‘जनता की सरकार’ या कॉरपोरेट का चौकीदार?

अबुआ जन की फरियाद नहीं सुन रही अबुआ सरकार” : झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार खुद को “अबुआ सरकार” यानी जनता की अपनी सरकार बताती है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कह रही है। एशिया के सबसे बड़े वन क्षेत्रों में गिने जाने वाले सारंडा जंगल से लेकर चाईबासा की सड़कों तक, जनता आज अपनी ही सरकार के सामने बेबस और अपमानित खड़ी दिखाई देती है।

बीते दिनों सारंडा के जंगल गोलियों की आवाज़ों, अर्धसैनिक बलों की घेरेबंदी और “ऑपरेशन” की खबरों से गूंजता रहा। सत्ता प्रतिष्ठान ने इसे “उग्रवाद खत्म कर विकास लाने” की कार्रवाई बताया। लेकिन सवाल वही पुराना है- क्या विकास का मतलब सिर्फ कॉरपोरेट के रास्तों को सुरक्षित करना है? क्या आदिवासियों और आम नागरिकों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं?

इसी सारंडा क्षेत्र के जिला मुख्यालय चाईबासा में पिछले कई महीनों से लोग एक बेहद बुनियादी मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं- घनी आबादी वाले इलाके में दिन के वक्त भारी वाहनों की “नो एंट्री” लागू की जाए। मांग बहुत मामूली है, लेकिन सरकार और प्रशासन का रवैया ऐसा है मानो जनता ने कोई बगावत छेड़ दी हो।

चाईबासा की जिस सड़क पर “नो एंट्री” (No Entry Movement in Chaibasa) की मांग उठ रही है, वहां चौबीसों घंटे भारी ट्रक और हाइवा बेलगाम रफ्तार में दौड़ते हैं। इस सड़क पर धूल, धुआं और मौत तीनों एक साथ तैरती है। स्कूली बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग हर कोई हर दिन जान जोखिम में डालकर सड़क पार करता है। आए दिन दुर्घटनाएं होती हैं। कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, दर्जनों घायल हो चुके हैं। हर हादसे के बाद सड़क जाम होता है, नारे लगते हैं, ज्ञापन दिए जाते हैं, लेकिन सत्ता के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन सड़कों पर दौड़ने वाले ज्यादातर भारी वाहन बड़े औद्योगिक घरानों और खनन कंपनियों से जुड़े हैं। इसलिए प्रशासन “नो एंट्री” लागू करने से बच रहा है। यानी जनता की सुरक्षा बनाम कॉरपोरेट मुनाफा मे सरकार ने अपना पक्ष चुन लिया है।

मालूम हो कि चाईबासा और आसपास के इलाकों में खनन, थर्मल पावर और बड़े उद्योगों का जाल फैला हुआ है। कोयला, लौह अयस्क और अन्य खनिजों की ढुलाई के लिए हर दिन सैकड़ों भारी वाहन शहर के बीचों-बीच से गुजरते हैं। नतीजा स्थायी प्रदूषण, स्थायी खतरा और स्थायी सरकारी चुप्पी।

विडंबना देखिए कि इलाके के स्थानीय विधायक खुद राज्य के परिवहन मंत्री हैं। चुनाव के वक्त जनता के दरवाजे पर जाकर “जनसेवा” की कसमें खाने वाले मंत्री जी अब जनता की इस बुनियादी मांग पर खामोश हैं, चुप्पी साध ली है। ऐसा लगता है मानो उनकी जिम्मेदारी जनता नहीं, ट्रकों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करना हो।

जब प्रशासन और सरकार ने लगातार शिकायतों को नजरअंदाज किया, तब स्थानीय नागरिकों ने “नो एंट्री आंदोलन समिति” बनाकर शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू किया। 27 सितंबर 2025 को लोगों ने मंत्री आवास पर धरना देकर मांगपत्र सौंपने की घोषणा की। सूचना पहले से दे दी गई थी, लेकिन कार्यक्रम के दिन मंत्री जी जनता का सामना करने के बजाय पहले ही वहां से निकल गए।

धरनास्थल पर भारी पुलिस बल तैनात था, मानो कोई दुश्मन देश की सेना आने वाली हो। शांतिपूर्ण प्रदर्शन चल ही रहा था कि प्रशासन ने बलपूर्वक हस्तक्षेप शुरू कर दिया। बातचीत की जगह अबुआ सरकार की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, लोगों को घसीटा गया और 28 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। इतना ही नहीं, 74 लोगों को नामजद और करीब 1500 अज्ञात लोगों पर गंभीर धाराओं में मुकदमे ठोक दिए गए।

सवाल यह है कि आखिर जनता अपनी जान बचाने की मांग भी नहीं कर सकती? क्या “नो एंट्री” मांगना अब कानून-व्यवस्था के लिए खतरा माना जाएगा? पुलिसिया दमन के खिलाफ अगले ही दिन “चाईबासा बंद” हुआ और शहर ने खुलकर आंदोलन का समर्थन किया। इसके बाद आंदोलन सिर्फ सड़क सुरक्षा का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह सरकार की संवेदनहीनता और दमनकारी रवैये के खिलाफ जनप्रतिरोध में बदलने लगा।

जब राज्य सरकार लगातार अनसुना करती रही तो आंदोलनकारियों ने फैसला किया कि अब वे पैदल रांची जाकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से सीधे मुलाकात करेंगे। 26 अप्रैल से 1 मई तक “न्याय यात्रा” निकाली गई। 150 किलोमीटर से ज्यादा पैदल चलकर लोग राजधानी पहुंचे। रास्ते में कई जगह पुलिस ने रोकने की कोशिश की, लेकिन लोग डटे रहे।

लेकिन रांची पहुंचने पर भी तस्वीर नहीं बदली। मुख्यमंत्री आवास के बाहर बैरिकेड लगा दिए गए। अधिकारियों ने कहा, “मिलने की अनुमति नहीं है।” आंदोलनकारियों का कहना था कि मुख्यमंत्री सचिवालय को पहले ही सूचना दी जा चुकी थी। आखिरकार उनसे कहा गया कि मांगपत्र दे जाइए, मुख्यमंत्री तक पहुंचा दिया जाएगा।

यानी अबुआ जनता पैदल चलकर राजधानी तक आ सकती है, लेकिन अबुआ सत्ता जनता से मिलने के लिए कुछ कदम बाहर नहीं निकल सकती। यह सवाल अब सिर्फ चाईबासा का नहीं है। सवाल यह है कि “अबुआ सरकार” आखिर किसकी सरकार है- जनता की या कॉरपोरेट घरानों की?

चाईबासा नो एंट्री आंदोलन की टाइमलाइन

सितंबर 2025 : स्थानीय नागरिकों, आदिवासी युवाओं और सामाजिक संगठनों ने “नो एंट्री आंदोलन समिति” के गठन की प्रक्रिया शुरू की। मांग थी कि दिन के समय शहर और घनी आबादी वाले इलाकों में भारी वाहनों की एंट्री रोकी जाए।

27 सितंबर 2025 : स्थानीय विधायक एवं झारखंड के परिवहन मंत्री दीपक बिरुआ के चाईबासा स्थित आवास पर धरना-प्रदर्शन और मांग पत्र सौंपने का कार्यक्रम घोषित किया गया। आंदोलनकारियों का आरोप है कि कार्यक्रम के दिन मंत्री आवास छोड़कर चले गए।

27-28 अक्टूबर 2025: तांबो चौक और NH-220 क्षेत्र में बड़ा प्रदर्शन हुआ। भारी वाहनों की आवाजाही रोकने की मांग को लेकर सड़क जाम किया गया। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ। लाठीचार्ज, आंसू गैस और गिरफ्तारी की घटनाएं सामने आईं। कई लोगों पर नामजद और अज्ञात मुकदमे दर्ज किए गए।

29 अक्टूबर 2025 : पुलिस कार्रवाई के विरोध में कोल्हान क्षेत्र में व्यापक बंद और प्रतिवाद हुआ। भाजपा ने भी लाठीचार्ज के खिलाफ बंद का समर्थन किया।

आंदोलन का विस्तार और “न्याय पदयात्रा”

अप्रैल 2026 (प्रारंभ) : हरिगुटू स्थित आदिवासी हो समाज कला-संस्कृति भवन में बैठक हुई। “नो एंट्री आंदोलन समिति, कोल्हान” के नाम से आंदोलन को संगठित स्वरूप दिया गया। रांची तक पदयात्रा निकालने का फैसला हुआ।

14 अप्रैल 2026 : आंदोलन समिति ने औपचारिक रूप से “नो एंट्री न्याय यात्रा” की घोषणा की। बताया गया कि 26 अप्रैल से 1 मई तक चाईबासा से रांची तक पैदल मार्च निकाला जाएगा।

17 अप्रैल 2026 : आंदोलन समिति के प्रतिनिधिमंडल ने झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा। राज्यपाल ने मामले पर संज्ञान लेने और जिला प्रशासन से बात करने का आश्वासन दिया।

26 अप्रैल 2026 : चाईबासा के तांबो चौक से “न्याय पदयात्रा” शुरू हुई। सैकड़ों ग्रामीण, आदिवासी युवा और सामाजिक संगठन शामिल हुए। आंदोलनकारियों ने इसे “जन सुरक्षा और न्याय की लड़ाई” बताया।

29 अप्रैल 2026 : 43 डिग्री तापमान के बीच पदयात्रा खूंटी पहुंची। आंदोलन समिति के संयोजक रमेश बालमुचू ने कहा कि “नो एंट्री लागू कराने के लिए हर संभव संघर्ष जारी रहेगा।”

1 मई 2026 : पदयात्रा रांची पहुंची। मुख्यमंत्री आवास तक मार्च करने की कोशिश कर रहे आंदोलनकारियों को बैरिकेड लगाकर रोका गया। प्रशासन ने पूर्व अनुमति न होने का हवाला दिया, जबकि आंदोलनकारियों का दावा था कि सचिवालय को पहले से सूचना दी गई थी।

मौजूदा हालात यह है कि आंदोलन अभी समाप्त नहीं हुआ है। “नो एंट्री” लागू करने की मुख्य मांग अब भी अधूरी है। पुलिस मुकदमों की वापसी भी बड़ा मुद्दा बन चुका है। आंदोलन धीरे-धीरे सड़क सुरक्षा से आगे बढ़कर “कॉरपोरेट खनन बनाम स्थानीय जीवन” के सवाल में बदलता दिखाई दे रहा है।

क्या है चाईबासा का “नो एंट्री आंदोलन”?

झारखंड का पश्चिमी सिंहभूम इलाका खनिज संपदा से भरपूर माना जाता है। नोआमुंडी, मनोहरपुर, चिरिया और सारंडा क्षेत्र लौह अयस्क खनन के बड़े केंद्र हैं। यहां से निकलने वाला खनिज ट्रकों और हाइवा वाहनों के जरिए लगातार उद्योगों, रेलवे साइडिंग और प्लांटों तक पहुंचाया जाता है।

इसी भारी खनन-आधारित वाहनों का सबसे बड़ा दबाव चाईबासा शहर और आसपास के ग्रामीण इलाकों पर पड़ा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि सैकड़ों भारी वाहन दिन-रात शहर के भीतर और घनी आबादी वाले इलाकों से गुजरते हैं। इससे लगातार सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, स्कूली बच्चों और आम नागरिकों की जान जोखिम में रहती है, धूल और प्रदूषण बढ़ा है। सामान्य जीवन प्रभावित हुआ है। आंदोलन की मुख्य मांग है कि दिन के समय भारी वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाई जाए और “नो एंट्री” व्यवस्था लागू की जाए। लेकिन आंदोलन सिर्फ ट्रैफिक नियंत्रण तक सीमित नहीं रहा। आंदोलनकारियों का आरोप है कि प्रशासन और सरकार खनन कंपनियों तथा औद्योगिक हितों के दबाव में जनता की मांगों को नजरअंदाज कर रही है।

इस आंदोलन को खास बनाती है इसकी सामाजिक संरचना। इसमें बड़ी संख्या में आदिवासी युवा, ग्रामीण, महिलाएं और स्थानीय सामाजिक संगठन शामिल हैं। आंदोलन का केंद्र सिर्फ “सड़क सुरक्षा” नहीं बल्कि “जीने का अधिकार” और “जनता बनाम कॉरपोरेट मॉडल” का सवाल बनता जा रहा है। आंदोलन को उस समय और धार मिली जब अक्टूबर 2025 में पुलिस लाठीचार्ज और गिरफ्तारी की घटनाएं हुईं। इसके बाद “मुकदमे वापस लो” और “पुलिस दमन बंद करो” जैसे नारे भी आंदोलन का हिस्सा बन गए। राजनीतिक रूप से यह मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि इलाके के विधायक खुद झारखंड सरकार में परिवहन मंत्री हैं। विपक्ष और आंदोलनकारी दोनों सवाल उठा रहे हैं कि जब परिवहन विभाग खुद स्थानीय प्रतिनिधि के पास है, तब भी जनता की मांगों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही।

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प्रवीण कुमार
मैं कौन हूं, क्या हूं, क्यों हूं, यह सब खुद मुझे भी नहीं पता क्यों कि खुद के बारे में बताना, जताना या उकेरना सबसे मुश्किल काम होता है। हां! बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और गीता के दर्शन से मैंने अपने जीवन को संवारने की कोशिश जरूर की है। बिहार के बेगूसराय जिले का रहने वाला हूं। जाने-अनजाने में पत्रकारिता के आंगन में ढाई दशक से अधिक वक्त से कूद-फांद कर रहा हूं। शुरूआती दौर में जी भरकर देश के तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में वैचारिक लेखन किया। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर लिखने में अपनी रूचि रहती है। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर लेखन कर रहा हूं। डिजिटल और सोशल मीडिया कंसल्टेंट के तौर भी हाथ साफ करता रहता हूं। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान फेक न्यूज़ की बयार को गहराई से जांचा परखा था। उससे पहले नोएडा स्थित ज़ी न्यूज़ में हिन्दी वेबसाइट की शुरूआत कर काफी लंबा वक्त गुजारा। इससे भी पीछे का पूछेंगे तो करीब डेढ़ दशक तक दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, अमर उजाला, दैनिक भास्कर समेत कई राष्ट्रीय व क्षेत्रीय अखबारों के संपादकीय विभाग में अलग-अलग भूमिकाओं को निभाते हुए एक पत्रकार के तौर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की, एक बेहतर इंसान भी बनने की कोशिश की, पर कितना बन पाया ये सब ''ऊपर वाले पर'' छोड़ता हूं...

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