नई दिल्ली। पिछले कुछ महीनों से भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों में जिस तरह की तल्खी दिखाई दे रही थी, उसके बीच अचानक आई गर्मजोशी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का दिल्ली दौरा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को व्हाइट हाउस का निमंत्रण और डोनाल्ड ट्रम्प का सार्वजनिक रूप से यह कहना कि “मुझे पीएम मोदी से प्यार है, पीएम मोदी महान हैं”, यह सब सिर्फ सामान्य कूटनीतिक घटनाएं नहीं हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या वाकई दोनों देशों के रिश्ते फिर से पटरी पर लौट रहे हैं, या फिर यह अमेरिका की तरफ से किया जा रहा रणनीतिक ‘डैमेज कंट्रोल’ है?
दरअसल, भारत और अमेरिका के संबंध पिछले एक दशक में काफी मजबूत हुए हैं। रक्षा, टेक्नोलॉजी, व्यापार और इंडो-पैसिफिक रणनीति में दोनों देशों की साझेदारी लगातार बढ़ी है। लेकिन हाल के महीनों में कई ऐसे मुद्दे सामने आए, जिन्होंने रिश्तों में खटास पैदा की। कनाडा में खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद अमेरिका ने कनाडा के समर्थन में भारत पर दबाव बनाया। अमेरिकी एजेंसियों ने भारत पर कथित साजिशों को लेकर सवाल उठाए। इसके अलावा रूस से भारत के तेल और रक्षा संबंधों को लेकर भी वॉशिंगटन की बेचैनी दिखाई दी।
यही वजह थी कि राजनीतिक और रणनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई थी कि क्या भारत-अमेरिका संबंधों में दरार आ रही है। लेकिन अब अचानक अमेरिकी रुख में नरमी दिखाई दे रही है। मार्को रूबियो का दिल्ली दौरा और व्हाइट हाउस से पीएम मोदी को निमंत्रण इस बदलाव का संकेत माना जा रहा है। असल में अमेरिका की चिंता सिर्फ भारत नहीं, बल्कि चीन है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। अमेरिका अच्छी तरह जानता है कि एशिया में चीन को संतुलित करने के लिए भारत उसका सबसे अहम साझेदार है। भारत के बिना अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति अधूरी मानी जाती है। ऐसे में वॉशिंगटन यह जोखिम नहीं लेना चाहता कि रिश्तों में आई तल्खी भारत को अमेरिका से दूर कर दे। यही वजह है कि ट्रम्प प्रशासन अब सार्वजनिक तौर पर मोदी सरकार के प्रति सकारात्मक संदेश देने की कोशिश कर रहा है।
ट्रम्प का “मोदी महान हैं” वाला बयान सिर्फ व्यक्तिगत प्रशंसा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संकेत भी है। अमेरिका यह दिखाना चाहता है कि तमाम मतभेदों के बावजूद भारत उसके लिए प्राथमिकता बना हुआ है। हालांकि, इसे पूरी तरह भावनात्मक या व्यक्तिगत रिश्ता मानना भी गलत होगा। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी दोस्ती नहीं, बल्कि स्थायी हित होते हैं। ट्रम्प का मोदी प्रेम भी उसी रणनीतिक गणित का हिस्सा माना जा रहा है। अमेरिका को भारत की जरूरत है- चाहे वह चीन के खिलाफ रणनीतिक संतुलन हो, सप्लाई चेन का पुनर्गठन हो या फिर एशिया में अमेरिकी प्रभाव को बनाए रखना।
दूसरी तरफ भारत भी इस रिश्ते की अहमियत समझता है, लेकिन अब भारत पहले वाला निर्भर सहयोगी नहीं है। मोदी सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में स्पष्ट किया है कि भारत अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ से समझौता नहीं करेगा। रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत का रुख इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अमेरिका के दबाव के बावजूद भारत ने रूस से तेल खरीदना जारी रखा और रक्षा संबंध भी बनाए रखे। यानी दोनों देशों के रिश्ते अब पुराने ‘सीनियर-जूनियर पार्टनर’ मॉडल से आगे बढ़ चुके हैं। भारत अब बराबरी के आधार पर संबंध चाहता है। यही वजह है कि जब अमेरिका ने भारत पर सार्वजनिक दबाव बनाने की कोशिश की तो नई दिल्ली ने भी उतनी ही स्पष्टता से अपनी नाराजगी जताई।
अब सवाल यह उठता है कि क्या यह नई गर्मजोशी लंबे समय तक टिकेगी? इसका जवाब आसान नहीं है। भारत और अमेरिका के बीच कई साझा हित हैं, लेकिन कई संवेदनशील मतभेद भी बने हुए हैं। मानवाधिकार, रूस, व्यापार शुल्क और खालिस्तान जैसे मुद्दों पर दोनों देशों की सोच अलग-अलग है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि रिश्तों में आई सारी खटास खत्म हो गई है। फिर भी, मौजूदा घटनाक्रम यह जरूर दिखाता है कि दोनों देश रिश्तों को टूटने नहीं देना चाहते। अमेरिका समझता है कि भारत को नाराज करना रणनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है। वहीं भारत भी यह जानता है कि वैश्विक शक्ति संतुलन में अमेरिका के साथ मजबूत संबंध उसकी आर्थिक और सामरिक ताकत को बढ़ाते हैं।
ट्रम्प के बयानों को इसी व्यापक रणनीति के तहत देखा जाना चाहिए। संभव है कि यह बयान तत्काल तनाव को कम करने और राजनीतिक संदेश देने के लिए हों। अमेरिकी चुनावी राजनीति भी इसमें एक फैक्टर हो सकती है। ट्रम्प पहले भी मोदी के साथ अपनी दोस्ती को राजनीतिक रूप से इस्तेमाल करते रहे हैं। “Howdy Modi” और “Namaste Trump” जैसे कार्यक्रम इसकी मिसाल हैं। भारतीय-अमेरिकी वोटर्स के बीच मजबूत छवि बनाना भी ट्रम्प की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। लेकिन केवल चुनावी मजबूरी कहकर इसे खारिज करना भी सही नहीं होगा। हकीकत यह है कि अमेरिका और भारत दोनों एक-दूसरे की जरूरत बन चुके हैं। इसलिए मतभेदों के बावजूद रिश्तों में संवाद और संतुलन बनाए रखने की कोशिश जारी रहेगी।
कुल मिलाकर, ट्रम्प का यह ‘मोदी प्रेम’ पूरी तरह भावनात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक और राजनीतिक दोनों है। इसे अमेरिका की तरफ से रिश्तों में आई दरार को भरने की कोशिश भी कहा जा सकता है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि यह गर्मजोशी सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहती है या फिर दोनों देशों के रिश्तों में वास्तव में एक नए अध्याय की शुरुआत होती है।




