तीन राज्यों के विधानसभा उपचुनावों के नतीजे केवल रिक्त सीटें भरने तक सीमित नहीं रहे। बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात के परिणामों ने अलग-अलग राजनीतिक संदेश दिए हैं। यदि गुजरात में भाजपा ने अपनी पारंपरिक ताकत बरकरार रखी तो मध्य प्रदेश के दतिया ने उसे आत्ममंथन का संकेत दिया। लेकिन सबसे बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम बिहार के बांकीपुर में देखने को मिला, जहां जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर (PK) ने भाजपा के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले गढ़ों में से एक पर कब्जा कर राष्ट्रीय राजनीति का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
“बांकीपुर ने बता दिया कि बिहार की राजनीति अब केवल भाजपा बनाम राजद नहीं रही। प्रशांत किशोर ने तीसरे विकल्प की बहस को चुनावी जमीन पर उतार दिया है।”
बांकीपुर विधानसभा सीट केवल एक सामान्य सीट नहीं थी। यह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की लगातार पांच बार की जीत वाली सीट रही है। उनके राज्यसभा जाने के बाद हुए उपचुनाव को भाजपा अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर देख रही थी। लेकिन परिणाम ने इस राजनीतिक गणित को पूरी तरह बदल दिया।
प्रशांत किशोर ने 64,151 वोट हासिल कर भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार को 19,324 मतों से पराजित किया। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि भाजपा और राजद- दोनों के कुल वोट जोड़ दिए जाएं, तब भी वे प्रशांत किशोर के वोटों से लगभग पांच हजार कम पड़ते हैं। यह आंकड़ा केवल जीत का अंतर नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीतिक मनोवृत्ति की ओर भी संकेत करता है।
यह परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि लंबे समय से बिहार की राजनीति भाजपा-एनडीए और राजद-कांग्रेस गठबंधन के बीच सिमटी हुई दिखाई देती रही है। बांकीपुर ने पहली बार यह संदेश दिया है कि यदि कोई तीसरा विकल्प विश्वसनीयता और संगठन के साथ मैदान में उतरता है तो मतदाता पारंपरिक ध्रुवीकरण से बाहर निकलने का फैसला भी कर सकता है।
हालांकि इस परिणाम के साथ चुनाव आयोग की मतगणना प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में रही। मतगणना के दौरान आयोग की वेबसाइट पर राउंड की संख्या लगातार बदलती रही। पहले 31, फिर 32, फिर 36 और उसके बाद दोबारा 32 राउंड दिखाई देने लगे। हालांकि अंतिम परिणाम पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा, लेकिन इस तकनीकी गड़बड़ी ने चुनावी पारदर्शिता को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी।
उधर मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर कांग्रेस ने भाजपा को सीधा झटका दिया। कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने 6,016 मतों से जीत दर्ज की। भाजपा ने यहां अपने वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा था। परिणाम ने भाजपा की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए। आशुतोष तिवारी अपने पूर्ववर्ती नेता नरोत्तम मिश्रा के पोलिंग बूथ तक पर बढ़त नहीं बना सके।
दतिया का एक और महत्वपूर्ण पहलू आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) का प्रदर्शन रहा। पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव को 14 प्रतिशत से अधिक वोट मिले। सामान्य परिस्थितियों में इसे कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध माना जा सकता था, लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस की जीत यह संकेत देती है कि भाजपा विरोधी वोटों में असंतोष इतना व्यापक था कि त्रिकोणीय मुकाबले के बावजूद सत्ता पक्ष को लाभ नहीं मिल सका।
वहीं गुजरात के मांजलपुर ने अपेक्षित परिणाम दिया। भाजपा उम्मीदवार सतेन्द्रभाई (सतीश) पटेल ने कांग्रेस प्रत्याशी भिखाभाई रबारी को 30 हजार से अधिक मतों के अंतर से पराजित कर यह संदेश दिया कि गुजरात में भाजपा का संगठनात्मक आधार अब भी मजबूत बना हुआ है। हालांकि इस जीत के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक राजनीतिक चर्चा बिहार और मध्य प्रदेश के परिणामों की ही हो रही है।
इन तीनों परिणामों को एक साथ देखें तो तस्वीर दिलचस्प बनती है। भाजपा गुजरात में मजबूत दिखती है, लेकिन बिहार में उसके सबसे सुरक्षित माने जाने वाले किले में सेंध लगी है और मध्य प्रदेश में उसे संगठनात्मक फैसलों की कीमत चुकानी पड़ी है। दूसरी ओर कांग्रेस को दतिया में राहत मिली है, लेकिन गुजरात में वह अब भी निर्णायक चुनौती देने की स्थिति में नहीं दिखाई देती।
सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ यदि किसी नेता को मिला है तो वह प्रशांत किशोर हैं। लंबे समय तक चुनावी रणनीतिकार के रूप में पहचान रखने वाले प्रशांत किशोर अब पहली बार चुनावी राजनीति में अपनी वैचारिक और संगठनात्मक स्वीकार्यता का दावा मजबूत करते दिखाई दे रहे हैं। बांकीपुर की जीत उन्हें बिहार विधानसभा चुनाव से पहले एक गंभीर राजनीतिक खिलाड़ी के रूप में स्थापित करती है।
उपचुनावों के ये नतीजे भले ही संख्या के लिहाज से छोटे हों, लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव आने वाले महीनों की रणनीतियों पर साफ दिखाई देगा। विशेष रूप से बिहार में अब मुकाबला केवल एनडीए और महागठबंधन तक सीमित रहेगा या जन सुराज नई धुरी बनेगी- यह सवाल इन परिणामों के बाद और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
बांकीपुर की जीत को केवल एक सीट की जीत मानना भूल होगी। यह उस राजनीतिक प्रयोग की पहली बड़ी सफलता है जिसमें मतदाता ने पारंपरिक दलों से अलग विकल्प को मौका दिया है। भाजपा के लिए यह संकेत है कि संगठन की मजबूत मानी जाने वाली सीटें भी अब पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं, जबकि राजद के लिए संदेश और भी गंभीर है कि विपक्ष का प्राकृतिक केंद्र बने रहने का दावा चुनौती के दौर में प्रवेश कर चुका है। दूसरी ओर दतिया ने दिखाया कि केवल नेतृत्व परिवर्तन से चुनाव नहीं जीते जाते और गुजरात ने फिर याद दिलाया कि भाजपा का सबसे मजबूत किला अभी भी वहीं खड़ा है।
PK को भाजपा-राजद के कुल वोटों से भी ज्यादा वोट
जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर ने बांकीपुर उपचुनाव में 64,151 वोट (49.23%) हासिल कर जीत दर्ज की। भाजपा के नीरज कुमार को 44,827 वोट (34.40%) मिले। दोनों के बीच जीत का अंतर 19,324 वोट रहा। राजद की रेखा कुमारी 14,273 वोट (10.95%) के साथ तीसरे स्थान पर रहीं। भाजपा और राजद को मिलाकर 59,100 वोट मिले, जो अकेले प्रशांत किशोर के वोटों से 5,051 कम हैं। यह उनकी मजबूत बढ़त को दिखाता है। चुनाव में कुल 1,30,313 वोट पड़े। इनमें से लगभग हर दूसरा वोट प्रशांत किशोर के पक्ष में गया। NOTA को 646 वोट (0.50%) मिले। वहीं, शीर्ष तीन उम्मीदवारों के बाद कोई भी प्रत्याशी 1,000 वोट तक नहीं पहुंच सका। चौथे स्थान पर रहे मनोरंजन कुमार श्रीवास्तव को 973 वोट (0.75%) मिले।
दतिया में ASP ने काटे वोट फिर भी जीत गई कांग्रेस
कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने दतिया उपचुनाव में 66,757 वोट (42.39%) हासिल कर जीत दर्ज की। भाजपा के आशुतोष तिवारी को 60,741 वोट (38.57%) मिले। दोनों के बीच जीत का अंतर 6,016 वोट रहा। तीसरे स्थान पर आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के दामोदर यादव ‘मंडल’ रहे। उन्हें 22,527 वोट (14.30%) मिले। कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला कड़ा रहा, लेकिन आजाद समाज पार्टी ने भी अच्छी-खासी हिस्सेदारी लेकर चुनाव को त्रिकोणीय बनाया। चुनाव में कुल 1,57,499 वोट पड़े। इनमें कांग्रेस और भाजपा को मिलाकर 1,27,498 वोट, यानी करीब 81% वोट मिले। वहीं तीसरे स्थान पर रहे दामोदर यादव को अकेले 14.30% वोट मिले।




