सवाल चुनाव आयोग के इकबाल का है

चुनाव आयोग की ताकत फैसलों में नहीं, भरोसे में होती है। दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों, SIR की प्रक्रिया और नियुक्ति व्यवस्था को लेकर उठे सवालों ने आयोग की संस्थागत पारदर्शिता और विश्वसनीयता को फिर से बहस के केंद्र में ला दिया है।

राधा रमण

देश की सबसे अहम संवैधानिक संस्थाओं में शामिल चुनाव आयोग की विश्वसनीयता इस समय गंभीर सार्वजनिक बहस के केंद्र में है। विपक्षी दल लंबे समय से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते रहे हैं। लेकिन हाल में इंडियन एक्सप्रेस की एक विस्तृत रिपोर्ट ने विवाद को नया आयाम दे दिया है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और चुनाव आयोग की भूमिका एक रेफरी की तरह होती है। रेफरी चाहे खेल का हो या लोकतंत्र के महापर्व का, उसकी जीत किसी एक पक्ष की जीत में नहीं, बल्कि मुकाबले की निष्पक्षता में निहित होती है। लेकिन जब रेफरी की निष्पक्षता पर ही सवाल उठने लग जाएं, तो पूरे मुकाबले की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।

अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने 28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच करीब दस महीनों में चुनाव आयोग के फैसलों पर 14 बार आपत्ति जताई। इतना ही नहीं, 16 अप्रैल को एक ही दिन में चार आपत्तियां दर्ज कराई गईं। इनकी प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त समेत उन उप चुनाव आयुक्तों को भी भेजी गईं, जो संबंधित कार्यों की निगरानी कर रहे थे। इन आपत्तियों का प्रमुख विषय स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) की पारदर्शिता और उससे जुड़ी प्रक्रियाएं थीं। यह वही प्रक्रिया है, जिसके तहत मतदाता सूची का पुनरीक्षण किया जाता है, नये मतदाताओं के नाम जोड़े जाते हैं और मृत, अपात्र या डुप्लीकेट नामों को हटाया जाता है।

लोकतंत्र में मतदाता सूची ही मतदान के अधिकार का आधार होती है। यदि मतदाता सूची की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाए, तो चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। दोनों चुनाव आयुक्तों ने नये मतदाताओं को जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया पर आपत्तियां जताई हैं। उन्होंने एसआईआर के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले फॉर्म-6 में बदलाव को अनधिकृत और अवैध बताया है। साथ ही, मतदाता डाटाबेस के दिल्ली में केंद्रीकरण और राज्यों के अधिकारियों की उस तक पहुंच न होने पर भी सवाल उठाए हैं।

अखबार का दावा है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सॉफ्टवेयर और आईटी प्रणाली से जुड़ी चिंताओं से कैबिनेट सचिव को भी अवगत कराया था। यदि इन आपत्तियों और शिकायतों का विवरण सही है, तो यह महज प्रशासनिक असहमति का मामला नहीं रह जाता। यह चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया, पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही से जुड़ा गंभीर सवाल बन जाता है। दोनों चुनाव आयुक्तों की शिकायत है कि कई आदेश उनकी जानकारी के बिना जारी किये गए। यही इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर पहलू है। आखिर जिस संस्था के फैसले करोड़ों नागरिकों के मतदान के अधिकार को प्रभावित करते हैं, वहां निर्णय लेने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और सामूहिक है?

चुनाव आयोग पहले एक सदस्यीय संस्था था। वर्ष 1993 में इसे तीन सदस्यीय बनाया गया। उस समय टी.एन. शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे। तत्कालीन सरकार ने एम.एस. गिल और जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति को भी चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया था। इस व्यवस्था के खिलाफ शेषन सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। अदालत ने न केवल तीन सदस्यीय चुनाव आयोग की व्यवस्था को बरकरार रखा, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि तीनों चुनाव आयुक्तों के अधिकार समान होंगे। वरिष्ठता के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त बैठकों की अध्यक्षता करेंगे, लेकिन फैसले आम सहमति या बहुमत से लिये जाएंगे। ऐसे में मौजूदा विवाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित संस्थागत व्यवस्था की भावना के विपरीत दिखाई देता है। यदि तीन में से दो चुनाव आयुक्तों ने 14 बार आपत्तियां दर्ज कराईं और इसके बावजूद उन पर समुचित विचार नहीं हुआ, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या आयोग वास्तव में सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के तहत काम कर रहा है?

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का विवाद भी इसी संदर्भ में समझना होगा। वर्ष 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की तीन सदस्यीय समिति की सलाह पर की जाएगी। बाद में केंद्र सरकार ने पहले अध्यादेश और फिर संसद में कानून बनाकर इस व्यवस्था में बदलाव किया तथा मुख्य न्यायाधीश की जगह केंद्र सरकार के एक मंत्री को समिति में शामिल करने का प्रावधान किया। उस समय सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि संसद को कानून बनाने का अधिकार है और अदालत संसद से ऊपर नहीं हो सकती। लेकिन सवाल केवल संसद की विधायी शक्ति का नहीं, बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया में स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने का भी है। यदि नियुक्ति प्रक्रिया पर ही राजनीतिक प्रभाव के आरोप लगते रहें, तो संस्था की स्वतंत्रता को लेकर संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।

नये कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को कार्यकाल के दौरान उनके आधिकारिक कृत्यों के संबंध में विशेष कानूनी संरक्षण भी दिया गया है। इस प्रावधान और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती लंबित है। बीते दिनों सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने टिप्पणी की थी कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संस्था है, लेकिन उसकी स्वतंत्रता उसके कार्यों में भी दिखाई देनी चाहिए। यही इस पूरे विवाद का केंद्रीय सवाल है। संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता केवल कानून की किताबों में दर्ज प्रावधानों से सुनिश्चित नहीं होती। उसका वास्तविक प्रमाण उनके फैसलों, कार्यप्रणाली और सार्वजनिक जवाबदेही में दिखाई देता है।

विपक्षी दल लंबे समय से चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका आरोप है कि एसआईआर के जरिये 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए और इससे एक राजनीतिक दल को लाभ पहुंचाने की कोशिश हुई। इन आरोपों को चुनाव आयोग ने किस हद तक स्वीकार या खारिज किया है, यह अलग विषय है। लेकिन नये खुलासों के बाद मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों की गंभीरता बढ़ गई है। एसआईआर के तहत अकेले पश्चिम बंगाल में लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने की खबरें सामने आई हैं। इनमें से करीब 22 लाख मतदाताओं ने आयोग के फैसले को चुनौती दी। अप्रैल से अब तक ट्रिब्यूनलों ने 1,26,194 मामलों का निपटारा किया, जिनमें 1,13,943 मतदाताओं के नाम बहाल किये गए। यानी निपटाए गए मामलों में करीब 90 प्रतिशत मतदाताओं को राहत मिली।

यह आंकड़ा अपने आप में महत्वपूर्ण है। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हटाए गए सभी नाम गलत थे, लेकिन यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं को अपने नाम बहाल कराने के लिए अपील और कानूनी प्रक्रिया का सहारा क्यों लेना पड़ा। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिन मतदाताओं के नाम बाद में बहाल हुए, वे यदि पिछले विधानसभा चुनाव में मतदान नहीं कर सके, तो उनके लोकतांत्रिक अधिकारों की भरपाई कैसे होगी? मतदाता सूची को शुद्ध करने का उद्देश्य जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी पात्र नागरिक का नाम गलती से न कटे।

अब तक एसआईआर के दो चरणों में बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गोवा, लक्षद्वीप तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह सहित विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में यह प्रक्रिया कराई जा चुकी है। तीसरे चरण में दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड, झारखंड, महाराष्ट्र, मणिपुर, पंजाब, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम और ओडिशा में भी इसे आगे बढ़ाया जा रहा है। ऐसे में प्रक्रिया की पारदर्शिता और नागरिकों की सुविधा का महत्व और बढ़ जाता है। एसआईआर के दौरान मतदाताओं से पूछे जा रहे सवालों और दस्तावेजों की मांग को लेकर कई विवाद सामने आए हैं।

नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन से कथित तौर पर उनकी और उनकी मां की उम्र के बीच अंतर को लेकर सवाल किया गया। नये मतदाताओं से उनके पिता का नाम पिछली एसआईआर में दर्ज नहीं होने का कारण पूछा जा रहा है। दिल्ली की मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व चुनाव आयुक्त और पूर्व वायुसेना अध्यक्ष तक को नोटिस भेजे जाने की खबरें सामने आई हैं। ये कुछ चर्चित उदाहरण हैं। आम नागरिकों को इस प्रक्रिया में किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, इसका पूरा आकलन सार्वजनिक रूप से सामने आना चाहिए। मतदाताओं से नागरिकता संबंधी प्रमाण मांगे जाने के आरोप भी गंभीर हैं। मतदाता सूची का पुनरीक्षण करना चुनाव आयोग का वैधानिक दायित्व है, लेकिन इस प्रक्रिया में नागरिकता संबंधी जांच और मतदाता पात्रता के नियमों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

एक ओर चुनाव आयोग का नारा है कि कोई पात्र मतदाता छूटना नहीं चाहिए, दूसरी ओर यदि पात्र नागरिकों को अपने नाम बचाने या वापस जुड़वाने के लिए अनावश्यक कठिनाइयों से गुजरना पड़े, तो यह विरोधाभास दूर किया जाना चाहिए। मतदाता सूची की शुद्धता और मतदाता के अधिकार एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि लोकतंत्र के दो आवश्यक आधार हैं। विपक्षी दल ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं। नीट पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर चर्चा में रही कॉकरोच जनता पार्टी ने भी उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

राजनीतिक दलों के आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन चुनाव आयोग की विश्वसनीयता का सवाल किसी एक दल या सरकार से कहीं बड़ा है। चुनाव आयोग की साख केवल राजनीतिक दलों के आरोपों या उसके बचाव में जारी बयानों से तय नहीं होगी। इसका फैसला उसकी पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही से होगा। इसीलिए आयोग को मौजूदा विवाद को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने के बजाय आत्ममंथन और सुधार के अवसर के रूप में लेना चाहिए।

बहरहाल, तीनों चुनाव आयुक्तों को एक साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पूरे विवाद पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। एसआईआर की प्रक्रिया, मतदाता सूची में किये गए बदलावों, नाम हटाने और बहाल करने के आंकड़ों तथा संबंधित आईटी प्रणाली की कार्यप्रणाली का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए। साथ ही, आयोग के भीतर असहमति दर्ज करने, उस पर विचार करने और अंतिम निर्णय तक पहुंचने की स्पष्ट व्यवस्था भी सामने रखी जानी चाहिए।

लोकतंत्र में असहमति कमजोरी नहीं, बल्कि संस्थागत मजबूती का प्रमाण होती है। लेकिन जब असहमति दर्ज होने के बावजूद उसका जवाब न मिले और फैसलों की प्रक्रिया पर ही सवाल उठने लगें, तो संस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। सवाल सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त या दो चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद का नहीं है। सवाल किसी एक राजनीतिक दल के आरोप का भी नहीं है। सवाल उस संस्था की विश्वसनीयता का है, जिसके फैसले यह तय करते हैं कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनता की आवाज किस सूची के जरिए दर्ज होगी। इसीलिए सवाल चुनाव आयोग के इकबाल का है और इस सवाल का सबसे मजबूत जवाब पारदर्शिता, जवाबदेही और संस्थागत निष्पक्षता ही हो सकती है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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सत्ता विमर्श डेस्क
सत्ता विमर्श (Satta Vimarsh) नाम ही हमारी पहचान है। हमारा मानना है कि सब कुछ सत्ता के इर्द-गिर्द तय होता है, सरकार भी और सरोकार भी। लेकिन, इस सत्ता में हमारी-आपकी भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सत्ता में बैठे लोगों की। इसीलिए सत्ता और सरोकार से जुड़े मुद्दों पर विमर्श जरूरी है।

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