कुछ खास मुद्दे, कुछ खास गणित या फिर कुछ खास समीकरण का ही तो नाम है आम चुनाव जिसको लेकर पूरे देश का तापमान इस वक्त कुलांचे मार रहा है। चार चरण का चुनाव संपन्न हो चुका है जिसमें उत्तर प्रदेश की कुल 80 में से 40 सीटें भी शामिल हैं। बाकी बची 40 सीटों में पीएम नरेंद्र मोदी का भी चुनाव है, राहुल गांधी का भी चुनाव है।
चुनावी लिहाज से और केंद्र की सत्ता पर काबिज होने की दृष्टि से उत्तर प्रदेश सबसे जरूरी राज्य है। उत्तर प्रदेश की 80 सीटें ही तय करती है कि दिल्ली के तख्तोताज पर कौन बैठेगा।
ऐसे तो राजनीतिक तौर पर यूपी को पूर्वांचल, पश्चिमांचल, अवध और बुंदेलखंड चार हिस्सों में बांटकर चुनावी विश्लेषण कर सकते हैं लेकिन हम यहां खासतौर से अवध क्षेत्र की बात करेंगे क्योंकि अवध के बारे में मिथ है कि जिसने अवध को साध लिया, दिल्ली में सरकार उसी की बनती है।
अवध क्षेत्र में 5 मंडल के तहत 20 जिले हैं
लखनऊ मंडल – लखनऊ, लखीमपुर खीरी, हरदोई, कन्नौज, रायबरेली, सीतापुर।
कानपुर मंडल – कानपुर देहात, कानपुर नगर, औरैया।
अयोध्या मंडल – अयोध्या, सुल्तानपुर, अमेठी।
प्रयागराज मंडल – प्रयागराज, कौशांबी, फतेहपुर, प्रतापगढ़।
देवीपाटन मंडल – बलरामपुर, श्रावस्ती, बहराइच, गोंडा।
राजनीतिक रूप से अवध क्षेत्र की महत्ता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि देश के पांच प्रधानमंत्री इसी इलाके से चुनकर गए- फूलपुर से पंडित जवाहरलाल नेहरू, प्रयागराज जो तब इलाहाबाद होता था से लाल बहादुर शास्त्री, रायबरेली से इंदिरा गांधी, फतेहपुर और फूलपुर से विश्वनाथ प्रताप सिंह और लखनऊ से अटल बिहारी वाजपेयी।
साल 2014 की बात करें तो मोदी लहर में भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में निर्णायक जीत दर्ज की थी। 78 सीटों पर चुनाव लड़कर बीजेपी 71 जीत गई। अमेठी और रायबरेली छोड़कर पूरे अवध ने नरेंद्र मोदी को वोट दिया। 2019 में भी यही पैटर्न दिखा। इस बार तो कांग्रेस के हाथ से उसका पुराना गढ़ अमेठी भी चला गया जहां स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को हरा दिया था। रायबरेली के अलावा अवध की एक सीट ऐसी नहीं थी, जिसपर भाजपा ने जीत न दर्ज की हो।
अवध क्षेत्र में जातीय समीकरण पूरे सूबे के जातीय समीकरण से अलग नहीं है। 22 प्रतिशत दलित, 16 से 18 प्रतिशत यादव, 13 से 14 प्रतिशत ब्राह्मण, और 7 प्रतिशत मुस्लिम। चुनावी लिहाज से किसी एक जाति का कोई प्रभुत्व नहीं दिखता।
हालांकि, ओबीसी जातियों खासकर यादव, कुर्मी और लोदी की इस बेल्ट में अच्छी खासी संख्या है। कुछ जिलों में कुछ खास जाति-समुदाय की संख्या ज्यादा है जैसे, बहराइच, लखनऊ, लखीमपुर खीरी में मुस्लिम आबादी अच्छी खासी है। लखीमपुर में सिक्ख भी मिलते हैं। लेकिन पहले के मुकाबले सवर्णों का वोट यहां ज्यादा संगठित है जो आज की तारीख में बीजेपी के साथ है।
2014 के बाद एक और बदलाव दिखा वह यह कि यादवों के अलावा जो कुर्मी वोट थे, पहले सपा के वोटर हुआ करते थे उसका एक बड़ा हिस्सा भाजपा के पाले चला गया है।
2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बड़ी जीत मिली थी। 20 में से 18 सीटों पर बीजेपी के प्रत्याशियों ने जीत दर्ज कर तमाम राजनीतिक विश्लेषकों की भविष्यवाणी को झुठला दिया। दरअसल, इस इलाके में बड़ी संख्या में कोरी, पासी, नाई, वाल्मीकि, निषाद जो पहले सपा और बसपा के कोर वोटर थे उन्होंने बीजेपी को चुना।
2024 की बात करें इसमें कोई दो राय नहीं कि बीजेपी इस क्षेत्र में अभी भी मजबूत दिख रही है। लेकिन चुनाव का स्थानीय मुद्दों पर हो जाना, हिन्दुत्व और मंदिर का कार्ड नहीं चलना, पाकिस्तान का मुद्दा बेअसर होना बीजेपी के माथे पर चिंता की लकीर को गहरा कर रहा है। 20 में से 8 सीटें ऐसी हैं जहां बीजेपी को हार का डर सता रहा है।
इन 8 सीटों में रायबरेली भी है, अमेठी, कन्नौज, कानपुर, प्रयागराज और अयोध्या भी है। असल में 10 साल की मोदी सत्ता को लेकर सूबे में एंटी इन्कम्बेंसी तो है ही। अग्निवीर योजना से लोग खासे नाराज है, पेपर लीक और बेरोजगारी के मसले से युवा वोटर बेहद नाराज है। युवाओं की ये नाराजगी इंडिया गठबंधन को फायदा पहुंचा रही है।
बसपा के वोट बैंक की बात करें तो उसका वोटर अपनी पार्टी को ठीक से लड़ता हुआ नहीं देख रहा। उसके ऊपर से सपा और कांग्रेस ने जिस तरह से बहन मायावती को बीजेपी की बी टीम के तौर पर प्रचारित कर दिया उस वजह से दलित वोटरों का एक बड़ा चंक सपा-कांग्रेस की तरफ देख रहा है। अगर यह वाकई वोट में परिणत हो गया तो सपा-कांग्रेस गठबंधन 10 सीटें भी निकाल ले जा सकती है।




