RBI’s Record Dividend : विकास का वित्तपोषण या भविष्य के संकटों का जोखिम?

देश की केंद्रीय बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) द्वारा वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को 2.87 लाख करोड़ रुपये से अधिक का अधिशेष (सरप्लस) हस्तांतरित करने का निर्णय हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक घटनाओं में से एक है। आरबीआई के इतिहास में यह अब तक का सबसे बड़ा लाभांश हस्तांतरण माना जा रहा है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय निदेशक मंडल की बैठक में इस निर्णय को मंजूरी दी गई।

दिलचस्प बात यह है कि जिस प्रकार अतीत में आरबीआई के लाभांश हस्तांतरण को व्यापक सार्वजनिक और राजनीतिक बहस का विषय बनाया जाता था, इस बार वैसी चर्चा अपेक्षाकृत कम ही दिखाई दी। अधिकांश मुख्यधारा के आर्थिक विश्लेषणों में इसे सरकार के लिए राहत, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच अतिरिक्त संसाधन और विकास कार्यक्रमों के लिए वित्तीय समर्थन के रूप में प्रस्तुत किया गया। जबकि इस निर्णय के दूरगामी आर्थिक प्रभावों पर गंभीर विमर्श जिस अंदाज में होना चाहिए था वह कहीं दिखाई नहीं दिया।

केंद्र सरकार ने अपने बजट में आरबीआई तथा अन्य सरकारी वित्तीय संस्थानों से कुल लगभग 3.16 लाख करोड़ रुपये की लाभांश आय का अनुमान लगाया था। ऐसे में सिर्फ आरबीआई से ही लगभग 2.87 लाख करोड़ रुपये प्राप्त हो जाने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि वास्तविक प्राप्ति अनुमान से काफी अधिक हो सकती है। सरकारी बैंकों, सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों और बीमा कंपनियों के हालिया वित्तीय परिणाम भी उल्लेखनीय रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने रिकॉर्ड लाभ दर्ज किया है, जबकि अन्य सरकारी वित्तीय संस्थानों का प्रदर्शन भी मजबूत रहा है। ऐसे में पूरी संभावना है कि सरकार को बजट अनुमान से कहीं अधिक लाभांश आय प्राप्त हो। यही वजह है कि कई अर्थशास्त्री इस हस्तांतरण को केवल एक नियमित राजस्व प्राप्ति के रूप में नहीं, बल्कि सरकार की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने वाले महत्वपूर्ण घटक के रूप में देख रहे हैं।

आरबीआई का अधिशेष बनता कैसे है?

आरबीआई कोई सामान्य व्यावसायिक बैंक नहीं है, लेकिन उसकी आय के कई स्रोत होते हैं। विदेशी मुद्रा भंडार पर मिलने वाला प्रतिफल, सरकारी प्रतिभूतियों से प्राप्त ब्याज, खुले बाजार परिचालन, रेपो और रिवर्स रेपो लेनदेन, विदेशी मुद्रा विनिमय गतिविधियां तथा अन्य केंद्रीय बैंकिंग कार्य उसकी आय में योगदान देते हैं। इन तमाम आय स्रोतों से प्राप्त रकम में से मुद्रा छपाई, वितरण, प्रशासनिक खर्च, एजेंसी शुल्क और अन्य परिचालन लागतें घटाई जाती हैं। इसके बाद जो अधिशेष बचता है, उसका एक हिस्सा विभिन्न आरक्षित निधियों में रखा जाता है और शेष केंद्र सरकार को हस्तांतरित किया जाता है। यहीं से बहस शुरू होती है। प्रश्न यह नहीं है कि सरकार को लाभांश क्यों दिया गया, बल्कि मूल सवाल यह है कि आरबीआई अपनी आय का कितना हिस्सा भविष्य के जोखिमों के लिए सुरक्षित रखे और कितना हिस्सा सरकार को सौंपे।

आरबीआई आरक्षित निधि का महत्व

केंद्रीय बैंक की आरक्षित निधि केवल एक लेखांकन प्रविष्टि नहीं होती। यह वित्तीय प्रणाली की सुरक्षा का आधार मानी जाती है। वैश्विक वित्तीय संकट, मुद्रा बाजार में अस्थिरता, विदेशी पूंजी के अचानक पलायन या किसी अप्रत्याशित आर्थिक झटके की स्थिति में यही पूंजी सुरक्षा कवच का काम करती है। आरबीआई की आकस्मिक जोखिम निधि (Contingency Risk Buffer) का मकसद ऐसे ही संकटों से निपटने के लिए वित्तीय क्षमता बनाए रखना है। लंबे समय तक आरबीआई का दृष्टिकोण यह रहा कि पर्याप्त पूंजी और रिज़र्व बनाए रखना केंद्रीय बैंक की विश्वसनीयता तथा वित्तीय स्थिरता के लिए जरूरी है। लेकिन पिछले एक दशक में इस विषय पर सरकार और आरबीआई के बीच दृष्टिकोण का अंतर कुछ अलग ही रूप में खुलकर सामने आया है।

बिमल जालान समिति और नई व्यवस्था

2018 में केंद्र सरकार और आरबीआई के बीच पूंजी भंडार के आकार को लेकर विवाद सार्वजनिक रूप से सामने आया था। सरकार का तर्क था कि आरबीआई के पास जरूरत से अधिक पूंजी जमा है और उसका एक बड़ा हिस्सा विकासात्मक जरूरतों के लिए सरकार को उपलब्ध कराया जा सकता है। इस विवाद के समाधान के लिए पूर्व आरबीआई गवर्नर डॉ. बिमल जालान की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति गठित की गई। समिति ने आरबीआई की आर्थिक पूंजी के लिए एक नया ढांचा सुझाया। इसके अनुसार आरबीआई की कुल बैलेंस शीट के अनुपात में आकस्मिक जोखिम निधि को 5.5 प्रतिशत से 6.5 प्रतिशत के बीच रखना पर्याप्त माना गया।

समिति की सिफारिशों के बाद अधिशेष हस्तांतरण की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हुई, लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि इससे केंद्र सरकार को अधिक संसाधन उपलब्ध कराने का रास्ता भी खुल गया। ध्यान देने योग्य बात यह है कि हाल के वर्षों में आरबीआई द्वारा सुरक्षित रखी जाने वाली राशि के अनुपात में भी बदलाव देखने को मिला है। इससे सरकार को मिलने वाले अधिशेष में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

बीते एक दशक आंकड़े क्या बताते हैं?

आरबीआई द्वारा केंद्र सरकार को हस्तांतरित की गई राशि में पिछले दशक के दौरान तेज वृद्धि दर्ज हुई है। मोदी सरकार के कार्यकाल में कुल हस्तांतरण पूर्ववर्ती वर्षों की तुलना में कई गुना बढ़ गया है। विशेष रूप से पिछले तीन वित्तीय वर्षों में ही केंद्र सरकार को आरबीआई से अत्यंत बड़ी मात्रा में अधिशेष प्राप्त हुआ है। समर्थकों का तर्क है कि यह आरबीआई की मजबूत आय, बढ़ते विदेशी मुद्रा भंडार और बेहतर वित्तीय प्रबंधन का परिणाम है। दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि लगातार बढ़ते हस्तांतरण का अर्थ यह भी हो सकता है कि सरकार अपनी वित्तीय जरूरतों की पूर्ति के लिए केंद्रीय बैंक के संसाधनों पर अधिक निर्भर होती जा रही है।

सरकार के समर्थक अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह अतिरिक्त संसाधन बुनियादी ढांचे के निर्माण, सामाजिक कल्याण योजनाओं, सब्सिडी प्रबंधन और वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने में सहायक हो सकता है। वैश्विक स्तर पर ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक तनाव और खाद्य महंगाई जैसी चुनौतियों को देखते हुए अतिरिक्त वित्तीय संसाधन सरकार को अधिक लचीलापन प्रदान करते हैं। उनका तर्क है कि यदि उर्वरक सब्सिडी का बोझ बढ़ता है, ईंधन कीमतों में उछाल आता है या गरीब परिवारों के लिए अतिरिक्त सहायता की जरूरत पड़ती है, तो यह धन उपयोगी साबित हो सकता है।

लेकिन चिंताएं भी कम नहीं

लेकिन आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखने वाले अर्थशास्त्री मानते हैं कि किसी देश की वित्तीय सुरक्षा कोष का उपयोग नियमित सरकारी खर्चों के पूरक के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि केंद्रीय बैंक के रिज़र्व मूलतः संकट की घड़ी के लिए बनाए जाते हैं, न कि सामान्य बजटीय जरूरतों की पूर्ति के लिए। उनकी चिंता यह भी है कि यदि भविष्य में कोई बड़ा वित्तीय या मुद्रा संकट पैदा होता है तो केंद्रीय बैंक की सुरक्षा क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर हो सकती है। हालांकि अभी तक ऐसा कोई प्रत्यक्ष संकेत नहीं है कि आरबीआई की वित्तीय स्थिति कमजोर हुई हो, फिर भी लगातार बढ़ते हस्तांतरण को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

पारदर्शिता की आवश्यकता

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पारदर्शिता है। यदि सरकार को आरबीआई से रिकॉर्ड स्तर का अधिशेष प्राप्त हो रहा है तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि इन संसाधनों का उपयोग किन क्षेत्रों में किया जा रहा है। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि आरबीआई के पास वर्तमान में कितनी आकस्मिक जोखिम निधि उपलब्ध है और भविष्य के संभावित वित्तीय झटकों से निपटने के लिए उसकी तैयारी कितनी मजबूत है।

बहरहाल, आरबीआई द्वारा किया गया रिकॉर्ड लाभांश हस्तांतरण एक महत्वपूर्ण आर्थिक घटना है। इसे केवल सरकार की अतिरिक्त आय या केंद्रीय बैंक की सफलता के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि आर्थिक विकास की तत्काल जरूरतों और दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। किसी भी देश की केंद्रीय बैंकिंग व्यवस्था का मूल उद्देश्य सिर्फ राजस्व उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना भी होता है। इसलिए बहस का केंद्र यह होना चाहिए कि विकास के लिए संसाधनों का उपयोग और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा दोनों लक्ष्यों को किस प्रकार संतुलित किया जाए। यही वह प्रश्न है जो आने वाले वर्षों में आरबीआई और केंद्र सरकार के संबंधों को परिभाषित करेगा।

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प्रवीण कुमार
पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक का अनुभव रखता हूं। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों के साथ काम करते हुए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर निरंतर लेखन करता आ रहा हूं। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं और डिजिटल मीडिया कंसल्टेंसी से भी जुड़ा हूं। बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और भगवत गीता के विचार मेरे लेखन और जीवन-दृष्टि को दिशा देते हैं।

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