ा आयोजन है। इस पर किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? लेकिन उसी समय मणिपुर से हिंसा की खबरें आ रही थीं, अरुणाचल प्रदेश में सियांग जलविद्युत परियोजना के विरोध ने उग्र रूप ले लिया था और दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ चुनाव बहाल करने की मांग पर आंदोलन कर रहे छात्रों के साथ पुलिस का टकराव सुर्खियों में था।

एक तरफ आसमान में राष्ट्रीय शक्ति का प्रदर्शन था, दूसरी तरफ जमीन पर नागरिकों के सामने सुरक्षा, अधिकार और प्रतिनिधित्व के सवाल थे। यह विरोधाभास अपने आप में सरकार की विफलता का प्रमाण नहीं है, लेकिन विरोधाभास यह जरूर पूछता है कि सत्ता की प्राथमिकताओं में आम नागरिक की चिंता का स्थान कितना है। क्या सरकार की सफलता का आकलन केवल भव्य आयोजनों और उपलब्धियों की तस्वीरों से होगा या उन लोगों की स्थिति से भी होगा जो सुरक्षा, न्याय और अपनी बात सुने जाने की मांग कर रहे हैं? और यहीं से शुरू होता है प्रधानमंत्री द्वारा राजधर्म को निभाने का सवाल।

मणिपुर : शांति के आश्वासन और जमीनी हकीकत

मणिपुर की हिंसा भारतीय शासन व्यवस्था के सामने सबसे गंभीर सवालों में से एक बनी हुई है। मई 2023 में शुरू हुए जातीय संघर्ष ने राज्य के सामाजिक ताने-बाने को गहरी चोट पहुंचाई। हजारों परिवार विस्थापन और असुरक्षा से प्रभावित हुए। समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ा और सामान्य जनजीवन को पटरी पर लाने की कोशिशें लगातार चुनौती का सामना करती रहीं। अक्टूबर 2026 में भी राज्य के विभिन्न इलाकों से हत्याओं, गोलीबारी और घरों में आग लगाए जाने की खबरें सामने आईं। इन घटनाओं में अलग-अलग समुदायों के लोग मारे गए और कई परिवारों को नुकसान उठाना पड़ा। मतलब यह कि शांति बहाली का सवाल अभी समाप्त नहीं हुआ है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ताजा हिंसा में कई लोगों की जानें गईं हैं और कई घर जलाए गए।

यहां सबसे बड़ा सवाल केंद्र सरकार की जवाबदेही का है। यह सही है कि कानून-व्यवस्था मुख्य रूप से राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन जब किसी राज्य में लंबे समय तक जातीय संघर्ष बना रहे, तब केंद्र सरकार अपनी जिम्मेदारी से अलग नहीं हो सकती। सुरक्षा व्यवस्था, राजनीतिक संवाद, समुदायों के बीच विश्वास बहाली और शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में केंद्र की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्रालय को यह स्पष्ट करना चाहिए कि मणिपुर में स्थायी शांति के लिए क्या ठोस रणनीति अपनाई जा रही है। विस्थापित परिवारों की सुरक्षित वापसी, हिंसा के मामलों में न्याय, हथियारबंद समूहों की गतिविधियों पर नियंत्रण और प्रभावित समुदायों के बीच भरोसा बहाल करने के लिए क्या समयबद्ध योजना है?

राजधर्म का अर्थ सिर्फ संवैधानिक पद पर बने रहना नहीं है। उसका व्यापक अर्थ है कि शासन किसी नागरिक को असुरक्षा और उपेक्षा के हवाले न छोड़े। मणिपुर के लोगों को केवल सामान्य स्थिति बहाल होने के सरकारी दावों की जरूरत नहीं है। उन्हें ऐसा माहौल चाहिए जिसमें वे बिना भय के अपने घरों में लौट सकें, काम कर सकें और अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोच सकें। अगर हिंसा की नई घटनाएं सामने आती रही हैं, तो सरकार को अपने प्रयासों की समीक्षा करनी ही होगी। शांति का दावा तभी विश्वसनीय होगा जब वह प्रभावित नागरिकों के जीवन में दिखाई दे।

अरुणाचल प्रदेश : विकास के नाम पर ये कैसा भविष्य?

अरुणाचल प्रदेश के सियांग क्षेत्र में प्रस्तावित लगभग 11,200 मेगावाट की सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर उठा विवाद भी सरकार की प्राथमिकताओं की परीक्षा ले रहा है। 23 अक्टूबर की रात शुरू हुई हिंसक घटनाओं में प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर एनएचपीसी कार्यालय और पुलिस थाने में आग लगा दी तथा राजनीतिक नेताओं के आवासों को नुकसान पहुंचाया। पुलिस के अनुसार, कई सुरक्षाकर्मी घायल हुए। इसके बाद प्रशासन ने कुछ क्षेत्रों में लोगों के जमावड़े पर प्रतिबंध लगाए और केंद्र ने अतिरिक्त सुरक्षा बल भेजे।

इन घटनाओं में हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की निंदा होनी चाहिए। किसी आंदोलन की मांग चाहे कितनी भी महत्वपूर्ण क्यों न हो, हिंसा उसका उचित विकल्प नहीं हो सकती। लेकिन इस तथ्य को स्वीकार करने के बाद भी एक जरूरी सवाल बचता है: आखिर स्थानीय स्तर पर इतना असंतोष पैदा क्यों हुआ? सियांग परियोजना के समर्थक इसे ऊर्जा, जल प्रबंधन और सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताते हैं। चीन की ओर से ब्रह्मपुत्र की ऊपरी धारा पर बड़ी जलविद्युत परियोजना को देखते हुए भारत की रणनीतिक चिंताएं भी वास्तविक हैं। लेकिन दूसरी ओर, स्थानीय समुदायों को विस्थापन, जमीन, पर्यावरण, आजीविका और नदी के भविष्य को लेकर आशंकाएं हैं।

इन चिंताओं का उत्तर केवल सुरक्षा बलों की तैनाती से नहीं दिया जा सकता। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भी परियोजना पर विरोध कर रहे संगठनों और हितधारकों से बातचीत का आमंत्रण दिया है तथा सार्वजनिक सहमति की आवश्यकता पर जोर दिया है। अब इस संवाद को वास्तविक, पारदर्शी और प्रभावी बनाने की जरूरत है। राष्ट्रीय हित का अर्थ स्थानीय लोगों के हितों को अनदेखा करना नहीं हो सकता। राजधर्म की कसौटी यहां भी यही है कि सरकार जनता को केवल निर्णयों का प्राप्तकर्ता न समझे, बल्कि उसे निर्णय प्रक्रिया का सहभागी बनाए। यदि विकास की परियोजना और स्थानीय जनता के बीच विश्वास का संकट पैदा हो गया है, तो सरकार की जिम्मेदारी उस संकट को दूर करना है।

छात्र सवाल पूछें तो जवाब संवाद से मिलेगा या पुलिस से?

दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया विवि में छात्र संघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर चल रहा आंदोलन इस बहस को देश की राजधानी के केंद्र में ले आता है। छात्रों का कहना है कि उन्हें अपने प्रतिनिधि चुनने और विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने अपनी समस्याएं उठाने के लिए निर्वाचित मंच चाहिए। अक्टूबर में यह आंदोलन तेज हुआ, कुछ छात्र भूख हड़ताल पर बैठे और परिसर में तनाव बढ़ गया। 25 अक्टूबर को पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाया और छात्रों को हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आईं। छात्रों और उनके संगठनों ने कार्रवाई में बल प्रयोग के आरोप लगाए।

इन घटनाओं के सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है। पुलिस और प्रशासन के पक्ष को भी तथ्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए। लेकिन इससे छात्रों की मूल मांग समाप्त नहीं हो जाती। छात्र संघ चुनावों का सवाल विश्वविद्यालय में प्रतिनिधित्व और जवाबदेही से जुड़ा है। विश्वविद्यालय केवल पढ़ाई और परीक्षा पास करने की जगह नहीं होते। वे नागरिक चेतना, विचारों की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक व्यवहार सीखने के भी महत्वपूर्ण केंद्र हैं। छात्रों को अपनी समस्याएं उठाने और उनके समाधान की मांग करने का अवसर मिलना चाहिए। किसी भी आंदोलन में नियमों का पालन जरूरी है, लेकिन प्रशासन की जिम्मेदारी भी है कि वह संवाद के रास्ते बंद न करे।

यदि छात्र अपने प्रतिनिधियों को चुनने की मांग कर रहे हैं, तो विश्वविद्यालय प्रशासन को नियमों, कानूनी प्रावधानों और व्यावहारिक विकल्पों के आधार पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। आंदोलन को अनिश्चितकाल तक खिंचने देना, परिसर में तनाव बढ़ने देना और फिर पुलिस की मदद से स्थिति संभालने की कोशिश करना समाधान का पर्याप्त विकल्प नहीं है।
छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर बहस केवल जामिया तक सीमित नहीं रहती। यह उस व्यापक राजनीतिक संस्कृति की ओर संकेत करती है जिसमें असहमति को किस तरह देखा जाता है। सवाल पूछने वाले नागरिकों को संवाद के माध्यम से जवाब दिया जाएगा, या उन्हें ऐसी परिस्थिति में धकेल दिया जाएगा जहां उनकी आवाज ही विवाद का विषय बन जाए? लोकतंत्र में व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है, लेकिन व्यवस्था का अर्थ नागरिकों की आवाज को दबा देना नहीं है। कानून लागू करने वाली संस्थाओं की शक्ति के साथ उनकी जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

प्रतीकों से आगे बढ़कर जिम्मेदारी निभाने का सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति में बड़े सार्वजनिक आयोजन, राष्ट्रीय गौरव और विकास के प्रतीक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। काशी में एयर शो जैसे आयोजन इसी व्यापक राजनीतिक दृश्य का हिस्सा हैं। इनमें भारतीय सैन्य क्षमता का प्रदर्शन होता है और जनता के बीच राष्ट्रीय उपलब्धियों को लेकर उत्साह पैदा होता है। लेकिन किसी प्रधानमंत्री की भूमिका केवल प्रतीकों के निर्माण तक सीमित नहीं हो सकती। उनसे यह अपेक्षा भी की जाती है कि वे देश के अलग-अलग हिस्सों में पैदा हुए संकटों पर स्पष्ट रुख अपनाएं, जवाबदेही सुनिश्चित करें और उन नागरिकों को भरोसा दें जिन्हें लगता है कि उनकी समस्याएं शासन की प्राथमिकताओं में पीछे छूट रही हैं।

यहां हम ये बिलकुल नहीं कह रहे हैं कि मणिपुर में हिंसा या जामिया में आंदोलन के कारण काशी का एयर शो नहीं होना चाहिए था। देश की शासन व्यवस्था को अनेक काम एक साथ करने होते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीय आयोजन के साथ-साथ इन संकटों पर भी उसी स्तर की राजनीतिक गंभीरता दिखाई जा रही है? प्रधानमंत्री के पास सार्वजनिक मंच है, राजनीतिक प्रभाव है और सरकार की नीतियों को दिशा देने की जिम्मेदारी है। वह इन साधनों का इस्तेमाल संकटग्रस्त नागरिकों को भरोसा देने, संबंधित सरकारों और संस्थाओं से जवाब मांगने तथा समाधान की दिशा में प्रगति सुनिश्चित करने के लिए कर सकते हैं।

मणिपुर के मामले में स्थायी शांति की समयबद्ध रूपरेखा, अरुणाचल में स्थानीय समुदायों के साथ वास्तविक संवाद और जामिया में छात्र प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर पारदर्शी समाधान ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सरकार की गंभीरता को ठोस कदमों से परखा जाना चाहिए। राजधर्म की अवधारणा का राजनीतिक अर्थ भी यही है कि सत्ता अपने अधिकारों के साथ अपनी जिम्मेदारियों को पहचाने। सत्ता का सम्मान केवल उसके पद, प्रतिष्ठा और शक्ति से नहीं बनता। वह इस बात से भी बनता है कि संकट के समय वह कितनी संवेदनशीलता दिखाती है और कमजोर या असहमत नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करती है।

राष्ट्रीय गौरव का अर्थ नागरिकों का भरोसा भी है

देश की सुरक्षा, वायुसेना की क्षमता, आर्थिक विकास और बड़ी आधारभूत परियोजनाओं का अपना महत्व है। लेकिन इन सबका अंतिम उद्देश्य नागरिकों के जीवन को सुरक्षित और बेहतर बनाना होना चाहिए। यदि विकास की चमक के बीच नागरिक अपनी जमीन और आजीविका को लेकर चिंतित हैं, यदि किसी राज्य में लोग हिंसा के भय से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं और यदि विश्वविद्यालय के छात्र अपने प्रतिनिधित्व की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं, तो सरकार को इन सवालों का जवाब देना होगा।

निश्चित रूप से मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और जामिया की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। इनके कारण, प्रशासनिक संदर्भ और समाधान भी अलग-अलग हैं। लेकिन तीनों घटनाएं शासन के सामने एक साझा कसौटी रखती हैं कि क्या सरकार नागरिकों की बात सुनती है, क्या निर्णयों में पारदर्शिता है और क्या प्रशासनिक शक्ति का इस्तेमाल जवाबदेही के साथ किया जाता है? राजधर्म का अर्थ केवल यह नहीं कि सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखे। उसका अर्थ यह भी है कि नागरिकों को न्याय मिले, उनकी गरिमा सुरक्षित रहे और उन्हें अपनी बात कहने का अवसर मिले। लोकतंत्र में असहमति कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे हर हाल में समाप्त करना हो। वह शासन को अपनी नीतियों और फैसलों की समीक्षा करने का अवसर भी देती है।

काशी के आसमान में विमानों की उड़ान देश की शक्ति का प्रतीक हो सकती है। लेकिन लोकतंत्र की शक्ति का मूल्यांकन उन नागरिकों के अनुभव से भी होगा जो हिंसा से मुक्ति, अपने अधिकारों की रक्षा और अपनी बात सुने जाने की मांग कर रहे हैं। प्रधानमंत्री के सामने चुनौती किसी एक आयोजन को चुनने या छोड़ने की नहीं है। चुनौती यह है कि राष्ट्रीय गौरव के प्रतीकों और नागरिकों की वास्तविक समस्याओं के बीच कोई दूरी न बनने दी जाए। सरकार को यह दिखाना होगा कि उसकी प्राथमिकताओं में संकटग्रस्त नागरिक, असहमत छात्र और अपने भविष्य को लेकर चिंतित स्थानीय समुदाय भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने बड़े आयोजन और राष्ट्रीय उपलब्धियां। राजधर्म की सार्थकता सत्ता के प्रदर्शन में नहीं, बल्कि नागरिकों की सुरक्षा, न्याय और सम्मान सुनिश्चित करने में है। प्रधानमंत्री से यही अपेक्षा की जाती है कि वे इन सवालों का जवाब भाषणों या प्रतीकों से नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई और परिणामों से दें।

Previous articleलोकतंत्र की जंग या चुनावी टकराव? खड़गे के बयान से गरमाई सियासत
Next articleमानहानि केस में राहुल गांधी बरी, अमित शाह पर टिप्पणी को कोर्ट ने नहीं माना मानहानि
प्रवीण कुमार
पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक का अनुभव रखता हूं। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों के साथ काम करते हुए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर निरंतर लेखन करता आ रहा हूं। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं और डिजिटल मीडिया कंसल्टेंसी से भी जुड़ा हूं। बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और भगवत गीता के विचार मेरे लेखन और जीवन-दृष्टि को दिशा देते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here